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Sunday, June 14, 2020

अवसाद -2

जब होता है अवसाद नदियों को
धार क्षीण होती है पहले
उग आती हैं फिर जलकुंभियाँ
फिर सूख जाती हैं नदियाँ एक दिन

जब होता है अवसाद पेड़ों को
उनसे बिछड़ जाते हैं पत्ते
छूट जाता है हरे रंग से वास्ता
और पेड़ बन जाता है ठूँठ

जब होता है अवसाद जानवरों को
क्षुधा हो जाती है शांत उत्साह की तरह
और शरीर उर्जाविहीन 
वे हो जाते हैं विदा देखते हुए कातर आँखों से

जब होता है अवसाद मनुष्यों को
दिखता है अंधकार दिन के उजाले में
मुक्ति और मृत्यु घुल जाते हैं आपस में
नमक और जल की तरह

बनकर साक्षी कई युगों के अवसाद का भी
पत्थरों को अवसाद नहीं होता
ज़िंदा होना होता है
अवसादग्रस्त होने की पहली शर्त ।

Monday, November 16, 2015

अवसाद

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लिपटा है हर अप्रकाशित अनुभूति से
अन्धकार की तरह काला कोई दुःख
रख देती हूँ मैं तह करके दुखों को
अपने ही शरीर के हर जोड़ पर
जम जाती है हड्डियों में कैल्शियम की तरह,
और इस प्रकार संभाल लेती है पीड़ा मुझे


मेरे सपने टटोलते हैं अंधकार मे आलोक
पर नहीं पकड़ पाते हैं एक भी कतरा
सुख का फ़ानूस जल-जलकर बुझ जाता है
दुःख है कि टिका रहता है ध्रुव तारा की तरह
अपने निर्धारित स्थान पर- स्पष्ट और धवल
दुःख आसमान है-रंग नीला और सीमाहीन


भले बंजर हो चुकी हो मेरे आँखों की जमीन
और अभिघात बन चुका दिखता हो जीवन
मैं गाउंगी गीत बहारों के, भुलाकर अवसाद
कि कर पाये उम्मीद निराशा पर वज्र संघात
रखा है मौत का सामान जहाँ हर कदम पर
वहाँ ज़िंदा रहना ही है मेरा एकमात्र प्रतिवाद