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Thursday, September 1, 2016

अर्शी फातिमा के लिए

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बनारस की किसी गली में रहती है कत्थई आँखों वाली एक लड़की
कत्थई आँखों वाली लड़की की रंगत है नरगिस के फूलों जैसी शफ्फाक़
जाफरानी रंग के कपडे पहनकर खिल उठती है कत्थई आँखों वाली लड़की 
और जब थिरकती है कत्थई आँखों वाली लड़की, आसमान फिरोज़ी हो जाता है

कत्थई आँखों वाली मुस्लिम लड़की को पसंद है घाट पर गंगा आरती देखना
लौटती है घाट से लड़की लिए आँखों में पारदर्शिता जल की और रंग आग का
तहज्जुद की नमाज़ पढ़ती लड़की की बंद आँखों से बहती है गंगा की धारा 
उसके चेहरे पर है नूर घाट पर प्रज्वलित अखंड ज्योति की शोभा यात्रा का

कत्थई आँखों वाली लड़की को पसंद है भटकना सड़कों पर धूसर रंग में
कई बरस बीते कि देखे हैं कत्थई आँखों वाली लड़की ने चम्पई रंग के सपने
ढूंढ लिया है अपने सपनों का साथी बनारसिया कत्थई आँखों वाली लड़की ने
कत्थई आँखों वाली लड़की को इश्क के गुलाबी कतान में बाँध लिया है जिसने

अब नहीं रह जायेगी लड़की, कहलायेगी "छोटी बहू" कत्थई आँखों वाली लड़की 
नहीं दिखेंगे कत्थई आँखों वाली लड़की के जाफरानी रंग के कपडे काले बुर्के में
महका करेगा अब तो नरगिस के फूलों का इत्र, सफ्फाक फूल नज़र नहीं आएगा
हम जानते हैं दुनिया के रस्म और दस्तूर फिर भी यह मंजर हमें नहीं भाएगा

ज़िंदा रखना सपनों का चम्पई रंग अपनी कत्थई आँखों में, उसे बहने न देना
सुनो कत्थई आँखों वाली लड़की, अपने विचारों में रखना प्रज्वलित अखंड ज्योति
बचा लेना अपने पांव में लगा धूसर रंग कत्थई आँखों वाली, हिना के ठीक नीचे
न भूलना तुम वह लड़की हो जिसके थिरकने से हो जाता है आसमान फिरोज़ी

तुम बचाये रखना शऊर ज़िंदा रहने का ज़िंदगी में, कत्थई आँखों वाली लड़की
तुम खिलना कत्थई आँखों वाली लड़की जैसे खिलता नरगिस का शफ्फाक़ फूल
तुम खिलखिलाना जैसे बहती है गंगा की चंचल धारा, कत्थई आँखों वाली लड़की
ओ कत्थई आँखों वाली लड़की, तुम भूलकर भी जीवन के रंगों को न जाना भूल

-----सुलोचना वर्मा-----

Thursday, August 25, 2016

इच्छाएँ

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हम गए शिवाला और सुना आए शिव को अपनी औघर इच्छाएँ
शंकर शाम्भवी योग मुद्रा में थे लीन, त्रिकालदर्शी भोले बने रहे 

हम कान्हा के वृन्दावन गए कि सुना पायें अपनी अपूर्ण इच्छाएँ
मुरलीधर आँखों को मूँद सम्पूर्ण तन्मयता से बजाते रहे बाँसुरी

हमने टूटते तारों पर ज़ाहिर की अपनी आसमानी इच्छाएँ
सितारे नहीं पहुँच पाए जमीन तक, चमकते रहे बन जुगनू  

हमने नवाया शीश दरगाह पर लेकर अपनी बेखौफ इच्छाएँ
पीर बाबा सोए रहे इत्र से सनी चादर तान अपनी मजार पर 

हम चढ़ाने गए भोग तारापीठ में लेकर अपनी अनंत इच्छाएँ
और हमें सुनने से पहले ही काली ने निकाल लिया था जीभ 

हम गिरिजाघर भी गए लेकर अपनी अलौकिक इच्छाएँ
हम क्या माँगते, ईसा मसीह हाथ फैलाये सूली पर टंगे थे

वहाँ पीठ पर रीढ़ की हड्डी नहीं, हमारी जम चुकी इच्छाएँ हैं 
जो झुकाये जा रही हैं हमें वक़्त के साथ हर रोज थोड़ा - थोड़ा

इच्छाएँ हैं औघर, अपूर्ण, आसमानी, बेखौफ, अनंत, अलौकिक 
जिसके आगे हैं बेबस इंसान, देवी, देवता, सूफी पीर और मसीहा 

-----सुलोचना वर्मा-----

Sunday, February 9, 2014

बहुरुपिया

नही थी परवाह उसे लिंग या मज़हब की
अक्सर बदलकर आता वो अपनी वेश भूषा
बुनता धर्म और समाज के ताने बाने
हमारे गाँव रहता था एक बहुरुपिया


उसकी अभिनय क्षमता ढाल देती थी
उसे नये नये किरदारों में
वो लोगों के जीवन में लगाता सेंध
और निकाल लाता उनके अंदर से अनदेखा सच


कई चेहरे निकल आते थे
हरे नीले दरवाज़ों के पीछे से
जब बहुरुपिया निकल आता था सड़कों पर
दौड़ जाती थी खुशी लोगों के चेहरों पर


बहुरुपिए आज भी निकलते हैं सड़कों पर
पर नही दिखती खुशी की परछाई तक किसी चेहरे पर
कभी खुद को किसी और में ढूंढता; तो कभी किसी मे खुद को पाता
हर कोई जी रहा है दोहरी सी ज़िंदगानी


सीमित है धर्म अब, समाज बिखर सा गया
सिमट गयी घर की देहरी, मंदिर भी ताला जड़ा
अब जंगल के लूटेरों से लेकर, मंदिर के पुजारी तक
शहर की गलियों से, गाँव के नुक्कर तक, हर कोई बहुरुपिया है


सुलोचना वर्मा

Saturday, September 21, 2013

मज़हब

गर हवा का मज़हब होता
और पानी की होती जात
कहाँ पनप पाता फिर इंसान 
मौत दे जाती मुसलसल मात

जो समय का धर्म होता
किसी बिरादरी की होती बरसात
वक़्त के गलियारों में फिर
कौन बिछाता सियासत की विसात

ज़िरह कर रहे कबसे मुद्दे पर
ढाक के वही तीन पात
ये खुदा की ज़मीं है लोगों
ना भूलो अपनी औकात

----सुलोचना वर्मा-----