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Saturday, May 9, 2020

हृदयाघात

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था इक यंत्र
जो संभालता था
यंत्रणाओं की पोटली
रुकने से यंत्र के
यंत्रणा बिखर गई

था एक सरोवर
स्नान जहाँ करती थी
आत्मा डूबकर
सरोवर के सूखने से 
आत्मा निकल गई

था एक मैदान
जहाँ करती थी शवासन
प्रतीक्षा मनोयोग से
काल से उजड़ा मैदान
प्रतीक्षा संजोग से

था प्रत्याशाओं का जंगल
जो बाँटता था प्रशस्ति
प्राप्ति की बेला में
है मृत्यु ही अंतिम प्राप्ति
जीवन के मेला में

Saturday, December 13, 2014

एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी

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एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
बस सोती रही देर तक
घण्टों नहाया झरने में
धूप में सुखाये बाल
और गाती रही पुरे दिन कोई पुराना गीत


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
बिंदी को कहा "ना"
कहा चूड़ियों से "आज नहीं"
काजल से बोली "फिर कभी"
और लगा लिया तन पर आराम का लेप


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
न तोड़े फूल बगीचे से
न किया कोई पूजा पाठ
न पढ़ा कोई श्लोक ही
और सुनती रही मन का प्रलाप तन्मयता से


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
तवे को दिखाया पीठ
खूब चिढ़ाया कड़ाही को
फेर लिया मुँह चाकू से
और मिलाकर घी खाया गीला भात


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
न साफ़ की रसोई
न साफ़ किया घर
नहीं माँजा पड़ा हुआ जूठा बर्तन
और अंजुरी में भरकर पिया पानी


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
रहने दिया जूतों को बिन पॉलिश के
झाड़न को दूर से घूरा
झाड़ू को भी अनदेखा कर दिया
और हटाती रही धूल सुन्दर स्मृतियों से


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
न ही उठाया खिड़की से पर्दा
न ही घूमने गयी कहीं बाहर
न मुलाक़ात की किसी से
और बस करती रही बात अपने आप से


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
जो उसे करना था रखने को खुश औरों को
कि उसे नहीं था मन कुछ भी करने का
जीना था उसे भी एक दिन बेतरतीबी से
और मिटाना था ऊब अभिनय करते रहने का


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
दरअसल वह गयी थी जान
कि नहीं था अधिक ज़रूरी
कुछ भी जिंदगी में
जिंदगी से अधिक


एक दिन कविता ने नहीं किया कुछ भी 
बस मनाया ज़श्न
अपने जिंदा होने का


------सुलोचना वर्मा -----------

Saturday, July 12, 2014

कवि की कविता

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कवि को लिखना है काजल, उमस भरे एक दिन को 
कविता समेट लेती है बादल अपनी आँखों में  
दमक उठता है प्रेम का सूरज आसमान पर
कवि बारिश की चाह करता है


कवि दर्ज करता है चुम्बन प्रेयसी की गर्दन पर
और खोल देता है क्लचर बालों से
कविता महसूस करती है फिसलते हुए बालों को काँधे पर
फिर चखती है कवि की जुबान का स्वाद देर तक


कवि छेड़ देता है साज निर्वसना की देह का
कविता गुनगुनाने लगती है अवरोह से आरोह तक
किल्लोल भरती हैं प्रेयसी के पैरों की उंगलियाँ
रिसने लगता है प्रेम रसायन बन देह से  
कवि साधता है सांप्रयोगिक तंत्र प्रेयसी पर 
कविता झूमने लगती है चरमोत्कर्ष की सीमा पर
प्रेयसी के पंख फहराने लगते हैं
मंत्रमुग्ध कर जाता है कवि को
कविता का अनवरत लयबद्ध स्पंदन
कवि लिखता है पूर्णविराम
प्रेयसी की पीठ के बाएँ हिस्से में


कवि अब कविता नहीं लिखता
लिखता है प्रेम !


----सुलोचना वर्मा-------