Showing posts with label मृत्यु. Show all posts
Showing posts with label मृत्यु. Show all posts

Thursday, June 24, 2021

मोक्ष

--------------------------

जैसे कि जीवन नहीं 

था मृत्यु का सघन पूर्वाभ्यास  

निस्तब्ध चेतना-संज्ञा तप्त भाल 

धूमिल स्मृतियों का तंतुवाय जाल 


जैसे कि जीवन नहीं 

था झड़ते ईंट गारेवाला प्राचीन स्मारक 

दीवारों पर जिसकी उग आये थे पीपल 

क्षितिज की ओर जाने को जो थे विह्वल  

 

केतकीपत्र पर हस्तलिखित 

एक पाण्डुलिपि थी जिंदगी 

जब पिघला उम्र का हिमाला 

तो बह गई एक-एक वर्णमाला 

Saturday, May 9, 2020

हृदयाघात

---------
था इक यंत्र
जो संभालता था
यंत्रणाओं की पोटली
रुकने से यंत्र के
यंत्रणा बिखर गई

था एक सरोवर
स्नान जहाँ करती थी
आत्मा डूबकर
सरोवर के सूखने से 
आत्मा निकल गई

था एक मैदान
जहाँ करती थी शवासन
प्रतीक्षा मनोयोग से
काल से उजड़ा मैदान
प्रतीक्षा संजोग से

था प्रत्याशाओं का जंगल
जो बाँटता था प्रशस्ति
प्राप्ति की बेला में
है मृत्यु ही अंतिम प्राप्ति
जीवन के मेला में

Saturday, November 24, 2018

दुर्घटना

--------------------------------
1.
अपने उस सुनियोजित मृत्यु आयोजन के लिए 
उसने लिखा सुसाइड नोट किसी निमंत्रण पत्र की तरह 
अलग-अलग संबोधन वाले अलग-अलग लिफ़ाफ़े में 
एक को रखा मेज पर कमरे के दबाकर श्रीमद्‍भगवद्‍गीता से 
दूसरे को जिला-दंडनायक कार्यालय भेजा परिवार की सुरक्षा के लिए 
तीसरा छोड़ आया उसके घर जिसे लोग बता रहे हैं मृत्यु का कारण 

हर पत्र में बस इतना ही लिखा कि वह परेशान था बेहद 
नहीं लिखा किसी भी पत्र में उसने सटीक कारण आत्महत्या का 
वह जानता था नहीं करेगा कोई भी सम्मान उसकी भावनाओं का 
कि अलग थे समाज से उसके तय किए हुए रास्ते और मरहले 
और नहीं समझ पाते हैं लोग यह शरीर के नष्ट हो जाने से पहले 

देश में अब नहीं होती हत्याएँ, न जाने क्यूँ बढ़ती ही जा रही हैं दुर्घटनाएँ 
कृष्ण को पूजने वाले देश में इन दिनों गीता से दबाए जा रहे हैं सुसाइड नोट्स !

2.
अपने तमाम दुखों को स्थगित करने के लिए 
कूद गया सिउरी पुल से बूढ़ी गंडक के जल में 
प्रेम में समाज से परास्त अठारह बरस का वह लड़का 
फिर हो उठा आतुर नदी का मटमैला जल 
उसके शरीर में प्रवेश करने के लिए 
मरता रहा पीकर बूढ़ी गंडक का पानी वह गटागट 
बढ़ता घनत्व शरीर का डुबाता रहा उसे मोक्ष के जल में 
जब बंद हुई प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर की 
और शुरू हुआ अपघटन, 
क्या देख पायी थी उसकी आत्मा
कि जिस समाज के एक चन्द्र खंड के समक्ष 
वह था नत ज्योत्स्ना के उत्सव में करते हुए प्रतीक्षा
मन ही मन मिलन तिथि के पूर्णिमा की 
उस समाज की विवेचनाओं में सघन थी अमावस्या की कालिख 

सावधान ! प्रेम इस समाज में वह लक्ष्मण रेखा है 
जिसे पार करते ही घट सकती है कोई भी दुर्घटना !

3.
तुम प्रेम में भी मर सकते थे लड़के 
तुमने जल को क्यूँ किया कलंकित !
तुम उठा सकते थे जल से शब्द नदी के वक्ष से 
और रख सकते थे अपनी प्रियतमा की आँखों में 
फिर ले सकते थे ताप उन आँखों के दीए से 
आजीवन अपनी शीतल आँखों में !

देखो तो लड़के ! आज नदी है, जल है, प्रियतमा है 
बस एक तुम ही नहीं हो कहीं भी 
दर्ज होकर रह गए हो तुम प्रियतमा की स्मृति में 
एक अप्रत्याशित दुर्घटना की तरह !

4.
समाज से निराश और कितनी युवा लाशों को ढ़ोने के बाद 
आप लिख सकेंगे अपनी गौरवगाथा हे वीरों !
देखिये कहीं लज्जित न कर दें आप आदिमानवों को 
तोड़कर उनके समस्त पाषाण युगीन कीर्तिमान !

फ़िलहाल आपके काँधे पर जिस युवा का शव है 
आप उसे लेकर आगे बढ़िये राम नाम के साथ 
आगे बढ़ते हुए जब थोड़ा झुकने लगे आपकी पीठ 
तो शायद गलने लगे आपके अहंकार का पहाड़  
और यदि ऐसा हुआ सचमुच ही 
तो देख सकेंगे आप आसपास प्रकृति और इंसान  
माथे के ऊपर तना मिलेगा इन्द्रधनुषी आसमान 

बंद कीजिए ऐसी युवा लाशों को ढ़ोने का कारोबार 
नहीं तो बहुत समय नहीं लगेगा उस दुर्घटना को घटते 
जिसके घटित हो जाने से हम पहुँच जाएँगे पुनः पाषाण युग में !

5.
दृश्यमान आँखों से ज्योत के बुझते ही वह आती है
जब वह आती है तो कभी हिलाती है साँकल घर का
चूड़ी और कलाई-विहीन हाथों से या फिर कभी
बिना बताए ही करती है अनाहूत प्रवेश अचानक

वह आती है स्त्री विहीन उस साड़ी की तरह
जिसके आँचल में बंधा होता है गाढ़ा अंधकार
वह आती है पाँव विहीन भारी जूते की तरह
और बेतरह रौंद कर रख देती है जीवन का सर

फिर करती है चित्कार मुख विहीन, जिह्वा विहीन, स्वर विहीन कंठ से
जिससे हो उठता है गुंजायमान दिक-दिगन्त करुण रुदन स्वर से
समय से जीवन की दूरी घटते ही वह आने लगती है बिलकुल पास
और कर देती है अस्थिर जीवन को स्थिर सुनाकर मृत्यु का काव्य

जीवन के पाठ्यक्रम में समय एक शून्य विषय है जहाँ
भोरे भिनसारे भी हो सकता है अस्त जीवन का सूरज
और हमारे अतीत में जो प्रगाढ़ शुन्यता बची रह गयी थी
एकदिन वही शुन्यता कर लेती है दखल हमारा स्थान

मृत्यु एक अवश्यम्भावी दुर्घटना है !

Saturday, May 19, 2018

सरोज मृत्यु

------------------------------------------------------------
वह दिन का दूसरा प्रहर था जब हुआ शुरू मृत्यु आयोजन
गंगा पार की सुतनुका हवाओं ने गाया विरह का गीत
और पड़ी मलीन छाया ज्येष्ठ महीने के तपते मुख पर
तो भ्रमण पर निकल गए समस्त शब्द निःशब्द रूप लेकर

मृत्यु के जल की स्मृतियों में हुआ सरोज का आस्तित्व परिपूर्ण
तो आया लेकर अंधकार का दूत गंगा का जल निमंत्रण
सरोज की जिह्वा पर उतर आया स्वाद मछलियों का
डूबता चला गया फिर सरोज का मृणाल मृत्यु के जल में

भाग्य गुण से मिलता है ऐसा महाप्रस्थान
जब मृत्यु भी हो उठती है अत्यंत शिल्प सचेतन
जीवन ताल के पंक में बिखरा पड़ा है पवित्र बीज
फिर खिलेगा कहीं कोई सरोज किसी सृष्टि मुखर दिन में  !!

Wednesday, January 13, 2016

हम रह जाते हैं

--------------------------------------------------
अंततः हम रह जाते हैं, कहीं नहीं जाते 
रह जाते हैं हमारे अपनों की स्मृतियों में
जन्म और मरण पंजीकरण के दस्तावेजों में 
अतीत की कहानियों के ज़िक्र में ही नहीं 
भविष्य की अनुपस्थिति में भी सक्रिय होकर 
अंततः हम रह जाते हैं, कहीं नहीं जाते 

रह जाती हैं धरी हमारी इच्छाएं और अनिच्छायें
छूट जाती हैं तमाम अच्छी और बुरी आदतें 
भटकते रहते हैं हमारे जीवित और मृत स्वप्न यहाँ 
फिर किसी जरुरी कागज़ पर किए हस्ताक्षर में 
अंततः हम रह जाते हैं, कहीं नहीं जाते 

दर्ज रह जाते हैं हम उस घिसे हुए हवाई चप्पल में 
जो पलंग के नीचे ही रहती है व्यवस्थित हमारे बाद भी 
दुनिया हमें ढूँढ लेती है अक्सर मेज पर रखे ऐनक में 
दीवार पर टंगी किसी खूबसूरत पल की तस्वीर में 
अंततः हम रह जाते हैं, कहीं नहीं जाते 

गीता के श्लोकों में पढ़ते आत्मा अ -पदार्थ है
दोहराते हैं फिर एकबार उर्जा संरक्षण का नियम 
हमारी गैर-मौजूदगी में अपना ढांढस बढाते अपने 
इसप्रकार हमारी भौतिक काया के परे भी प्रमेयों में 
अंततः हम रह जाते हैं, कहीं नहीं जाते 

----सुलोचना वर्मा-------

Saturday, January 31, 2015

मौत

------------------------
जब चूमे मुझे हिमालय की बर्फ सी निष्ठुर मौत
तो बस मिले स्वाद उस गुलाबी बर्फ के गोले का
जो खाया करते थे हम अक्सर अपने बचपन में
हमारी मुलाक़ात हो खुशियों की ही तरह संक्षिप्त
जब बाँहे डाले मौत अन्धकार में कभी मेरे गले में  

 
मैं चाहूँगी कि उड़े मेरी आत्मा उस चिड़ियाँ की तरह
जो कर देती है बादलों को भी अनदेखा उड़ते हुए
या चख लेती है स्वाद कभी उनका हवा मिठाई जान
रखती नहीं है डर मन में वह बिजली के कौंध जाने का 
नहीं देखना चाहती मैं भी अपनी परछाई मौत को मान


जब पक जाए उम्र की फसल समय की घूप से
कह देना चाहूँगी तब "हाँ" मैं भी बिना कुछ सोचे
जैसे त्याग देता है पेड़ पीले पत्तों को पतझड़ में
झर जाना चाहूंगी मैं जीवन के उस बसंत के पार
पसन्द होगा मुझे बहते रहना अनंत के निर्झर में


मौत हो सकती है एक बेहद खूबसूरत यात्रा भी
जिसका नहीं होता होगा कोई भी गंतव्य स्थान
नहीं होता होगा जहाँ कोई अप्रिय या बहुत ख़ास
फिर थक जाता है इंसान भी जीते-जीते एक दिन
और मौत है इक कभी न ख़त्म होनेवाला अवकाश


----सुलोचना वर्मा------