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Tuesday, July 6, 2021

बारिश

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१.

आषाढ़ के दुलार से झरती हैं वृष्टि की बूँदें 

और प्रकृति की तृषित इच्छाओं से मनुष्य

हम मनुष्य भी बूँदें हैं इस भवसागर की

अभिसार को निकली मृत्यु जब हो उठेगी असभ्य 

और करेगी दुलार जीवन को आपादमस्तक 

झर जायेंगे हम बूँदें, जमा होंगे मेघ सरोवर में 

दीर्घतपा पृथ्वी करेगी प्रतीक्षा आषाढ़ की हर बरस 

सहस्र जन्मों बाद हम भी बरसेंगे मिलन-ऋतू में  

वृष्टि की पवित्र बूँदें बनकर किसी रोज़ कहीं धरा पर 


जीवन क्या है?

बारिश की नौका पर सवार एक जलीय यात्रा है|


२.

जब सृष्टि करती है वृष्टि 

सुविन्यस्त वर्षा के जल में 

बूँदें बनकर उतरते हैं हमारे पूर्वज

बरसते हैं सर पर बनकर आशीष 

लगते हैं तन को बनकर दिव्य औषधि    

ठहर जाते हैं कुछ देर धरा पर बन नदी 

कि जता सकें हम उनपर अपना अधिकार 

और चला सकें उन पर ख्वाहिशों की नाव 

डूब जाती है कागज़ की नौका कुछ देर चलकर 

जल में नहीं, प्रेम में !


बारिश क्या है?

पूर्वजों से हमारा साक्षात्कार है|

Friday, August 21, 2020

पंचतत्व

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बनकर स्रष्टा करना सृष्टि अहर्निश प्रेम की 

दफ़न करना अपनी जमीं पर सीने भर आशा 

कि अपने आप में पूरी पृथ्वी हो तुम 

जिसकी परिक्रमा करेंगे कई कई चाँद 

जो पोषित कर सकती है कई कई जीवन 


वृष्टि के जल को भर कलशी में 

पकाना दाल, धोना कपड़े 

बन मेघ भले पी जाना भवसागर  

आँखों का पानी बचा रहे 

बस इतना सा यत्न करना 


चूल्हे की आग में पकाना भंटा बैंगन

खाना पांता संग, मत करने देना शमन 

किसी को अपने भीतर की अग्नि का 

कि आत्मा में भर कर अंधेरा

नहीं लाया जा सकता उजाला जीवन में  


संसर्ग ही करना हो तो रहे ध्यान 

कि भले ही कर ले स्पर्श कोई शरीर का 

परन्तु तुम्हारे तुम को किंचित छू भी न सके 

न करना उत्सर्ग अपना असीम किसी को 

कि जमता रहे वहाँ संभावनाओं का मेघ 


बन चैत्र की आँधी घूमना माताल की तरह 

पर साधे रहना ताल जीवन का 

प्रेमशुन्य धरा पर लौटना बार-बार अनेक रूपों में 

बन कर प्रशांति की अविरल धारा 

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा 


Saturday, May 19, 2018

सरोज मृत्यु

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वह दिन का दूसरा प्रहर था जब हुआ शुरू मृत्यु आयोजन
गंगा पार की सुतनुका हवाओं ने गाया विरह का गीत
और पड़ी मलीन छाया ज्येष्ठ महीने के तपते मुख पर
तो भ्रमण पर निकल गए समस्त शब्द निःशब्द रूप लेकर

मृत्यु के जल की स्मृतियों में हुआ सरोज का आस्तित्व परिपूर्ण
तो आया लेकर अंधकार का दूत गंगा का जल निमंत्रण
सरोज की जिह्वा पर उतर आया स्वाद मछलियों का
डूबता चला गया फिर सरोज का मृणाल मृत्यु के जल में

भाग्य गुण से मिलता है ऐसा महाप्रस्थान
जब मृत्यु भी हो उठती है अत्यंत शिल्प सचेतन
जीवन ताल के पंक में बिखरा पड़ा है पवित्र बीज
फिर खिलेगा कहीं कोई सरोज किसी सृष्टि मुखर दिन में  !!

Sunday, March 12, 2017

फ़िदा हुसेन का घोड़ा

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अपने ख्वाबों की बदलती ज्यामिति पर
जिसे बन जाना था पाइथोगोरस सा 
और गढ़ने थे जिसे नित्य नए प्रमेय 
मैंने देखा है खुली आँखों से उस शख्स को 
बदलते हुए अनगढ़े ख्वाबों को रंगों में,
फिर उन रंगों को बदलते कैनवास पर 
बिखरी हुई आड़ी-तिरछी लकीरों में,
बदलते देखा है उन लकीरों को फिर 
अलग-अलग ज्यामितीय आकारों में, 
देखा फिर ज्यामितीय आकारों को 
बदलते हुए एक मुकम्मल आकृति में 
देखा है इन आकृतियों को कई बार बनते घोड़ा
कभी रंगीन तो कभी श्वेत-श्याम रंगों में 
और इस प्रकार फ़िदा हुसेन की तूली से गुजरकर 
अनगढ़े ख्वाबों को घोड़ा बन दौड़ते कैनवास पर 
कई बार मैंने देखा है खुली आँखों से

यदि लगता है आपको कि मर गए हैं आपके ख्वाब 
यदि लगता है आपको कि ख्वाब अब बचे ही नहीं 
यदि लगता हो आपको कि ख्वाब जैसा कुछ था ही नहीं कभी 
तो जागकर शून्यता के ध्यान से देखिये फिदा हुसेन के घोड़े को 
जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे अलग-अलग रंगों में 
आगे बढ़ते हुए क्या देखा है आपने कभी मुड़कर अपने छूटे हुए ख्वाबों को ?

आप देखेंगे कि हमारे अपने ही ख्वाबों का चित्रांतर है फिदा हुसेन का घोड़ा 
जिसे स्पर्श कर पाने के लिए दरकार है अंतर्दृष्टि की 
जिसके शरीर से एक ज्यामितीय आकार निकालकर रख लेना चाहता है मन 
फिदा हुसेन के घोड़े की नाल में दिखता है मस्तुल हमारे ख्वाबों की नौका का

फिदा हुसेन का घोड़ा जो दिखता है कैनवास पर पीछे मुड़कर देखता 
बना है ज्यामितीय आकारों से और हर आकार का है अपना एक कैनवास 
मंचन हो सकता है उस हर एक कैनवास पर हमारी ख्वाबों के पसंद के किसी नाटक का 
जिसे देखकर पता चलता है कि होता है कितना जरूरी ख्वाबों को आकार देना !

हम जब भी देखते हैं कोई ख्वाब, हमें देखना चाहिए फिदा हुसेन के घोड़े को 
जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे बारबार, आगे दौड़ते हुए भी पूरे सामर्थ्य के साथ 
कि मन को चाहिए होती है अथाह हॉर्स पावर शक्ति आगे बढ़ते रहने के लिए 
और आकार देने के लिए पीछे मुड़ कर देखते हुए अपने छूटे हुए अनगढ़े ख़्वाबों को






Monday, March 6, 2017

बस इक आशा

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गाढ़े नीले रंग की स्याही में है दर्ज़
मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं में तैर रही दमित स्मृतियाँ 
जिन्हें विस्मृत करने के अभ्यास में किए जा रही हूँ कंठस्थ 
अब भी आच्छादित है जिन पर रक्त अक्षत अच्छे दिनों के अनुष्ठान का 

धरने पर है अनुच्चारित शब्दों का जुलूस
ध्वनि के द्वार पर, नीरवता में लीन
कोई जाप या मंत्रोच्चार नहीं, है बस इक आशा 
कि सुनाएगा कभी जीवन पियानो बीथोवन की नाइन्थ सिम्फ़नी

समयपुरुष पोंछ देता है उन तमाम स्नेहसिक्त आँखों की अनुभूतियों को 
जो कर सकता था काम मलहम का मेरी वेदना पर  
अबाध्य मन जा रहा है दंडकारण्य की ओर
है बस इक आशा कि लौट आएगा अच्छे दिनों का प्रवासी पक्षी 

अवकाश पर हैं धरती के समस्त देवी-देवता इन दिनों 
कि विलीन हो जाती हैं समस्त प्रार्थनाएँ निर्वात में 
है बस इक आशा कि आएगा कोई पैगम्बर वक़्त का 
और करवाएगा मेरा साक्षात्कार अच्छे दिनों के देवता से 

Wednesday, March 1, 2017

रात

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आएगा प्रकाश
कहता है भोर की ओर देख  
रात का बतास 

शब्द बतास का खिल जाता है बन फूल 
हवा में तैरती है गंध रात की रानी की 
स्वप्न में टिमटिमाता है जुगनू व्याकुल 

अँधेरा खिलखिलाता है 
नींद के कानन में चेतना की जागृति 
स्वप्न की विलासिता है 

दीये की बाती में रात की उदासियाँ जलती हैं 
होता है अंतराल बस एक स्वप्न भर का 
दिन के उजाले में स्वप्न की परियाँ हाथ मलती हैं 

निकल पडूँगी पदयात्रा पर मैं भी साथ
आएँगे जब दिन के उदास देवी-देवता 
और सीख लूँगी एक नए दिन का पाठ 

Sunday, February 26, 2017

पर्वतारोहण

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एक दिन बना लूँगी मैं अपना ठिकाना
किसी हरे-भरे पहाड़ पर  
ढूँढते हुए आस्ताना 

फिर एक दिन तपस्या में लीन आदिम पुरुष सा पहाड़  
माँगेगा मुझसे आश्रय, बन प्रणय भिक्षुक 
और प्रतिदान में चाहूँगी मैं अभयदान 
तब हमारे प्रणय अभ्यास का फल 
लेगी जन्म हमारी नैसर्गिग संतान, बन वितस्ता सी कोई नदी 

उस दिन करते हुए हमारा अनुसरण 
अपने अमरत्व के लिए 
बहुत-बहुत लोग करेंगे पर्वतारोहण 

तपस्या कर रहा है पहाड़ अनंतकाल से कि आएगा माहेन्द्र-क्षण
दे रही है आहुति कालिंदी, इक्षुला, तमसा जैसी नदियाँ इस अनुष्ठान में 
मंत्रोच्चार कर रहे है हिलाकर पत्तों को सनोबर और देवदार के वृक्ष  
मैं ढूँढ रही हूँ सूत्र पहाड़ को पिघलाने का !

दुविधा में है भगीरथ का समयपुरुष !!

Thursday, February 23, 2017

इंसान होना रह गया

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हुए सबसे पहले हम नर और नारी, श्वेत और अश्वेत  
हम हुए फिर हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख और साई 
दिमाग लगाया तो हम दलित और सवर्ण भी हुए 
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

जब हम बढ़े आगे और की हमने खूब तरक्की 
तो हम हुए अमीर और गरीब, सुखी और दुखी 
हम शिक्षित और निरक्षर, विद्वान् और मुर्ख हुए 
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

समय के साथ किया हमने प्रवेश जब विज्ञान के युग में  
तो हुए हम आस्तिक और नास्तिक, प्रगतिशील और पिछड़े 
हम हुए वामपंथी और दक्षिणपंथी, मूक और वाचाल 
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

हम भगवान् तक बन गए जब हुए "ईसा मसीह" और "बिरसा मुंडा" 
संत भी बन गए होकर रैदास, नानक, कबीर, फरीद और मीरा
वीर बने "शिवाजी", "भगत" होकर, बने आदर्श बन स्वामीजी और बापू
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

पढ़ा हमने गीता, कुरआन,  गुरुग्रंथ साहिब और बाइबिल, तो बने हम धार्मिक 
वैज्ञानिक बने पढ़कर भौतिकी, जीव विज्ञान, रसायन और वनस्पति शास्त्र 
राजनीति पढ़ नेता बने, हुए कलाविद पढ़ कला की तमाम विधाएँ 
और इन्हीं झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

कितना हो पाए सामाजिक, हम समाज शास्त्र पढ़कर ही 
जोड़ पाता जो समाज को, बनने के पहले ही पुल वो ढह गया 
पढ़कर रामायण हम ढूँढ रहे हैं सदियों से स्वर्ग जाने की सीढ़ी 
और ऐसे ही तमाम झंझटों के बीच हमारा इंसान होना रह गया 

Monday, February 13, 2017

शाम्भवी योग

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किसी  रक्तपूर्णिमा की रात 
मेरे अभिधान से झड़े थे कुछ शब्द
विषाद के रंग में सने  
रोप आयी थी उन्हें मैं घर के दक्षिण दुआर पर 
कि कहा था पिता ने विदाई से ठीक पहले 
नहीं दिखाना कभी किसी को अपना दुःख 

डाला मेरे दुखों पर बारिश ने पानी और रौशनी सूरज ने
जब बदला करवट मौसम ने और चली बसंती हवा 
उग आया पेड़ मेरे दुखों पर, खिला जिस पर रक्त जवा 

चढ़ा रहें है पत्थर के महादेव को रक्त जवा 
आजकल, मेरे ही असीम दुखों के अधिष्ठाता
मेरे अश्रुजल से हो रहा है उनका जलाभिषेक 

मौन हैं देवता, चुप हूँ मैं भी 
खुली हैं आँखें हम दोनों की 
और कुछ देख भी नहीं रहे 
शाम्भवी योग कहते हैं जिसे

देवता ढूँढ रहे हैं सूत्र 
मनुष्य होने का, योग द्वारा 
कि समझ सकें इंसानों के तुच्छ दुःख 
मैं हूँ प्रतीक्षारत कि न जाने लगेंगे कितने कल्प 
मुझे पत्थर हो जाने में !!

समझना चाहती हूँ मैं देवताओं की विवशता !

Thursday, February 9, 2017

दुनियादारी

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मैंने ऐसा तो नहीं कहा
कि लोग छोड़ दे समस्त दुनियादारी
कैसे कहूँ ऐसा !

बिखर रहा है धरती पर समाज उन दिनों से
जब सपने में भी नहीं सोचा था किसी वैज्ञानिक ने
जीवन के संभावना होने की मंगल ग्रह पर

अब जबकि हम पहुँच चुके हैं मंगल ग्रह पर सच में
और पाल रहे हैं उम्मीद जीवन का वहाँ
तो क्या यह नहीं है सामाजिक बिखराव के अगले स्तर की नींव ?

काँधों पर शव ढ़ोते लोग चल रहे हैं वृताकार इस तरह
जैसे कि वो कर रहे हों प्रदक्षिणा धरती की
श्मशान से लौटते यात्री भूल रहे हैं करना गंगास्नान 
और कर रहे हैं प्रस्थान मलय पर्वत की ओर
होकर चंदन की सुगंध से वशीभूत

तो यहाँ ले आयी है दुनियादारी हमें  !

जमीन को जमींदोज कर जमींदार
पका रहे हैं तंदूर पर बगेरी
प्रतिरोध अब एक वर्जित शब्द है
फिर कोई चीज है दुनियादारी!

Sunday, February 5, 2017

इमोटिकॉन

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हाथों में स्मार्टफोन लिए 
इनबॉक्स के पत्रशिल्पी 
भूल जाते हैं अक्सर मादरी ज़बान
और बतियाते हैं सुविधा की विदेशी भाषा में 

जहाँ बात-बात में इमोटिकॉन चेपते 
वह दिखना चाहते हैं आधुनिक 
नहीं करती है उनका ध्यान आकर्षित 
उनके शब्दकोष के अक्षरों की यह दरिद्रता 

इमोटिकॉन संभाल लेता है भावनात्मक आवेगों को 
बिना इस्तेमाल किए मादरी ज़बान के वो तमाम शब्द 
जिनका प्रयोग माना जाता है अनुचित पत्राचार में
शिष्टाचार के मद्देनजर, भद्रलोक के संसार में 
फिर यह बचा भी तो लेता है व्याकरण के अतिरिक्त बोझ से 

मुझे भयाक्रांत करती है एक आशंका 
कि मुझे नहीं है विशेष समझ चित्रकला की 
और अगर होते रहें इसी तरह लोग स्मार्ट दिन-प्रतिदिन 
किसी रोज गुम हो जाएँगे समस्त अक्षर इतिहास की गुफाओं में 

शायद किसी रोज़ हम वापस पहुँच जाएँ उसी आदिम समाज में 
जहाँ है दर्ज कंदराओं के पाषाण पर हमारे पूर्वजों का होना चित्रों में 
पर भूल जाएँ स्वयं पाषाण होकर दर्ज करना अपना होना पाषाण पर 
पत्राचार के मशीनी भाव में डूबे हम मानव और मानवी 

जहाँ पाषाण शिल्पी महसूस कर सकते हैं दर्द पत्थरों का तराशते हुए 
इनबॉक्स के पत्रशिल्पी बन रहे हैं स्वयं पाषाण सा- इमोटिकॉन 
जो बस दिखता ही है भावपूर्ण जबकि होता है भावशून्य असल में 

इन दिनों मेरी मूक प्रार्थनाओं में उभर आता है अक्स  
किसी अज्ञात पाषाण शिल्पी का अक्सर बंद आँखों में 
कि किसी रोज जब हम हों चुके हों परिवर्तित पाषाण में
एक वही तो होगा जो तराशकर हमें फिर मनुष्य बनाएगा

देख लेना, अंततः शिल्पी ही शिल्पी को बचाएगा !!!

Monday, January 16, 2017

इतिहास

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नहीं है क्षीरसागर धरती पर कहीं भी 
फिर भी सदियों से सुनाया जा रहा है हमें 
समुद्र मंथन का वर्णन विस्तार से 

नहीं हुई थी कोई पेन्डोरा
यूनान में ही कभी 
फिर भी उसके बक्से से जुडी हैं 
न जाने कितनी कहानियाँ 

नहीं था सोने के सींगों वाला हिरण 
फिर भी लोग करते रहते हैं ज़िक्र 
रोम के हरक्युलिस का आए दिन 

चार दिन का शिशु साँप तो दूर 
नहीं मार सकता मच्छर भी 
फिर भी अस्पताल से लेकर अंतरिक्ष यान तक 
सबके नाम में मौजूद है ग्रीस का अपोलो  

क्या होता है सुनी-सुनायी इन कहानियों से 
रातों में आँखें मूँदते ही मेरे सपनों में लेती हैं हिलोरें 
हिंद महासागर की उद्दाम लहरें अक्सर 
तैरता हुआ आता है जिसमें पीतल का सुनहला बक्सा 
पेन्डोरा का नहीं, मेरी माँ का है वह पानदान 
बंद हैं जिसमें पान, सुपारी और कत्थे के रंगों में रंगे हुए दिन 

छूटता हुआ आता है हिरणों का दल सुंदरवन से 
सुन्दर स्मृतियों की तरह 
देखती हूँ नींद में मुस्कुराया है पहली बार 
मेरी गोद में सोए हुए चार दिन के शिशु ने
जिसका नामकरण नहीं किया मैंने किसी मिथकीय पात्र पर 
कि वह रच सके अपना खुद का इतिहास 
मिथकों का भी भला कोई इतिहास होता है!

Wednesday, December 7, 2016

मध्यरात्रि की चाय

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महकती हुई एक इलाइची रात जो है काली 
इलाइची के काले दानों के ही समान 
जगा जाती है मुझे देकर स्वप्निल संकेत डूबने का

मैं बिसार कर नींद का उत्सव 
डालती हूँ इलाइची के कुछ दाने केतली में 
उबालती हूँ रात्रि को चाय की पत्तियों संग 
दूध डाल उजाला करती हूँ 
और छान लेती हूँ उम्मीदों की छन्नी से  
मध्यरात्रि की चाय, पोर्सलिन की प्याली में  

बह जाती है मेरी नींद अँधेरे में 
भूमध्यसागर में आहिस्ता-आहिस्ता 

लोग जो डूब जाने का उत्सव भूल 
चढ़ रहे हैं पहाड़ों पर 
क्या यह नहीं जानते कि ठीक से तैरना आता हो 
तो आप डूब कर ले सकते हैं स्वाद जीवन का 

Monday, September 12, 2016

वक्त

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बड़ा होता है हर एक दिन और हर एक महीना 
कैलेंडर के उस पन्ने से जहाँ वह होता है चिन्हित 
पर सबसे बड़ा है वह अनुभव जिसे लिखा गया 
शब्दों में डायरी के पन्नों में, समय जिसे जीया गया 

पाया गया है ऐसा कि उम्र हमेशा लम्बी ही होती है  
हथेली में मौजूद आयु रेखा की लकीर के मुकाबले 
कुछ घन्टे, कुछ दिन, कुछ महीने या फिर कुछ साल ?
उम्र इतनी भी लम्बी नहीं होती कि जान सकें ये सूत्र 

रचे गए रामायण और महाभारत जैसे मोटे-मोटे ग्रन्थ 
जो हमेशा छोटे ही दिखे सीता और द्रौपदी के दुःख से 
पर सबसे मोटा था वह वक़्त जो देख रहा था चुपचाप 
दर्ज होते इन कथाओं को ग्रंथों में और इन्हें मानक बनते 

सबसे ज्यादा बड़ा है आयतन आसमान का जिसमें है कैद 
असंख्य तारे ठीक वैसे जैसे पिंजरे में कैद होती है चिड़ियाँ 
पर संसार में सबसे ज्यादा जालिम होता है बेरहम वक्त 
जो देखता है सब कुछ और समय आने पर पलट जाता है  

वक़्त बड़ा है अनुभवों से, लम्बा है उम्र से अधिक और जालिम सबसे ज्यादा !

---सुलोचना वर्मा ----

Sunday, September 4, 2016

कोलकाता के बाबूघाट पर

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बिन माझी की एक नाव 
बँधी थी कोलकाता के बाबूघाट पर 
जो कर रही थी शायद किसी की प्रतीक्षा
और ऊंघ रही थी क्लांति से होकर चूर

वह वैशाख की अपराह्न बेला थी जब मैं पहुंची घाट पर
सूरज ने तान रखा था पीला कतान सा गंगा के ऊपर 
ऐसे में एक उमस ही थी जो फैली थी दूर- दूर तक
घाट पर गंगा के जल के अतिरिक्त  
समय की बहुतायत कर रही थी इंगित मुझे और नाव को
परस्पर एक-दुसरे के एकाकीपन की ओर
मैं भीड़ के बीच खड़ी थी अकेली ठीक वैसे 
जैसे पड़ी थी अकेली बिन माझी की नाव 
कोलकाता के बाबूघाट पर 

हवा में तैरते हुए कुछ शब्द कर रहे थे अतिक्रमण मानस पर 
रासमणि, गंगा स्नान, ढीमर जाति, देवी मन्त्र, शूद्र वर्ण और भी कई ...
रह रहकर ध्यान भंग कर रहीं थीं गंगा की शांत लहरें 
जो टकरा रहीं थी पास आती हुई हमारी डिंघी के पाल से उसी तरह 
जैसे मैं टकरा गयी थी अचानक बिसरि हुई स्मृतियों से उस क्षण
कोलकाता के बाबूघाट पर 

घिर आयी अजीब सी उदासी उस नौका से दूर डिंघी से दक्षिण की तरफ बढ़ते हुए 
जैसे पड़ी हो कोई हिचकी, कोई हुक या कोई चीख नाव के ठीक नीचे रेत पर  
जिसे नहीं कर पायी हो शांत बरसों पहले बुझी चिता की आग 
लिपटी है एक उदासी नौका पर रखे पाल से जो चीख-चीख कर सुनाना चाह रही हो कहानी 
सदियों पहले घाट पर हुए दमन और अत्याचार की
जो पाना तो चाहती है मोक्ष अपने अतीत से, पर वर्तमान के जल में घुल नहीं पा रही 
कि शायद आये कोई अपना कभी घाट पर और तर्पण कर जाए  
ऊब-डूब कर रही थी एक गहरी उदासी मेरे अंदर भी 
उनके लिए जो एक जमाने जीवित थे और इन घाटों पर मरे
उनके लिए भी जो नहीं रहेंगे एक दिन इन घाटों और मंदिरों को देखने के लिए बचे 

अजीब था पर मैं कर रही थी यात्रा दो नावों पर वस्तुतः एक ही कालखंड में 
मैं जी रही थी कोई पौराणिक क्षण अपने भीतर उसी तरह
भोगता है मिथक काल का मानुष इतिहास जैसे
बढ़ रही थी मेरी डिंघी अपने गंतव्य की ओर 
जबकि मेरा एक पाँव अब भी था उस नाव पर 
जो बँधी थी कोलकाता के बाबूघाट पर 

गंगा की लहरों को पाल से चोटिल कर रही थी कई अन्य नौकाएं 
जो चल रहीं थीं हमारी डिंघी के समानांतर 
वो सभी नौकाएं ढों रहीं थीं उदासियाँ किस्म-किस्म की 
मानो उदासियों का मेला लगा हो गंगा के घाट पर 
उस प्रहर भी सबसे तेज चल रही थी वह नाव 
जिस पर अपनी स्मृतियों में सवार थी मैं अब भी 
और जो बँधी थी कोलकाता के बाबूघाट पर 

उतर गयी डिंघी से मैं कालीघाट पर ठीक संझा-बाती के समय 
पर फिर भी रही सवार बाबूघाट के उस नाव पर जैसे 
मैं थी उस काठ की नौका पर ठोका गया कोई कील 
जो चीख रहा है मोक्ष, जिसे सुन पाने के लिए चाहिए गंभीरता नदी की 
बाबूघाट से दक्षिणायन होती गंगा लगती है गले सागर के कुछ देर चलकर 
अभी मैं चली ही थी लेकर अपने भीतर मृत्यु का बोध 
जो हुआ मुझे घाट और मंदिर के बीच 
कि गंगा की धारा ऐसे लहराई जैसे कोई सगा लहरा रहा हो हाथ विदाई के क्षण में 
मुझे हुआ बोध जीवन का, 
जो है वर्तमान, गतिशील और इतिहास से परे
मैं बैठ गयी कुछ देर मूंदे आँख घाट किनारे 
पार्श्व में गा रहा है बाऊल मीठा धीरे-धीरे 
"कोन घाटे लागाईबा तोमार नाव, सुजॉन माझी रे"

----सुलोचना वर्मा -----

Wednesday, August 31, 2016

अतिरेक

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दिखे आसमान में सबसे रौशन सितारे जब थी सबसे अँधेरी रात 
चुभती रह गयी दिल में सबसे अधिक नहीं कही गयी इक बात 
सबसे ज्यादा चाहा गया उसे, जिसने नहीं समझा हमारा जज्बात 
की जिसे भूलने की कोशिश ज्यादा, हर पल उसे ही किया याद 

सबसे अँधेरी रात में लुका - छिपी खेलता रह गया माहताब 
सबसे कठिन निर्णय था कि पलटें पन्ना या बंद करें किताब 
सबसे बड़ा दुःख दे गया अपनी आँखों का सबसे प्रिय ख्वाब 
वह कोयला हीरा बन गया झेला जिसने सबसे ज्यादा दबाब 

जीवन के सबसे अधिक कष्टप्रद समय में हमें मिले इंसान नेक 
सबसे जटिल समय में ही खोया हमने अपना संयम और विवेक 
मृत्यु के सबसे निकट में जाना जीवन का सबसे बड़ा सत्य एक 
सबसे अंत में जाना, है अदभूत यह जीवन संयोगों का अतिरेक 

-----सुलोचना वर्मा ------

खुशियाँ

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खुशियाँ एकदम से तो गायब नहीं हो जाती हैं 
गुम जाती हैं अक्सर एक पाँव के मोजे की तरह  
जो मिल नहीं पाता हमें जरुरत के ऐन मौके पर 
और फिर प्रकट होता है अप्रत्याशित जगह से 

असम्भव है बिना दुःख भोगे खुशियों को पाना 
बिन बारिश के इंद्रधनुष उगने जितना दुष्कर  
खुशियाँ होती हैं वो वनफूल जो उग आती हैं 
उन जगहों पर जहां सोचा ही नहीं जाता उन्हें 

खुशियाँ होती हैं वो इत्र जिसे छिड़कते हैं हम 
दूसरों पर जितना, महक उठते उतना खुद भी  
खुशियाँ झाँकती हैं हमारे जीवन में ठीक वैसे ही 
जैसे झाँकता सूर्य का प्रकाश खपरैल की छत से

हम चले अनजान रास्तों पर ढूंढते हुए खुशियाँ
जबकि खुशियाँ ही रास्ता थीं जीवन के पथ पर 
चलते - चलते पहुंचे हम सफेद कास के वन में 
और आँखों को मिलीं खुशियाँ उस भारी क्षण में 

खुशियाँ होती हैं मेघों के जैसी जो उड़ जाती हैं
बनकर भाप तनिक देर तक निहारे जाने पर 
मुनासिब नहीं होता है खुशियों को ढूंढकर लाना 
खुशियों का मतलब है कुछ बातों को भूल जाना 

---सुलोचना वर्मा----

Saturday, August 27, 2016

रंग

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मेरी आँखों ने देखी दुनिया, 
सफेद और काले रंगों में 
कि उसमें यही दो रंग थे जन्म से 
मेरे ख्यालों का रंग हुआ
मिटटी की तरह धूसर
कि भावनाएँ केंचुए की तरह दबी रहीं अन्दर 
जब मैंने किया प्रेम
तो इन्द्रधनुषी रंग ही बिखरे 
मेरी आत्मा आसमानी रही 
और विस्तार अपरिमित 

--सुलोचना वर्मा-----

भूल

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जब हमें सीखना था चीजों को बनाना 
हम खरीद रहे थे उन तमाम चीजों को 
जब हमें सीखना था शऊर बांटने का 
हम गिन रहे थे कुछ चीजों की कमी 

जब हमें करना था अपने चरित्र का निर्माण 
उन दिनों हम सीख रहे थे प्रतिस्पर्धा करना
जिन दिनों हमें जानना था महत्व चीजों का 
हम भागते चले जा रहे थे सफलता के पीछे 

हमने दोहराया उन भूलों को जिन्हें नहीं सुधारा कभी भी 
हमने चीजों को ही जिंदगी समझ लेने की बड़ी भूल की 
हमारी भूल से बढ़ा लीं हमने चीजें और छूटती गयी जिंदगी 
जबकि जिंदगी से अधिक खूबसूरत चीज और कुछ भी नहीं  

--सुलोचना वर्मा-----

Friday, August 26, 2016

एक दिन

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एक दिन मैं बहती हुई मिलूँगी समंदर के फेनिल जल में 
तुम्हें उस जल का स्वाद पहले से कहीं अधिक खारा लगेगा 
एक दिन मैं बहती हुई जा मिलूँगी नरम हवा के साथ
उस रोज हवा में होगी सांद्रता पहले से कुछ ज्यादा ही 
एक दिन मैं बहती हुई पहुँच जाऊँगी तुम्हारी चेतना तक 
और जम जाऊँगी कैलाश पर्वत पर जमे बर्फ की तरह 

एक दिन शायद तुम मुझे करोगे याद देर तक भूलवश 
उस रोज मैं पिघल जाऊँगी, बहने लगूँगी बनकर तरल   
फिर कहाँ जा पाऊँगी कहीं और, रहूँगी तुम्हारे अंदर ही 
बहती रहूँगी तुम्हारे रक्त के साथ हृदय की धमनियों तक 

---सुलोचना वर्मा -----