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Thursday, February 9, 2017

दुनियादारी

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मैंने ऐसा तो नहीं कहा
कि लोग छोड़ दे समस्त दुनियादारी
कैसे कहूँ ऐसा !

बिखर रहा है धरती पर समाज उन दिनों से
जब सपने में भी नहीं सोचा था किसी वैज्ञानिक ने
जीवन के संभावना होने की मंगल ग्रह पर

अब जबकि हम पहुँच चुके हैं मंगल ग्रह पर सच में
और पाल रहे हैं उम्मीद जीवन का वहाँ
तो क्या यह नहीं है सामाजिक बिखराव के अगले स्तर की नींव ?

काँधों पर शव ढ़ोते लोग चल रहे हैं वृताकार इस तरह
जैसे कि वो कर रहे हों प्रदक्षिणा धरती की
श्मशान से लौटते यात्री भूल रहे हैं करना गंगास्नान 
और कर रहे हैं प्रस्थान मलय पर्वत की ओर
होकर चंदन की सुगंध से वशीभूत

तो यहाँ ले आयी है दुनियादारी हमें  !

जमीन को जमींदोज कर जमींदार
पका रहे हैं तंदूर पर बगेरी
प्रतिरोध अब एक वर्जित शब्द है
फिर कोई चीज है दुनियादारी!