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Sunday, July 30, 2017

चरित्रहीन

(शरतचंद्र की किरणमयी के लिए)
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शरत बाबू ऐसे गए कि नहीं लौटे फिर कभी 
पर लेती रही जन्म तुम किरणमयी रक्तबीज सी 
दुनिया मनाती रही शरत जयंती बरस दर बरस 
नहीं बता गए शरत बाबू तुम्हारा जन्मदिन संसार को 
कि रहा आजन्म, जन्म लेना ही तुम्हारा सबसे बड़ा पाप 
और इस महापाप का ही तुम करती आ रही हो पश्चाताप 

अपने नयनों पर बनाकर पथरीला बाँध 
रोका तुमने अजश्र बूँदो का समुद्री तूफ़ान 
पास- परिवेश के पुरुषों का बन आसमान 
छुपाती रही अपनी समस्त असंतुष्टियों को 
स्निग्ध मुस्कान की तह में तुम घंटो चौबीस 
पढ़ाकर उन्हें अपने ही दुर्भाग्य का हदीस !!!

दिखता है तुम्हारे होठों पर मुस्कान का खिला हुआ ब्रह्मकमल 
जो बाँध लेता है अपनी माया से सबको, गहरे उतरने नहीं देता 
अदृश्य ही रह जाता है मन की सतह पर जमा कीचड़ लोगों से 
ठीक जैसा तुम चाहती हो अपनी लिखी कहानी की भूमिका में 
परिस्थितियों के बन्दीगृह का तुम अक्सर टटोलती हो साँकल 
गहन अन्धकार से नहा, पलकों पर लेती सजा, बिंदु -बिंदु जल 

निज को उजाड़ कर बसने देती हो पति का अहंकार घर 
रखती हो शुभचिंतकों को खुश अपनी अभिनय क्षमता से 
सजाती हो सामजिक आडम्बर से अपना प्रेमहीन संसार 
तुम्हारा असंदिग्ध भोलापन ही तो है सबसे बड़ी बीमारी 
कभी आईनाखाने जाकर देखो अपने होठों की उजासी 
हाँ, है तो फूलों सी ही बिलकुल, मगर वह फूल है बासी 

देखो उन मधुमक्खियों को, जो कर रही हैं चट 
छत्ते पर बैठ खुद अपना ही शहद संग्रह झटपट 
कि उन्हें पता है वो रहती हैं भालुओं के परिवेश में 
कब तक उड़ाती फिरोगी सपनों को सन्यासिनी के भेष में 
न करो फ़िक्र जमाने की, बाँध लो चाहनाओं को अपने केश में
क्या हुआ जो होना स्वतंत्र स्त्रियों का, है होना चरित्रहीन इस देश में 

अपने होठों पर फूलों की उजास नहीं, सूरज की किरण उगाओ  
सुनो समय की धुन लगाकर कान समयपुरुष के सीने से किरणमयी
बिखरो नहीं, गढ़ लो खुद को फिर एकबार अपने पसंद के तरीके से 
मत जिओ औरों की शर्त पर और, रखना सीख लो तुम शर्त अब अपने 
सुनती आई तो हो जमाने से जमाने की, सुनो अब केवल अपना ही कहना 
अपनी पुण्य आत्मा को कष्ट देने से तो है बेहतर तुम चरित्रहीन ही बनी रहना 

Wednesday, January 7, 2015

स्वतंत्रता

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जलायी है मशाल किसी हरिया ने आज़ादी की
जहाँ आग की लपटें गाती हैं गीत मुक्ति का
मुक्ति दर्द और भूख से,अभाव और निराशा से
नुकसान से और लाभ से,नस्ल और क्रोध  से
विफलता और सफलता से,वर्तमान और अतीत से
संघर्ष और युद्ध से, लालच से और वासना से
अज्ञानता से और किसी अनभिज्ञ परिस्थिति से
नफरत से और ईर्ष्या से, गरीबी और बीमारी से
गलत और अपराध से,अन्धकार और अहंकार से


गाती है गीत कोई राफ़िया बानो स्वतंत्रता का
जिसमे लयबद्ध शब्द छेड़ते हैं तान आज़ादी की 
आज़ादी भ्रम और बंधन से मुक्ति की 
जीवन का आनंद लेने की और खुश रहने की
ज्ञान प्राप्त करने की और विकसित होने की
सोच पाने की और घटनाओं का संज्ञान लेने की 
खतना नहीं करवाने की और गर्भ धारण करने की
स्वयं के निर्णय के आधार पर कार्य कर पाने की
स्वतंत्रता चुनने की और अस्वीकार कर पाने की


जो हम किसी प्रकार के भेद से परे होते केवल मनुष्य
तो फिर दरकार होती हमें बस ऐसी स्वतंत्रता की
जो हमें वो ही बने रहने दे जो हम असल में हैं
फिर हमारे पास होती स्वतंत्रता स्वाभिकता की
जीने की और मरने की, हँसने की और रोने की 
बात करने और सुनने की, प्यार करने और शांति की
संक्षिप्त में कहें तो अपने ढंग से जीवन जी लेने की


हाँ, हम सब  हैं ग़ुलाम कि नहीं रह सके स्वाभाविक
जबकि हम हैं वासी  लोकतंत्रात्मक स्वतंत्र देश के 
और है कहने को हमारा भी अपना एक संविधान
जो देता है हमें स्वतंत्रता विचारों की अभिव्यक्ति की
जो करता है बातें राष्ट्र की एकता और अखण्डता की
व्यक्ति की गरिमा की और प्रतिष्ठा की समता की
फिर हो जाता है परतंत्र अपने ही अनुच्छेदों में
और करता है लम्बा इंतज़ार उसमे संशोधन का
कायम रहती है ऐसे सम्प्रुभता हमारे गणराज्य की 


----सुलोचना वर्मा---------