Showing posts with label वक़्त. Show all posts
Showing posts with label वक़्त. Show all posts

Sunday, December 4, 2016

वक्त-2

-------------------------
हम जी सकते थे जिंदगी  
देखते हुए एक-दूसरे की आँखों में 
पर देखा हमने परस्पर को 
जमानेवालों की नजरों से 
अपनी आँखें होते हुए भी 

बड़ा ही बेदर्द और जालिम निकला वक़्त 
वक्त न दिया कमबख्त ने, हमे लील गया 


Monday, September 12, 2016

वक्त

--------------------------------------------------------
बड़ा होता है हर एक दिन और हर एक महीना 
कैलेंडर के उस पन्ने से जहाँ वह होता है चिन्हित 
पर सबसे बड़ा है वह अनुभव जिसे लिखा गया 
शब्दों में डायरी के पन्नों में, समय जिसे जीया गया 

पाया गया है ऐसा कि उम्र हमेशा लम्बी ही होती है  
हथेली में मौजूद आयु रेखा की लकीर के मुकाबले 
कुछ घन्टे, कुछ दिन, कुछ महीने या फिर कुछ साल ?
उम्र इतनी भी लम्बी नहीं होती कि जान सकें ये सूत्र 

रचे गए रामायण और महाभारत जैसे मोटे-मोटे ग्रन्थ 
जो हमेशा छोटे ही दिखे सीता और द्रौपदी के दुःख से 
पर सबसे मोटा था वह वक़्त जो देख रहा था चुपचाप 
दर्ज होते इन कथाओं को ग्रंथों में और इन्हें मानक बनते 

सबसे ज्यादा बड़ा है आयतन आसमान का जिसमें है कैद 
असंख्य तारे ठीक वैसे जैसे पिंजरे में कैद होती है चिड़ियाँ 
पर संसार में सबसे ज्यादा जालिम होता है बेरहम वक्त 
जो देखता है सब कुछ और समय आने पर पलट जाता है  

वक़्त बड़ा है अनुभवों से, लम्बा है उम्र से अधिक और जालिम सबसे ज्यादा !

---सुलोचना वर्मा ----

Wednesday, June 1, 2016

उन दिनों(प्रेम)

--------------------------------------------------------------
                          1.
उसने कहा "मैं हूँ और मेरा वक़्त है"
और ऐसा कहकर माँग लिया मेरा साथ  
वह एक बेहद थका हुआ समय था 
जिसमे चल पड़े थे हम तेज क़दमों से 
उन दिनों हमारा वक़्त हमसे माँग रहा था केवल प्रेम  

                         2.
वक़्त जो माँग रहा था प्रेम, बदल गया 
अब सिर्फ था वह और थी उसकी जरूरतें 
उन जरूरतों की सूचि में कहीं भी नहीं थी मैं 
लाज़िम था मेरी जरूरतों को नहीं दिया उसने अपना वक़्त  
ऐसे में अब सिर्फ बेशर्म वक़्त ही था जो रह गया मेरे पास  

                        3.
मुस्कुरा देती हूँ मैं अक्सर यह सोचकर कि मालूम था उसे 
कि बंद पड़ी थीं तमाम घड़ियाँ मेरे घर की, एक अरसे से
और मैं नहीं चल रही थी समय के साथ मिलाकर ताल 
वह जानता था बख़ूबी कि वक़्त नहीं लगता है वक़्त बदल जाने में 
और यह भी कि जरूरतें बदल जाती हैं वक़्त के ही साथ 

                       4.
आज भी बंद पड़ी हैं तमाम घड़ियाँ मेरे घर की 
कि उसमें दर्ज है वह समय जब हम पहली बार मिले थे 
घड़ी में तीन बजाते काँटों की शक्ल बनाती है आकार उसकी ऊँची नाक की
जो थोड़ा और तन जाती है मेरी हर शिकायत के बाद 
गिर रही हूँ मैं प्रेम की गहरी खाई में इन दिनों, मुझे घेरे खड़ा है वक़्त का ऊँचा पहाड़ !!!!

आई ऍम फॉलिंग इन लव - प्रेम में गिर जाना जिसे कहते हैं!!!

---सुलोचना वर्मा -------

Sunday, November 29, 2015

खराब समय

------------------------------------------------
ठीक जिस वक़्त ढूंढ रही थी मैं
खराब समय की संज्ञा
जम रहा था पसीना माथे पर समय के
मानवता की हाहाकार पर


मिनटों और सेकण्ड्स में बिखर रहा था जो
लड़ी से टूटे उजले मोती के दाने की भाँति
असहिष्णु हो उठा वह खराब समय अब
और चल पड़ा घृणा के रक्तिम पथ पर


कुहासा ओढ़े चला जा रहा है घृणित समय
बंद कर रहे हैं लोग घरों के खिड़की दरवाजे
छोड़ जाती हैं समस्त ऋतुएँ भी खराब समय को
नहीं गलता है खराब समय बारिश के पानी से


स्वाभाविक है जहाँ अन्धकार खराब समय के लिए
उसकी उम्मीदों में है शामिल अच्छे दिनों का प्रकाश
कि कभी देखे हैं उसने भी यहाँ मैदानों में हरा घास
कि उसकी स्मृतियों में अब भी दहकता है रंगीन पलाश


पलट दिया जाता है देखते ही देखते
कैलेंडर का अंतिम पन्ना भी
और रह जाता है समय काल की विस्मृति में
बनकर केवल एक इतिहास


खराब समय चलता है लड़खड़ाकर शराबी की तरह
उसकी शरीर से फूटता रहता है घृणा का मवाद
जिससे दूरी बनाकर आगे बढ़ जाते हैं अच्छे लोग
अच्छे लोग, जो ले आए है यह भीषण महामारी !!!


 ----सुलोचना  वर्मा--------

Saturday, November 29, 2014

बीता हुआ वक़्त

--------------------------
क्या बाँधा किसी ने उस इकलौते कुत्ते को 
मरुथल में काटा जिसने ऊँट पर बैठे इंसान को
और जिंदगी की अदालत में मुजरिम बना वक़्त


क्या वक्त इतना था बुरा कि मिले उसे सजा उम्रकैद की 
और दर्ज होकर रह जाए उसका बुरा होना इतिहास में
फिर मान ले मानदण्ड लोग अपने बचाव की खातिर उसे


क्या ज़िक्र हुआ किसी किताब में उन करोड़ों लोगों का
जो चढ़े ऊँटों पर एक नहीं, कई बार
और जिन पर नहीं किया हमला किसी कुत्ते ने 


काश हम सीख पाते कि हादसों से इतर हैं घटती
सुंदर घटनाएं भी जीवन में
कि बीता हुआ वक़्त गुज़र नहीं पाता
ठहर जाता है हमारी स्मृतियों में


---सुलोचना वर्मा-----