Showing posts with label पहाड़. Show all posts
Showing posts with label पहाड़. Show all posts

Sunday, February 26, 2017

पर्वतारोहण

------------------------------------------------------------
एक दिन बना लूँगी मैं अपना ठिकाना
किसी हरे-भरे पहाड़ पर  
ढूँढते हुए आस्ताना 

फिर एक दिन तपस्या में लीन आदिम पुरुष सा पहाड़  
माँगेगा मुझसे आश्रय, बन प्रणय भिक्षुक 
और प्रतिदान में चाहूँगी मैं अभयदान 
तब हमारे प्रणय अभ्यास का फल 
लेगी जन्म हमारी नैसर्गिग संतान, बन वितस्ता सी कोई नदी 

उस दिन करते हुए हमारा अनुसरण 
अपने अमरत्व के लिए 
बहुत-बहुत लोग करेंगे पर्वतारोहण 

तपस्या कर रहा है पहाड़ अनंतकाल से कि आएगा माहेन्द्र-क्षण
दे रही है आहुति कालिंदी, इक्षुला, तमसा जैसी नदियाँ इस अनुष्ठान में 
मंत्रोच्चार कर रहे है हिलाकर पत्तों को सनोबर और देवदार के वृक्ष  
मैं ढूँढ रही हूँ सूत्र पहाड़ को पिघलाने का !

दुविधा में है भगीरथ का समयपुरुष !!

Wednesday, February 8, 2017

शिल्प

---------------------------------------------
खड़ा रहता है पहाड़ सर उठाये 
कि धरती सह लेती है उसके हिस्से का दर्द 
उसे उठाये हुए निरंतर अपनी गोद में 

भय नहीं जानता पहाड़ 
कि भय स्वभाव है टूटने का 
टूटकर बिखर जाने का पत्थरों में 

पहाड़ अगर पहाड़ है
तो पत्थर से ही गढ़े जाते हैं शिल्प 
शिल्प अगर शिल्प  है 
तो सारा संसार है उसका ठिकाना 

तो प्रेम ?

पहले पहाड़ था प्रेम, 
फिर तो पत्थर भी नहीं रहा 
अब शिल्प बन बिकता है बाजार में !

Wednesday, June 15, 2016

बचे रहने का अभिनय

------------------------------------------------------------------
हम जिंदा रहते हैं फिर भी 
उस पहाड़ की तरह जो दरकता है हर रोज़ 
या काट दिया जाता है रास्ता बनाने के लिए 
और फिर भी खड़ा रहता है सर उठाये 
बचे रहने का अभिनय करते हुए 

हम जिंदा रहते हैं फिर भी 
रसोईघर के कोने में पड़े उस रंगीन पोंछे की तरह 
जो घिस-घिसकर फट चुका है कई जगहों से 
और फिर भी हो रहा है इस्तेमाल हर रोज़ कई बार 
बचे रहने का अभिनय करते हुए 

हम जिंदा रहते हैं फिर भी 
मिट्टी के चूल्हे में जलते कोयले की तरह 
जो जल-जलकर बन जाता है अंगार 
और फिर भी धधकता रहता है 
बचे रहने का अभिनय करते हुए 

हमारी अभिनय क्षमता तय करती है हमारा जिंदा दिखना 
और हमारा जिंदा दिखना ही है विश्व की सबसे रोमांचक कहानी 

---सुलोचना वर्मा -----

Saturday, May 21, 2016

आत्महत्या

------------------------------------------
जल रहे थे जंगल, सूख रहीं थीं नदियाँ 
काटे जा रहे थे पहाड़
और इस तरह बीत रही थी सदियाँ 

सहने की सीमा थी, पृथ्वी अवसादग्रस्त हुई 
वह पृथ्वी के अनंत प्रेम में था पागल 
ईश्वर ने आत्महत्या कर ली!

----सुलोचना वर्मा------