Showing posts with label दशहरा. Show all posts
Showing posts with label दशहरा. Show all posts

Thursday, October 10, 2013

दुर्गा पूजा


शक्ति के उपासक हैं ये लोग
यहाँ स्कंदमाता की पूजा होती है
गणेश कार्तिक को भोग लगता है
और अशोक सुंदरी फुट फुट रोती है


चंदन नही, रक्त भरे हाथों से
देवी का शृंगार करते हैं
गर्भ की कन्याओं का जो
वंश के नाम संहार करते हैं

अचरज होता है क्यूँ शक्ति के नाम पर
नौ दिनो का उपवास होता है
कहाँ मिलेंगी कंजके लोगों को
जहाँ गर्भ उनका अंतिम निवास होता है


कभी मन्त्र से, कभी जाप से
नर तुमको छल रहा है
मत आओ इस धरती पर देवी
यहाँ तो चिरस्थायि
भद्रकाल चल रहा है


सुलोचना वर्मा

Monday, September 16, 2013

दशहरा

क्यूँ पुतले को फूँककर
खुशी मनाई जाए
क्यूँ एक रावण के अंत का
जश्न मनाया जाए
कितने ही रावण विचर रहे
यहाँ, वहाँ, और उस तरफ
क्यूँ ना उन्हे मुखौटों से पहले
बाहर लाया जाए

 
इस साल दशहरे में नयी
रस्म निभाई जाए
राम जैसे कई धनुर्धरो की
सभा बुलाई जाए
हर रावण को पंक्तिबद्ध कर
सज़ा सुनाई जाए
अंत पाप का करने को उनमे
आग लगाई जाए

 
हर घर में नई आशा का
दीप जलाया जाए
अपहरण को इस धरती से
फिर भुलाया जाए
किसी वैदेही को कहीं अब
ना रुलाया जाए
गर्भ की देवियों को भी
बस खिलखिलाया जाए

 
सुलोचना वर्मा