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Friday, August 21, 2020

पंचतत्व

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बनकर स्रष्टा करना सृष्टि अहर्निश प्रेम की 

दफ़न करना अपनी जमीं पर सीने भर आशा 

कि अपने आप में पूरी पृथ्वी हो तुम 

जिसकी परिक्रमा करेंगे कई कई चाँद 

जो पोषित कर सकती है कई कई जीवन 


वृष्टि के जल को भर कलशी में 

पकाना दाल, धोना कपड़े 

बन मेघ भले पी जाना भवसागर  

आँखों का पानी बचा रहे 

बस इतना सा यत्न करना 


चूल्हे की आग में पकाना भंटा बैंगन

खाना पांता संग, मत करने देना शमन 

किसी को अपने भीतर की अग्नि का 

कि आत्मा में भर कर अंधेरा

नहीं लाया जा सकता उजाला जीवन में  


संसर्ग ही करना हो तो रहे ध्यान 

कि भले ही कर ले स्पर्श कोई शरीर का 

परन्तु तुम्हारे तुम को किंचित छू भी न सके 

न करना उत्सर्ग अपना असीम किसी को 

कि जमता रहे वहाँ संभावनाओं का मेघ 


बन चैत्र की आँधी घूमना माताल की तरह 

पर साधे रहना ताल जीवन का 

प्रेमशुन्य धरा पर लौटना बार-बार अनेक रूपों में 

बन कर प्रशांति की अविरल धारा 

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा 


Wednesday, July 18, 2018

बाउजी ने कहा

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ट्रेन की सीटी बजी
और वह चल पड़ी |
छोड़ते हुए बेटी का हाथ 
कट्टर माने जानेवाले बाउजी ने कहा -
"जा सिमरन जी ले अपनी जिंदगी"
और वह दौड़ पड़ी नायक की ओर 

फिल्म का अंतिम दृश्य देख सोचती रही 
वह असाधारण खूबसूरत युवती 
कि क्यूँ नहीं ऐसा उसके बाउजी ने कहा 
उसे उसकी मर्जी के खिलाफ ब्याहे जाने से पहले 
क्या उसकी जिंदगी अपनी नहीं थी !!!

Thursday, September 14, 2017

गुड़िया

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जन्मदिन के उपहार में तीन गुड़ियाँ मिलीं थी उसे 
जबकि दो पहले से ही रही उसके पास 
पाँच गुड़ियों का होना नहीं था कम किसी भी स्वप्न से 

पहली गुड़िया की बनाई ऊँची चोटी 
और  चूमते हुए उसे कहा "तुम मेरी छुटकी हो"
बार्बी नाम लेकर ही आई थी दूसरी 
जिसके सुंदर जूतों को निहारती थी देर तक 
तीसरी के पास गुलाबी फ्रॉक थी ठीक वैसी 
पहना था जैसा उसने अपने जन्मदिन पर और 
पूछकर माँ से रखा था उसका नाम "नयनतारा"
माँ उसे भी इसी नाम से बुलाती थी अक्सर 
नौ बरस की परी का रहा छोटा सा प्यारा संसार 

ठीक जब वह खेल रही थी अपने नए -पुराने गुड़ियों से 
और देख रही थी अगले जन्मदिन का प्यारा सपना 
घटित होती रही उसके जीवन में कुरूप एक घटना 
मामा कहती थी, मारा जिसने बचपन को किस्तों में 
नासमझ थी, फिर कौन करता है संदेह ऐसे रिश्तों में 
यह भी एक खेल है - बताता रहा उसे पूछे जाने पर 
और यह भी बताया कि गुड़िया वह थी इस खेल में 

जन्मदिन के उपहार में तीन गुड़ियाँ मिलीं थी उसे 
जबकि दो पहले से ही रही उसके पास 

अब वह कोई मामूली गुड़िया तो थी नहीं, हाड़-मांस की गुड़िया थी 
जब दिया जन्म उसने एक गुड़िया को, उसे नहीं पता था हुआ था जो 
रख दिल पर पत्थर कहा था माँ ने - पथरी थी, निकाल दिया डॉक्टर ने 
कह रहे थे लोग होकर हैरान हर तरफ - गुड़िया को गुड़िया हुई है  

जन्मदिन के उपहार में तीन गुड़ियाँ मिलीं थी उसे 
जबकि दो पहले से ही रही उसके पास 

बंद कर दी सभी गुड़ियाँ माँ ने अलमारी में एक रोज़ यह कहकर 
कि बंद हो जाना चाहिए अब गुड़ियों का खेल हमेशा के लिए 
कि दस बरस की लड़की बन चुकी थी खिलौना इस खेल आड़ की में 
सुबकती हुई लड़की कुछ भी नहीं समझ पायी 

जन्मदिन के उपहार में तीन गुड़ियाँ मिलीं थी उसे 
जबकि दो पहले से ही रही उसके पास ..........

Sunday, July 30, 2017

चरित्रहीन

(शरतचंद्र की किरणमयी के लिए)
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शरत बाबू ऐसे गए कि नहीं लौटे फिर कभी 
पर लेती रही जन्म तुम किरणमयी रक्तबीज सी 
दुनिया मनाती रही शरत जयंती बरस दर बरस 
नहीं बता गए शरत बाबू तुम्हारा जन्मदिन संसार को 
कि रहा आजन्म, जन्म लेना ही तुम्हारा सबसे बड़ा पाप 
और इस महापाप का ही तुम करती आ रही हो पश्चाताप 

अपने नयनों पर बनाकर पथरीला बाँध 
रोका तुमने अजश्र बूँदो का समुद्री तूफ़ान 
पास- परिवेश के पुरुषों का बन आसमान 
छुपाती रही अपनी समस्त असंतुष्टियों को 
स्निग्ध मुस्कान की तह में तुम घंटो चौबीस 
पढ़ाकर उन्हें अपने ही दुर्भाग्य का हदीस !!!

दिखता है तुम्हारे होठों पर मुस्कान का खिला हुआ ब्रह्मकमल 
जो बाँध लेता है अपनी माया से सबको, गहरे उतरने नहीं देता 
अदृश्य ही रह जाता है मन की सतह पर जमा कीचड़ लोगों से 
ठीक जैसा तुम चाहती हो अपनी लिखी कहानी की भूमिका में 
परिस्थितियों के बन्दीगृह का तुम अक्सर टटोलती हो साँकल 
गहन अन्धकार से नहा, पलकों पर लेती सजा, बिंदु -बिंदु जल 

निज को उजाड़ कर बसने देती हो पति का अहंकार घर 
रखती हो शुभचिंतकों को खुश अपनी अभिनय क्षमता से 
सजाती हो सामजिक आडम्बर से अपना प्रेमहीन संसार 
तुम्हारा असंदिग्ध भोलापन ही तो है सबसे बड़ी बीमारी 
कभी आईनाखाने जाकर देखो अपने होठों की उजासी 
हाँ, है तो फूलों सी ही बिलकुल, मगर वह फूल है बासी 

देखो उन मधुमक्खियों को, जो कर रही हैं चट 
छत्ते पर बैठ खुद अपना ही शहद संग्रह झटपट 
कि उन्हें पता है वो रहती हैं भालुओं के परिवेश में 
कब तक उड़ाती फिरोगी सपनों को सन्यासिनी के भेष में 
न करो फ़िक्र जमाने की, बाँध लो चाहनाओं को अपने केश में
क्या हुआ जो होना स्वतंत्र स्त्रियों का, है होना चरित्रहीन इस देश में 

अपने होठों पर फूलों की उजास नहीं, सूरज की किरण उगाओ  
सुनो समय की धुन लगाकर कान समयपुरुष के सीने से किरणमयी
बिखरो नहीं, गढ़ लो खुद को फिर एकबार अपने पसंद के तरीके से 
मत जिओ औरों की शर्त पर और, रखना सीख लो तुम शर्त अब अपने 
सुनती आई तो हो जमाने से जमाने की, सुनो अब केवल अपना ही कहना 
अपनी पुण्य आत्मा को कष्ट देने से तो है बेहतर तुम चरित्रहीन ही बनी रहना 

Saturday, April 8, 2017

कष्ट

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सुनो नताशा, 
न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

धो डालो यथाशीघ्र अपनी उँगलियों के पोरों पर जमे नक्षत्र-विषाद
नहीं तो जान लो नताशा, आएगा कोई राक्षस भिक्षुक के वेश में 
तुम्हारे कष्टों को तो नहीं ही हरेगा, तुम्हें छल जाएगा 
पौराणिक महाकाव्यों में उल्लेख है ऐसी कहानियों का

ठहरो नताशा, मत उगलो अग्निवर्षा करते शब्दबीज 
जिससे जल जाए तुम्हारे घर का दक्षिण दुआर 
जो संयोगवश प्रवेश द्वार भी है तुम्हारे घर का 
संभलो कि यह तमाशबीन समय है 
जानती तो हो न नताशा,  घर छोड़कर वन को निकली स्त्रियाँ 
भैरवी ही बनती हैं, बुद्ध नहीं बनती कदापि 

याद करो नताशा कि तुम्हारी माँ ने कहा था प्रेम नहीं करना 
कर सीता से यशोधरा तक का उल्लेख, कहा था
अत्यंत सुंदर स्त्रियों के भाग्य में प्रेम नहीं होता  
माँ के मुख से निकली बात किसी मंत्रोच्चार से कम तो नहीं होती नताशा
फिर कौन सा मुँह लेकर कहोगी कि वो जो रिश्ता था, अब रिसता है|

देखो नताशा, तुम्हारी खंडित स्मृतियों की परिक्रमा करता है शब्दयान 
और तुम्हें घेरे बैठी हैं कई दुर्लभ कवितायेँ 
तो करो प्रतिज्ञा कि नहीं पढ़ोगी प्रेम की आयूहीन कविता आजन्म 
हृदयहीन समाज की धिक्कारसभा में 

सुनो नताशा, 
यदि अपने दुखों के रंगों में रंग नील-बसना ही बनना है 
तो आसमान बन जाओ, करो अपने व्यक्तित्व का विस्तार अपरिमित 
किसी की छत बन जाओ, सजा लो कष्टों को बना सूरज, चाँद और तारे 
करो वृष्टि स्नेह की, जब दिल भर आये 

चलो, उठो नताशा, बहुत दूर जाना है 
और देखो आसमान की ओर सर उठाकर, कहीं कोई करुणाधारा नहीं है 
पर याद रहे नताशा,  न करना उल्लेख प्रेम या स्वाधीनता का कभी
कि मानवता की पृष्ठभूमि पर फूटता है कष्ट का झरना इन्हीं दो पर्वतों से 

सुनो नताशा, 
न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

Wednesday, January 11, 2017

अनुत्तरित

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खूब बारिश हुई थी उस साल और गाँव की इकलौती सड़क पर घुटने तक पानी जमा था| बारिश रुक चुकी थी| वह 2 किताबें और एक कॉपी, जिसपर फाउंटेन पेन खोंसा हुआ था, सीने से चिपकाए माथा नीचे किए ट्यूशन पढ़ने जा रही थी| अभी आधे रास्ते ही पहुँची थी कि जावेद चचा की दूकान पर बैठे चाय का लुत्फ़ उठाते पवन मिश्र ने टोका "काहे जा रही हो इतने पानी में? लड़की जात हो, आगे शादी-ब्याह ही तो करोगी| बरसाती घाव हो गया तो पाँव में निशान छोड़ जाएगा| एक महीना घर बैठ जाने से परीक्षा में फेल नहीं हो जाओगी| पास तो हो ही जाओगी|"

मधुरा ने कुछ भी नहीं कहा और सर हिलाकर आगे बढ़ गयी| उसके साथ उसके पड़ोस का लड़का कृष्ण मुरारी भी था| उससे किसी ने कुछ भी नहीं कहा| क्लास रूम में उसका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था| कुछ शब्द उसका पीछा कर रहे थे| यह वही शब्द थे जो रास्ते में उससे कहे गए थे| क्या वह सिर्फ इसलिए पास होने का अरमान रखे कि वह एक लड़की है? वह अव्वल क्यूँ न आए?

ट्यूशन के बाद वह सीधे घर लौट आयी थी; पर कुछ था जो उसे अच्छा नहीं लग रहा था| लेकिन क्या? पवन मिश्र का टोकना? तीन घंटों तक घुटने तक भींगे कपड़ों में क्लास रूम में बैठना? लड़की होना?  
देर तक खिड़की पर चिंतन की मुद्रा में बैठे रहने के बाद शाम में मन ठीक करने के लिए मधुरा  ने हारमोनियम निकाला| वह राग भूपाली की बंदिश गा रही थी-

"सा ध प ग रे सा.....................
लाज बचाओ कृष्ण मुरारी, तुम बिन और न दूजो कोई
बीच भँवर में आन फंसी अब नैया मोरी डगमग डोले
पार लगाओ शरण तिहारी ......"

पास के कमरे से चचेरा भाई चिल्लाता हुआ आया "कोई ढंग का गाना नहीं गा सकती !! शाम के साढ़े सात बजे "लाज बचाओ, लाज बचाओ" चिल्लाओगी तो आस-पड़ोस वाले क्या समझेंगे ...और लाज बचाना ही है तो घर में जवान भाईयों के रहते कृष्ण मुरारी को क्यूँ बुला रही हो??"

"अरे! यह बंदिश है और यह पड़ोस का कृष्ण मुरारी नहीं है| इसमें भगवान् श्रीकृष्ण को पुकारा गया है| इस बंदिश को मैंने तो नहीं लिखा, गुरु जी ने सिखाया है" मधुरा ने झल्लाते हुए कहा और गाना बंद कर हारमोनियम को यथास्थान रख आयी| 

मधुरा के पड़ोस में एक कृष्णभक्त मारवाड़ी परिवार रहता था| उस घर के चारों बच्चों के नाम क्रमशः श्यामलता, श्यामबिहारी, कृष्ण मुरारी और कृष्णकांता थे| श्यामलता लगातार तीन सालों तक फेल हुई और अब वह भी मधुरा  की कक्षा में ही थी| कभी-कभार स्कूल तो चली जाती थी, पर वह ट्यूशन पढ़ने नहीं जाती थी| गाँव की अन्य लड़कियों की तरह उसे बस पास ही होना था; पर उसके लिए यह भी नाक से पानी पीने जैसा ही था| कृष्ण मुरारी मधुरा के साथ ही ट्यूशन पढ़ने जाता था| ऐसा नहीं था कि किसी ने दोनों को साथ जाने के लिए कभी कहा हो, पर कृष्ण मुरारी ने हमेशा मधुरा  के साथ चलना अपना कर्तव्य समझा| ऐसा भी नहीं था कि दोनों साथ ही घर से निकलते थे, कभी मधुरा को घर से निकलने में देर हो जाती, तो वह गली के मोड़ पर उसका इन्तजार करता| बिना कुछ कहे साथ चलता रहता|

बाहर झींगुरों का शोर था| आधा गाँव सो चूका था और बाकी के आधे गाँव वाले सोने की तैयारी कर रहे थे| कोई बर्तन मांज रही थी तो कोई रोटियाँ सेंक रही थी| कोई लाठी लिए "जागते रहो" पुकार रहा था तो कोई आँखें बंद किए राम-नाम  की माला फेर रहा था| मधुरा मच्छरदानी टांग रही थी कि माँ ने सलाद काटने के लिए बुला लिया| 

अगले दो घंटों के बाद घर-बाहर हर ओर सन्नाटा पसरा था सिवाय उस गाँव के जो मधुरा  के मानस में बसा हुआ था| इस गाँव में न तो सूरज अस्त होता था; न ही चाँद खिलता था| बाइस्कोप की तरह बस रील दर रील दृश्य उभरते थे| इस गाँव को नींद नहीं आती थी| यह एक बेचैन गाँव था जो हरदम जगा रहता था| यह गाँव क्या चाहता था मधुरा  से? या मधुरा  इस गाँव से कुछ चाहती थी? बाइस्कोप की एक रील में उसने श्यामलता का चेहरा देखा| उसकी शक्ल दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले धारावाहिक "उड़ान" की नायिका से हू-ब-हू मिल रही थी| पर आईपीएस अधिकारी बनने के लिए बहुत पढ़ना पड़ता है| श्यामलता क्यूँ सिर्फ पास होना चाहती थी? क्या उसे कभी अव्वल आने का ख्याल आया होगा? क्या उसे फैसला सुना दिया गया था कि अंततः उसे भी चौका-बासन ही संभालना है? 

रात का चाँद नरम पड़ रहा था और खिड़की से आती उसकी ज्योत्स्ना मधुरा  को किसी चादर की तरह ढँक रही थी| एक प्रकार की क्लान्ति अब भी जाग रही थी उसके अन्दर| बाइस्कोप की अगली रील में मीराबाई बनी हेमा मालिनी की तस्वीर है| उसके हाथ में कोई वाद्ययंत्र है| मधुरा सोचने लगी कि क्या मीराबाई ने कभी राग भूपाली की उस बंदिश को गाया होगा?  क्या किसी ने उसके इस बंदिश गाने पर पाबंदी लगाई होगी? प्रेम क्या सिर्फ मुर्तियों से की जाने वाली चीज है? क्या पड़ोस के किसी लड़के से प्रेम करना अक्षम्य अपराध है?

"जागते रहो" की कर्कश आवाज एकदम से मधुरा की कानों में पड़ती है और वह अपने मानस में बसे उस गाँव से बाहर निकल आती है| लाठी की ठक-ठक की आवाज देर तक सुनायी देती है| उसकी जेहन में कृष्ण मुरारी आता है| वह भी चौकीदार की लाठी की तरह ही है| कुछ कहता नहीं है, पर उसकी पदचाप उसके मौन पर भारी पड़ते हुए उसके होने का आभास कराती है| क्लास में भी कम ही बोलता है| क्या कृष्ण मुरारी भी एकदिन चौकीदार बनेगा? गाँव का चौकीदार बनेगा या देश का? क्या चौकीदार को भी राम-नाम की माला की जरुरत पड़ती होगी? क्या सरहद पर जवान मच्छरदानी में सोते होंगे? क्या कृष्ण मुरारी ने मच्छरदानी टांगना सीखा होगा? 

मधुरा करवट बदलती है और नींद के आगोश में चली जाती है| अब वह सपनों की दुनिया में है| वह सपना देखती है कि वह रोटियाँ बेल रही है और वह गोल न होकर किसी देश के नक़्शे सा दिखता है| वह रोटी सेंकने के लिए तवे पर चढ़ाकर सलाद काटने लगती है और रोटी जल जाती है| वह बर्तन मांजने के लिए आँगन में चापाकल के नीचे आती है और जोरों की बारिश शुरू हो जाती है| वह पूरी तरह से भींग जाती है| वह ठण्ड से कांपने लगती है| इसी क्रम में उसकी नींद खुल जाती है| वह सोचने लगती है क्या होगा अगर सच में ब्याह के बाद वह गोल रोटियाँ न बेल पाए तो? क्या वह किसी ऐसे राज्य या देश में जाकर नहीं रह सकती जहाँ लोग भात खाते हों? क्या पवन मिश्र के घर की स्त्रियाँ बारिश में भींगकर बर्तन मांजती होंगी? क्या पवन मिश्र उनसे बारिश के पानी में भींगने से मना करते होंगे? क्या उनके शरीर पर बरसाती घाव का निशान होगा?

सुबह की अजान तय करती है मधुरा के रियाज का वक़्त| हारमोनियम लेकर बैठ तो गयी, पर गाये क्या? उसे राग भैरवी का रियाज करके गुरूजी के पास जाना है और बंदिश है -

"मधुर बन्सी नाद सुनत 
ब्रिज सुन्दरी भई पुलकित 
चित आवत श्याम मुरत"

यह महज संयोग ही था कि जिस संगीत विद्यालय में मधुरा शास्त्रीय संगीत सीखने जाती थी, उसी विद्यालय में कृष्ण मुरारी का बड़ा भाई श्यामबिहारी बाँसुरी बजाना सीख रहा था| एक दिन पहले चचेरे भाई ने जो सुनाया, उसके बाद यह बंदिश गाना बिलकुल भी हितकारी नहीं था| हारमोनियम की 'सा' कुंजी पर ऊँगली धरे मधुरा सोच रही थी कि गुरूजी ने देवी सरस्वती को सुर की देवी तो बताया पर पिछले दो सालों में किसी भी राग की किसी भी बंदिश में "शारदा" या "सरस्वती" जैसा शब्द क्यूँ नहीं मिला? ज्यादातर बंदिशों में कृष्ण की लीला और कुछ में शिव की महिमा का ही गान क्यूँ है? क्या किसी रोज वह खुद अपनी बंदिशें लिख पाएगी? क्या वह पहली बंदिश में देवी सरस्वती का ज़िक्र करेगी? क्या किसी बंदिश में वह अपने प्रेमी का नाम लिख पाएगी? क्या वह उस बंदिश को अपने पिता या भाई के समक्ष गा सकेगी? क्या कभी ऐसा भी हो सकता है कि उसके गाने पर ही बंदिशें लगा दीं जाएँ?

मधुरा ने आरोह, अवरोह और तान का रियाज किया और हारमोनियम रख आयी| चाची ने धुले हुए कपड़ों को पसारने में मदद करने के लिए मधुरा को छत पर बुलाया| अभी मधुरा ने दो-तीन कपड़े ही पसारे होंगे, चाची ने कहा "तुम्हारी माँ किसी से बता रही थी कि तुम आगे डॉक्टर बनने की पढाई करने वाली हो?"

"इतना आसान कहाँ है चाची| बहुत पढ़ना होता है; फिर कम्पटीशन और फिर ..."

मधुरा अपनी बात समाप्त भी नहीं कर पायी थी कि चाची ने कहा "हाँ , कोई जरूरत नहीं है ये सब करने की| पराया धन हो, दूसरों के घर ही जाना है तो फिर बाप का पैसा क्यूँ बर्बाद करना| लड़की अपने बाप के लिए नहीं सोचेगी तो कौन सोचेगा| तुम तो बस बीए कर लो और शादी कर लो| वैसे भी ज्यादा पढ़ाई करने से आँखों के नीचे काले दाग हो जाते हैं|"

मधुरा चुपचाप कपड़े पसार रही थी और सोच रही थी कि लड़की होना ज्यादा बड़ी समस्या है या शरीर पर दाग वाली लड़की होना? पाँव में बरसाती घाव का निशान ज्यादा परेशान करता है इस समाज को या आँखों के नीचे का काला दाग? तो क्या टीवी पर वह झूठ कहती है कि "दाग अच्छे हैं"?

मधुरा ने अपनी सवालिया तितलियों को वक़्त के गाँव भेज दिया है| सुना है समय डाकिया जवाब दे जाता है| क्या मधुरा के पास इतना वक़्त होगा? क्या समय की चिठ्ठियाँ सही पते पर पहुँचेंगी?

Tuesday, August 9, 2016

जरूरतें

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सम्मान और सामान
श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द थे
स्त्री के लिए पुरुष के शब्दकोष में
जिनका अर्थ तय करती थीं जरूरतें
वक्त बेरहम अक्सर पलट जाता था

---सुलोचना वर्मा -------

Monday, October 12, 2015

आकार

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सब जानते हैं  
कि वह नही बेल पाती
चाँद सी गोल रोटियाँ
और ना ही बेल पाती है
समभुज त्रिकोण वाले पराठे


पर वह भरती है पेट कुछ लोगों का
लाकर चावल, आंटे, नमक और घी
साथ ही लाती और भी कई ज़रूरी सामान
जो होने चाहिए किसी रसोई में

है शुद्ध कलात्मक क्रिया
पेट भर पाना, अपना और औरों का
कि जहाँ पेट हों भरे ,
लोग निहार सकते हैं चाँद को घंटों
और कर सकते हैं चर्चा उसकी गोलाई की


भरा पेट देता है दृष्टिकोण
कि आप देख पाएँ
बराबर है त्रिभुज का हर कोण


सामान्य है ना बेल पाना
रोटियों और पराठों का
कमाकर लाना भी सामान्य ही है


असामान्य है समाज का स्वीकार लेना
एक ऐसी स्त्री को, जो सभी का पेट भरते हुए
नही बेल पाती है सही आकार की रोटी और पराठे 


रसोई के बाहर अमीबा नज़र आती है स्त्री

-----सुलोचना वर्मा-------

Friday, June 12, 2015

शून्य के जनसमुद्र में

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हो उठा है कुत्सित ये मनहूस शहर
किसी स्तनविहीन नग्न नारी की देह के समान 
और रात है एक पेड़ जिसपर लटक रहा है लालच
बनकर चमगादड़ों का कोई झुण्ड


खो गयी है इक रात उसके जीवन की 
जिसे वह जी सकती थी सोकर या जागते हुए
जिसे पी गया है अंधकार स्वाद की ओट में
और अवाक रह गयी अभिसार को निकली युवती


कहाँ से ढूँढे सांत्वना का कोई भी शब्द ऐसे में
जहाँ ले चुकी हैं समाधि हमारी भावनाएँ
गूँजती हो जहाँ साज़िश शून्य के जनसमुद्र में
जहाँ भोर होते ही पूजी जायेगी फिर एक कन्या


------सुलोचना वर्मा--------------

Sunday, May 24, 2015

स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं

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इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं
कि शोध करे कण भौतिकी पर
और ठीक स्वर्ण पदक पा लेने के बाद
घर बैठे बन बेरोजगार बिना किसी ग्लानी के


वो कर सकती हैं प्रेम टूटकर किसी से
और जा सकती हैं किसी अजनबी के साथ बिताने उम्र
ऐसे में कुल की मर्यादा की रक्षा करने के लिए
इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं


इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं
कि जन सकें आठवीं बेटी बेटे की आस में
और जीतीं रहें यंत्रवत जीवन साल दर साल
किसी अनजाने भय में होकर लिप्त


वो हो सकती हैं अनुकूलित जरुरत के हिसाब से
कि उनकी अपनी कोई इच्छा ही नहीं होती
किसी भी प्रकार की ग्लानी, दुःख और पीड़ा से
इस देश की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं


मेरी आँखों में अक्सर खटकती है ऐसी स्वतंत्रता
कि पनपे आधी आबादी को भी करोड़ों साल बीते
पूछती है अपनी निजता की पराधीन मेरी आत्मा
इस देश की स्त्रियाँ इतनी स्वतंत्र क्यूँ हैं!!!


-------सुलोचना वर्मा---------------

Saturday, December 13, 2014

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी

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एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
बस सोती रही देर तक
घण्टों नहाया झरने में
धूप में सुखाये बाल
और गाती रही पुरे दिन कोई पुराना गीत


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
बिंदी को कहा "ना"
कहा चूड़ियों से "आज नहीं"
काजल से बोली "फिर कभी"
और लगा लिया तन पर आराम का लेप


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
न तोड़े फूल बगीचे से
न किया कोई पूजा पाठ
न पढ़ा कोई श्लोक ही
और सुनती रही मन का प्रलाप तन्मयता से


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
तवे को दिखाया पीठ
खूब चिढ़ाया कड़ाही को
फेर लिया मुँह चाकू से
और मिलाकर घी खाया गीला भात


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
न साफ़ की रसोई
न साफ़ किया घर
नहीं माँजा पड़ा हुआ जूठा बर्तन
और अंजुरी में भरकर पिया पानी


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
रहने दिया जूतों को बिन पॉलिश के
झाड़न को दूर से घूरा
झाड़ू को भी अनदेखा कर दिया
और हटाती रही धूल सुन्दर स्मृतियों से


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
न ही उठाया खिड़की से पर्दा
न ही घूमने गयी कहीं बाहर
न मुलाक़ात की किसी से
और बस करती रही बात अपने आप से


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
जो उसे करना था रखने को खुश औरों को
कि उसे नहीं था मन कुछ भी करने का
जीना था उसे भी एक दिन बेतरतीबी से
और मिटाना था ऊब अभिनय करते रहने का


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
दरअसल वह गयी थी जान
कि नहीं था अधिक ज़रूरी
कुछ भी जिंदगी में
जिंदगी से अधिक


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
बस मनाया ज़श्न
अपने जिंदा होने का


------सुलोचना वर्मा -----------

Tuesday, July 8, 2014

विदाई

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दिवाली के बाद
जब आयी सहालग की बारी
हो गई डोली विदा घर से
और चले गए बाराती


खड़ा रहा पिता
दुआरे पर बहुत देर
मन सा भारी कुछ लिए


देखती रही माँ एकटक
गुलाबी कुलिया चुकिया
जो भरा था अब भी
खाली-खाली से घर में


----सुलोचना वर्मा----

Monday, June 23, 2014

तीस पार की आधुनिका

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जब तीस पार की आधुनिका करती है प्रेम
तो तोड़ देती है सारी वर्जनाएं
उम्र, धर्म और समाज की
और लिख देना चाहती है नाम प्रेमी का
शहर की सबसे ऊँची ईमारत पर
बड़े बड़े काले अक्षरों में
उसी प्रेम को उसका प्रेमी 
धर देता है किताब के पन्नो के बीच
मोर पंख की तरह
फिर हो जाता है व्यस्त
हरे, नीले और सुनहरे रंगों के बीच
और ढूँढने लगता है प्रेम का गुलाबी रंग उसमे


तीस पार की आधुनिका को नहीं पसंद गुलाब
कि उसकी उँगलियाँ डूबी होती है काँटों से मिले लहू में
प्रेमी को कहती है चाँद और महक जाना चाहती है
बनकर प्रेम सा झक्क सफ़ेद इवनिंग प्राइमरोज
मना लेना चाहती है वह उत्सव जिंदगी का


जब देखती है प्रेमी को, बुनती है ख्वाब प्रेम के आसमान पर
उसके ख़्वाबों को चिन्हित करता है आसमान में उड़ता हवाई जहाज
प्रेमिका देखती है हवाई जहाज और फिर देखती है प्रेमी को
प्रेमी कर लेता है कैद प्रेमिका को हवाई जहाज के साथ कैमरे में
ढाई सेकण्ड की इस घटना में पुरे पच्चीस साल फिर से जी लेती है
प्रेम में जवान एक नवयुवती, जो है तीस पार की आधुनिका


सुलोचना वर्मा

Wednesday, June 4, 2014

कविता

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जब कविता छपती है अखबारों में
कुछ शब्द जोड़ती है हौंसलों के
अनुभवों के खाते से निकाल कर 


जब कविता गाती है किसी गीत समारोह में
तो उम्मीदों को देती है स्वर
अपने अधूरे सपनो से लेकर उधार 


पर जब खूबसूरत कविता लौट आती है घर
साहस नहीं रह जाता शेष अनुभवों के खाते में
उम्मीदें दब जाती हैं कर्जदारों के स्वप्निल स्वर में


खत्म हो जाती है इसप्रकार एक बेहतरीन कविता
जिसका छपते रहना और गाते रहना था बेहद ज़रूरी


सुलोचना वर्मा

Friday, May 30, 2014

सोने की चिड़ियाँ

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विश्व के मानचित्र पर
आज भी चिन्हित है वह देश
कहलाता था जो कभी विश्व गुरु
और था समृद्ध हर दृष्टि से  
हर लड़का होता था कान्हा उस देश का
और राधा कही जाती थी लडकियां

जब वहाँ हर डाल पर होता था बसेरा
सोने की चिड़ियाँ का
अक्सर बन जाया करती थी कुछ नारी
गणिका, नगरवधू या देवदासी
और ठीक उसी समय
पुरुष रहा करता था केवल पुरुष

जहाँ नारी स्त्री से बन जाती थी सती
पुरुष बना रहता था पति
मृत्यु शैया तक
जहाँ रानियों को मान लेना होता था जौहर
पुरुष बना रहता था शौहर
बहुपत्नीवाले सभ्य समाज में
नहीं थी शिकायत किसी को भी
समाज की इस दोहरी बनावट से
ना ही स्त्री को , ना ही पुरुष को
और असर था यह ज्ञान का
जो दिया जाता रहा लिंग के आधार पर

आधुनिकता के इस दौर में 
सचमुच की जीवित चिड़ियों के साथ
गायब है सोने की चिड़ियाँ डाल पर से
नहीं रोते लोग यहाँ अब लड़की के जन्म पर
उसे तो जन्म लेने ही नहीं देते
और जो ले चुकी है जन्म
करते हैं उनका शोषण; हर प्रकार से
फिर लहराते हैं किसी पेड़ पर परचम
अपने पुरुषत्व का डंके की चोट पर

तरक्की कर ली है हमने हर मायने में
और जारी है हमारा सभ्य होते रहना
इतना सभ्य हो जाएगा
इस समाज का पुरुष  निकट भविष्य में
बाँट लेगा पत्नी को भाई -बंधुओं में
बता देगा इस कृत्य को माँ का परम आदेश
और माँ ? क्या करेगी माँ ?
खींच देगी बहु का घूंघट कुछ ज्यादा ही लम्बा
कि नहीं करना पड़े सामना
उसकी आँखों में तैरते सवालों का
दर्द का, नफरत का
या समझा लेगी खुद को यह कहकर
कि गलती कर जाया करते हैं लड़के
या फिर जश्न मना रही होगी
अपनी अजन्मी बेटियों को जन्म नहीं देने का

ये सिलसिला चलता रहेगा तब तक
जब रह जायेगी धरती पर
एक अकेली औरत
ठीक उसी समय आएगा
किसी धर्म का कोई गुरु
जो बांचेगा ज्ञान यह कहकर
कि बनाया है औरत को उसने अपनी पसली से
और उस औरत का धर्म होगा तय
सभ्यता को आगे बढ़ाना !!!!

इस प्रकार पार कर
असभ्यताओं की सारी सीमाएं
करेगा मानव प्रवेश पुनः
किसी सभ्यता वाले युग में
जहाँ हर डाल पर फिर होगा बसेरा
सोने की चिड़ियाँ का |


सुलोचना वर्मा

Tuesday, May 27, 2014

मेरे जैसा कुछ

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नहीं हो पायी विदा
मैं उस घर से
और रह गया शेष वहाँ
मेरे जैसा कुछ


पेल्मेट के ऊपर रखे मनीप्लांट में
मौजूद रही मैं
साल दर साल


छिपी रही मैं
लकड़ी की अलगनी में
पीछे की कतार में


पड़ी रही मैं
शीशे के शो-केस में सजे
गुड्डे - गुड़ियों के बीच


महकती रही मैं
आँगन में लगे
माधवीलता की बेलों में


दबी रही मैं
माँ के संदूक में संभाल कर रखी गयी
बचपन की छोटी बड़ी चीजों में 


ढूँढ ली गयी हर रोज़
पिता द्वारा
ताखे पर सजाकर रखी उपलब्धियों में


रह गयी मैं
पूजा घर में
सिंहासन के सामने बनी अल्पना में


हाँ, बदल गया है
अब मेरे रहने का सलीका
जो मैं थी, वो नहीं रही मैं |


---------सुलोचना वर्मा -------

Saturday, May 17, 2014

सादगी

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रूठ गयी चूड़ियाँ कलाई से
आईना देखता रहा 
बिंदी जा लिपटी मेरी परछाई से
और देखती रही एकटक मुझे |


मुझे मुझमे विलीन होता देख
जाते-जाते  बिछिया ने पाँव में काटी
एक ज़ोरदार चिकोटी  !


भारी हो उठा पाजेब द्वन्द में
घूँघरू मोती बरसाते रहे
बिलख उठा बाजू पर बँधा ताबीज़
पिघलता चला गया उसमे भरा मोम
और उड़ गयी दुआ पंख लगाकर दूर वीरानो में |


आँखों ने सोख लिया सारा का सारा काजल
और भरती ही चली गई अंतस की सुरमेदानी में |


घूर रही हैं पेशानी पर तैरते सवालों को
मेरी बेनाम सी अधूरी ख्वाहिशें
कुछ और उलझ गयी हैं
मेरे माथे की मुलायम लटें
शूल सा चुभ रहा है ह्रदय में
गले की हार से लगा लॉकेट
लहुलुहान कर गया मुझे बेतरतीब होकर
सादगी का ये प्रौढ़ आलिंगन !!!


(c)सुलोचना वर्मा

Friday, May 9, 2014

दो चोटी वाली लड़की

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ना इतराना दो चोटी वाली लड़की
जो कह दे तुम्हें कोई गुलाब का फूल
कि जो ऐसा हुआ
ताक पर रख दी जायेगी तुम्हारी बौद्धिकता
फिर तुम्हें दिखना होगा सुन्दर
तुम्हें महकना भी होगा
फिर .........
चर्म इन्द्रि से देखना चाहेंगे लोग तुम्हारा सौन्दर्य
और लगभग भूल जायेंगे विलोचन की उपस्थिति
उमड़ पड़ेंगे लोग लेने तुम्हारा सुवास
कुछ लोग महानता का ढोंग भी रचेंगे
और तुम्हारा कर देंगे उत्सर्ग किसी देवता के चरणों में
इन सभी परिस्थितियों में
बिखर जायेंगी तुम्हारी पंखुडियाँ
और तुम्हे मुरझा जाना होगा


क्या जानती हो दो चोटी वाली लड़की
नहीं ख़त्म होगी बात तुम्हारे मुरझा जाने पर
और समाज सोचेगा भी नहीं
कि वह कर देगा व्यक्त अपनी मानसिक अस्‍वस्‍थता को 
जब जब करेगा प्रश्न तुम्हारे यौन शुचिता की
और तुम बनी रह जाओगी केवल और केवल
एक शर्मनाक विषय,
एक नीरस चर्चा,
जिसे समाज स्त्री कहता है 


सुनो दो चोटी वाली लड़की
तुम्हें बनना है बछेंद्री पाल
और नाप लेना है माउंट एवरेस्ट
गाड़ देना है झंडा अपने वजूद का
और अपने नाम का परचम लहराना है
विश्व के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर पर .......


तुम्हे मैरीकॉम भी बनना है दो चोटी वाली लड़की
कि तुम जड़ सको जोरदार घूँसा
हर उस मनहूस चेहरे पर
जिसकी भंगिमाएँ बदलती हों
तुम्हारे शरीर की बदलती ज्यामिति पर ......


दो चोटी वाली लड़की, बन सकती हो तुम मैरी अंडरसन
जो करे इजाद एक ऐसा विंडशील्ड वाइपर
जिसे लोग करे इस्तेमाल
अपने दिमाग पर पड़े धुल को धोने के लिए
और फिर एक हो जाए उनका रवैया लड़का और लड़की के लिए .....


बन सकती हो तुम ग्रेस हूपर दो चोटी वाली लड़की
और लिख सकती है कोबोल जैसी कोई नयी भाषा
जिसे पढ़ें उभय लिंग के प्राणी बिना भेदभाव के
और डिस्प्ले लिखकर कहे "हेल्लो वर्ल्ड "
बड़े ही जिंदादिली और बेबाकी के साथ .......


जो ऐसा कुछ नहीं बन पायी दो चोटी वाली लड़की
तो कर लेना अनुसरण अपने पिता का...खेतों... खलिहानों  तक
लगा लेना झूला आम के किसी पेड़ पर और बौरा जाना
जैसे बौराती है अमिया की डाली फागुन में
खूब गाना कजरी सखियों के संग मिलकर
ऐसे में कहीं जो कोई धर दे तुम्हारी जुबां पर हाथ
मंथर होने लगे तुम्हारी आवाज़
उठा लेना हाथ में हंसुआ
और काट देना गन्दी फसल को......... जड़ से....
फिर खोल लेना अपनी चोटियाँ मुक्तिबोध में
बना लेना गजरा खेत के मेड़ पर उग आये वनफूलों से
खोंस लेना बालों में आत्मविश्वास के साथ
चल पड़ना हवा के बहाव की दिशा में
कि तुम हो प्रकृति
तुम्हे रहना है हरा भरा...हर हाल में |


बताओ न, दो चोटी वाली लड़की,
तुम्हें क्या बनना है ?


-----(c)सुलोचना वर्मा--------------

Thursday, April 24, 2014

पूरा प्रेम

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पांचाली से करता था प्रेम 
अंग प्रदेश का कर्ण
और पांडवों में बाँट दी गयी द्रौपदी
पत्नी, जो पांच भाईयों की थी
चाहती थी अर्जुन को सर्वाधिक
बन गयी नरक की भागी


उस युग में भी नारी करती थी प्रेम
सचमुच का प्रेम, असीम प्रेम 


एक प्रेम अहिल्या ने किया
कर दी गयी परिवर्तित शिला में
एक प्रेम शकुन्तला ने भी था किया
और रह गयी चिर प्रतीक्षारत वन में
पार्वती ने तो प्रेम में तपस्या ही कर डाला
किया इतना प्रेम और बन गयी मत्स्या
समर्पण उसका सम्पूर्ण था
फिर भी, प्रेम रहा अतृप्त |


जीवन में थोड़ा प्रेम, थोड़ी अतृप्ति
और अतृप्ति के अनेकों अभिशाप
मृत आत्मसम्मान
सुप्त अभिलाषाएं
मानसिक प्रताड़ना
दैहिक कष्ट
लुप्त निंद्रा
और भी कई .........


उसे चाहिए था सम्पूर्ण समर्पण का पूरा प्रेम
वह शिला नहीं, ना ही मीन, नहीं वस्तु
वह थी नारी, नर समान जीवंत नारी
धरती का लगभग आधा हिस्सा
और पूरा प्रेम पाने की अधिकारिणी नारी |


वह संत शिरोमणि नहीं, था केवल एक पुरुष
लिखा जिसने नारी को तारण की अधिकारी
उस महाकाव्य को मैं एक मिथक लिखूंगी
कि नहीं हो सकती वह रचना महान जिसमे
नर और नारी के ना हों समान अधिकार 
जहाँ बस प्रेम की व्याख्या तो लिखी हो
और उपस्थित ना हो लेशमात्र विश्वास 
जहाँ नर को प्रभु कह करे संबोधित
करे गुणगान उसके महिमा की
उसी पृष्ठ पर करे चित्रित नारी को
जिसमे झुका हो उसका माथा
नहीं चिंता किसीको उसकी  गरिमा की |                              

(c)सुलोचना वर्मा

Thursday, April 17, 2014

घर से भागी हुई लड़की

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घर से भागी हुई लड़की
चल पड़ती है भीड़ में
लिए अंतस में कई प्रश्न 
डाल देती है संदेह की चादर
अपनापन जताते हर शख्स पर
पाना होता है उसे अजनबी शहर में
छोटा ही सही, अपना भी एक कोना
रह रहकर करना होता है व्यवस्थित
उसे अपना चिरमार्जित परिधान
मनचलों की लोलुप नज़रों से बचने के लिए
दबे पाँव उतरती है लॉज की सीढियां
कि तभी उसकी आँखें देखती है
असमंजस में पड़ा चैत्र का ललित आकाश
जो उसे याद दिलाता है उसके पिता की
करती है कल्पना उनकी पेशानी पर पड़े बल की
और रह रहकर डगमगाते मेघों के संयम  को
सौदामनी की तेज फटकार
उकेरती है उसकी माँ की तस्वीर
विह्वल हो उठता है उसका अंतःकरण
उसके मौन को निर्बाध बेधती है प्रेयस की पदचाप
और फिर कई स्वप्न लेने लगते हैं आकार
पलकों पर तैरते ख्वाब के कैनवास पर
जिसमें वह रंग भरती है अपनी पसंद के
यादें, अनुभव, उमंग  और आशायें
प्रत्याशा की धवल किरण
और एक अत्यंत सुन्दर जीवन
जिसमें वह पहनेगी मेखला
और हाथ भर लाल लहठी
जहाँ आलता में रंगे पाँव
आ रहे हों नज़र
कैसे तौले वह खुद को वहाँ
सामाजिक मापदंडों पर  .......


(c)सुलोचना वर्मा