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Monday, February 20, 2017

स्मृतियाँ

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पड़ी हैं कुछ बेशकीमती स्मृतियाँ स्मरण अरण्य की किसी उपेक्षित गुफा में 
जिनका है अपना ही कोई अदृश्य तिलस्मी अंतर्द्वार 
गुफा, जहाँ नहीं है मौजूद कोई भी खिड़की या कोई रौशनदान ही 
खुलता है उसका द्वार अकस्मात कुछ ऐसे  
जैसे दिया हो दस्तक जंग लगे हुए फाल्गुन के सांकल ने 
और किया हो उच्चारण शून्य में दबी जुबान 
अरबी उपन्यास के जादुई शब्द "खुल जा सिमसिम" का 
द्वार के खुलते ही दिखता है करीने से सजाकर रखा हुआ 
खजाना स्मृतियों का, दमकता है अँधेरे में  

निरूद्देश नौका पर हैं सवार निरुपाय स्मृतियाँ 
भाषा भूल चुकी स्मृतियाँ पोषित हो रही हैं हमारी करोटी में 
किसी परजीवी की तरह और चला रहीं हैं काम शब्दों का 
होकर निःशब्द, कर रही हैं संक्रमित हमारे मन को बार-बार 

धूसर स्मृतियों के तन पर लगे हैं मोरपंख 
जब छा जाता है मन के आकाश पर भावनाओं का मेघ 
और गिरने लगती हैं रिमझिम बूँदें गगनचारिणी आँखों से 
नाचता है स्मृतियों का अबाध्य मयूर !!

Wednesday, December 31, 2014

गुजरता हुआ साल

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गुजरता हुआ साल इतना साधारण भी न था 
कि मिली ऐसे असाधारण किस्म के लोगों से 
जो टपका सकते हैं अपनी जुबान से शहद 
अंतस में नफरत का काला नमक रखकर 
जबकि मैं मौन भी रहूँ तो बयाँ कर जाती है 
दिल की सच्ची दास्ताँ मेरी पारदर्शी शक्ल 

गुजरता हुआ साल इतना बेरंग भी न था 
कि मैंने देखा बदलते मौसमों के इन्द्रधनुष को 
और लोगों को जुड़ते-बिछड़ते अपनी सुविधानुसार 
जहाँ कुछ मौसम दे गए मीठे-मीठे सुफेद पल 
कभी जिंदगी सुना गयी अपना मुकम्मल काला सच   

गुजरता हुआ साल इतना गया गुजरा भी नहीं 
कि कहूँ कमबख्त आया और आकर चला गया 
जहाँ आया यह साल लेकर कई सुखद पल 
जाते-जाते बहुत कुछ मुझे सिखा दे गया 

गुजरता हुआ साल बस गुजरने ही वाला है 
जहाँ दुनिया कर रही रही है आतिशबाज़ी  
और मना रही है जश्न नए साल के स्वागत में 
कौंध रही हैं यादें बीते हुए बारह महीनों की 
मेरे जेहन के आसमान में बिजली की तरह 
कि तभी जाग जाती है अच्छे दिनों की उम्मीद 
और मैं कह देती हूँ नया साल हो मुबारक़!!

Wednesday, December 10, 2014

बिन पता के लिफ़ाफ़े में

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काश तुम सहेज पाते मेरे प्रेम को
मोती की तरह वक़्त के सीपी में
जो हो गया है लुप्त धीरे-धीरे
मैमथ की ही तरह धरती से 


मैं अक्सर अपने सपनों में
बुनती हूँ एक मफ़लर काले रंग का
जिसे चाहती हूँ लपेटना तुम्हारे गले में
मेरी बाँहों के हार सा


पर जब मैं देखती हूँ खुद को आईने में
तो देखती हूँ केवल एक ठूँठ
जिस पर करती हैं आरोहण
तुम्हारी यादें वनलता की मानिंद


चला देती हूँ रवीन्द्र संगीत उस कमरे में
दिन के भोजन के ठीक बाद
जहाँ अब रहते हो तुम बड़े सुकून से अकेले
क्यूँकि मेरे एकांत में बहुत सक्रिय होते हो तुम


झाँकती हैं एक जोड़ी आँखें आजकल
उस बिना साँकल वाली खिड़की से
जहाँ लगाना था नीले रंग का पर्दा
ओढ़ बैठी हूँ मैं दर्द की नीली चादर


भेजती हूँ खत कुछ दिनों से बिन पता के लिफ़ाफ़े में
जबकि तुम्हारे ठिकाने का सन्देश दे ही जाती है हवा
कि नहीं मयस्सर मुझको तुम्हें परेशाँ देखना
और मेरा कद मुझे पशीमान होने की इज़ाज़त नहीं देता


----सुलोचना वर्मा-------------

Wednesday, September 24, 2014

एक आम सी कविता

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जब दिखेंगे आम के मंजर अगले बरस
फागुन बौरा उठेगा
और मैं हो जाउंगी सरसों की तरह
थोड़ी और पीली दर्द से


जब झूमेगा मौसम कोयल की कूक से
एक हुक मेरे अन्दर भी उठेगी


एक दिन वैशाख लगा जाएगा पेड़ पर टिकोला
और हो उठेगा खट्टा मेरे स्वाद का मन  

 
जेठ भारी हो जाएगा मन के मौसम में
ज्यूँ लद जायेगी टहनी पके फलों से


जब दिखेगा बिकता लंगड़ा सावन के बाज़ार में
मन गुज़रे मीठे पलों की बैशाखी ढूँढ लेगा


मुझे तुम पसंद रहे आम की तरह
हमारा साथ भी आम के मौसम जितना रहा


जी रही हूँ मैं अब तुम्हारी आम्रपाली सी यादें !!!

-----सुलोचना वर्मा---------