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Sunday, July 23, 2017

ननिहाल

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ढूँढती हूँ गंधराज का वह झुरमुट 
जिसके पीछे छिप जाते थे हम बच्चे 
खेलते हुए लुका छिपी का खेल 
महकती हैं जब स्मृतियाँ बन गंधराज 
तो देखती हूँ स्मृति नाम की बालिका है छुपी  
उसी झुरमुट के पीछे, लिए काया पुष्प रूपी  

स्मृतियाँ करती हैं आघात उस ढेकी की तरह 
जिस पर कूटा जाता था धान 
और जो नहीं था कम किसी भी खेल से 
हम अति सक्रिय बच्चों के लिए 
ठीक वहाँ, धान के उस कटोरे में इस क्षण 
चिपका हुआ होगा बचपन का सुनहलापन 

ढूँढती हूँ खजूर के गुड़ के बताशे 
शनिवार के हरिलूट में 
ऐसा शनिवार अब नहीं आता 
कि लूट चुका है बचपन का गुल्लक 
स्मृतियों की जीभ में उतर आता है पानी 
इन दिनों रह रहकर याद आती है नानी 

ढूँढती हूँ टुपुक टप टुप का वह संगीत 
जिसे सुना जाता था बारिशों का पानी 
कटहल के पेड़ से टपककर टीन की छत पर 
तरस रहें हैं मेरी स्मृति के कान एक अरसे से 
सुनने को वृष्टि की वही लयबद्ध रूपक ताल 
कमबख्त शोर बहुत करता है स्मृतियों का ननिहाल 

डाल दिया है हथकड़ी समयपुरुष ने
भूत के वृत्त में घेर, स्मृतियों के हाथों में
बता सकता है क्या विधि का कोई ज्ञाता निज अभ्यास से 
कैसे हो सकती है संभव मुक्ति स्मृतियों के कारावास से ?

Thursday, July 3, 2014

कुआं

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मुझे परेशान करते हैं रंग 
जब वे करते हैं भेदभाव जीवन में
जैसे कि मेरी नानी की सफ़ेद साड़ी
और उनके घर का लाल कुआं
जबकि नहीं फर्क पड़ना था
कुएं के बाहरी रंग का पानी पर
और तनिक संवर सकती थी
मेरी नानी की जिंदगी साड़ी के लाल होने से


मैं अक्सर झाँक आती थी कुएं में
जिसमे उग आये थे घने शैवाल भीतर की दीवार पर
और ढूँढने लगती थी थोड़ा सा हरापन नानी के जीवन में
जिसे रंग दिया गया था काला अच्छी तरह से
पत्थर के थाली -कटोरे से लेकर, पानी के गिलास तक में


नाम की ही तरह जो देह था कनक सा
दमक उठता था सूरज की रौशनी में
ज्यूँ चमक जाता था पानी कुएं का
धूप की सुनहरी किरणों में नहाकर


रस्सी से लटका रखा है एक हुक आज भी मैंने
जिन्हें उठाना है मेरी बाल्टी भर सवालों के जवाब
अतीत के कुएं से
कि नहीं बुझी है नानी के स्नेह की मेरी प्यास अब तक
उधर ढूँढ लिया गया है कुएं का विकल्प नल में
कि पानी का कोई विकल्प नहीं होता
और नानी अब रहती है यादों के अंधकूप में !


----सुलोचना वर्मा------