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Friday, July 27, 2018

दुःस्वप्न

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उसने देखा बैठक कक्ष में दीवान पर उसके पति के पास उसका देवर बैठा है जो उसकी बेटी के साथ खेल रहा है| पास सोफे पर उसके कॉलेज का दोस्त कुंदन बैठा है| वो सभी धीमे-धीमे आपस में बात कर रहे हैं जो वह नहीं सुन पा रही है क्यूँकि वह कुछ दूरी पर खड़ी है| कोई आकर कुंदन के लिए खाना पड़ोस गया और वह खाने में मशगुल हो गया | माहौल में एक किस्म की उदासी पसरी हुई दिख रही है| वह कुछ देर उन्हें निर्विकार देखती रही | फिर उसने देखा कि कुंदन खाना समाप्त कर हाथ धोने के लिए उठकर सीधा उस ओर आ रहा है जहाँ वह खड़ी है| कुंदन ने वाश बेसिन का नल खोला, हाथ धोया और नल बंद करते हुए जैसे ही उसकी नजर बाथरूम की बायीं ओर गयी, वह पहले चौंका और फिर बुरी तरह डर गया | वह इतनी बुरी तरह डर गया कि हड़बड़ी में बाथरूम से निकलकर किसी से बिना कुछ कहे घर से निकल गया | वह कुछ देर सोचती रही कि कुंदन उसे देख क्यूँ डर गया और फिर उसे याद आया कि उसकी मौत को अभी कुछ ही दिन बीते हैं| वह कुंदन से कुछ कहना चाह रही थी, इसलिए उसके पीछे दौड़ पड़ी | कुंदन अपनी गाड़ी में बैठ चुका था | वह पसीने से तर हो रहा था | उसने कार स्टार्ट किया तो अचानक से हर ओर धुँआ -धुँआ  हो गया | वह उस धुएँ की ओर बढ़ ही रही थी कि तभी कामवाली ने घर का बेल बजा दिया और वह नींद से जाग गयी | जागते ही सबसे पहले पास सोई बेटी को छूकर देखना चाहा कि तभी उसे याद आया कि उसकी तो कोई संतान ही नहीं है |  दो मिनट हथेलियों पर अपना माथा टिका कर बैठी रही और फिर वह दरवाजा खोलने चली गयी | दरवाजा खोलकर वहाँ तब तक खड़ी रही जब तक कि कामवाली ने उससे यह नहीं कहा "लगता है आपकी नींद पूरी नहीं हुई"

"ओह ! तो वो एक दुःस्वप्न था और मैं जिंदा हूँ" उसने दीर्घ निश्वास लेते हुए खुद से कहा और मेज पर रखे बोतल का पानी एक साँस में पी गयी |

नींद से जाग जाने के बावजूद सपने में देखा हर दृश्य रील दर रील उसकी स्मृति में ताज़ा था | वह बैठक कक्ष के दीवान पर जा बैठी | उसने देखा कि मेहमानों के लिए बने बाथरूम से दीवान पर बैठे शख्स को नहीं देखा जा सकता था और यह भी कि सपने में देखे गए घर से वह घर अलग था | उसने यूरोप के किसी देश में पढ़ाई कर रहे अपने इकलौते देवर से फोन पर कुशलक्षेम पूछा | फिर उस दुःस्वप्न से अपना ध्यान हटाने के लिए उसने टीवी पर थोड़ी देर समाचार देखा और फिर नहा-धो कर तैयार हो नाश्ते के बाद दफ्तर के लिए निकल गयी |

दोपहर में उसने थोड़ा असहज महसूस किया | भीषण उमस में भी उसे ठंड लग रही थी | जब ठंड लगने और तबियत खराब रहने का सिलसिला कई रोज़ चला तो डॉक्टर के पास हो आई | कई प्रकार के रक्त जाँच के बाद उसके गर्भवती होने की पुष्टि हुई | नौ कठिन महीनों के बाद उसने एक लड़की को जन्म दिया | बीते नौ महीनों में उसने कई बार कई अच्छे-बुरे स्वप्न देखे पर वह दुःस्वप्न उसे रह-रह कर याद आता | वह अपना दुःस्वप्न पति से जब भी साझा करती, वह इसे दुःस्वप्न बता उसे भूल जाने की सलाह देता |

घर-गृहस्थी, नौकरी और बेटी के बीच जिंदगी ऐसी उलझी कि समय कब पानी की तरह बह गया, उसे पता ही न चला | उसकी बेटी अब तीन साल की हो चुकी थी और घर की दीवारों पर रंगीन पेन्सिल  से कई प्रकार की आकृतियाँ बना चुकी थी | इसी क्रम में एक रोज़ मकान मालिक आ धमका और घर की दीवारों का हुलिया देख उसे दूसरा घर तलाश लेने को कहा | अगले दो महीनों के बाद अब वह  पड़ोस के नए घर में थी | किराये के इस नए घर को देखने जब वह पहली बार गयी थी, उसी दिन उसने उस घर का दुःस्वप्न में देखे गए घर से मिलान किया था और दोनों में कई अंतर देखने के बाद ही उस घर में जाने का निर्णय लिया था | नया घर बड़ा था | बेटी अब स्कूल जाने लगी थी | धीरे-धीरे जरूरतों के बढ़ते ही घर का सामान भी बढ़ने लगा | उसने तय किया कि उसका भी अपना एक स्थायी घर होना चाहिए | पति और पत्नी ने मिलकर घर ढूँढने का अभियान चलाया और कुछ महीनों के बाद शहर के दूसरी छोर पर उन्हें अपने नए घर का पता मिल चुका था | कागज पर बने नक़्शे को देख फ्लैट बुक कर लिया था | निर्माण कार्य पूरा होने में अभी दो साल बाकी था | 

इन दो सालों में पति-पत्नी ने घर की कई पुरानी चीजों को औने-पौने दामों पर बेच दिया और नए घर के लिए नया सामान खरीदा | जिंदगी मुस्कुरा रही थी, पर दुःस्वप्न था कि स्मृति से मिट ही नहीं रहा था |अंततः वह दिन भी आया जब नया घर बन कर तैयार हुआ | यूँ तो घर के बनने के दौरान वह कई बार वहाँ गयी थी, पर रंग-रोगन होकर दरवाजे और खिडकियों के शीशे लगाये जाने के बाद पहली बार घर में प्रवेश करते ही उसे लगा जैसे वह इस घर में पहले रह चुकी है| उसने सोचा शायद निर्माणाधीन भवन को पहले कई बार देखने की वज़ह से उसे ऐसा लग रहा है| अपने नए घर में सामान व्यवस्थित  करने में उसे काफी वक़्त लगा | एक दिन जब वह बैठक कक्ष में बैठी हुई थी और टीवी में समाचार देख रही थी, उसने ध्यान दिया कि वह वहाँ से मेहमानों के लिए बना बाथरूम दृष्टिगोचर है| फिर वह उस बाथरूम में गयी और पाया कि उस बाथरूम की बनावट ठीक वैसी है जैसा उसने सपने में देखा था | बाथरूम से निकलते हुए उसने देखा कि दक्षिण दिशा में खुलता घर का मुख्य द्वार ठीक वैसा ही है जैसा सपने में था | वह अवाक् भी थी और परेशान भी|  उसने घबराते हुए पति से कहा "सुनो, जानते हो ..."

"यही न कि यह घर बिलकुल वैसा है जैसा तुमने सपने में देखा था ! अच्छा, यह बताओ कि किस दिन मरने वाली हो" पति ने मजाकिया लहजे में कहा | 

"पता है... छोड़ो तुम नहीं समझोगे" कहकर वह चुप हो गयी और खिड़की से बाहर देखने लगी |

दिन, महीने और साल बीतने लगे |  जब दुःस्वप्न ने उसका पीछा न छोड़ा, तो उसने कभी घर का इंटीरियर बदला तो कभी घर के अलग-अलग हिस्सों को पेड़-पौधों से सजाकर उसे एक अलग लुक देने की कोशिश की | कई नौकरियाँ भी बदली | उसका देवर भी विदेश से पढ़ाई पूरी कर वापस लौट आया था और अपना व्यापार कर रहा था |

वह एक उमस भरा दिन था | वह एक गहरी नींद से उठी थी | बेडरूम से बाहर निकलते ही उसने देखा बैठक कक्ष में कुंदन बैठा था | दीवान पर उसके पति के पास उसका देवर बैठा है जो उसकी बेटी के साथ खेल रहा है| कुंदन को देख उसने हाथ हिलाकर अभिवादन किया पर न जाने कुंदन किन ख्यालों में गुम था | वह सर झुकाए बैठा था | वह कुछ देर निर्विकार खड़ी स्थिति को समझने का प्रयास करती रही | उसे न तो कुछ समझ आ रहा था न ही वह कुछ सुन पा रही थी |  उसे लगा यह गहरी नींद का असर है| चेहरा धोने के लिए वह बाथरूम गयी और वहाँ उसने देखा कि शावर से हल्का पानी गिर रहा था | वह शावर को बंद करने की कोशिश कर रही थी पर पानी फिर भी टपक रहा था | थोड़ी देर बाद कुंदन हाथ धोने आया | उसने वाश बेसिन का नल खोला, हाथ धोया और नल बंद करते हुए जैसे ही उसकी नजर बाथरूम की बायीं ओर गयी, वह पहले चौंका और फिर बुरी तरह डर गया | वह इतनी बुरी तरह डर गया कि हड़बड़ी में बाथरूम से निकलकर किसी से बिना कुछ कहे घर से निकल गया | वह कुछ देर सोचती रही कि कुंदन उसे देख क्यूँ डर गया और फिर उसे याद आया कि उसकी मौत को अभी कुछ ही दिन बीते हैं| वह कुंदन से कुछ कहना चाह रही थी, इसलिए उसके पीछे दौड़ पड़ी | कुंदन अपनी गाड़ी में बैठ चुका था | वह पसीने से तर हो रहा था | उसने कार स्टार्ट किया तो अचानक से हर ओर धुँआ -धुँआ हो गया | वह कार की पिछली सीट पर बैठ गयी और कार के रियर व्यू मिरर में देख कुंदन से पूछने लगी "क्या हुआ"

थोड़ी देर बाद उसने महसूस किया कि उसकी आवाज कुंदन तक पहुँच ही नहीं रही थी | कुंदन उसे सिर्फ देख पा रहा था | उसे लगा शायद उसकी नींद पूरी नहीं हुई | वह कार से उतर कर सीढियाँ चढ़ती हुई घर आ गयी |  घर का दरवाजा  हल्का सा खुला रह गया था | उसने महसूस किया कि वह उस छोटी सी जगह से बिना किसी परेशानी के अंदर आ गयी थी | अब उसकी नजर बैठक कक्ष के एक कोने में रखे छोटे से मेज पर गयी जहाँ उसकी तस्वीर पर माल्यार्पण किया गया था | उसने उस तस्वीर को देखा और मुस्कुराते हुए कहा "उफ़्फ़ ! फिर वही दुःस्वप्न"

Thursday, July 26, 2018

जीवन का स्वाद

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उन्होंने अपने बचपन में किसी बुजुर्ग को कहते हुए सुना था कि जीवन को स्वाद लेकर जीना चाहिए | चाय की प्याली में डुबोकर खाए गए बिस्कुट की तरह नहीं बल्कि पान की गिलौरी की तरह देर तक चबाकर | बस उसी रोज़ से वह जिंदगी के तमाम एहसासों को स्वाद से समझने लगीं | जब भी किसी ने उनसे लाड़ जताया, उन्होंने "चाशनी" सा महसूस किया | जब माता या पिता ने डपटा, तो उन्होंने "दालचीनी" महसूस किया | अपने माता-पिता के अतिरिक्त उन्हें सगे-संबंधी और पड़ोस के लोगों का भी भरपूर प्यार मिला था | एक लम्बे अरसे तक उनका व्यक्तित्व आकर्षक और सहानुभूतिपूर्ण ही रहा | किसी किस्म की क्रूरता से वह कोसों दूर रहीं |

रात के अंधेरे में या दिन के समय जब वह अकेली होतीं थीं, तो "बर्फ" जैसा महसूस करती थीं | ऐसे क्षणों में भयभीत होने के बावजूद किसी से मदद मांगने की बजाय वह इतिहास के साहसिक घटनाओं का स्मरण कर लेतीं या खुद को समझातीं कि अपने ऊपर भय को हावी होते देना स्वयं को कमजोर बना देना होता है | कभी आँखें बंद कर अतीत की चाशनी में डूब जातीं और इस पर भी अगर भय हावी रहता तो उसी अतीत से उधार लेकर दालचीनी चबाने लगतीं |

उनका असली नाम क्या था, यह तो किसी को पता ही न चलता यदि उस गाँव के पहले डॉक्टर की विधवा, जिसे लोग डॉक्टरनी कहते थे, से उनका लगाव न होता | वह बतौर नर्स सरकारी डिस्पेंसरी में कार्यरत थीं और उनके हिंदी उच्चारण से लोगों ने अनुमान लगाया था कि शायद वह पश्चिम बंगाल की रहने वालीं थीं | उम्रदराज स्त्री थीं, तो किसी ने उनके बारे में ज्यादा कुछ जानने की कोशिश नहीं की | जब वह उस गाँव में पहली बार आईं थीं, तब भी नहीं | वह हर किसी के लिए नर्स ही रहीं | शायद उस गाँव की पहली और इकलौती नर्स | उम्रदराज होने के बावजूद उनके नैन-नख्स इतने तीखे थे कि इस बात का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता था कि अपनी युवावस्था में वह बेहद खूबसूरत रही होंगी | उन दिनों नर्स सफेद रंग की साड़ी ही पहना करतीं थीं | कुछ लोग उन्हें विधवा समझते रहे तो कुछ अविवाहित | उनकी आवाज़ में एक किस्म का कड़कपन था जिसकी वज़ह से लोग उनसे थोड़ी दूरी बरतना ही श्रेयस्कर समझते थे |

नर्स का जन्म एक सुखी परिवार में हुआ था और उन्होंने बचपन से ही अपने माता-पिता के बीच ऐसा सुंदर सामंजस्य देखा था कि उन्हें लगता जब उनका ब्याह होगा तो उनका भी उनके जीवन साथी से वैसा ही सामंजस्य होगा | उस गाँव के लोगों को भले ही न मालूम हो, आपकी जानकारी के लिए यह बताना बेहद जरूरी है कि हमारी नर्स का नाम कनक प्रभा था, वह विधवा थीं और उनकी एक बेटी थी, जो शिक्षित तो थी , पर जिसने ब्याह करने के बाद घर बसा लेने को ही अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य समझा | घर बसाने में वह इतना रम गयी कि यह भी भूल गयी कि भारत भू-खंड के किसी कोने में उसकी माँ भी रहती थी | नर्स, जो कि एक सम्पन्न परिवार की थीं, उनका ब्याह हुआ तो एक डॉक्टर से ही था, पर उन दोनों के बीच उस सामंजस्य का अभाव हमेशा रहा जो उसके माता-पिता के बीच था | फिर विवाह के चंद सालों के बाद ही उनके पति का कैंसर से निधन हो गया था | डॉक्टर पति ने कैंसर का पता चलते ही सबसे पहले कनक को नर्स ट्रेनिंग के लिए भेजा था और फिर वह जिस अस्पताल में कार्यरत थे, वहाँ सिफारिश कर कनक की नौकरी लगवा दी थी | नर्स कनक ने पति के इस उपकार को आजीवन याद रखा |

नर्स कनक लज़ीज़ मांसाहारी व्यंजनों की बेहद शौक़ीन थीं और बिना कलफ़ लगी साड़ियाँ नहीं पहनती थीं | गाँव में रहते हुए उन्होंने बेटी को शहर के हॉस्टल में रख पढ़ाया और फिर ग्रेजुएशन के बाद  उसके आगे न पढ़ने के फैसले को मंजूरी देते हुए उसका ब्याह एक संभ्रांत परिवार के लड़के से कर दिया | बावन वर्ष की आयु में अब वह एकबार फिर से अकेली हो गयी थी | अकेली तो वह पति की मृत्यु के बाद से ही हो गयी थी पर बेटी नामक ज़िम्मेदारी से मुक्ति क्या मिली, उन्होंने पहली बार अकेले हो जाने का "सुपाड़ी सा कसैलापन" महसूस किया | सप्ताह के अन्य दिनों में वक़्त की जिह्वा पर यह कसैलापन इतना नहीं चढ़ता जितना कि छुट्टी वाले दिन | इस कसैलेपन से कुछ देर बचने के लिए वह डॉक्टरनी के घर जाती और घंटो बिताकर शाम में लौट आती |

विवाह के दो वर्षों के बाद जब उनकी बेटी झिनुक माँ बनी, तो बहुत समय बाद उन्होंने मन में मिश्री घुलता हुआ सा अनुभव किया था | टेलीग्राम मिलते ही वह दो दिनों का सफर पूरा कर बेटी के ससुराल पहुँच गईं थीं | न सिर्फ माँ और नानी होने के नाते उन्होंने बेटी के घर की सभी ज़िम्मेदारियाँ संभाली, बल्कि एक नर्स होने की ज़िम्मेदारी भी बखूबी निभाई | अपना सारा समय बेटी और उसके बच्चे की देखभाल में लगाया करती थीं |

डेढ़ महीने बेटी के ससुराल में रहने के बाद एक दिन नर्स ने "चिरायता" सा महसूस किया | उनकी आँखों में सूजन आ गया था और उन्होंने साड़ी में कलफ़ लगाना छोड़ दिया था | वह अचानक से एकसाथ बीमार भी हो गयी थीं और बूढ़ी भी | तन अधिक बीमार था या मन, यह तो नर्स ही बता सकतीं थीं | बेटी के स्वभाव में यदि रूखापन न था, तो वह लगाव भी न था जो उन्हें वहाँ उसके पास रोक लेता |  बेटी व उसके परिवार की सेवा करने की बनिस्बत नर्स को अनजान मरीजों की सेवा करना बेहतर विकल्प लगा और वह फिर से दो दिनों के सफर के बाद अस्पताल आ गई थीं | उन पर एक किस्म की थकान हावी हो रही थी | कुछ ही महीनों में दायीं आँख में गुलाबी उभार नजर आने लगा | शुरुआत में किसी किस्म का दर्द नहीं था, तो नर्स को किसी उपचार की भी जरूरत नहीं महसूस हुई | फिर आँखों का डॉक्टर उस गाँव में तो क्या, आसपास के शहरों में भी न था | कई बार कई प्रकार के घरेलू उपचार करने के बाद जब कोई लाभ न हुआ, तो फिर उन्होंने उपचार के विषय में सोचना ही छोड़ दिया |

१९८८ की गर्मियों में अस्पताल में एक नए डॉक्टर का आगमन हुआ जो किसी बड़े शहर से स्थानान्तरण के फलस्वरूप इस गाँव में आए थे | कुछ दिनों के बीतते ही नए डॉक्टर ने नर्स से उनकी आँख के विषय में जानना चाहा था जिसे नर्स ने "कुछ नहीं....बस जरा सा उभार.." कहते हुए टालने की कोशिश की थी | डॉक्टर ने जब उन्हें कैंसर का अंदेशा जताते हुए दिल्ली जाकर अपने परिचित आँखों के डॉक्टर से दिखाने का सुझाव दिया था, तो मुस्कुराहट के साथ हाथ जोड़ कर आभार प्रकट करने के अलावे उन्होंने कुछ भी नहीं कहा |

नर्स उन दिनों दार्शनिक हो चलीं थीं या बेटी की उनके प्रति उदासीनता ने जीवन के लिए उनमें निरसता का संचार कर दिया था; जीवन में उनकी रूचि कम होने लगी | पहले उन्होंने डॉक्टरनी के घर जाना छोड़ा, जो उस गाँव में उनके जाने का एकमात्र ठौर था | फिर कुछ दिनों बाद अस्पताल भी छूटा | अब उनकी आँखों में उभार और सूजन के अतिरिक्त खुजली भी एक समस्या का रूप ले चुकी थी | वह आस-पड़ोस के बच्चों से अनुरोध कर और उन्हें पाँच -दस पैसों का लालच देकर अपनी दायीं आँख की बरौनी निकालने को कहतीं | बच्चे पैसों के लालच में अपने अभिभावकों से छुपा कर ऐसा करते भी |  अपने प्रति इस क्रूरता के बाद नर्स कुछ समय के लिए नमकीन महसूस करती | अगले दिन फिर आस-पड़ोस के बच्चों से वही मनुहार |

एक दिन जब वह सुबह उठीं और बच्चों को बुलाने आँगन के बाहर गयीं, बच्चे उन्हें देख छूप गए | उन्हें खट्टा महसूस करना चाहिए था, पर उन्होंने गौर किया कि ऐसा कुछ महसूस ही नहीं  हुआ | दिन में पड़ोस से कोई खाना दे गया | यह तो चाशनी महसूस करने वाली बात थी, पर आश्चर्य ! ऐसा कुछ भी महसूस न हुआ | घर बिखड़ा पड़ा था, रसोई में जूठे बर्तनों का अम्बार लगा था और उन्हें कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था | कुछ महसूस होने के अभाव में वह रात में घर का दरवाजा बंद नहीं कर पायीं |

अलसुबह उनके घर का दरवाजा खुला देख जब उनका हाल-समाचार लेने लोग उनके कमरे में गए, तो पाया कि उनकी इकलौती नर्स बेस्वाद हो चुके जीवन का त्याग कर चुकीं थी | आलमारी के शीशे से कलफ़ लगी साड़ियाँ झाँक रहीं थीं | पास के टेबल पर झिनुक के बचपन की तस्वीर रखी हुई थी, जिसमें वह माँ की साड़ी लपेट मुस्कुरा रही थी |

नर्स की मौत की खबर आग की तरह फैल चुकी थी | डॉक्टरनी, जो खबर सुनते ही नर्स के अंतिम दर्शन के लिए वहाँ गयीं थीं, नर्स का शव देख रोते हुए कह रहीं थीं “अभागी जीवन का स्वाद लेना चाहती थी और जिंदगी ने इसे ही पान की गिलौरी की तरह चबा डाला” |

Saturday, July 7, 2018

सौमित्र के छह अध्याय

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1. प्रथम अध्याय - "हीरा"

सौमित्र चट्टोपाध्याय कोलकाता से कला संकाय में स्नातक करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए लंदन गए | काले बालों को छोड़, वह दिखते भी अंग्रेज थे | वहाँ उन्हें एक अंग्रेज लड़की, लूसी से प्रेम हो गया | दोनों साथ रहने लगे | जब पढाई पूरी हुई, तो भारत लौटने की बजाय उन्होंने लंदन के ही एक स्कूल में नौकरी कर ली | लूसी अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर करने के बाद लंदन के एक कॉलेज में पढ़ा रही थी | वह असाधारण कविताएँ लिखती थी | सौमित्र लूसी से अधिक प्रेम करते थे या उसकी कविताओं से, यह कहना मुश्किल था | दोनों साथ-साथ एक सुंदर जीवन (शायद सुंदर समय कहना ठीक होगा ) जी रहे थे  | सौमित्र पहले कैनवास पर चित्र उकेरते और लूसी उस चित्र को देख कविता लिखती | दोनों  कला के दीवाने थे | फिर एक दिन सौमित्र के पिता का तार आया कि उनकी तबियत ठीक नहीं और वह चाहते हैं कि सौमित्र भारत लौट आए | सौमित्र अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे | पिता की तबियत खराब सुन फ़ौरन लौट आए|

 घर लौटकर पाया कि उनके माता-पिता उनके विवाह की तैयारियां कर रहे थे | उन्होंने बहुत साहस के साथ अपने माता-पिता को लूसी और अपनी नौकरी के विषय में बताया | सुनते ही उनके जमींदार पिता ने उनसे कहा "हमने तुम्हें पढ़ने के लिए लंदन भेजा कि समाज में तुम्हारा रुतबा बढ़े और तुम उस अंग्रेज लड़की के चक्कर में पड़ स्कूल मास्टरी करने लगे ! छी ! छी ! कान खोलकर सुन लो, अब तुम लंदन वापस नहीं जा रहे हो"

"हम दोनों एक - दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं और मैंने उससे वायदा भी किया है कि मैं उसे अपनी जीवन संगिनी बनाऊंगा" सौमित्र ने नजरें झुकाकर धीमे स्वर में कहा |

"किसने कहा था वायदा करने को? तुम्हारा विवाह हमारे समाज की ही किसी लड़की से होगा; उस विदेशी से नहीं| इसके आगे कुछ कहा तो मैं तुम्हें अपना वारिस मानने से इंकार कर दूँगा | मरते समय तुम्हारे हाथ का जल भी नहीं ग्रहण करूँगा | कुपुत्रः  बाघाय नमः" कहते हुए सौमित्र के पिता ज़ोर-ज़ोर से हाँफने लगे |

पिता को बेतरह हाँफते देख सौमित्र की माँ रोते हुए उसके पिता की पीठ सहलाते हुए कहने लगी "अगर इनको कुछ हो गया, तो मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगी"

सौमित्र से आगे कुछ नहीं कहा गया | अगले पाँच दिनों तक घर की स्थिति तनावपूर्ण ही रही | तीनों प्राणी खाने की मेज पर मिलते और आपस में बिना कुछ कहे सुने ही खाना खाकर चले जाते | छठे दिन खाने के साथ करौंदे का अचार खाते हुए सौमित्र ने सोचा कि यदि इतने वर्षों तक विदेश में रहकर विदेशी खाना खाने के बाद भी उन्हें करौंदे का अचार खाते हुए अलौकिक स्वाद की अनुभूति हो सकती है, फिर प्रेम तो शाश्वत है, अमर है| प्रेम को बचाने के लिए विवाह आवश्यक क्यूँ  होने लगा | उन्होंने उसी दिन गोधूली बेला में लूसी को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने लंदन से लौटने से लेकर अब तक हुई घटनाक्रमों का विवरण देने के बाद लूसी से विवाह न कर पाने के लिए माफ़ी माँगते हुए एक कविता भी लिखी जिसका हिंदी रूपान्तरण इस प्रकार है -

"पड़ी हैं कुछ बेशकीमती स्मृतियाँ स्मरण अरण्य की किसी उपेक्षित गुफा में 
जिनका है अपना ही कोई अदृश्य तिलस्मी अंतर्द्वार 
गुफा, जहाँ नहीं है मौजूद कोई भी खिड़की या कोई रौशनदान ही 
खुलता है उसका द्वार अकस्मात कुछ ऐसे  
जैसे दिया हो दस्तक जंग लगे हुए फाल्गुन के सांकल ने 
और किया हो उच्चारण शून्य में दबी जुबान 
अरबी उपन्यास के जादुई शब्द "खुल जा सिमसिम" का 
द्वार के खुलते ही दिखता है करीने से सजाकर रखा हुआ 
खजाना स्मृतियों का, दमकता है अंधेरे में  

निरूद्देश नौका पर हैं सवार निरुपाय स्मृतियाँ 
भाषा भूल चुकी स्मृतियाँ पोषित हो रही हैं हमारी करोटी में 
किसी परजीवी की तरह और चला रहीं हैं काम शब्दों का 
होकर निःशब्द, कर रही हैं संक्रमित हमारे मन को बार-बार 

धूसर स्मृतियों के तन पर लगे हैं मोरपंख 
जब छा जाता है मन के आकाश पर भावनाओं का मेघ 
और गिरने लगती हैं रिमझिम बूँदें गगनचारिणी आँखों से 
नाचता है स्मृतियों का अबाध्य मयूर "

पत्र के अंत में लिखा कि इकलौती संतान होने के कारण माता-पिता की देखभाल करना उनका कर्तव्य है और वह हालात के आगे मजबूर हैं| यह भी लिखा कि लूसी को वह मरते दम तक नहीं भूल पाएँगे और लूसी के लिए उनका प्रेम भी कभी खत्म नहीं होगा | 

पत्र लिखने के बाद वह कुछ हल्का महसूस कर रहे थे | अलबत्ता अगले रोज़ की पहली डाक से वह पत्र लूसी के पते पर भेज दिया गया | घर आते ही ऐलान कर दिया कि वह लूसी को विवाह के लिए मना कर चुके हैं| घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी | सौमित्र बाबु के लिए नए सिरे से वधु की तलाश शुरू की गयी | 

"हम जानते थे सोमू कि तुम हमारा मान रखोगे | तुम हीरा हो , हीरा " कहते हुए सोमू की माँ ने उसका माथा चूमा था | 


2. द्वितीय अध्याय - "प्रेम का हत्यारा "

गाँव लौटते ही सौमित्र वही पुराने सोमू हो गए | एक निर्णय लेकर चिठ्ठी लिख देने से मन हल्का जरूर हो गया था पर समय-समय पर लूसी की यादें सोमू का मन मलीन कर जातीं | रात को सोने से पहले लूसी की बनाई हुई कॉफ़ी बेहद याद आती | हर सुबह आँखें खोल बिस्तर पर लूसी का न होना मन ही नहीं दिन भी खराब कर रहा था | वह याद करता किस तरह रात में टूट कर प्रेम करने के बाद लूसी उसकी कमीज पहनकर सो जाती | खाने की मेज पर सोमू की सूजी हुई आँखों को देख उसके पिता कहते "पुरुष नहीं रोते बेटे | तुम जमींदार खानदान के हो, अपने व्यक्तित्व में वैसा रौब भी लाओ"

सोमू केवल सुनते; कुछ नहीं कहते |  कुछ कहने की कोई गुंजाईश ही कहाँ थी |  उन्होंने स्वयं को व्यस्त रखने के लिए जमशेदपुर की एक बड़ी कम्पनी में एक छोटी नौकरी का बंदोबस्त कर लिया |  हालात के मद्देनजर घरवालों को भी लगा कि व्यस्त रहने और जगह परिवर्तन से सोमू लूसी को भूल जाएगा | सोमू के जमशेदपुर जाने से एक दिन पहले लूसी का पत्र आया | लूसी ने पत्र में जवाब स्वरुप सिर्फ एक कविता लिख भेजा था, जिसका हिंदी रूपांतरण इस प्रकार है -

"उचित है विदा लेना मनुष्य का अपने भ्रम से  
प्रेम की रात ढलने से भी पहले ही जीवन में 
कि चला जाता है विद्युत् आँधी के पूर्वाभास में 

उचित है उठा लेना काँधे भर ज़िम्मेदारी 
जीवन में बने खूबसूरत रिश्तों का 
कि बना रहे फर्क प्रेम और सुविधा में 

स्वार्थ के दौर का का गुजर जाना उचित है|"

कहने को कविता की महज कुछ पंक्तियाँ थीं, पर हर पंक्ति सोमू के हृदय में शूल की तरह चुभ कर रह गयी | वह अपने पहले प्रेम का हत्यारा साबित हो चूका था | वह गुनाहगार अधिक था या मजबूर ज्यादा, इसकी गणना करते हुए सुबह हो गयी और वह जमशेदपुर के लिए रवाना हो गया |

3.तृतीय अध्याय - "रुक्मिणी का रियाज "

जमशेदपुर में जहाँ सोमू के ठहरने की व्यवस्था की गयी थी, वहाँ हर शाम पड़ोस के घर से किसी लड़की के गाने की आवाज आती थी | वह हर संध्या गाने का रियाज़ करती और सोमू अपने आँगन में चाय पीते हुए उस आवाज़ में खो जाते | कई बार उत्सुकता बस छत की ओर जाती सीढ़ियों पर चढ़ पड़ोस के घर के उस कमरे की खिड़की की ओर झाँकते, जहाँ वह रियाज़ कर रही होती थी | लड़की की नजर सोमू से मिलती तो वह गाना छोड़ अपलक उसे निहारती | सोमू आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था | लगभग डेढ़ महीने तक यह सिलसिला चला | एक शाम जब चाय पीते हुए वह आवाज़ सोमू तक नहीं पहुँची, उसे बेचैनी महसूस हुई| पहले तो उसने सीढ़ियों पर चढ़ उस कमरे में झाँका और लड़की को वहाँ न देख उसने पड़ोस के घर जाकर दरवाजे पर दस्तक दिया | 

"जी, आप ?" दरवाजा खोलते ही सामने खड़ी स्त्री ने पूछा |

"जी, मैं........वो...आपके घर से रोज़ इस समय गाने की आवाज़ आती थी, आज नहीं आई, तो सोचा पूछ लूँ कि सब ठीक तो है न"

"अच्छा | रुक्मिणी हमारी भांजी है| कोलकाता के एक स्कूल में संगीत सिखाती है| गर्मी की छुट्टियाँ बीताने यहाँ आई थी | छुट्टियाँ खत्म होने को हैं, इसलिए वापस चली गयी| आप अंदर आइये न" कहते हुए उस स्त्री ने सोमू को घर के बैठक में आने का न्योता दिया | 

"नहीं, फिर कभी| कोलकाता के किस स्कूल में हैं"सोमू  ने अधीर होकर पूछा |

इस प्रश्न पर उस स्त्री ने चुप रहना वाजिब समझा | अंततः सोमू ने अपना व अपने पिता का परिचय देते हुए बताया कि वह भी कोलकाता का रहवासी है और वह कोलकाता में ही रहकर किसी शैक्षणिक संस्थान में नौकरी करना चाहता है और इसीलिए उस स्कूल का नाम जानना चाहता है| उसके पिता के परिचय से रू-ब-रू हो उस स्त्री ने स्कूल का नाम बता दिया | सोमू उन्हें धन्यवाद ज्ञापित कर लौट आया | 

अगले दो दिनों तक वह बेचैन रहा | रुक्मिणी का चेहरा जेहन से हटने का नाम नहीं ले रहा था | शुक्रवार शाम दफ्तर से लौटते ही वह शाम की ट्रेन से कोलकाता रवाना हुआ | सोमवार को वह उस स्कूल के मुख्य द्वार पर खड़ा रुक्मिणी का इंतजार करने लगा | लगभग साढ़े नौ बजे सोमू के सामने एक रिक्शा रुका और उसका इंतजार खत्म हुआ | रुक्मिणी सामने सोमू को देख हैरान थी | वह एकटक सोमू को देखती रही |

"तुम्हारी आवाज कब मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गई, पता ही न चला | जब एक रोज़ तुम्हारी आवाज मुझ तक नहीं आई, मैं तुम्हारी मामी से तुम्हारे विषय में प्रश्न करने का दुस्साहस कर बैठा | आज तुम्हारे पास हूँ जबकि मुझे तो यह भी नहीं पता कि तुम्हारी जिंदगी में कोई पुरुष है भी या.."कहते हुए सोमू रुक्मिणी की आँखों में देखने लगा |

रुक्मिणी ने धीमे स्वर में कहा था "नहीं है" और फिर शरमाते हुए स्कूल परिसर में दाखिल हो गयी थी | सोमू शाम के साढ़े चार बजे तक स्कूल के आसपास मंडराता रहा | 

"आप अभी तक यहाँ हैं" रुक्मिणी सोमू को देख आश्चर्यचकित थी |

"क्या करता| तुमसे बात करने ही आया था | बात बिना पूरी किए कैसे चला जाता" सोमू स्नेहसिक्त आँखों से रुक्मिणी को देखता रहा | 

"अरे !" रुक्मिणी को समझ नहीं आ रहा था कि उसे कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए |

"देखो, अब या तो तुम ज़मशेद्पुर आओगी या मुझे कोलकाता आना पड़ेगा| तुम्हारी आवाज के बिना मेरी शाम बड़ी तकलीफदेह होती है" सोमू जवाब का इंतजार कर रहा था |  

"आपका तो घर भी है इस शहर में "रुक्मिणी ने इससे ज्यादा कुछ कहना ठीक न समझा |

"हम्म..करता हूँ कोई बंदोवस्त.. करना ही पड़ेगा" कहते हुए सोमू उसे कुछ देर एकटक देखता रहा और फिर दोनों कालीघाट की ओर निकल पड़े |

अब सोमू हर शनिवार की रात कोलकाता आ जाते और रविवार का दिन रुक्मिणी के साथ बिताकर वापस जमशेदपुर चले जाते | सोमू का समय फिर सुंदर हो चला था | सुंदर समय को साढ़े चार माह ही बीता था कि एक रविवार रुक्मिणी के किसी परिचित ने उन्हें कालीघाट पर देख लिया और फिर बात रुक्मिणी के पिता तक जा पहुँची | 

"स्वावलंबी बेटी किसी पुरुष का हाथ थामे कालीघाट में ...."रुक्मिणी के पिता तरह-तरह की अटकलें लगा रहे थे | शाम में रुक्मिणी के घर आते ही उससे अप्रत्याशित प्रश्न किया गया जिसका उसने सही जवाब दिया | सोमू के पिता का परिचय पा कर रुक्मिणी के पिता ने उसे सोमू को घर बुलाने के लिए कहा  | रुक्मिणी ने उन्हें बताया कि सोमू जमशेदपुर में कार्यरत है और अगले रविवार को ही मिलना संभव हो सकेगा | अगले रविवार जब सोमू रुक्मिणी से मिलने पहुँचा, वहाँ रुक्मिणी के साथ उसके पिता भी थे | वह सोमू को आग्रह कर घर ले गए और दिन के खाने के बाद रुक्मिणी से विवाह का प्रस्ताव भी दिया | सोमू उन्हें विवाह का आश्वासन देकर घर आया, तो सोचा बिना देर किए उसे अपने माता-पिता से बात करनी चाहिए | किसी और से पता लगे, उससे बेहतर होगा कि वह  स्वयं ही बात करे | वह लगभग आश्वस्त था | इस बार लड़की उनके समाज की थी, सो सोमू को आपत्ति की कोई गुंजाईश नहीं दिखी |

"क्या नाम बताया? नकुल डे ?" सोमू के पिता ने लाल जिल्द चढ़ी कानून की किसी किताब को पलटते हुए पूछा |

"जी" 

"विवाह कोई बच्चों का खेल नहीं | यह विवाह संभव नहीं और आप अपने विवाह की चिंता छोड़ काम में मन लगाईये | हम आपके लिए उपयुक्त कन्या तलाश रहे हैं| मिलते ही आपका ब्याह कर देंगे" उसके पिता ने बिना उत्तेजित हुए कहा | 

"क्यूँ  संभव नहीं  यह विवाह ? रुक्मिणी तो आपके ही समाज की लड़की है" सोमू क्रोधित था |

"लगता है लन्दन रहकर आप सब भूल गए | हम ब्राह्मण हैं और वो कायस्थ | छोटे कुल की वधु नहीं आ सकती इस घर में" कह कर  सोमू के पिता अपने काम में मगन हो गए |

"कुछ फर्क नहीं पड़ता इन सभी बातों से | ये आदिम युग की बातें हैं | रुक्मिणी एक पढ़ी - लिखी लड़की है और कोलकाता के एक  स्कूल में संगीत पढ़ाती है" सोमू पिता के दरबार में दलीलें दे रहा था |

"बहुत फर्क पड़ता है| चार अक्षर पढ़ कर आजकल की लडकियाँ हमारे सामाजिक रीति-रिवाजों को चूल्हे में डाल रही है और उस पर स्वाबलंबी हो, तो क्या कहने | हमारा तो आदर ही नहीं करेगी | इस घर में कोई ब्राह्मण की लड़की ही आएगी | मुझे आगे कुछ नहीं सुनना" कहते हुए सोमू के पिता ने उसके दूसरे प्रेम का अतिम अध्याय लिख दिया |

सोमू गुस्से से लाल तो था ही, गोरा होने के कारण उसके गुस्से का रंग चेहरे पर भी दिख रहा था और उसकी लाल आँखों में आँसू थे | 

जब सोमू पिता के कमरे से निकल रहा था तो पिता ने कहा था "पुरुष नहीं रोते| कम से कम लडकियों के लिए तो कभी नहीं"

सोमू अगले दिन जमशेदपुर लौट गया | उसने रुक्मिणी को चिठ्ठी लिख कर सब बताया और विवाह न कर पाने के लिए क्षमा याचना की |

4.चतुर्थ अध्याय - "वनदेवी परिचय"

शामें अब सोमू को उदास कर जातीं थीं और इसी उदासी से उबरने के लिए उसने बचत के रुपयों से ग्रामोफोन खरीद लिया था | पर स्मृतियाँ अदृश्य सुरंगों से होते हुए सोमू तक पहुँच जाती | ग्रामोफोन पर किशोरी अमोनकर राग हंसध्वनि गातीं " आज सजन संग मिलन बनिलवा" और वह रुक्मिणी के लिए तड़प उठता | उसे अहसास हुआ कि संगीत के प्रति उसकी आसक्ति  ही उसे रुक्मिणी तक ले गयी थी | ऐसे में विरह के सफर में संगीत उसका साथी नहीं हो सकता | लूसी की संगति में रहकर वह चित्रकारी भी करने लगा था | लूसी ने उसे चित्रकारी की कई बारीकियाँ सिखाई थीं | सोमू ने अपने अकेलेपन के सफर में रंगों का साथ चुना | अब उसके कमरे में हर आकर के कैनवास थे और कई प्रकार के रंगों की शीशियाँ थीं | जिंदगी अक्सर विस्मृत करती है| होना तो यह था कि कूची और रंग उसे लूसी की स्मृतियों के करीब ले जाते, पर कैनवास पर जो वह उकेर रहा था, वहाँ एक वनदेवी थी, जो अज्ञात कुलशील थी | उसके माथे पर फूलों का ताज था | उसके केश घुटनों तक लम्बे थे और उसकी दोनों भवें  आपस में जुड़ी हुईं थी | कैनवास पर कई बार वन देवी खीर बना रही होतीं तो कभी मछलियों के मध्य जल में तैर रही होती | ऐसा नहीं था कि रंगों से खेलते हुए उसे लूसी की याद नहीं आती, पर वह अपने अतीत को किसी अदृश्य चेहरे में गुम कर देना चाहता था | एक ऐसे चेहरे में, जो उस तथाकथित समाज का हिस्सा न हो, जो मनुष्य को वर्ण और हैसियत के आधार पर बाँटता है | एक ऐसे चेहरे में, जहाँ वह चरित्र अपने में इतना पूर्ण है कि उसे किसी की आज्ञा की कोई जरुरत नहीं | सोमू के तस्वीरों की तारीफ़ करते हुए भले ही लोग उसे चित्र प्रदर्शनी में शामिल होने की सलाह देते, पर सोमू के लिए वह चित्र पूजा के निर्माल्य के बराबर थे, किसी को कैसे बेचता | उसके कई परिचित उससे चित्र माँगकर निराश हो चुके थे | 

नौकरी और रंगों के बीच सात महीने कट गए और शारदीय महापर्व दुर्गा पूजा का समय आ गया | बीते सात महीनों में सोमू को उसके पिता ने कई बार घर बुलाया पर हर बार सोमू कोई बहाना बना देता |  पिता समझ रहे थे कि बेटा नाराज है, सो दुर्गा पूजा पर उसे घर ले जाने वह स्वयं जमशेदपुर आ गए थे | अब सोमू के पास घर जाने के अतिरिक्त कोई चारा न था |

सोमू घर तो पहुँच गए थे या यूँ कहे कि ले जाए गए थे, पर उत्सवधर्मिता के लिए मन में जिस उल्लास की जरूरत होती है, वह तो दूर-दूर तक न था | वह सुबह देर तक सोया रहता, दिन में कहानी की किताबें पढता और शाम दोस्तों को शतरंज खेलने के लिए घर पर ही बुला लेता |  घर के अहाते में पूजा  का बड़ा सा पंडाल लगा था पर सोमू झाँकने तक न गया | षष्ठी की पूजा के दिन सोमू की माँ ने उसे सुबह - सुबह जगाया और उसे नहाकर पंडाल तक आने की जिद की | वह उनके हुक्म की तामील करे इसलिए अपना कसम देना भी नहीं भूलीं | थोड़ी उधेर बुन के बाद सोमू तैयार होकर जब पंडाल पहुँचा, पुष्पांजलि का समय था |  वह भीड़ को चीरता हुआ पुष्पांजलि के लिए फूल लेने हेतु जब बेदी के करीब पहुँचा, वहाँ उसके अंजुरी में फूल भरने के बाद एक लड़की करबद्ध कर आँखें मूँद पुजारी के साथ-साथ मन्त्र बुदबुदाने लगी | पूरा पंडाल या तो देवी की प्रतिमा की ओर देख रहा था या ऑंखें मूँद प्रार्थना में लीन था | सोमू हैरान हो लाल पार की सफेद साड़ी पहनी उस लड़की को एकटक देखता रहा | धवल त्वक, कमर से लम्बे केश, जुड़ी हुई भवें; वह साक्षात वनदेवी के दर्शन कर रहा था | सोमू ने मंत्रोच्चार के बाद अन्य लोगों की तरह फूलों को बेदी पर अर्पण करने की बजाय अपनी वनदेवी पर अर्पित किया | वनदेवी ने एकबार पलटकर देखा और फिर पुष्प -पात्र लिए लोगों में फूल वितरण करने लगी | सोमू ने हर बार फूल वनदेवी को ही अर्पित किया | वनदेवी पूजा समाप्त होते ही घर के अंदर चली गयी | सोमू ने अपनी माँ से वनदेवी का परिचय पूछा तो पता चला वनदेवी और कोई नहीं उनके महाराज (रसोईया) की बेटी थी जो कुछ दिनों पहले अपने पिता की अस्वस्थता का समाचार पाकर आई थी | अब रसोई उसके ही जिम्मे था | 

"अच्छा ! क्या नाम है उसका?" सोमू ने माँ से पूछा |

"अन्नपूर्णा" कहती हुई माँ प्रसाद वितरण में मगन हो गयीं थी |

उस दोपहर किताब पढ़ते हुए सोमू को रह-रह कर किताब के पन्नों पर अन्नपूर्णा का चेहरा उभरता दिख रहा था | पढ़ने में उसका मन नहीं लग रहा था | रात में भी उसे ठीक से नींद नहीं आई | वह अचंभित था कि कैसे उसके तैलचित्र की वनदेवी से उसका साक्षात्कार हुआ था | कैसे संभव था यह जबकि वह कभी पहले उससे मिला तक न था | 

वह अगले रोज़ सुबह सूर्योदय होते ही उठकर नदी किनारे टहलने चला गया | थोड़ी देर टहलने और कसरत करने के बाद भानु सिंह की पदावली गुनगुनाता हुआ वह मुँह धोने के लिए घाट की सीढ़ियों से जैसे ही नीचे उतरा, सामने का दृश्य देख अवाक् हो गया | अन्नपूर्णा जल में स्नान करती हुई तैर रही थी और उसके आसपास रह-रहकर मछलियाँ उछलती हुई नदी की विपरीत धारा की ओर बढ़ रहीं थी | सोमू को एकबार लगा था कि उसकी नींद पूरी न होने की वज़ह से उसे यह सब दिख रहा था| उसने आगे बढ़कर नदी का जल अपने चेहरे पर छिडका था और पुनः वही दृश्य देख स्वयं को अस्वस्थ मान भागता हुआ घर आकर चादर ओढ़ सो गया था | पुरे दिन कमरे में ही रहा |

महाष्टमी के दिन माँ के मनुहार पर भी वह पूजा मंडप तक नहीं गया, तो माँ ही भोग का प्रसाद लेकर उसके कमरे में आ गयी और उसे अपने हाथ से खिलाने लगी |  भोग चखते ही जैसे उसकी जन्मों की भूख तृप्त हुई थी | 

"किसने बनाया यह भोग?" पूछते हुए वह शायद उत्तर जानता था |

"और कौन ? अन्नपूर्णा" माँ ने उसके मुँह में निवाला डालते हुए कहा | 

वह माँ की हाथ से चुपचाप भोग की खिचड़ी खाता रहा जबकि उसके मन में एक अलग ही खिचड़ी पक रही थी | उसे अन्नपूर्णा से एकांत में मिलना था | उससे मिलकर बताना था कि वह उसकी वनदेवी है| 

नवमी के दिन सुबह उठकर सोमू वनदेवी से मिलकर बात करने की लालसा लिए नदी किनारे गया | वहाँ वनदेवी अपने रुग्ण पिता को स्नान करा रही थी | वह दृश्य देख सोमू करुणा से भर गया | वह अन्नपूर्णा से चाहे तो बात कर सकता था; महाराज कुछ नहीं कहते | पर उसने बिना कुछ कहे लौट जाना ही उचित समझा |

विजयादशमी के दिन सिंदूर खेला के बाद जब देवी की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया गया, सोमू सीधे रसोई में जा हाजिर हुए | 

"जी, आपको कुछ चाहिए ? आज बाकी सभी लोग विसर्जन में गए हैं| मैं अकेली हूँ" अन्नपूर्णा ने सहमते हुए पूछा | 

"तुमसे ही बात करने आया हूँ" सोमू ने धीमे स्वर में कहा |

"जी...."अन्नपूर्णा बस इतना ही पूछ सकी |

"तुम कहाँ से आई हो ? क्या तुम विश्वास करोगी यदि मैं कहूँ कि मैंने तुम्हें देखने से पहले ही तुम्हारा चित्र बनाया ? क्या तुम जानती हो तुम मेरी वनदेवी हो? मुझे लगता है तुम मेरी चित्रों से निकलकर मेरा पीछा करती हुई यहाँ तक आ गयी हो" सोमू  एक साँस में कह गया था |

इतना सुनते ही अन्नपूर्णा खिलखिला कर हँस पड़ी थी और कहा था "बाबु, मैंने तो सुना कि आप तो लंदन से बहुत कठिन पढ़ाई कर यहाँ लौटे हैं | क्या ज्यादा पढ़ने से लोगों को ऐसा कुछ होने लगता है?"

"पागल नहीं हूँ मैं | किसी रोज़ तुम्हें वो तस्वीर भी दिखाऊंगा | कहो, शर्त लगाओगी? अगर चित्र की वनदेवी की शक्ल हु-ब -हु तुमसे मिली, तो मुझसे ब्याह करोगी?"सोमू अधीर हो चूका था |

अन्नपूर्णा ने बिना कोई उत्तर दिए लज्जा से अपने दोनों हाथों से अपनी आँखें बंद कर लीं थी | 

सोमू इसे स्वीकार का लक्षण समझते हुए कमरे में लौट आया | वह देर तक सोचता रहा था कि ग्रामीण अंचल में पली -बढ़ी उस लड़की में कितना आत्मविश्वास था | इतना तो शायद उसमें भी न था |  वह लड़की क्या थी, साक्षात माया थी | जादुई आकर्षण था उसमें | अगले दिन उसे जमशेदपुर के लिए रवाना होना था, इसलिए उसने रात्री भोजन के बाद अपने पिता से अन्नपूर्णा के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा था | सुनते ही पिता आगबबूला हो गए थे | 

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? यह नहीं हो सकता" पिता ने स्पष्ट कह दिया था  |

"पर अन्नपूर्णा ब्राह्मण है| आपको इस बार कोई आपति नहीं होनी चाहिए" सोमू ने अपना पक्ष रखा था |

"ब्राह्मण है तो क्या हुआ, है तो हमारे महाराज की ही बेटी | कहाँ हम और कहाँ वो| मैंने तुम्हारा रिश्ता कूचबिहार के एक जमींदार घराने में पक्का कर दिया है| दोल पूर्णिमा के बाद कोई अच्छा दिन देख  तुम्हारा विवाह करा देंगे | तुम्हें अब ब्याह के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं" सोमू के पिता ने फरमान सुना डाला था |

"क्या? आपने मेरा ब्याह पक्का कर दिया ? मुझसे बिना पूछे ? मैंने तो उस लड़की को देखा भी नहीं?" सोमू गुस्से से लाल था |

"हमने कौन सा तुम्हारी माँ को देखा था ब्याह से पहले | माता-पिता जो करते हैं अपनी संतान का भला सोचकर ही करते हैं| हमारी पसंद पर भरोसा रखो" कहते हुए सोमू के पिता उसकी पीठ थपथपाते हुए कमरे से बाहर निकल गए |

सोमू रात भर न सो सका था  | मन में कई तरह के ख्याल आए | सुबह जमशेदपुर रवाना होने से पहले वह अन्नपूर्णा से मिलने गया था तो उससे कहा था कि वह अगली बार जब आएगा तो उसे अपने साथ ले जाएगा और उससे ब्याह कर लेगा | 

सोमू अगली बार पंद्रह दिनों के अन्तराल पर लौटा, तो उसे अपने घर के अहाते में विवाह मंडप दिखा, जिसके चारों ओर केले का पेड़ लगा था | वह एक किस्म के अनजान भय से घिर गया | उसने भारी मन से घर में प्रवेश किया और सीधे रसोई की ओर भागा | वहाँ उसकी माँ खाना बना रही थी | वह अवाक् हो माँ को देखता रहा था | माँ ने बताया था "महाराज की तबियत अचानक बिगड़ गयी थी | वह चाहता था उसके जिंदा रहते उसकी इकलौती बेटी का ब्याह हो जाए | तुम्हारे पिता ने उसकी आखिरी इच्छा पूरी कर दी | पास के गाँव के एक लड़के से अन्नपूर्णा का ब्याह कर दिया | उसका ब्याह भी हुआ और महाराज भी बैकुंठ सिधार गया| ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे"

सोमू यात्रा से थका हुआ तो था ही, अन्नपूर्णा की शादी की बात सुन टूट सा गया था | वह अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर औंधे मुँह पड़ गया था | उसके दिनभर अन्न-जल ग्रहण न करने की बात सुन उसके पिता उसे रात्री भोजन के लिए बुलाने स्वयं आए थे |

अभी उसके पिता अपने चिर-परिचित अंदाज में उसे समझाना शुरू ही किए थे "बेटे, पुरुष नहीं रोते ..."

"हाँ, कापुरुष रोते हैं ; जैसे मैं हर बार अपना प्रेम खोकर रोता हूँ| पहली बार पुरुष बनने चला था, आप लोगों ने मुझसे वह मौका भी छीन लिया" सोमू ने अपने पिता को वाक्य पूरा करने नहीं दिया |

अगली सुबह सोमू जमशेदपुर लौट गया |

5 पंचम अध्याय - "अन्नपूर्णा का वैधव्य"

रंग उसे लूसी की याद दिलाता तो चित्र की वनदेवी उसे अन्नपूर्णा की ; संगीत उसे रुक्मिणी की याद दिलाता | उसने अपने अतीत से भागने के लिए योगाभ्यास शुरू किया | खाली समय में शारीरिक व्यायाम के अतिरिक्त वह ध्यान लगाने के विभिन्न तरीकों को सीखने लगा | चार महीनों से वह घर भी नहीं गया था | अचानक एक रविवार उसके माता-पिता जमशेदपुर आ गए और उसे बताया कि अगले महीने के प्रथम सप्ताह ही उसका विवाह तय हुआ है| योगाभ्यास और ध्यान का ही असर रहा होगा कि सोमू ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी | तीन दिन बाद सोमू यंत्रवत माता-पिता के साथ कोलकाता चला गया | विवाह की खरीदारी से लेकर विवाह के नियम -क़ानून तक अपने माता-पिता के हर निर्देश का पालन किया | 

पत्नी, जो गहनों से लदी थी, देखने में औसत थी | विवाह के कुछ महीनों में सोमू को यह भी पता चल गया कि उसे न तो लिखने-पढ़ने में कोई रूचि है, न ही संगीत में | कभी उसने सोमू के चित्रों में भी किसी प्रकार की कोई रूचि नहीं दिखाई | सोमू इस बात से बेहद दुखी रहता था | उसने अपने बनाये चित्र कोलकाता के भंडार कक्ष में रखवा दिया था |

दिन, महीने , साल बदलते रहे और सोमू दो बच्चों के पिता बने | सोमू कभी अपना अतीत विस्मृत नहीं कर पाए | परिस्थितियों ने उन्हें चैन से रहने न दिया | अपनी छोटी संतान के अन्नप्राशन पर जब सोमू कोलकाता गए, उनके लौटने के ठीक दो दिन पहले रुक्मिणी की सीढ़ियों से गिरने से मृत्यु हो गयी | वह उसकी अंत्येष्टि में शामिल हुए और घर लौटकर रोने की बजाय देर तक ग्रामोफोन  पर किशोरी अमोनकर को सुना | 

इस घटना के तीन साल बाद सोमू के पिता चल बसे | पिता के श्राद्ध पर उसने ब्राह्मण भोज के समय अन्नपूर्णा को खाना बनाते देखा | वह विधवा के वेश में थी |  सोमू के पूछने पर उसने बताया कि उसका विवाह जिस युवक से किया गया था, वह शराबी था | शादी के दो साल बाद एक दिन वह स्नान करने नदी में गया, तो नहीं लौटा | कई दिनों बाद उसकी लाश लौटी |  दो -चार घरों में खाना बनाकर किसी प्रकार उसका गुज़ारा चल रहा था | 

"मेरे साथ जमशेदपुर चलोगी? हमारे साथ रहना " सोमू ने भावुक होकर कहा था | 

" इस विधवा से ब्याह करेंगे बाबु?"अन्नपूर्णा ने व्यंग्य करते हुए पूछा था |

सोमू ने जब कोई उत्तर नहीं दिया, अन्नपूर्णा ने कहा था "वनदेवी हूँ,  दासी नहीं बन पाऊँगी | मेहनत कर अपना पेट पाल सकती हूँ | संभव हो तो आप मुझे वनदेवी का चित्र उपहार में दे जाइये"

सोमू ने जमशेदपुर लौटने से पहले भंडार कक्ष से ढूँढकर वनदेवी का चित्र अन्नपूर्णा को दिया था |  

सोमू की माँ अकेली रह गयी थी और वह सोमू के साथ जमशेदपुर भी नहीं जाना चाहती थी | सोमू जब कभी उन्हें अपने साथ ले जाने की बात करता, वो कहतीं कि उन्हें उसी घर में अपना प्राण त्याग करना है जहाँ उसके पिता की स्मृतियाँ हैं| सोमू अब हर महीने कोलकाता का एक चक्कर लगाने लगे थे | पिता की अंत्येष्टि के अगले महीने जब वो अपनी माँ से मिलने आए, तो माँ ने उन्हें कुलदेवी के दर्शन करवाने का आग्रह किया | कुलदेवी का मंदिर ग्राम के दूसरे छोड़ पर था | जब सोमू माँ को लेकर वहाँ पहुँचे, उन्हें वनदेवी का वह चित्र, जो उसने अन्नपूर्णा को उपहार में दिया था, कुलदेवी की प्रतिमा के ठीक ऊपर टंगा दिखा | अगली सुबह उसने अन्नपूर्णा से शिकायत के लहजे में जब पूछा था कि उसने उस चित्र को मंदिर में क्यूँ टांगा, तो उसने जवाब में कहा था "प्रेम के लिए इस संसार में कोई मंदिर नहीं है| उस चित्र को कुलदेवी के ऊपर टांग कर मैंने यह स्थापित करने की कोशिश की है कि प्रेम से बड़ा कोई भगवान नहीं होता"| यह सुन कर सोमू कुछ कह ही नहीं पाया | उसके अंदर जैसे कुछ चटखा | वह चीख कर रोना चाहता था, पर आँखों में अश्रु जल आने से पहले मानस पटल पर पिता का कहा गूँजने लगता "पुरुष नहीं रोते" |  उसने मन ही मन सोचा कि अन्नपूर्णा सचमुच की देवी ही होगी जो शापित हो इहलोक में विचर रही है|   

6 षष्ठ अध्याय - "पुरुष नहीं रोते"

बीते वर्षों में बहुत कुछ बदला | सोमू एकबार फिर सौमित्र हो गए | कई पदोन्नति, कई तबादला और अंतिम तबादला कोलकाता में हुआ | उनके अंतिम तबादले के वर्ष ही उनकी माँ का स्वर्गवास हो गया था | पत्नी से उनका संबंध औपचारिक रह गया | बच्चे बड़े हो गए और अब उनके अपने बच्चे थे | संतोष की बात यह रही कि उनके बच्चे उनका बेहद ख्याल रखते हैं| रंग और चित्र से नाता भले ही टूट सा गया, पर उनसे प्रेम न छूटा | ग्रामोफ़ोन अब सजावट का सामान बन कर रह गया था | सौमित्र अब मोबाइल के एक क्लिक पर किशोरी अमोनकर से लेकर प्रभा अत्रे तक किसी को भी सुन सकते थे | उनके पढ़ने का शौक कब लिखने में तब्दील हो गया, यह उन्हें भी पता न चला | शायद अकेलेपन के अपने नितांत निजी क्षणों में अतीत का तीर जब सीने में चुभता, वह उसे पन्नों पर उतार देते | उनकी कविताओं में लूसी के प्रेम को पढ़ा जा सकता और रुक्मिणी के मृत्यु विलाप को | 

सौमित्र अब अस्सी पार कर चुके हैं|  अपने बच्चों से अपनी अंतिम इच्छा ज़ाहिर करते हुए सौमित्र ने कह दिया है कि मृत्योपरांत उन्हें चंदन की लकड़ी पर न जलाया जाए | वह चाहते हैं कि लकड़ी की जगह उन सभी कैनवास का प्रयोग चिता के लिए किया जाए जिस पर उन्होंने कभी वनदेवी और वन के चित्र उकेरे थे | अपने बच्चों से कहा कि जलती हुई चिता से उठती रंगीन लपटों में जीवन को देखे और उनके लिए कभी आँसू न बहाए | पत्नी से कुछ नहीं कहा | पत्नी और उनके बीच किसी प्रकार का संवाद तभी होता है जब वह अत्यंत आवश्यक हो |

हर शाम वह बिला नागा हुगली नदी के किनारे बैठ ध्यान करते हैं और फिर घर पहुँचकर संध्या करने बैठ जाते हैं| आसपास के लोगों को भले ही लगता है कि सौमित्र शांभवी मुद्रा में योगरत होते हैं, यह सिर्फ सौमित्र ही जानते हैं कि उनके ध्यान में नदी होती है जिसमें पानी की सतह के नीचे हिलसा मछलियां और सतह के ऊपर अन्नपूर्णा तैर रही होती है| कभी -कभी जल की जगह कुलदेवी की पूजा बेदी, मछली की जगह कुलदेवी और अन्नपूर्णा की जगह वनदेवी का चित्र उभर आता है| संध्या अर्चना करते हुए गायत्री मंत्र नहीं बुदबुदाते | रुक्मिणी को ध्यान करते हुए एक ही प्रश्न बारबार पूछते हैं "तुम मुझे कभी क्षमा कर पाओगी?"|

सौमित्र अब नहीं रोते | सौमित्र अब ध्यान लगाकर अतीत के अश्रु जल में गोता लगाते हैं|

होलिका दहन

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बुंदेलखंड के जमींदार हिरण्यकश्यप अपने इकलौते बेटे प्रह्लाद की अंधभक्ति को लेकर बेहद चिंतित थे | प्रह्लाद ने एकबार अपनी माँ कयाधु को कहते सुन लिया था कि ईश्वर की आराधना से संसार में किसी भी वस्तु को प्राप्त किया जा सकता है और यही बात उसके बाल मन में घर कर गयी थी | वह अपना ज्यादातर वक़्त पूजा-अर्चना में लगाया करता था और हर बात के लिए ईश्वर पर आश्रित रहने लगा था | न उसका मन पढ़ने में लगता न ही खेलने में | वह अपने आसपास के लोगों से भी कटा-कटा सा रहता था | शुरू-शुरू में जमींदार हिरण्यकश्यप ने बच्चे की इन गतिविधियों को उसके विकास की उम्र मानकर और बालपन की बालसुलभ प्रवृत्ति मानकर अनदेखा किया; परन्तु जब कुछ समय के बाद भी यह गतिविधियाँ कम होने की बजाय बढ़ती रहीं, तो वे प्रह्लाद से कठोरता से पेश आए | इसी क्रम में एकदिन उन्होंने अपने आदेशपाल से घर से सभी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ निकाल उन्हें जंगल में रख आने का आदेश दिया | आदेशपाल ने आज्ञा का यथाशीघ्र पालन किया और जमींदार के घर की सभी देवी-देवताओं की मूर्तियों को जंगल में रख आया |

जमींदार हिरण्यकश्यप लगभग आश्वस्त हो चुके थे कि घर से मूर्तियों के निष्कासन से उनकी समस्या का समाधान हो गया था कि तभी किसी ने उन्हें सूचना दी कि प्रह्लाद जंगल चला गया और वहाँ जाकर वह ईश्वर के तप में लीन हो गया |  उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने जल्दबाजी में गलत फैसला ले लिया | वह प्रह्लाद को लाने स्वयं जंगल गए पर प्रह्लाद ने उनके समक्ष शर्त रखा कि वह घर तभी जाएगा जब वह जंगल में रखी मूर्तियों को घर ले जा सकेगा | हिरण्यकश्यप को प्रह्लाद के बाल हठ के आगे झुकना पड़ा और वह प्रह्लाद और मूर्तियों के संग भारी मन से घर लौट गए |

अगले दिन शरत पूर्णिमा थी | हिरण्यकश्यप ने काफी विचार करने के बाद अपनी समस्या के समाधान के लिए अपनी छोटी बहन होलिका को बुला भेजा | जमींदार को होलिका की सूझबूझ पर बहुत विश्वास था | होलिका हिमाचली लड़के इलोजी से प्रेम करती थी और एक अरसे से उससे विवाह करना चाहती थी परंतु इस अन्तर्जातीय विवाह को हिरण्यकश्यप मान्यता देने को तैयार न थे | उस रोज़ जब बड़े भाई के बुलावे पर होलिका आई तो भाई ने बहन के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि यदि वह अगले वर्ष शरत पूर्णिमा के दिन तक किसी प्रकार प्रह्लाद की अंधभक्ति समाप्त करने में सफल रही, तो वह स्वयं इलोजी से उसका विवाह करवाएँगे | होलिका अपने बड़े भाई के इस प्रस्ताव पर राज़ी हो गयी | उसके पास इलोजी से विवाह करने का और कोई दूसरा रास्ता भी न था |

अगले दिन जब प्रह्लाद पूजा करने बैठा, तो होलिका ने उससे कहा "तुम इतना पूजा-पाठ करते हो, काश ! कि तुम्हें इसका पुण्य भी उतना ही मिलता"

"उतना ही मिलता !!! क्या कहना चाहती हैं आप?" प्रह्लाद नहीं समझ पा रहा था |

"देखो, पूजा तुम करते हो | फूल और फल हमारा माली उगाता है; प्रसाद तुम्हारी माँ बनाती हैं और पूजा के स्थान की सफाई तो घर का सहायक करता है| तुम्हारी पूजा का पुण्य तुम्हारे अतिरिक्त उन सभी को बराबर हिस्से में मिलता है| तो पूरा पुण्य तुम्हें तो नहीं मिला न ?" कहते हुए होलिका प्रह्लाद की आँखों में देखने लगी |

"अरे हाँ !!!" कहता हुआ प्रह्लाद सोच में पड़ गया था|

"परेशान होने की कोई बात नहीं| अगर तुम चाहो, कल से बागीचे की देखभाल में माली की मदद कर सकते हो और कुछ समय बाद तुम्हें स्वयं फूल और फलों को उगाना आ जायेगा| इसी प्रकार तुम हमारे गोशाला जाकर गायों की सेवा कर सकते हो, उन्हें चराने ले जा सकते हो और उन्हें दूहना भी सीख सकते हो | हो सके तो सहायक के बदले कल से पूजा स्थान की सफाई तुम ही करो" कहती हुई होलिका ने उसे एकसाथ कई उपक्रमों में व्यस्त रखने का कारगर उपाय ढूँढ लिया था | प्रह्लाद की सहमती देख लगे हाथ उसने माली से लेकर सहायक तक सभी को उचित निर्देश दे दिया |

प्रह्लाद ईश्वर को पाने के लिए कुछ भी कर सकता था | अगले दिन सुबह उठते ही पहले वह माली के साथ काम पर लग गया | फिर वह गौशाला गया और गौ पालन के गुर सीखने लगा | पूजा स्थान की सफाई सबसे आसान काम था |  इन कामों में अब प्रह्लाद को तीन से चार घंटों का समय देना पड़ता था | फिर शारीरिक श्रम के चलते वह शाम में थकान की वज़ह से जल्दी ही सो जाता | पूजा के लिए अब कम समय मिलता; पर वह संतुष्ट रहता कि पूजा का सारा पुण्य उसे अकेले ही मिल रहा था | कुछ ही महीनों में प्रह्लाद ने अपनी लगन से ये सब काम तो सीखा ही; साथ ही गाय और पेड़-पौधों से उसे लगाव हो गया | लाजिम भी था जिनके साथ वक़्त बिताया, उनसे लगाव तो होना ही था |

अभी पाँच महीने ही बीते थे कि एक दिन फिर होलिका पूजा के ऐन वक़्त प्रह्लाद के सामने उपस्थित हुईं  और कहने लगीं "मैं बेहद खुश हूँ कि अब तुम अपनी पूजा की सारी व्यवस्था स्वयं करते हो | ईश्वर भी तुमसे बेहद खुश होंगे | बस एक बात की कमी है अब"

"अब किस बात की कमी है!!" प्रह्लाद ने आश्चर्यचकित होकर पुछा था |

"बिना शिक्षा के तुम न मन्त्र का सही उच्चारण जानते हो न ही कर्मकांड की सही विधि का ही ज्ञान है तुम्हें | इस सबके लिए जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है, वह तो विधिवत शिक्षा के पश्चात ही मिलना संभव हो सकता है और यह है बड़ा मुश्किल काम | न जाने तुम कर पाओगे या ... " कहती हुई होलिका एक बार फिर प्रह्लाद की आँखों में देखने लगी |

"क्यूँ नहीं कर सकता | जरूर करूँगा | ईश्वर के लिए तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ" प्रह्लाद ने होलिका की अपेक्षानुसार ही उत्तर दिया था |

कुछ समय के बाद प्रह्लाद ने अपने पिता से कहकर एक प्रतिष्ठित विद्यालय में अपना नामांकन करवाया और मन लगाकर पढ़ने लगा | प्रकृति और ईश्वर को जानने की ऐसी उत्सुकता कि पाठ्यक्रम के इतर पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रह्लाद पुस्तकालय भी जाने लगा |  अब वह पूजा के लिए मुश्किल से आधा घंटा ही निकाल पाता था | कुछ समय बाद उसके वैज्ञानिक प्रयोगों की माया थी कि वह ईश्वर की अपेक्षा प्रकृति में अधिक विश्वास करने लगा था |

जमींदार हिरण्यकश्यप अपने पुत्र में इस सकारात्मक बदलाव देख बेहद प्रसन्न हुए और अपनी बहन से किए हुए वायदे के मुताबिक शरत पूर्णिमा को उसका ब्याह उसके प्रेमी इलोजी के साथ धूमधाम से करवाया | उन्हें इस बात का भी भान हुआ कि किसी भी समस्या का हल हठ या कठोरता की अपेक्षा सूझबूझ से किया जाना चाहिए | इसी उपलक्ष्य में उन्होंने पुराने जर्जर हो चुके रीति रिवाजों के बहिष्कार के लिए प्रतीकात्मक तौर पर पुराने जर्जर हो चुके सामानों को जलाया और इसे होलिका के नाम पर होलिका दहन कहा | होलिका दहन में होलिका को जलाया जाना पुरानी बात थी; आज के जमाने में होलिका द्वारा समाज की रुढ़िवादी परम्पराओं और वर्जनाओं को जला नए प्रतिमान गढ़ने को होलिका दहन कहा गया |

Monday, February 12, 2018

सेल्फी

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मृणाल यूँ तो साधारण दिखने वाली छरहरे बदन की साँवली लड़की थी, पर उसकी एक जोड़ी आँखों में वो चमक थी कि जो भी उसे देखता रौशन हो जाता | वो अपनी हिरणी जैसी आँखों से जिसे देखती उसकी आँखों पर जमी काई हट जाती और उन आँखों में फिर मृणाल का ही सपना तैरता | उसे तरह -तरह से सेल्फी लेने का बेहद शौक था और उसने सेल्फी कला में महारत हासिल कर ली थी| अगरतला के एक होटल व्यवसायी ने एकबार अंतरजाल पर उसकी सेल्फी देख उसका पता लगाया और फिर उससे संपर्क साधा | फिर मिलने के बहाने तलाश किए जाने लगे | मिलने का मतलब होता था ढेर सारे उपहार और महंगे होटलों में खाना |  कुछ ही महीनों में मृणाल को विवाह का प्रस्ताव भी मिला | समाज के एक मध्यम वर्गीय परिवार में पली-बढ़ी लड़की के लिए यह किसी स्वप्न से कम न था | मृणाल ने अपने पिता को विवाह प्रस्ताव से अवगत करवाया | पहले तो यह सुनकर कि उनकी बेटी किसी से प्रेम करती है, वह अपना आपा खो बैठे | फिर जैसे ही उन्होंने लड़के का नाम सुना, तो पहचान गए | वह शहर का जाना - माना होटल व्यवसायी था | उनकी आँखें चमक उठीं | इतने बड़े घर में रिश्ते की बात तो वह सोच भी नहीं सकते थे | लड़के का ब्राह्मण न होना अब कोई बड़ी बात नहीं थी | वो झट से तैयार हो गए | एक महीने के अंदर शादी भी हो गयी | खूब धूमधाम से संपन्न हुई थी शादी | मृणाल के पिता इस शादी से बेहद संतुष्ट थे |

शादी के चौथे दिन देर रात कोई दरवाजा ज़ोर-ज़ोर से पीट रहा था | मृणाल के पिता सोने ही गए थे कि असमय दस्तक से चौंक दरवाजे तक गए | दरवाजा खोलने से पहले पूछा "कौन"

"मैं, मैं हूँ बाबा, जल्दी दरवाजा खोलिए" मृणाल ने रुंधे हुए गले से कहा |

हडबडाहट में दरवाजा खोला गया | मृणाल नाईट गाउन पहने नंगे पाँव ही चली आई थी | उसे देख घर के लोग हैरान थे | 

"अरे ! ऐसे कैसे चली आई हो? क्या हुआ ? सब ठीक तो है न" एक साथ कई आवाजें गूँजी |

"जल्दी दरवाजा बंद करो | कुछ भी ठीक नहीं | बाबा, आप मुझे कहीं छुपा दीजिए न" मृणाल बेतहाशा रो रही थी|

"पर हुआ क्या" मृणाल की माँ ने उसे एक ओर खींचते हुए पूछा |

"वो दूसरे कमरे में फोन पर था | मैंने उसकी सारी बातें सुन लीं | मैंने अपनी कानों से सुना कि कल वो हनीमून के बहाने मुझे दुबई ले जाएगा और वहाँ मुझे बेच देगा | कीमत भी तय हो चुकी है" मृणाल काँप रही थी |

मृणाल के पिता ने उसकी माँ से विमर्श किया और उसी रात मृणाल को लेकर वे दूर किसी गाँव में मृणाल की मौसी के पास चले गए | मृणाल का वहाँ रहना हर दृष्टि से सुरक्षित था | उस गाँव में बिजली न के बराबर रहती थी, यातायात के साधन भी सीमित थे और वह मौसी उसकी शादी में भी किसी कारण से नहीं आ पायी थीं, इसलिए उनसे वर पक्ष के किसी का कोई परिचय भी नहीं था | 

कई महीने गुजर गए| न तो मृणाल के ससुराल से कोई उसकी खबर लेने उसके मायके आया और मृणाल के घरवालों ने भी उनसे कभी संपर्क साधने की कोशिश नहीं की | मृणाल अपनी मौसी के यहाँ इस डर के साथ जी रही थी कि किसी रोज़ उसका पति उसे ढूँढता हुआ वहाँ न आ धमके | मृणाल के माता - पिता हर महीने एकबार  आकर उसे देख जाते और चिंतित होते | मृणाल अपने हृदय के व्याघात को वाणी भले ही न देती हो, पर माता-पिता उसके चेहरे से सब पढ़ लेते | 

एक साल बाद मृणाल के पिता को पता चला कि उस होटल व्यवसायी ने फिर से शादी की | एकबार उनके मन में आया कि पुलिस को इत्तिला कर सब बता देना चाहिए पर अगले ही पल उन्होंने विवेचना की कि उस होटल व्यवसायी के पास इतनी संपत्ति है कि वह लगभग सभी कुछ खरीद सकता है| वह एक और लड़की की जिंदगी खराब होने से बचाना तो चाहते थे, पर अपनी बेटी की कीमत पर नहीं | उन्होंने सोचा शायद इसी में मृणाल की मुक्ति निहित है और तय किया कि वह कुछ नहीं कहेंगे | इस घटना के सात महीने बाद उन्होंने दूर शहर के एक लड़के से मृणाल की शादी कर दी | शादी मृणाल की मौसी के घर से सम्पन्न हुआ | मृणाल के नए ससुराल वालों को उसका नाम मेघबालिका बताया गया | 

मृणाल अपनी मौसी के घर रहते हुए घर के कामों में दक्ष हो गयी थी| फिर चुपचाप रहते हुए कब मौन रहना उसकी आदत में शुमार हो गया, उसे भी पता न चला | चुप रहकर घर का सारा काम करने वाली स्त्री किसे अच्छी नहीं लगेगी ! बहुत कम समय में उसने अपने नए ससुराल में सभी लोगों का मन मोह लिया | साल भर बाद जब उसने एक बेटे को जन्म दिया, तो दोनों परिवारों में उत्सव सा माहौल था | लगभग दो सालों के बाद मृणाल के चेहरे पर मुस्कान देख उसके माता-पिता संतुष्ट और खुश थे |

बेटा रोज़ थोड़ा-थोड़ा बड़ा हो रहा था और मेघबालिका रोज़ थोड़ा-थोड़ा मृणाल हुई जाती थी | कभी फोन से बेटे की तस्वीरें लेती तो कभी खुद की उसके साथ सेल्फी |  सुंदर -सुंदर सुखद तस्वीरों से भरा साल बीत गया और बेटा एक साल का हो गया | मृणाल ने अपने नए जीवन साथी को कभी बताया था कि जब कंचनजंघा पर भोर का सूरज अपनी लालिमा बिखेरता है, तो उस दृश्य को देखने वाला इंसान सभी कुछ भूल जाता है| बेटे के जन्मदिन पर तय हुआ कि तीनों प्राणी दार्जिलिंग घूमने जाएँगे और उस दृश्य का साथ आनन्द उठाएँगे | पाँच घंटे के सफर के बाद मृणाल बेटे और पति, राजीव के साथ दार्जिलिंग में थी | वह अतीत की यादों में देर तलक डूबी रही | शाम के चार बजे घूमते हुए वे एक बेकरी तक गए | अंदर जाकर देखा बेकरी बस नाम में ही था, वह दरअसल एक छोटा सा रेस्तरां था | बेटे के जन्मदिन का केक काटा गया और रेस्तरां में मौजूद लोगों में बाँटा गया | ढ़ेरों तस्वीरें ली गईं | रात का खाना खाकर जल्द ही होटल आने का कार्यक्रम था | सुबह कंचनजंघा पर सूरज का जादू देखना था | 

कार्यक्रम के मुताबिक वे अलसुबह होटल से निकले | रास्ते में जगह-जगह रुककर सेल्फी ली गयी | अंततः वे उस जगह पर पहुँच ही गए जहाँ उनके साथ अन्य सैलानी भी टाइगर हिल पर उगते हुए सूरज का इन्तजार कर रहे थे | लगभग आधे घंटे बाद सूर्योदय हुआ और कुछ देर के लिए वहाँ खड़े सभी लोगों की साँसे रुक गयीं | नजारा था ही ऐसा अलौकिक | मृणाल ने पहले टाइगर हिल पर सूरज की स्वर्णिम किरणों के बिखरते जादू को फोन के कैमरे में क़ैद किया और फिर उसने टाइगर हिल के उस मनोरम दृश्य के साथ पति और बेटे की तस्वीर ली | पास से तीनों का टाइगर हिल के साथ वाली सेल्फी में उनका चेहरा ही दिख रहा था, टाइगर हिल नहीं दिख रहा था | मृणाल ने राजीव से कहा भी कि वह किसी दूसरे सैलानी से आग्रह करे कि वह इन लोगों की तस्वीर खींच दे पर राजीव को किसी अजनबी के हाथों में फोन देना सुरक्षित न लगा और उसने कहा कि वह खुद ही थोड़ी दूरी पर आगे जाकर सेल्फी ले लेगा | वह फोन को सेल्फी मोड में रखकर फोन में देखता हुआ आगे बढ़ने लगा | फोन में उसकी नजरें कंचनजंघा पर टिकी थीं और उसका पीठ मृणाल की ओर थी | मृणाल ने अचानक गौर किया कि वह आगे बढ़ता ही जा रहा है और उसके चार कदम आगे गहरी खाई है| 

"ठहरो" वह चिल्लाई | पर वह उस मनोरम दृश्य में इस कदर खो चुका था कि जब तक वह समझ पाता कि यह उसकी मेघबालिका की आवाज है, उसके पाँव के नीचे से जमीन जा चुकी थी और वह हवा में तैरता हुआ खाई में गिर रहा था | सैलानी, जो अभी तक कंचनजंघा देखने में व्यस्त थे. उस ओर दौड़ पड़े और फोटो लेने लगे | मृणाल उन तस्वीरों में कहीं नहीं थी |

Sunday, February 4, 2018

पुरुषोत्तम

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दशरथ चौधरी की तीन संतानों में सबसे बड़ा था पुरुषोत्तम | दशरथ चौधरी जब खाड़ी देश से खूब सारा धन कमाकर लौटे, तो सबसे पहले इंटरमीडिएट में पढ़ रही बेटी का ब्याह कर दिया जबकि वह आगे पढ़ना चाहती थी | दोनों लड़कों को किसी तरह ग्रेजुएट होने तक फॉर्म भरने के रूपये दिए |  जब पुरुषोत्तम ग्रेजुएट हो गया , उसके पिता ने कहा "अब हम तुम्हारी जिम्मेदारी से मुक्त हुए | अब तुम्हारे जीवन की बागडोर तुम्हारे हाथों में है| अपने लिए कोई नौकरी देख लो | अब मैं तुम्हारा खर्चा नहीं चला सकता "

पुरुषोत्तम नौकरी ढूँढने दिल्ली चला आया | नौकरी ढूँढते हुए दो जोड़ी चप्पलों के घिस जाने के बाद उसे एक इंटेरनेट कैफे में नौकरी मिली | कॉलेज के दिनों से ही पुरुषोत्तम कंप्यूटर की मरम्मत करने लगा था | वही काम आया | एक दिन वहाँ उसने मैथिली को देखा | मैथिली सुन्दरता की प्रतिमा थी | पुरुषोत्तम कॉलेज के दिनों से ही उसे चाहता था, पर कभी इज़हार करने लायक साहस न जुटा पाया |

"अरे ! तुम यहाँ क्या कर रही हो" खुशी मिश्रित आश्चर्य से पुरुषोत्तम ने पूछा |

"यही सवाल मेरा भी है| तुम यहाँ क्या कर रहे हो"मैथिली ने खुशी जाहिर करते हुए कहा |

"मैं यहीं काम करता हूँ और पास ही रहता हूँ" कहते हुए पुरुषोत्तम कुछ उदास हो गया |

"अरे वाह ! बहुत बढ़िया | मैं यहाँ मेल चेक करने आई हूँ|" कहते हुए मैथिली एक कंप्यूटर की ओर बढ़ गयी |

जाने से पहले मैथिली ने अपना फोन नम्बर पुरुषोत्तम को देते हुए कहा "मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के पास रहती हूँ जबकि मेरा दफ्तर दक्षिणी दिल्ली में है| तुम अपने कमरे के आसपास ही मेरे लिए भी कोई कमरा दूंढ़ दो"

"जरूर | समझो हो गया" पुरुषोत्तम ने आश्वस्त करते हुए कहा |

एक महीने बाद मैथिली पुरुषोत्तम की पड़ोसन बन चुकी थी | आसपास रहने के कारण अक्सर दोनों एक-दुसरे से टकरा जाते, कभी बस स्टॉप पर तो कभी सब्जी मंडी में और फिर कभी एक-दुसरे के घर चाय या खाने के बहाने अनायास ही हो आते |  एक रविवार पुरुषोत्तम ने मैथिली को बताया कि उसके बुआ के लडके की सगाई है और वह उसे अपने साथ ले जाना चाहता है| छुट्टी का दिन होने के नाते मैथिली बिना किसी संकोच के उसके साथ चल पड़ी |

चार मंजिला ईमारत की छत पर खूब भीड़ थी | मैथिली एक कोने में जा खड़ी हुई | पुरुषोत्तम भी उसके साथ ही खड़ा रहा और सभी से उसका परिचय कराता रहा | कुछ समय बाद उसके जीजा जी आए और कहा " आप दोनों को भी अब शादी के विषय में विचार करना चाहिए |"

मैथिली अवाक् होकर पुरुषोत्तम की ओर देखने लगी जबकि पुरुषोत्तम मुस्कुराकर रह गया | मैथिली को अजीब सी बैचेनी होने लगी और उसने पुरुषोत्तम से लौटने का आग्रह किया |  पुरुषोत्तम मैथिली को छोड़ने उसके कमरे तक गया | कमरे पर पहुँचते ही मैथिली ने पुरुषोत्तम से पूछा "तुम्हारे जीजा जी क्या कह रहे थे?"

"अरे छोड़ो | मैंने उनसे कुछ भी नहीं कहा | तुम्हें साथ देखा तो उन्हें लगा, शायद हम..."कहते हुए पुरुषोत्तम रुक गया |

"मैं तुम्हें कुछ बताना चाह रही थी| तुम अभिराम से तो मिल ही चुके हो पिछले इतवार" कहते हुए मैथिली संकोच कर रही थी |

"कौन, वो नीली आँखों वाला लड़का?" पुरुषोत्तम ने उत्सुक होकर पूछा |

"हाँ, वही | हम दोनों एक-दुसरे को चाहते हैं और शादी करना चाहते हैं" मैथिली को यह बताना बेहद जरूरी लगा |

"ओ..."कहकर उदासी छुपाता पुरुषोत्तम झूठी मुस्कान बिखेरता हुआ "गुड नाईट" कहकर चला गया | मैथिली अब थोड़ा हल्का महसूस कर रही थी |

पुरुषोत्तम सहज और सुलझे हुए व्यक्तित्व वाला इंसान था |  मैथिली का सच जानने के बाद वह भले ही संयमित हो गया था, पर दोस्ती निभाने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी |

उधर सगाई की शाम मैथिली को पुरुषोत्तम के साथ देखकर ही पुरुषोत्तम के घर में उसकी शादी को लेकर बातचीत शुरू हो चुकी थी, इधर मैथिली का पंजाब की एक बड़ी कम्पनी से नौकरी का बुलावा आ गया था | दस दिनों के बाद मैथिली पंजाब चली गयी |

एकदिन पुरुषोत्तम के पिता ने उसे बताया कि उन्होंने उसकी शादी के लिए लड़की पसंद कर ली है और कुरियर से लड़की की तस्वीरें भी भेज दी है| न पुरुषोत्तम से कुछ पूछा गया , न ही पुरुषोत्तम ने कुछ पूछा | कुछ दिनों बाद पुरुषोत्तम के हाथों में वह लिफ़ाफ़ा था जिसमे तस्वीरों के साथ थी उसके पिता की चिठ्ठी  |

"प्रिय पुरुषोत्तम,

उम्मीद है सब बढ़िया है| तुम्हारे लिए हमने एक लड़की पसंद की है| पसंद क्या, मैं तो उसके पिता को जुबान दे चूका हूँ| एकबार तुम भी वैदेही की तस्वीर देख लो, बाद में न कहना कि बिना लड़की देखे शादी करवा दी गयी | चाहो तो तस्वीर के पीछे लिखे मोबाइल नंबर पर बात भी कर लो | मुझे तो बड़ी सुशील लड़की लगी | दहेज भी मुँहमांगा दे रहे हैं| शादी के लिए अभी छुट्टियों की अर्जी दे दो, तीन महीने ही रह गए हैं|

और सुनो, शादी के लिए खरीदारी पर फिजूल खर्च करने की कोई जरुरत नहीं| सब मैं देख लूँगा |

हो सके तो शादी से दस दिन पहले आ जाना |

तुम्हारा पिता
दशरथ "

पुरुषोत्तम कुछ देर सोचता रहा और फिर तस्वीरों में खो गया | वैदेही एक साधारण सी दिखने वाली प्यारी लड़की लगी | उसने उसी रात वैदेही को फोन लगाया और बात की | बातों से वह बेहद प्यारी लगी और पुरुषोत्तम ने अपने घर में बता दिया कि उसे इस शादी से कोई आपत्ति नहीं | उसने मैथिली को भी फोन पर अपनी शादी कि सूचना दी |

घर में शादी की तैयारियाँ पूरी हुई और तीन महीने बाद पुरुषोत्तम और वैदेही की शादी हो गयी | पुरुषोत्तम वैदेही को लेकर वापस दिल्ली आ गया | खूब जमने लगी दोनों की आपस में और वैदेही ने हर प्रकार से पुरुषोत्तम का साथ दिया | वैदेही को पुरुषोत्तम के एक कमरे में रहना अच्छा नहीं लगता था, पर वह जानती थी कि पुरुषोत्तम की आय में उससे बेहतर कुछ नहीं मिल पाता | उसने पहले एक ब्यूटी पार्लर में प्रशिक्षण लिया और फिर वहीं काम करने लगी| कुछ समय बाद दोनों दो कमरों के घर में किराए पर रहने लगे | वैदेही ने अपना ब्यूटी पार्लर खोल लिया | इसी बीच पुरुषोत्तम को भी मनचाही तनख्वाह वाली नौकरी मिली | चार साल बाद उनके घर एक लड़की का जन्म हुआ जिसका नाम उन्होंने राज नंदिनी रखा | बच्ची के आने से वैदेही का काफी समय बच्ची की देखरेख में चला जाता जिससे ब्यूटी पार्लर खोलने में देर होती | ब्यूटी पार्लर से घर तीन किलोमीटर की दूरी पर था | पुरुषोत्तम ने इसका भी हल ढूँढ निकाला | उसने ब्यूटी पार्लर के ठीक सामने वाली गली में दो कमरे का घर किराए पर ले लिया | गली से निकलते ही बायीं ओर था प्रकाश ड्राईक्लिनर्स जिसके ठीक सामने था वैदेही ब्यूटी पार्लर | प्रकाश ड्राईक्लिनर्स को लगभग पुरुषोत्तम के ही उम्र का प्रकाश चलाता था| पिछले कुछ महीनों में पुरुषोत्तम और प्रकाश की अच्छी दोस्ती हो गयी थी | फिर पुरुषोत्तम था भी बड़ा मिलनसार | नए घर से पुरुषोत्तम का दफ्तर काफी दूर हो गया था, जिसकी वज़ह से उसे घर लौटने में अक्सर ही देर हो जाती थी |

अभी नए घर में आए बमुश्किल सात महीने ही गुजरे थे कि एक रविवार सब्जी खरीदते हुए  प्रकाश का सामना पुरुषोत्तम से हुआ |

"और भाई, तुम तो ईद का चाँद हो गए | कब जाते हो, कब आते हो, तुम्हारे तो दर्शन दुर्लभ हो गए" प्रकाश ने सब्जी वाले से टमाटर का थैला लेते हुए कहा |

"हाँ यार, क्या करूँ| रहता यहाँ हूँ और तुम तो जानते ही हो मेरा दफ्तर..."अभी पुरुषोत्तम बात पूरी भी नहीं कर पाया था|

"वो सब तो ठीक है, पर घर की भी कुछ खबर रखते हो या मुहल्लेवालों के भरोसे रख छोड़ा है अपना परिवार" प्रकाश ने पुरुषोत्तम के काँधे पर हाथ रखते हुए कहा |

"कहना क्या चाहते हो? मैं कुछ समझा नहीं" पुरुषोत्तम परेशान था |

"कुछ ख़ास नहीं | पिछले बीस - पच्चीस दिनों से एक गजब का संयोग दिखा | हर रोज़ दोपहर तीन बजे वैदेही भाभी राज नंदिनी को हेयर ड्रेसर के पास रखकर घर जाती हैं और उसके ठीक कुछ देर बाद अपने एम पी साहब, शुक्ला जी का बड़ा बेटा दशकंध आपके घर जाता है| हो सकता है आपको पता हो, पर मुझे लगा आपको बता देना ठीक रहेगा" कहते हुए प्रकाश प्रश्न भरी नजरों से पुरुषोत्तम की ओर देखने लगा |

पुरुषोत्तम को ठोकर तो जोर की लगी थी, पर उसने खुद को सहज दिखाते हुए कहा "ऐसा हो सकता है कि घर में कोई आए और मुझे पता न हो ! दशकंध वैदेही से भूगोल पढ़ने आता है| एमपी का बेटा है, मना करते नहीं बना | शाम में समय नहीं दे सकती न, इसलिए दिन में एक घंटे पढ़ाती है| तुम्हें शायद नहीं पता वैदेही ने भूगोल से स्नातक किया है|"

"ओह ! अच्छा " प्रकाश के लहजे में व्यंग था |

पुरुषोत्तम सब्जी की थैली उठाकर घर की ओर चल पड़ा | उसका मन बड़ा बेचैन था | वह पूरी रात परेशान रहा | उस रात उसने वैदेही से कई बार पूछा "वेद, क्या तुम मुझसे अब भी प्यार करती हो?"

"आज अचानक ऐसा क्यूँ पूछ रहे हो" वैदेही ने हाँ या ना के असमंजस को टालते हुए कहा | फिर जिस इंसान से ब्याह किया और जिसके बच्चे की माँ बनी, उससे यह कहना कि प्रेम खत्म हो गया, आसान भी तो नहीं होता |

अगले दिन पुरुषोत्तम बड़े अनमने तरीके से दफ्तर गया | उसका किसी काम में मन नहीं लग रहा था | उसने सर दर्द का बहाना बनाया और डेढ़ बजे दफ्तर से निकल पड़ा | उसे घर पहुँचने में अमूमन दो घंटे लगते, पर दिन में सडकें खाली थीं, सो डेढ़ घंटे में ही पहुँच गया | उसने कॉलिंग बेल बजाने के लिए हाथ उठाया, पर कुछ सोचकर रूक गया | वह पड़ोसी के घर गया और उनसे कहा कि उनकी छत पर उसके कपड़े उड़कर गिर गए और वह उन्हें उठाने आया है| वह छत पर गया और उस छत से सटे अपने घर की छत पर कूद गया | छत की सीढ़ियों से उतरता हुआ वह घर के अंदर दबे पाँव दाखिल हुआ | उसकी कानों तक जो आवाजें आ रहीं थीं, वह उनका पीछा करते हुए बैठक तक गया | दरवाजा बंद नहीं था, पर पूरी तरह खुला हुआ भी नहीं था | उसने बाहर से झाँककर वो मंजर देखा कि जड़ हो गया | सोफे पर वैदेही और दशकंध एक-दूसरे से गुथे हुए थे| कुछ देर रुककर वह खुद को संभालता हुआ वहीं कमरे के बाहर दीवार पर पीठ टेक कर आँखें मूँद बैठ गया |

थोड़ी देर बाद वैदेही ने जैसे ही दरवाजा खोला, उसकी आँखें फटी रह गयीं और दोनों हाथ जुबान पर | दशकंध तूफ़ान की तरह भाग गया |

पुरुषोत्तम भले ही चुप था, पर उसकी नजर वैदेही से न जाने कितने सवाल कर रही थी |

"मुझे माफ़ कर दो | मैं बेहद अकेली हो गयी थी | मुझे प्यार चाहिए था और तुम्हारे पास मेरे लिए वक़्त ही नहीं था | दशकंध ऐसे समय में मेरे जीवन में आया, जब मैं अकेलेपन और अवसाद की खाई में गिरती चली जा रही थी | अब जो चाहो मुझे सजा दो" कहती हुई वैदेही रोने लगी |

पुरुषोत्तम उठा और सीधे पार्लर गया | वहाँ उसने राज नंदिनी को उठाया और घर की ओर आने लगा | प्रकाश ने थोड़ी देर पहले दशकंध को उस गली से तूफ़ान की तरह गुजरते देखा था | फिर शाम के साढ़े चार बजे पुरुषोत्तम का पार्लर आकर राज नंदिनी को लेना... प्रकाश घटना का अंदाजा लगा चूका था | उसने पुरुषोत्तम को टोकते हुए कहा "सच्चे मित्र हैं हम तुम्हारे | कल तुमने भले ही हमारे सामने नाटक कर लिया, पर इस गली में जो नाटक होता है न, उसे न जाने कितने लोगों ने देखा है| अब तुम्हारी इज्जत इसी में है कि भगवान राम की तरह तुम भी वैदेही भाभी को छोड़ दो | (राज नंदिनी की ओर दिखाकर) इसे भी उनके साथ ही दे देना | न जाने कहाँ से आई है"

पुरुषोत्तम में आगे एक भी शब्द सुनने का धैर्य न बचा था | वह घर की ओर बढ़ गया |

घर आकर उसने राज नंदिनी को वैदेही के सुपुर्द करते हुए उसे खाना खिलाकर सुला देने को कहा | शाम के लगभग साढ़े सात बजे जब राज नंदिनी सो चुकी थी, पुरुषोत्तम ने वैदेही से कहा "तुम चाहो तो दशकंध शुक्ला के साथ जा सकती हो| राज नंदिनी मेरे पास रहेगी |"

"नहीं, मैं राज नंदिनी के बिना नहीं रह सकती" कहते हुए वैदेही फिर रोने लगी |

"मेरे बिना तो रह ही लोगी | अब तो आत्मनिर्भर भी हो" पुरुषोत्तम ने लगभग पूछने के अंदाज में कहा |

"मैं आज जो भी हूँ, सिर्फ तुम्हारी वज़ह से हूँ| तुमने अपने पिता की मर्जी के खिलाफ़ मुझे पार्लर जाकर काम सीखने का मौका दिया | तुमने मेरी सुविधा का ख्याल रखते हुए अपने दफ्तर से और भी दूर घर लिया | पर तुम घर देर से आने लगे | अक्सर मेरे सो जाने के बाद आते और अलसुबह उठकर चले जाते | तुम्हारी शक्ल तक ठीक से देखने के लिए मुझे रविवार का इन्तजार करना पड़ता | मुझे पार्लर से फुर्सत मिलती, तो आराम की जगह घर के काम और राज नंदिनी की देखभाल |प्यार के लिए तरस गयी थी | अकेलेपन और अवसाद के दलदल में मैं बेतरह धँस चुकी थी कि दशकंध एक दोस्त बनकर आया | उसने मुझे अपना वक़्त दिया और मुझे सुना | फिर हमलोग कब इतने करीब आ गए, पता ही नहीं चला| चलो, हम तुम्हारे दफ्तर के पास कोई घर ले लेते हैं| मैं पार्लर बंद कर दूँगी, पर इस परिवार को बिखरने न दूँगी| हम फिर से पहले की तरह रहेंगे एक कमरे में" वैदेही पुरुषोत्तम से लिपटकर रो-रो कर कह रही थी |

पुरुषोत्तम उस रात सो नहीं पाया | वह सोचता रहा कैसे वह एक कमरे के मकान में रहता था और वैदेही ने अपनी सूझबूझ और मेहनत से कम समय में ही घर की आर्थिक स्थिति दुरुस्त कर दिया था | वैदेही ने उससे कभी कोई शिकायत नहीं की बल्कि हमेशा उसकी मददगार बनी रही | आखिर उसने ऐसा क्यूँ किया ? थोड़े से प्रेम के लिए ? क्या प्रेम गैर जरूरी था जीवन में ? अगर हाँ, तो उसे आज वैदेही पर गुस्सा क्यूँ आया ? अगर नहीं, तो वैदेही ने क्या गलत किया अपने लिए थोड़ा सा प्रेम चुनकर ?  इसी तरह के कई प्रश्न जेहन में उभरते रहे जिनके जवाब भी वो खुद ही थे |

अगली सुबह वह दुसरे दिनों कि अपेक्षा जल्दी उठा और वैदेही से भी उठने को कहा | वैदेही असमंजस में कुछ समझ नहीं पा रही थी कि पुरुषोत्तम क्या चाह रहा था |

"क्या बात है" वैदेही ने डरते हुए पूछा |

"चलो, पार्क हो आते हैं| याद है तुम्हें हम शादी के बाद जब पहली बार दिल्ली आए थे, तुम मुझे जबरन उठाकर पार्क ले जाती थी| मुझे लग रहा है कि हमें फिर से हर सुबह पार्क जाना चाहिए" पुरुषोत्तम ने शांत आवाज में कहा |

वैदेही कुछ देर तक अपलक पुरुषोत्तम को देखती रही और फिर उससे लिपटकर रोने लगी |

थोड़ी देर बाद राज नंदिनी को लेकर दोनों पास के पार्क गए | राज नंदिनी पार्क में चिड़िया और मोर देखकर बेहद खुश थी | वैदेही और पुरुषोत्तम जैसे अतीत के दिनों में खो गए थे |

सुबह की सैर से लौटते हुए उन दोनों ने तय किया कि रात का खाना वह बाहर खाएँगे | फिर पुरुषोत्तम अपने दफ्तर चला गया और वैदेही घर का काम निपटाकर अपने पार्लर|

शाम में पुरुषोत्तम जल्दी आ गया था | जब रात का खाना खाकर वे लौट रहे थे,  प्रकाश ड्राईक्लीनर्स बंद कर रहा था |

"ओह ! मुझे तो लगा था रामचंद्र जी सीता जी को जंगल तक छोड़ने गए हैं| पर देखकर लग रहा है अग्नि परीक्षा देकर स्वयं आए हैं "प्रकाश ने पुरुषोत्तम के करीब आकर कहा |

"मैं एक औसत इंसान हूँ, कोई भगवान नहीं | गलती इंसानों से ही होती है| औसत इंसानों से तो कई बार | मैंने भी कई दूसरी तरह की गलतियाँ की हैं जिंदगी में | जब मैं साधारण सा मनुष्य हूँ, तो जीवन संगिनी के रूप में देवी या सती कि अपेक्षा भी नहीं रखता| अगर वैदेही से गलती हुई, तो कहीं न कहीं मुझसे भी लापरवाही हुई तो है| फिर सजा उस अकेली को क्यूँ?" पुरुषोत्तम कि आवाज में आत्मविश्वास था |

"भगवान हो कि नहीं हो, नहीं पता | पर एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि पुरुषों में उत्तम पुरुष हो | साधारण या औसत तो बिलकुल भी नहीं| आज से और भी सम्मान बढ़ गया तुम्हारे लिए" कहते हुए प्रकाश ने पुरुषोत्तम को गले लगाया और आगे बढ़ गया |

राज नंदिनी ऊँगली से घर की ओर इंगित कर रही थी, वे एक-दूसरे का हाथ थामे घर की ओर चल पड़े | पूर्णिमा का चाँद अपनी शीतल छाया उन पर बनाता हुआ उनके साथ चलने लगा |

Monday, January 22, 2018

कहानी का अंत

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ऐसा पहली बार था कि सुष्मिता किसी के जीवन पर आधारित कहानी लिख रही थी| अनमोल ने खुद ही एकदिन सुष्मिता को अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा था "तुम तो लेखिका हो, मेरे जीवन पर एक उपन्यास लिख डालो"

"उपन्यास लिखने के लिए तो न जाने कितना इन्तजार करना पड़ेगा और कौन जाने आने वाले सालों में आपके जीवन में कौन सा मोड़ आ जाए | हाँ, बहरहाल एक कहानी जरूर लिखने की कोशिश रहेगी" सुष्मिता ने अनमने तरीके से कहा था |

डेढ़ बरस बाद एकदिन सुष्मिता को यह वाकया याद आया और उसने अनमोल की कहानी को जस का तस पन्ने पर उकेरना शुरू कर दिया | पिछली कई मुलाकातों  से जो कुछ भी जान पायी थी, कहानी में वो सब कुछ शामिल किया | कई पन्ने लिख लेने के बाद सुष्मिता को लगा कि कहानी के साथ न्याय करने के लिए उसे अनमोल के जीवन की घटनाओं को करीब से जानना होगा| 

अनमोल सुष्मिता को शादी का प्रस्ताव दे चूका था और सुष्मिता के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा था | जब भी सुष्मिता उससे कहती कि उसे कहानी पूरा करने के लिए उससे कई बातें पूछनी हैं तो अनमोल एक ही जवाब देता "जब तक तुम मेरे प्रस्ताव का जवाब नहीं दोगी, कहानी कैसी पूरी होगी| तुम्हारा जवाब ही कहानी को पूरा करेगा"

एक शाम सुष्मिता जब अस्पताल में डॉक्टर दिखाने के क्रम में अपनी बारी का इंतजार कर रही थी, अनमोल उसके ठीक बगल में बैठा था | वह सुष्मिता का साथ देने  के लिए ही वहाँ गया था | सुष्मिता को लगा कि वक़्त का सही उपयोग अनमोल से उन तमाम सवालों के जवाब पा लेने में है, जिन्हें जाने बिना कहानी को दिशा दे पाना मुश्किल था| उसने अनमोल से पहला ही सवाल किया था कि अनमोल के चेहरे के भाव बदल गए और वह कह उठा "रहने दो न | क्या वो घटनाएँ इतनी अच्छी थीं जिनका बारम्बार ज़िक्र करने का मन हो | कई लोगों ने मुझे भला-बुरा सुनाया था और मैं चुप रह गया था| अब मन नहीं करता उन घटनाओं को याद करने का"

सुष्मिता ने आगे कुछ पूछना मुनासिब नहीं समझा | वह खुद जीवन के झंझावातों से होकर गुजर चुकी थी और समझ सकती थी कि आपबीती सुनाने का मतलब हर बार उन पलों  से होकर गुजरना होता है जिन्हें अमूमन कोई याद नहीं करना चाहता | सुष्मिता ने उसी पल अनमोल से कहा "ठीक है| मैं फिर अपनी कल्पना से कहानी को कोई नाटकीय मोड दूँगी और जब आप कहानी पढ़ेंगे तो एकबार आपको भी पता न चलेगा कि कहानी आपके जीवन पर आधारित है|"

अनमोल ने सहमति में सर हिलाया था | इस घटना के कई दिनों बाद सुष्मिता ने कहानी को नाटकीय रूप देते हुए कई काल्पनिक घटनाओं को कहानी में जोड़ा और कहानी समाप्त की | कहानी का अंत लिखते हुए उसने अनमोल की बजाय अपने पाठकों का ख्याल रखा | कहानी समाप्त होते ही उसने सबसे पहले अनमोल को यह जानकारी दी और साथ ही यह भी बताया कि घटनाओं की पूरी जानकारी के अभाव में उसने कहानी का फ़िल्मी अंत दिया है | अनमोल कहानी का कुछ अंश पहले पढ़ चूका था और अब पूरी कहानी पढ़ने के लिए उत्सुक था | अगली सुबह उसने कहानी पढ़ते ही सुष्मिता से पूछा "कहानी का जो अंत तुमने लिखा है, क्या वह सच है?"

"अरे नहीं ! मैंने तो पहले ही कहा था कि फ़िल्मी अंत है| कल्पनाओं की स्याही ने जो उकेरा, लिख डाला" कहते हुए सुष्मिता समझ गयी कि अनमोल को कहानी का अंत पसंद नहीं आया | कहानी के अंत में सुष्मिता ने अपने किरदार को किसी और के साथ दिखाया था |  सुष्मिता ने फोन किया तो अनमोल ने काट दिया |

सुष्मिता कुछ समय से अनमोल के प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देने का विचार कर रही थी पर कहानी पढ़कर अनमोल ने जैसी प्रतिक्रिया दी, सुष्मिता ने मन ही मन सोचा कि काश ! उसने कहानी को अधूरा ही छोड़ दिया होता | यह भी सोचा कि जो इन्सान एक काल्पनिक कहानी पर ऐसी प्रतिक्रिया दे सकता है, वह जब उसके जीवन की सच्चाईयों से रु-ब-रु होगा, तब कैसी प्रतिक्रिया देगा| 

अनमोल की प्रतिक्रिया सोचते हुए सुष्मिता सुबह से शाम तक परेशान रही | रात के लगभग दस बज रहे थे| एक अप्रत्याशित प्रश्न ने उसे धक्के देकर कई अन्य अनुत्तरित प्रश्नों के पते पर पहुँचा दिया और फिर उसके मन के पेड़ पर उदासियों के पंछी घर बनाने लगे | इस स्थिति से उबरने के लिए वह बाहर पार्क में गयी| उसने सुना था कि चलते-चलते कहीं पहुँच ही जाते हैं, कुछ ऐसा ही सोचकर पार्क के जॉगिंग ट्रेक पर चली जा रही थी| तभी उसके बेटे ने कहा कि उसे झूला झूलना है| फिर क्या था, माँ-बेटा दोनों झूला झूले| झूला झूलते हुए भी न जाने सुष्मिता क्या सोच रही थी कि तभी उसके बेटे ने ध्यान दिलाया कि झूले में पीछे जाते हुए पाँव भी पीछे की ओर मोड़ना होता है| सच! वह तो भूल ही गई थी!! उसे बचपन के दिन याद आ रहे थे और वह आँखें मूँदकर झूल रही थी| अचानक आँखें खुली तो देखा ऊपर आसमान तारों से भरा था| उसे लगा कभी - कभी सर उठाकर आसमान की ओर भी देख लेना चाहिए| उसने अपने जेहन पर जोर डाला कि उसने आखिरी बार कब फुर्सत से आसमान में तारों को निहारा होगा| बहुत सोचने पर याद आया पाँच बरस पहले रात के समय जिम कॉर्बेट पहुँचने पर सबसे पहले ध्यान तारों पर ही गया था| अभी वह प्राकृतिक नजारों में खोई ही थी कि उसका ध्यान सप्तर्षि मंडल पर गया, जो उसे आसमान पर टंका प्रश्न लगा| झटके में प्रकृति का सारा सौन्दर्य बोध ख़त्म हो गया| वापस सवाल उसका पीछा करने लगे और वह उनसे भागती हुई घर आ गयी| बहुत देर तक सोचने के बाद वह इस नतीजे पर पहुँची कि दरअसल सवाल ही जवाब था और कुछ कहानियाँ अधूरी ही अच्छी लगती हैं, उसकी अपनी कहानी की तरह |

उस रोज उसकी लिखी कहानी के साथ ही उस कहानी का भी अंत हो गया जो वह अपनी जिंदगी के पन्ने पर लिखने चली थी |

Saturday, January 20, 2018

अद्वैत

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अलमारी से लगभग सभी चीजें निकाली जा चुकी थी| अलमारी के ताखों पर अब बस रंगीन कागज़ बिछा था| जैसे ही उसने सबसे ऊपरवाले ताख पर बिछे रंगीन कागज को हटाया, उसे एक लिफ़ाफ़ा नजर आया | उसने लिफ़ाफ़ा खोलकर देखा और उसमें रखे कागज़ के पन्नों को पढते ही वह अवसाद की किसी गहरी खाई में गिर गया | इतने सालों तक जिस माता-पिता पर अभिमान करता रहा, वह तो उसके अपने माता-पिता ही नहीं थे| उसे किसी अनाथालय से गोद लिया गया था| एक साथ न जाने कितने प्रश्न उभर आए उसके जेहन में | थोड़ी देर बाद खुद को संभालता हुआ वह उठ खड़ा हुआ, जेब से माचिस निकालकर पहले सिगरेट सुलगाया और फिर जलती हुई उस तीली को अनाथालय के उस कागज़ पर गिरा दिया| उसने तय किया कि वह इस बाबत अपने किसी रिश्तेदार से कुछ नहीं पूछेगा| पूछता भी तो क्या ! उसे तो यह भी नहीं पता कि यह सच्चाई किसी और को पता भी है या नहीं| यहाँ तक कि उसने यह खबर माधुरी तक से भी साझा करने की जरुरत नहीं समझी| 

माधुरी उस ट्रेनिंग सेंटर की रिसेप्शनिस्ट थी जहाँ अद्वैत पढ़ाता था| उसी ट्रेनिंग सेंटर में सुजाता पढ़ने आती थी जिससे अद्वैत प्रेम कर बैठा था |अभी सुजाता की पढ़ाई ख़त्म होने में वक़्त तो था पर सुजाता के घरवाले उसके लिए वर तलाशने का काम शुरू कर चुके थे| आगे कोई अनहोनी न हो, यही सोचकर एकदिन अद्वैत और सुजाता ने अदालत जाकर विवाह कर लिया| माधुरी के साथ-साथ अद्वैत के घरवाले इस विवाह के साक्षी बने| तय हुआ कि जब सुजाता की पढाई ख़त्म हो जायेगी, तब इस शादी का राज़ सुजाता के घरवालों के सामने खोला जाएगा| अदालत में हुई शादी के बाद सुजाता अपने घर लौट गई और अद्वैत अपने घरवालों के साथ अपने घर| अगले सात-आठ महीनों तक सब ठीकठाक चलता रहा| सुजाता ट्रेनिंग सेंटर आती और शाम में अद्वैत के साथ थोड़ा वक़्त बीताकर अपने घर लौट जाती| फिर एक दिन वही हुआ जिसका डर था| सुजाता के घरवालों ने उसकी शादी तय कर दी| कोई चारा न देख, सुजाता ने घरवालों से अपनी शादी की बात बता दी | उसके घरवालों ने वकील से विमर्श किया, तलाक के कागज़ बनावाकर उस पर जबरन सुजाता से दस्तखत करवाया और फिर कुछ परिजनों के साथ अद्वैत के घर जा पहुँचे| अद्वैत प्यार के लिए मर सकता था और मार भी सकता था ; पर तलाक के कागज़ पर सुजाता के दस्तखत देखने के बाद वह  टूटकर बिखर गया| उसने भी चुपचाप उस कागज़ पर दस्तखत कर दिया और अवसाद के चादर ओढ़कर सो गया| अब वह न किसी से कुछ कहता और न किसी के कुछ पूछने पर जवाब ही देता| उसे इस अवसाद से बाहर निकालने में सबसे ज्यादा मदद की उसके चचेरे भाई  अनुकल्प ने| अनुकल्प हर शाम अद्वैत  को लेने ट्रेनिंग सेंटर आ जाता और फिर उसे लेकर कभी सिनेमा तो कभी थियेटर पहुँच जाता| जब अद्वैत  कहीं जाने से मना कर देता, तो ट्रेनिंग सेंटर के सामने वाले पार्क में बैठकर दोनों देर तक बातें करते| कभी अद्वैत के क्लास ख़त्म होने  में समय लगता, तो अनुकल्प रिसेप्शन पर बैठकर उसका इन्तजार करता| धीरे-धीरे माधुरी से उसकी दोस्ती हो गई और फिर कुछ महीनों में दोस्ती प्यार में तब्दील हो गई| इसी दौरान अद्वैत को पता चला कि नशे की लत ने किस कदर अनुकल्प को अपने गिरफ्त में ले लिया है| उसने कई बार अनुकल्प को समझाया कि सिगरेट तक तो ठीक है पर स्मैक और हेरोइन से उसे दूर रहना चाहिए; पर नशे की लत एकबार लग जाए, तो इतना आसान कहाँ होता है इससे पीछा छुड़ाना| 

देखते -देखते दो साल बीत गए| अद्वैत ने तय कर लिया था कि वह फिर दूसरी शादी कभी नहीं करेगा| वह सुजाता को भुला ही नहीं पाया था| अब अनुकल्प ट्रेनिंग सेंटर आता और सिगरेट पीने के बहाने थोड़ी देर अद्वैत के साथ सामने वाले पार्क में बिताने के बाद माधुरी के साथ घूमने निकल जाता| सावन का महीना रिमझिम के तराने लेकर आ चूका था| माधुरी और अनुकल्प घर लौटते हुए कई दिनों से बारिश में भींग रहे थे| फिर अनुकल्प एकदिन बीमार पड़ा| बुखार के साथ पेट दर्द की शिकायत थी| मोबाईल फोन उन दिनों भारत नहीं पहुंचा था| अद्वैत ने जब माधुरी को अनुकल्प की तबियत खराब होने की खबर दी, तो माधुरी ने बताया कि उसे भी हल्का बुखार रह रहा है और उल्टियाँ हो रही हैं | शायद बारिश में भींगने की वज़ह से ऐसा कुछ हुआ हो, ऐसा ही अंदेशा था दोनों का |

पहले अनुकल्प के घर के लोगों को यह मौसमी बुखार लगा जो अमूमन पेट दर्द के साथ ही आता है, पर जब उसे साँस लेने में तकलीफ होने लगी और स्थिति बद से बदतर होती चली गई, उसे शहर के सबसे बड़े अस्पताल में भर्ती करवाया गया|  डॉक्टर ने रक्त जाँच की रिपोर्ट के बाद ही बता दिया कि नशे की लत उसे अपना ग्रास बना चुकी है| तेरह दिनों तक चली जिंदगी और मौत के बीच छिड़ी जंग में जिंदगी हार गई | 

अद्वैत फिर से अवसाद में चला गया| एक अनुकल्प ही तो था जो उसके इतने करीब था| वह भाई कम, दोस्त ज्यादा था| अनुकल्प की मौत के बाद वह पंद्रह दिनों तक ट्रेनिंग सेंटर नहीं गया| फिर एक दिन घरवालों ने उसे समझाकर भेजा| 

ट्रेनिंग सेंटर पहुँचते ही उसका सामना माधुरी से हुआ| वह माधुरी से आँखें चुराकर सीधे क्लास रूम में प्रवेश कर जाना चाहता था पर माधुरी ने आवाज देकर पहले उसे रोका और फिर एक कठिन सवाल अद्वैत की ओर उछाला "अनुकल्प अब कैसा है"

पहले तो अद्वैत किंकर्तव्यविमूढ़ हो मूक खड़ा रहा, फिर खुद को संभालता हुआ माधुरी को क्लास के बाद पार्क में मिलने के लिए कहा| अगले दो घंटों तक तरह-तरह के कयास लगाकर माधुरी का दिमाग सुन्न पड़ चुका था कि तभी अद्वैत को क्लास से बाहर आता देख वह पार्क के लिए निकल पड़ी| 

"अनुकल्प कैसा है और आपने मुझे पार्क में क्यूँ बुलाया" माधुरी का धैर्य जवाब दे चूका था|

"अनुकल्प को सभी परेशानियों से मुक्ति मिल गयी | वह अब इस दुनिया में नहीं रहा" अद्वैत ने माधुरी के सर पर हाथ फेरते हुए कहा|

माधुरी पिछले दो घंटों से वैसे ही कशमकश में थी और अचानक से जो कुछ भी उसने सुना, उसे सह पाने की शक्ति शायद उसमें नहीं बची थी| वह बेहोश हो गयी| अद्वैत घबराकर पार्क में लगे फव्वारे से पानी लाकर माधुरी के चेहरे पर छिड़कने लगा|  थोड़ी देर बाद जब माधुरी को होश आया तो वह बुदबुदा रही थी "मुझे भी अब मर जाना होगा...और कोई चारा नहीं.."

"संभालो खुद को माधुरी| मुझे पता है तुम पर क्या गुजर रही है, पर इस सच को स्वीकार करना ही होगा" अद्वैत ने समझाते हुए कहा |

"आपको कुछ नहीं पता....कुछ भी नहीं " माधुरी विलाप किए जा रही थी|

"क्या बात है...क्या नहीं पता.. " अद्वैत ने पुछा |

"मैं माँ बनने वाली हूँ, अनुकल्प को बता भी नहीं पायी..." माधुरी बेतहाशा रो रही थी| 

यह सुनते ही पहले तो अद्वैत के पैरों तले की जमीन खिसक गयी, फिर उसके मुँह से अचानक निकला "अब"?

कुछ प्रश्नों के कोई जवाब नहीं होते | यह प्रश्न भी ऐसा ही था | माधुरी निरुत्तर बैठी रही | 

थोड़ा ठहर कर अद्वैत ने कहा "चलो"

"कहाँ" माधुरी दिशाहारा थी|

"वहाँ, जहाँ तुम और अनुकल्प की अमानत सुरक्षित रह सको"  कहता हुआ अद्वैत आगे बढ़ने लगा |

"पर ऐसी कौन सी जगह होगी" माधुरी को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था |

"मेरा घर" कहता हुआ अद्वैत रुक गया |

"ऐसा कैसे हो सकता है? लोग क्या कहेंगे? आप क्या जवाब देंगे?" माधुरी ने सवालों की लड़ी लगा दी थी|

"परेशान होने की जरुरत नहीं| हम आज ही शादी करेंगे और फिर तुम मेरे घर रहने आ जाओगी" अद्वैत के चेहरे पर आत्मविश्वास था|

"पर..."

माधुरी वाक्य पूरा कर पाती, उसके पहले ही अद्वैत ने कहा "चिंता मत करो | यह सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए होगा | तुम हमेशा अनुकल्प की अमानत ही रहोगी और बच्चे के आ जाने के बाद मुझे भी अनुकल्प नए दोस्त के रूप में मिल जाएगा "

माधुरी अद्वैत के साथ चल पड़ी और फिर उसके साथ रहने लगी | अद्वैत को रिश्तेदारों के ताने सुनने पड़े, पर वह चुप रहा | कुछ समय बाद वह माधुरी और बच्चे को लेकर दुसरे शहर चला गया | नए शहर में माधुरी ने भी अपने लिए एक नौकरी का इंतजाम कर लिया | बच्चे के स्कूल में पिता के नाम की जगह अद्वैत ने अपना नाम लिखा | माधुरी नौकरी और बच्चे में व्यस्त हो गयी और अद्वैत ने भी उन दोनों की देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी |  महीने दर महीने और साल दर साल बीतते रहे | अद्वैत ने खूब तरक्की की, गाड़ी और घर के अतिरिक्त भी सुख -सुविधा के तमाम साधनों का इंतजाम किया | नहीं खरीद पाया, तो अपने लिए प्यार | खरीदता भी कैसे ! प्यार को भी भला रुपया-पैसों से खरीदा जा सकता है !! वह घर में सामान भरता रहा और उसके मन का महल खाली ही रहा | उसने खुद को दफ्तर के कामों में बेतरह व्यस्त कर लिया था |

वह जून की एक दोपहर थी जब कई सालों बाद अद्वैत की मुलाक़ात उसके पिछले दफ्तर में काम करने वाली शालिनी कौशल से हुई | 

"अरे! कैसी हो शालिनी? पूरे नौ साल हो गए, अब भी वैसी ही दिखती हो" अद्वैत का चेहरा खिल उठा था 

शालिनी ने आदतन मुस्कुरा कर नजरें झुका लीं थी | 

"चलो, किसी कॉफ़ी शॉप पर बैठते हैं" अद्वैत ने कहा और कॉफ़ी शॉप की ओर मुड़ गया |

दोनों कॉफ़ी शॉप गए, दो कैपेचीनो आर्डर किया और एक-दुसरे का हाल समाचार पूछा | बातों ही बातों में शालिनी ने बताया कि दिल की बायपास सर्जरी के वक्त उसने यह सोचकर इस्तीफ़ा दे दिया था कि उसका पति कौशल उसको और घर को, दोनों को संभाल लेगा , पर अब घर की स्थिति बद से बदतर होती देख उसने नौकरी का निर्णय लिया और अब वह नौकरी की तलाश कर रही थी| अद्वैत ने शालिनी से कहा कि उसे आराम करना चाहिए और वह कौशल के लायक कुछ काम का बन्दोवस्त कर सकता है| शालिनी ने एक अन्तराल के बाद बताया कि उसने गलत इन्सान को अपना जीवन साथी बना लिया था जिसका खामियाजा वह आज तक भुगत रही है| वह नशे की लत का शिकार है, घर पर ही रहता है और आए दिन उससे मारपीट करता रहता है| 

"ओह ! पुलिस की सहायता क्यूँ नहीं लेती" अद्वैत ने जल्दबाजी में कहा |

"कोशिश की थी, कुछ नहीं हुआ | हर ओर से मुझे ही ज्ञान मिला | खैर, छोड़िये इन बातों को | आपके दफ्तर में मेरे लायक कोई नौकरी हो तो ..." शालिनी ने कातर होकर कहा |

"जरूर | जो कुछ मुझसे बन पड़ेगा, करूँगा | " अद्वैत ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा |

थोड़ी देर तक दोनों चुपचाप कॉफ़ी पीते रहे और फिर अद्वैत ने मौन तोड़ते हुए दार्शनिक अंदाज में कहा "कितनी अजीब बात है न कि इतने सालों से परिचित हैं हम और एक-दुसरे के बारे में कुछ भी नहीं जानते | एक ही दफ्तर में आजू-बाजु बैठकर सुबह से शाम न जाने कितनी बातें की होंगी हमने, पर एक-दुसरे के जीवन का यह रंग हम देख ही न पाए | एक बात है जो मुझे पिछले कुछ महीनों से भीतर ही भीतर खाए जा रही है| किसी से बता सकूँ, ऐसा कोई इन्सान जिंदगी में नहीं है| आज तुम्हारे जीवन के एक नए पहलू से वाकिफ़ हुआ, तो लग रहा है कि अपने जीवन का काला सच तुम्हें बताकर इस बोझ से मुक्ति पा लूँ | 

"कैसा सच !" शालिनी अवाक् थी |

अद्वैत ने उसे बताया कि किस तरह पिता की मृत्यु के बाद उसे अपने अनाथ होने का पता चला था और वह टूट गया था | उसने अपने और माधुरी के बीच का सच भी बताया| 

"मैं काफी हल्का महसूस कर रहा हूँ अब" अद्वैत ने दीर्घ निश्वास लेते हुए कहा |

कुछ देर बाद दोनों अपने-अपने घर लौट गए |

अब अद्वैत फोन के मार्फत शालिनी का हाल समाचार लेता रहता था | कई जगह शालिनी की नौकरी के लिए उसने बात भी की | फिर एक दिन उसने शालिनी से फोन पर ही कहा "हमारे दुःख एक जैसे हैं| तुम अपने संसार में अकेली हो और मैं अपने संसार में | इतने सालों के बाद इस तरह अचानक मिलना, ऊपरवाले की साजिश भी तो हो सकती है! "

"मैं कुछ समझी नहीं" शालिनी शायद समझ ही गयी थी |

"मैं तुम्हें तब से पसंद करता हूँ जबसे तुम हमारे पिछले दफ्तर नौकरी के लिए पहले दिन आयी थी| संयोग था कि हम आस-पास ही बैठे और खूब बातें भी की| तुम शादीशुदा थी, तो इसलिए कभी मन की बात तुमसे कह नहीं पाया | अब जब जान गया हूँ कि तुम किसी शादी में नहीं, बल्कि धोखे में जी रही हो, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम एक हो जाएँ और हम दोनों की समस्या ही खत्म हो जाए| तुम्हें आराम चाहिए और मुझे तुम्हारा साथ | क्या कहती हो?" अद्वैत की आवाज में आत्मविश्वास था |

"तो माधुरी !!" शालिनी को न जाने क्यूँ अद्वैत का ऐसा पूछना अटपटा लगा |

"वो मुझे तलाक दे देगी | अब उसका बच्चा बड़ा हो गया है| नौकरी भी पहले से बेहतर है| उसे मेरी जरुरत नहीं| तुम बताओ" अद्वैत जैसे सब सोचकर ही बैठा था |

"मैं एक विचित्र सी मनोदशा से होकर गुजर रही हूँ और ऐसी मनोदशा में कुछ भी कहना ठीक न होगा" कहते हुए शालिनी ने फोन काट दिया |

शालिनी ने अद्वैत से बात करना बंद कर दिया | शालिनी की परिस्थितियों से जो भी अवगत होता, वह अपनी कोई दुखभरी कहानी सुनाकर उसके करीब आने की कोशिश करता और अब अद्वैत की बातें भी शालिनी को ठीक उन्हीं की तरह लग रही थी | जब भी वह फोन करता, बस काम की बात कर वह फोन रख देती | अद्वैत भी उससे आगे कुछ नहीं कहता | फिर एकदिन अद्वैत की मेहनत ने रंग दिखाया और शालिनी को नौकरी का बुलावा आया | दो इंटरव्यू और नौकरी पक्की | 
शालिनी ने खुश होकर अपनी ख़ास सहेली और राजदार सोनाली को फोन लगाया तो उसने कहा "अद्वैत सही इन्सान है तुम्हारे लिए |"

शालिनी अब नौकरी में व्यस्त हो गयी थी, पर अद्वैत के प्रति वो सम्मान जगा था उसके मन में, वह अद्वैत को अक्सर फोन कर लेती और उसका हाल-समाचार पूछ लेती | इसी बीच बातों ही बातों में अद्वैत ने शालिनी से कहा था कि वह समझ गया है कि वह उसके दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं है|  शालिनी को जब भी जरूरत पड़ती, अद्वैत हाज़िर हो जाता | महीने में एक -दो बार मिलना भी हो जाता | शालिनी उस पर भरोसा करने लगी थी | अद्वैत शालिनी के बदले हुए व्यवहार देखकर कभी - कभार पुराना सवाल दाग दिया करता था | शालिनी के असमंजस को देख कहता कि उसे कोई जल्दी नहीं है, वह आजन्म इन्तजार कर सकता है|

मार्च की एक दोपहर शालिनी ने अद्वैत को बताया कि कौशल उसे तलाक देने को राजी हो गया है| अद्वैत खुश हुआ | अगले एक साल तक दोनों दोस्त की तरह ही मिलते रहे | एक दिन शालिनी ने उसे बताया कि तलाक की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और वह अब आज़ाद है| सुनते ही अद्वैत ने पूछा " तो अब शादी ?"

"हम्म..."मुस्कुराते हुए शालिनी ने कहा |

"तो मैं भी तलाक की अर्जी डाल दूँ अब" अद्वैत ने आत्मविश्वास से कहा |

"अरे नहीं | मैं तुम्हें कबसे बताना चाहती थी, पर तुमने मेरे लिए इतना कुछ किया कि जब भी बताना चाहा तुम्हारे प्यार को देखकर चुप हो गयी | मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहती थी | दो साल पहले एक कार्यक्रम में मेरी मुलाक़ात नवोदित से हुई थी | वो तलाकशुदा है और हम काफी हद तक एक जैसे हैं| दो-चार मुलाकातों के बाद ही हम दोनों को लगा था कि हमें एक-दुसरे का हाथ थाम लेना चाहिए | कौशल तलाक के लिए नहीं मान रहा था | अब जाकर सब खत्म हुआ | नवोदित ने अगले महीने की तीन तारीख का दिन तय किया है| समझ सकती हूँ तुम्हें बहुत बुरा लग रहा होगा, पर दिल का मामला दिल ही निपट लेता है| कमबख्त नाम का ही हमारा होता है| वहाँ कौन है, हम यह तब जान पाते हैं जब अगला वहाँ सेंध लगाकर फ़ैल चूका होता है| तुम समझ रहे हो न ... आई एम् सॉरी" शालिनी सफाई देती रही |

"अरे वाह ! चलो पार्टी करते हैं| यह बात बता सकती थी तुम पहले भी | उसको भी बुलाओ | यह तो बहुत खुशी की बात है" अद्वैत ने मुस्कुराते हुए कहा |

"तुम्हें सचमुच बुरा नहीं लगा ?"शालिनी अद्वैत के लिए चिंतित थी |

"क्यों लगेगा बुरा भला ? इसलिये कि तुम मेरी न हो सकी ? इतना ही तो चाहता हूँ तुम्हारे लिए कि तुम खुश रहो | क्या फर्क पड़ता है कि खुशी का जरिया मैं बनूँ या नवोदित ? जिंदगी ने मुझे समझा दिया है कि प्रेम में जिसे चाहते हैं, उससे कुछ नहीं चाहते | यु सी, नियति ने मेरे हिस्से महान बनना लिखा है| पर एक बात कान खोलकर सुन लो | अब अगर नवोदित ने तुम्हें किसी प्रकार का दुःख दिया, तो मैं उसे तुम्हारे घर आकर मारूँगा " अद्वैत ने हँसते हुए कहा |

शालिनी की आँख भर आयी | उसने अद्वैत का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा " तुम नाम से ही नहीं, काम से भी अद्वैत हो| अपने लिए कभी सोचते ही नहीं| हमेशा दूसरों के लिए ही.."

"एक जरूरी काम आ गया है| मुझे जाना होगा " अद्वैत ने शालिनी की हाथों से अपना हाथ खींचते हुए कहा और पलट कर जाने लगा  |

"कभी कोई जरुरत पड़ी या मैंने मिलने बुलाया तो आओगे" शालिनी इतना अच्छा दोस्त नहीं खोना चाहती थी |

"मैं मनुष्यों में गधा हूँ और गधों में गर्धवराज | जब मनभर बोझ तैयार हो जाए, आवाज देना " अद्वैत ने बिना पलटे ही जवाब दिया और आगे बढ़ गया | आँखों के आँसुओं को छुपा लेना बेहद जरूरी था उस वक़्त |