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Monday, January 16, 2017

इतिहास

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नहीं है क्षीरसागर धरती पर कहीं भी 
फिर भी सदियों से सुनाया जा रहा है हमें 
समुद्र मंथन का वर्णन विस्तार से 

नहीं हुई थी कोई पेन्डोरा
यूनान में ही कभी 
फिर भी उसके बक्से से जुडी हैं 
न जाने कितनी कहानियाँ 

नहीं था सोने के सींगों वाला हिरण 
फिर भी लोग करते रहते हैं ज़िक्र 
रोम के हरक्युलिस का आए दिन 

चार दिन का शिशु साँप तो दूर 
नहीं मार सकता मच्छर भी 
फिर भी अस्पताल से लेकर अंतरिक्ष यान तक 
सबके नाम में मौजूद है ग्रीस का अपोलो  

क्या होता है सुनी-सुनायी इन कहानियों से 
रातों में आँखें मूँदते ही मेरे सपनों में लेती हैं हिलोरें 
हिंद महासागर की उद्दाम लहरें अक्सर 
तैरता हुआ आता है जिसमें पीतल का सुनहला बक्सा 
पेन्डोरा का नहीं, मेरी माँ का है वह पानदान 
बंद हैं जिसमें पान, सुपारी और कत्थे के रंगों में रंगे हुए दिन 

छूटता हुआ आता है हिरणों का दल सुंदरवन से 
सुन्दर स्मृतियों की तरह 
देखती हूँ नींद में मुस्कुराया है पहली बार 
मेरी गोद में सोए हुए चार दिन के शिशु ने
जिसका नामकरण नहीं किया मैंने किसी मिथकीय पात्र पर 
कि वह रच सके अपना खुद का इतिहास 
मिथकों का भी भला कोई इतिहास होता है!

Saturday, September 19, 2015

चीनी का पराठा

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पकड़ लेते हैं बच्चे माँ का आँचल
देखकर तवे पर पकता चीनी का पराठा
थमाती है माँ पराठा जो होता है कड़क
माँ की नयी ताँत की साड़ी की तरह


चमक उठती है बच्चों की आँखों में
अखण्ड ज्योति की शोभा यात्रा

एक-एक रवा मीठी मुस्कान देकर माँ
करती रहती है किसी किसान की तरह
प्रत्यारोपित प्रेम परिवार के बेहड़उर में


--------सुलोचना वर्मा -------------

Sunday, June 21, 2015

जन्मदाता

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लेकर जाते रहे जहाँ हम अपनी फरियाद
रही हमारे जीवन में किसी मंदिर जैसी माँ
पिता हुए तीर्थ स्थल जीवन की धरती पर
कि पूरी हुई हमारी जितनी माँगें थीं वहाँ


दुनिया में थी भीड़ और भटक जाना था तय
फिर माँ जैसा कोई अवलम्ब होता है कहाँ
हम भूले, हम भटके, फिर घर को भी लौटे
कि पिता नाम का मानचित्र अंकित रहा यहाँ


-----सुलोचना वर्मा-----

Sunday, February 8, 2015

माँ

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पूरे जग की आधी आबादी में है एक वह भी
करती हूँ जिसके नाम का उच्चारण हर रोज
ऐसा नहीं कि मेरे जीवन में नहीं है कोई और 
पर एक उसके होने से बना रहता है भरोसा
कि होती रहेगी हल हर समस्या जीवन की


लब से निकलती हर दुआ पुकारती है उसे ही
जबकि ऐसा नहीं कि निकलता हो दिव्य प्रकाश
उसके माथे के पीछे से वृत्त सा आकार लिए
पर जब कभी होती हूँ अँधेरे में मैं उसके साथ
जरुरत ही महसूस नहीं होती कभी रौशनी की


----सुलोचना वर्मा---------

Thursday, August 14, 2014

उन दिनों

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नहीं उगे थे मेरे दूध के दांत उन दिनों
फिर भी समझ लेती थी माँ मेरी हर एक मूक कविता
जिसे सुनाती थी मैं लयबद्ध होकर हर बार
जैसे पढ़ा जाता है सफ़ेद पन्ने पर ढूध से लिखी इबारत को
ममता की आंच में स्पष्ट हो उठता था मेरा एक-एक शब्द


माँ ने अपनी कविता में मुझको कहा चाँद
और उस चाँद से की मेरी नज़र उतारने की गुज़ारिश


चाँद ने बदले में लिख डाली कविता
अपनी रौशनी से मुझ पर


उन दिनों चाँद पर एक औरत
दोनों पाँव पसारे
रेशमी धागों से गेंदरा सिला करती थी 
जिसके किनारों पर लगे होते थे
मेरी माँ की साड़ी के ज़री वाले पार


----सुलोचना वर्मा-----

Friday, June 6, 2014

सच्चाई है माँ

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जब खीझ जाती हूँ किसी पर
तो कहती हूँ "ओह जीसस"
"हे भगवान्" भी कह देती हूँ कभी कभार


जब गर्मी कर देती है पस्त
आवाज़ देती हूँ "अल्लाह" को
और मांगती हूँ पानी जो बरसे बनकर फुहार


पर जब भी गिर पड़ती हूँ खाकर ठोकर
जुबाँ पर होता है जीवन का पहला शब्द
चिल्लाती हूँ "माँ" जब भी होता है अन्धकार


माँ है चट्टानों पर लिखी गई एक दुआ
जिसे पढ़ते हैं सभी धर्मों के लोग
अपनी अपनी भाषा में
ईश्वर अफवाह है; सच्चाई है माँ


सुलोचना वर्मा

Monday, April 21, 2014

क्या होती हैं माँ

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सोचती हूँ लिख डालूँ एक कविता
वर्णन हो जिसमें माँ की ममता का
पढ़ें जिसे अनाथालय के बच्चे
और जान सके क्या होती है माँ


सोचा है कहूँगी उनसे
जेठ की तपती दुपहरी में
इकलौते छाते से ढंकती है जिसका सर
यमुना पुस्ता में रहनेवाले उस छोटे बच्चे से पूछे
पूछे मयूर विहार की उस नन्ही लड़की से
जिसकी गुड़िया के कपड़े सिले हैं माँ ने
अपनी रेशमी साड़ी के ज़रीदार आँचल से
बड़े ही चाव से, कई रातें जागकर
और जिसकी एक मुस्कान के लिए
माँ ने बिसार दिए अपने सारे दुःख
उसके माथे पर माँ का हाथ
आया है बनकर जवाब ईश्वर की प्रार्थना का


फिर सोचती हूँ ....
कहाँ लिख पाएगी कोई कविता
कि क्या होती हैं माँ 
और अनाथालय के बच्चों ने कभी थककर
माँ की गोद में सर भी तो नहीं रखा होगा
नहीं पुकारा होगा कभी अँधेरे में डरकर माँ को 
कहाँ देखा होगा कभी अपनी तकलीफों में
ढाढ़स बँधाता माँ का विह्वल चेहरा


ऐसे में मेरी कविता ढूँढती रह जायेगी अपने अर्थ
जिसके सारे शब्द समवेत स्वर में भी
नहीं बता पायेंगे कि क्या होती है माँ