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Friday, January 15, 2016

दौड़ते हुए

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दौड़ते रहते हैं हम घड़ी के काँटों की मानिंद 
और ज़िन्दगी देखती है हमें बेतहाशा दौड़ते हुए 
ठीक उसी तरह जिस तरह हम देखते हैं उसे 
दौड़ते हुए पीछे छूटते चले गए रास्तों की तरह 

फिर होती हैं हमारी आँखें चार जिंदगी से एक दिन 
किसी अप्रत्याशित घटना की तरह अजनबी मोड़ पर 
हो उठती है प्रज्वलित हमारे विवेक की अखण्ड ज्योति 
न ख़त्म होनेवाली जरूरतों की आंधी उसे बुझा जाती है 

घड़ी के काँटों की मानिंद हम दौड़ने लगते हैं फिर से 
एक दिन नाप लेते हैं जीवन के तमाम रास्ते दौड़ते हुए
पहुँच जाते हैं घड़ी के सभी काँटे दौड़ते हुए बारह पर 
और क्रूर समय हमें अतीत बनाकर दौड़ता रहता है| 

-----सुलोचना वर्मा--------

Wednesday, August 5, 2015

इरोम चानू शर्मीला

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हौआ नहीं होता है मौत का आना
आप हो सकते हैं खर्च ठीक उसी तरह
जैसे खराब नल से टपकता है पानी


मृत्यु है जैसे कोई एक मछुआरा
जिसने फैला रखा है जाल हर तरफ
जल थल और आसमान तक में
आप मर सकते हैं बिना किसी योजना के
बस, ट्रक या मोटर कार के नीचे आकर
या फिर उतर सकती है पटरी से रेलगाड़ी
जिसमें आप इस वक्त सफर कर रहे हैं
फिर आम है विमान का दुर्घटनाग्रस्त हो जाना


हौआ नहीं होता है मौत का आना
आप हो सकते हैं खर्च ठीक उसी तरह
जैसे खराब नल से टपकता है पानी


चकित करता है मुझे अक्सर जिंदा रहना
उस बहादुर स्त्री इरोम चानू शर्मीला का
जिसने किया है इनकार मर-मर कर जीने से
और मर रही है हर पल जी-जी कर
जैसे उँगलियों को चाट रही हो खाने के बाद
कुछ इस तरह स्वाद ले रही जीवन का


जहाँ हममें से अधिकांश बीता रहे हैं जीवन
वह कह सकती है कि उसने इसे जीया सार्थकता से
बिस्कुट के छोटे - बड़े टुकड़ों की तरह नहीं
बल्कि पान की गिलौरी की तरह चबाकर


मुझे वह किसी किसान की तरह लगती है
जो रोप रही है बीज जीवन में आशाओं के
उसकी सोच जो है किसी पारसमणि के समान
मैं चाहती हूँ जा टकराए नियति का पत्थर उससे
और सोने सा चमक उठे मानवता का चेहरा


हौआ नहीं होता है मौत का आना
आप हो सकते हैं खर्च ठीक उसी तरह
जैसे खराब नल से टपकता है पानी


---------सुलोचना वर्मा -----------

Saturday, January 31, 2015

मौत

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जब चूमे मुझे हिमालय की बर्फ सी निष्ठुर मौत
तो बस मिले स्वाद उस गुलाबी बर्फ के गोले का
जो खाया करते थे हम अक्सर अपने बचपन में
हमारी मुलाक़ात हो खुशियों की ही तरह संक्षिप्त
जब बाँहे डाले मौत अन्धकार में कभी मेरे गले में  

 
मैं चाहूँगी कि उड़े मेरी आत्मा उस चिड़ियाँ की तरह
जो कर देती है बादलों को भी अनदेखा उड़ते हुए
या चख लेती है स्वाद कभी उनका हवा मिठाई जान
रखती नहीं है डर मन में वह बिजली के कौंध जाने का 
नहीं देखना चाहती मैं भी अपनी परछाई मौत को मान


जब पक जाए उम्र की फसल समय की घूप से
कह देना चाहूँगी तब "हाँ" मैं भी बिना कुछ सोचे
जैसे त्याग देता है पेड़ पीले पत्तों को पतझड़ में
झर जाना चाहूंगी मैं जीवन के उस बसंत के पार
पसन्द होगा मुझे बहते रहना अनंत के निर्झर में


मौत हो सकती है एक बेहद खूबसूरत यात्रा भी
जिसका नहीं होता होगा कोई भी गंतव्य स्थान
नहीं होता होगा जहाँ कोई अप्रिय या बहुत ख़ास
फिर थक जाता है इंसान भी जीते-जीते एक दिन
और मौत है इक कभी न ख़त्म होनेवाला अवकाश


----सुलोचना वर्मा------