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Tuesday, December 9, 2014

मुखौटा

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सुकन्या की शादी को अभी १२ दिन बचे थे, पर अभी कुछ दिनों पहले ही उसकी अपने मंगेतर, सुगत से अनबन हो गयी| सुकन्या को अब लगने लगा कि मसले को बिना सुलझाए शादी करना ठीक नहीं होगा| पर सुगत तैयार न था; उसे सुकन्या को हर हाल में पाना था| परेशान होकर सुकन्या राहुल को फोन करती है और उसे सब कुछ बता देती है| राहुल सुकन्या और सुगत, दोनों का करीबी मित्र है|

"तुम्हे उससे शादी नहीं करनी चाहिए" सुकन्या को ध्यान से सुनते हुए राहुल जवाब देता है|
"अब करनी ही पड़ेगी; नहीं तो ...." कहते हुए सुकन्या रुक जाती है|
"नहीं तो क्या........?????" राहुल कौतूहलता से पूछता है|
"नहीं तो वह कह रहा था कि हमारे लिव इन रिश्ते की बात घरवालों और रिश्तेदारों को बता देगा"कहती हुई सुकन्या रो पड़ती है|
"कोई बात नहीं; बताने दो और तुम्हे ऐसे इंसान से शादी कतई नहीं करनी चाहिए जो ऐसी बातों को लेकर तुम्हें ब्लैकमेल करता हो" राहुल की आवाज़ में गुस्सा था|  
"फिर मैं कौन सा मुँह लेकर घर जाऊँगी"
"तुम्हें कहीं जाने की क्या ज़रूरत? तुम तो आत्मनिर्भर हो और फिर अगर ऐसी ज़रूरत हुई तो तुम मेरे पास आकर रह सकती हो| मैं फिर कोई बढ़िया सा लड़का देखकर तुम्हारी शादी करवा दूँगा" ऐसा कहता हुआ राहुल लगभग आश्वस्त था कि सुकन्या अब यह शादी नहीं करेगी|

सुकन्या मन ही मन सोचती है कि काश उसने राहुल को अपने लिए चुना होता तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता| कितना सुलझा हुआ इंसान है!! पर सुकन्या की परेशानी कम नहीं होती है| घर में शादी की सारी तैयारियाँ हो चुकी हैं| मेहमानों का आना शुरू चूका है| ऐसे में वह क्या करे; उसे नहीं सूझ रहा| शादी में जब सात दिन रह गए, सुकन्या की एक सहेली ने आकर सुगत से बात की और दोनों को आमने -सामने बैठाकर परस्पर बातचीत से मसले को सुलझाया| सुगत ने अपनी गलती मान ली| हिंदी सिनेमा की तरह आखिरी दृश्य में सब ठीक हो जाता है|

शादी हुए अभी दस महीने ही गुज़रे थे कि एकदिन राहुल उनके घर आ धमकता है| दफ्तर के किसी काम से आना हुआ है और दो दिनों बाद वह वापस चला जाएगा| तीनों दोस्त बहुत दिनों बाद मिले हैं; बातों का सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा| रात के खाने के बहुत देर बाद तक तीनों खूब बतियाते हैं| तभी राहुल उनसे कहता है कि उसे अपना ईमेल चेक करना है और उसके लैपटॉप को चार्ज होने में अभी समय लगेगा| सुकन्या अपना लैपटॉप उसकी ओर बढ़ाकर सोने चली जाती है| जाते हुए यह कहकर चुटकी लेती है कि उसे पता है कि उसे अपनी गर्लफ्रेंड से बातें करनी होंगी|

सुबह चाय नाश्ते के बाद तीनों अपने-अपने दफ्तर की ओर रवाना होते हैं| दफ्तर पहुँचकर सुकन्या जैसे ही लैपटॉप ऑन करती है; तो देखती है कि राहुल ने मेल चेक करने के बाद लॉगआउट नहीं किया| वह जैसे ही लॉगआउट करने जाती है; तभी उसकी नज़र सबसे ऊपर वाले ईमेल पर पड़ती है| वह निधि को भेजा गया ईमेल था| सुकन्या ने निधि के बारे में सुना था ; पर उसे यह मालूम नहीं था कि राहुल और निधि के बीच अब भी किसी प्रकार का कोई रिश्ता है| उत्सुकता का कीड़ा बेहद खतरनाक होता है| सुकन्या  से नहीं रहा गया और वह राहुल का निधि को लिखा ईमेल पढ़ती चली गयी जिसमे लिखा था ............

"निधि,
पिछले आठ दिनों से तुमसे बात करने की कोशिश कर रहा हूँ ; पर न तो तुम फोन पर ही आती हो और न ही ईमेल का जवाब देती हो| क्या तुम्हारा मन भर गया इस रिश्ते से? क्या अब तुम्हें मेरे साथ की ज़रूरत नहीं है? अगर नहीं, तो क्यूँ जताया मुझसे इतना अपनापन? क्यूँ आई मेरे इतने करीब? क्या करूँगा उन कपड़ों का जो मैं पिछले छह महीनों से तुम्हारे लिए खरीदकर अपने वार्डरोब में रखता आया हूँ? देखो, ये मेरा आखिरी ईमेल है तुम्हें; अगर दो दिनों में तुम्हारा जवाब नहीं आया तो मैं तुम्हारे पिता को हमारे लिव इन रिलेशन की बात बता दूँगा| बताओ फिर क्या करोगी? मैं ऐसा नहीं करना चाहता; पर तुमने मेरे पास और कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा| इन्तजार रहेगा.....तुम्हारा राहुल"

 सुकन्या को अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हो रहा था| क्या यह वही राहुल है जिसने उसे सुगत द्वारा ब्लैकमेल किये जाने पर शादी तोड़ने की सलाह दी| फिर वह वार्डरोब वाली बात..... तीन महीने पहले जब राहुल ने नया घर लिया तो सुकन्या और सुगत को विडियो चैट पर अपना पूरा घर दिखाया था और अपने वन रूम फ्लैट का इकलौता वार्डरोब खोलकर दिखलाया था कि कितना स्पेशियस है| उसमे तो सभी कपड़े राहुल के ही थे!!!

आज सुकन्या का मन दफ्तर के किसी काम में नहीं लग रहा है| वह तय नहीं कर पा रही कि राहुल अब खुद ही भटक गया है या तब उसे भटकाने की कोशिश कर रहा था............या फिर प्रेम की ज़मीन इतनी गीली
होती है कि वहाँ सही से गलत की ओर फिसलते देर नहीं लगती??? पीछे छूट गयी पुरानी स्मृतियाँ तेजी से पीछा कर रही थी| इतना तय था कि राहुल ने अपने मुख पर मुखौटा लगा रखा था; पर परेशानी यह थी कि कौन सा चेहरा उसका अपना असली चेहरा था !!!

सुकन्या शाम को देर से घर लौटी और फिर सभी ने मिलकर बाहर खाना खाया| राहुल अगली सुबह के फ्लाइट से मुंबई वापस चला गया| सुकन्या ने इस घटना का ज़िक्र किसी से नहीं किया ....किसी से भी नहीं...इस सच को काले मोती की मानिंद यादों के पारदर्शी जार में सहेज कर रख लिया| धरा रह गया सुकन्या का सवाल जिसका उत्तर अब पश्चिम में है|

Friday, December 5, 2014

झूठा सच

"मैं आपके जैसा साहसी नहीं था कि घरवालों के विरोध के बावजूद अपने पसंद की लड़की से शादी करता | पर रागिनी ने तो पूरा जीवन ही मेरे नाम कर दिया | अब उसके जीवन में मेरे सिवाय कोई नहीं और उसकी देखभाल करना मेरी नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है | अगर आप यह सब सौम्या से कह देती हैं तो मेरा घर टूट जायेगा | ज़रा मेरे बच्चों के बारे में तो सोचिये.......और वैसे भी अब सौम्या जायेगी कहाँ...उसके माता-पिता तो रहे नहीं..सो...." प्रदीप बोलता ही चला गया | उसकी आवाज़ काँप रही थी |

"आपको मुझसे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है | यह बात मुझ तक ही रहेगी | शायद मेरे चुप रहने ही में सौम्या की ख़ुशी निहित है" मधुरा ने भारी मन से कहा | पुरे दिन ग्रुप वायलिन की विकल तरंगों के बीच मन
बजता रहा | मन में कई तरह के ख्याल उभर रहे थे |

मधुरा कई दिनों तक इस उधेड़बुन में पड़ी रही कि उसे क्या करना चाहिए | अगर सौम्या से उसके साथ हुए धोखे के बारे में नहीं बताती है ; तो सहेली के साथ अन्याय होगा और अगर सब कुछ बता देती है तो उसका घर टूट जायेगा |

"मुझे तो समझ नहीं आता कि आप और सौम्या एक ही शहर के होते हुए एक दुसरे से इतने अलग कैसे हैं | आप इतनी समझदार हैं और आत्मनिर्भर भी | आपको अपना कुछ काम करना चाहिए | मेरी राजनीति में अच्छी पैठ है और आप चाहें तो ..." अब प्रदीप अक्सर मधुरा को फोन करता और उसके तारीफों की पुल बांधता | यह सिलसिला लगभग तीन महीनों तक चला |

फिर एक दिन......

"सुनिए, आज मेरे बचपन की सहेली घर आ रही है | वैसे तो आपको अपने काम के अलावे कुछ सूझता ही नहीं है ; पर आज हो सके तो जरा समय से घर आ जाइएगा" सौम्या का प्रदीप से इतना कहना था की प्रदीप घर से निकलते हुए अचानक से रुक गया |

"अच्छा, कौन सी सहेली आ रही है" ऐसा पूछते हुए प्रदीप को जवाब लगभग पता था |

"मधुरा" कहते हुए सौम्या ने घर का दरवाजा बंद किया |

प्रदीप कुछ सोचता हुआ पार्किंग में आकर अपनी लिमोजिन में बैठ गया | मन की वीणा ने राग विहाग का तान छेड़ दिया |

मधुरा का सामना ऐसे सच से हुआ था जिसे वह चाहकर भी नहीं भुला पा रही थी | सौम्या के घर जाने से पहले मधुरा ने अपनी माँ को सारी बातें बता दी और साथ ही उनसे यह वादा भी लिया कि वह इस सच को किसी और से सांझा नहीं करेगी |

"देखो, पैसेवाला है, तभी तो एक साथ दो परिवारों का निर्वाह कर पा रहा है; वरना इस कमरतोड़ मंहगाई में तो एक परिवार भी संभालना मुश्किल होता है | सौम्या को तो बड़े आराम से रखा है | उसे किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं | अब उसे सब कुछ पता भी चल जाए, तो वह बेचारी जायेगी कहाँ ? " अपनी माँ के मुँह से ऐसा सुनकर मधुरा चौंक गयी |

माँ ने आगे जो कहा, वो और भी चौंकानेवाली बात थी |

"सौम्या की माँ को शादी के बाद यह पता चल चुका था कि यह शादी प्रदीप की मर्ज़ी के वगैर हुई है | इस बात का किसी को पता ना चलता अगर शादी के आठवें दिन रात्री भोज के समय घर पर पुलिस ना आ धमकती | रागिनी ने आत्महत्या की कोशिश की थी और उसे किसी प्रकार बचाया जा सका था | उसने अपने बयान में पुलिस को सब कुछ बता दिया था | उस रोज़ प्रदीप पुलिस के साथ अस्पताल तक गया था और देर रात गए घर लौटा | घर लौटने पर सौम्या के माता-पिता, जो वहाँ रात्री-भोज में शामिल होने आये थे, उनसे कहा गया कि कोई लड़की थी जो प्रदीप से बहुत प्यार करती थी | प्रदीप ने उससे शादी के लिए इंकार कर दिया, तो आत्महत्या की कोशिश की | प्रदीप का अब उस लड़की से कुछ नहीं लेना देना है और पुलिस ने भी उस लड़की को समझा दिया है | सौम्या के पिता तो मान भी चुके थे कि वह लड़की ही प्रदीप के पैसों पर फ़िदा होकर उसके गले पड़ना चाह रही थी ; पर सौम्या की माँ....उसे सच्चाई का लगभग अनुमान हो चला था | सौम्या की शादी के एक महीने बाद जब वह हमारे घर आई थी , तब इस घटना का ज़िक्र किया था | उन्हें शायद लगा था कि सारा मसला सुलझ गया था | बहरहाल सौम्या अपनी दुनिया में खुश है और वो लड़की, रागिनी भी | काबिल कहना पड़ेगा प्रदीप को ........एक साथ दो-दो घर .............." माँ शायद आगे भी कुछ कहना चाहती थी; पर अब सब कुछ मधुरा के बर्दाश्त के बाहर हो गया था |

"अगर उसके माता-पिता को सब मालूम था, तो उन्होंने कुछ क्यूँ नहीं किया? क्या उन्हें भी इस बात पर लड़के में काबिलियत ही दिखी थी कि एक साथ दो-दो स्त्रियों का भरण पोषण कर सकता है ? क्या सौम्या उनके सर पर एक बोझ थी , जिसके उतर जाने पर वह इतना खुश थे कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता इन सारी बातों से ? या फिर प्रदीप का पैसेवाला होना इस सभी चीज़ों के मायने बदल देता है ?" माधुरी अभी  अपने आप से ऐसे ही कुछ चंद सवाल पूछ रही थी कि उसके फोन की घंटी बजी |

"हाँ सौम्या, मैं चार बजे तक तुम्हारे घर पहुँच जाऊँगी" कहते हुए मधुरा ने फ़ोन रखा |

मधुरा तैयार होकर सौम्या के घर के लिए निकल पड़ती है| वह खुद भी नहीं जानती कि वह सौम्या का सामना कैसे करेगी| डेढ़ घंटे की ड्राइव के बाद मधुरा सौम्या के घर पहुँचती है| सौम्या अपनी सोसाइटी के बाहर खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी| दोनों सहेलियां गले मिलती हैं और फिर सौम्या मधुरा को अपने घर ले आती है| घर आते ही सौम्या मधुरा को अपना पूरा घर दिखाती है| उसके लिए डुप्लेक्स घर बहुत मायने रखता था| सौम्या के चेहरे से झलकती ख़ुशी ने मधुरा के बैचैन मन को कुछ हद तक शांत किया|

"जानती हो मधुरा, आज तक का रिकार्ड है कि प्रदीप कभी मेरे किसी परिचित से मिलने दफ्तर का काम छोड़कर नहीं आये; पर तुम स्पेशल हो न ............" सौम्या इठलाते हुए कहती है| 

प्रदीप आधे घंटे से खड़ा है | शायद उसके अन्दर का अपराधबोध उसे बैठने की इज़ाज़त नहीं दे रहा है |  मधुरा उसकी असहजता  समझ सकती है| मधुरा की इल्तिजा पर प्रदीप उसके पास ही कुर्सी पर बैठ जाता है| सबने साथ बैठ चाय नाश्ता किया और फिर मुलाक़ात को अंजाम तक पहुंचाने का वक़्त आया| मुलाक़ात जो थी वीथोवन की आठवीं सिम्फनी की तरह संक्षिप्त!

 मधुरा को छोड़ने सौम्या पार्किंग तक आती है और मधुरा एक बनावटी मुस्कान के साथ गाड़ी में जा बैठती है | मधुरा मन ही मन तय करती है कि अब वह अपनी सहेली के घर नही आयेगी क्यूंकि सौम्या जी रही है एक झूठ, जो उसका खूबसूरत सच है या यूँ कहें उसकी शादी का सफ़ेद झूठ, जो सच है | अपने दिल पर हजारों सवाल का बोझ लिए मधुरा अस्सी की स्पीड से कार ड्राइव कर रही है कि तभी उसका ध्यान खींचता है  कार की स्टीरियो में चल रहा गाना "क्या मिलिए ऐसे लोगो से, जिनकी फितरत छुपी रहे, नकली चेहरा सामने आये, असली सूरत छुपी रहे"|

Thursday, July 17, 2014

घड़ी

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सुबह के लगभग दस बज रहे थे और चारुकेशी बहुत परेशान थी  | उसे अपनी घड़ी नहीं मिल रही थी | बहुत ढूँढा ; पर कहीं नहीं मिली |


बहुत प्यारी थी चारुकेशी को अपनी इकलौती घड़ी | चार बहनों में सबसे छोटी और दसवीं की परीक्षा द्वीतीय श्रेणी में उत्तीर्ण करने वाली अपने घर की पहली लड़की | वह घड़ी उसके लिए दसवीं पास होने पर मिली मैडल जैसी थी | होती भी क्यूँ ना; अब ऐसा मैडल उसे फिर थोड़े ही न मिलना था | उसे दिल की बिमारी थी और उसका पढ़ना लिखना बंद हो चुका था | शहर के बड़े डॉक्टर ने जवाब दे दिया था और अब घर के लोग भी मान चुके थे की वह अगले दस- बारह साल किसी तरह जी पायेगी |

"हे भगवान ! जिसने भी मेरी घड़ी चुराई है, उसका हश्र मेरे जैसा करना | उसे भी दिल की बिमारी हो जाए........... और उसके मुँह से भी खुन आये .......और ............................." कहते हुए चारुकेशी का दर्द उसके चेहरे पर छा गया |

आठ साल की नन्ही माधुरी चारुकेशी के मुँह से ऐसे शब्द सुन सहम गयी | उसका डर लाजिमी था | उसने सुना था की घड़ी में बैटरी होता है और बैटरी के नाम पर उसने टॉर्च में लगनेवाली बैटरी को ही देखा था | उसे जानना था की घड़ी में लगी हुई बैटरी कैसी होती है | यही सोचकर उसने बीती रात उस घड़ी को उठाया था | उसे खोलने में कामयाब भी हो गयी थी ; बैटरी भी देख लिया ; पर कोशिशों के वाबजूद बंद ना कर पायी |  खुली घड़ी को उसने चारुकेशी के कमरे में ही छुपा रखा था |

"जो कोई भी मेरी घड़ी ढूँढ देगा, उसे मिठाई खिलाऊँगी" परेशान हो चारुकेशी ऐलान करती है  |

"यह ठीक रहेगा...मैं घड़ी ढूँढने के नाम पर खुली हुई घड़ी वापस कर सकूँगी......अभिशाप भी नहीं लगेगा फिर तो ......और मिठाई भी....." मन ही मन माधुरी बुदबुदाती है |

थोड़ी देर बाद माधुरी घड़ी ढूंढ़कर चारूकेशी को देती है और चारुकेशी अपने ऐलान के मुताबिक़ खुश होकर माधुरी को मिठाई खिलाती है | साथ  ही माधुरी को देती है दुआएं |

माधुरी मिठाई खा रही है... पर पहली बार मिठाई का स्वाद इतना कड़वा लग रहा है |

-----सुलोचना वर्मा------

असली मुद्दा रह गया

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दो घंटे मेट्रो में खड़े -खड़े सफर करने और फिर एक घंटे गाड़ी चलाने के बाद समर बेहद थक गया था| घर पहुँचा, तो रात का खाना बनाने की ऊर्जा नहीं बची थी और भूखे पेट नींद भी नहीं आ रही थी | आँखें बंद करते ही उसे मेट्रो में सफर करते लोगों का चेहरा याद आ रहा था| वह उस रोज़ मेट्रो से सफर करते हुए न जाने कितनी कहानियाँ एक साथ जी गया । 

उसे उस लड़की का चेहरा याद आया जो अपनी सहेली को सिगमंड फ्रायड के बारे में बता रही थी। सहेली को  फ्रायड के बारे में सुनने में मजा नहीं आ रहा था, वह बारबार फ्रायड के बीच में भिन्डी की सब्जी का ज़िक्र ला रही थी। वह सोचने लगा कि उन दोनों के मुद्दे कितने अलग थे फिर भी वो सहेलियाँ थीं| 

दरवाजे के पास शायद वो कानून पढ़नेवाली दो छात्राएँ थीं जो 'हलफ़नामा" और "इकरारनामा" के बदले प्रयुक्त हो सकने वाला हिंदी शब्द ढूँढ रही थी। उनसे किसी ने ढूंढ़कर लाने को कहा था। साथ यह भी कि  प्रमाण पत्र के कई मायने हो सकते हैं। वह सोच रहा था कि ऐसी जरुरत कैसे आ गयी!! जिसने उन लड़कियों से ऐसा कहा होगा, उसका मुद्दा क्या रहा होगा!!  

उसके ठीक पास बैठी एक माँ अपने बच्चे को फीडिंग बोतल से दूध पिला रही थी और बच्चा अभी नींद के आगोश में आने ही वाला था कि उनका स्टेशन आ गया। माँ ने बोतल बच्चे के मुँह से हटाकर बैकपैक में रख लिया। बच्चा रोने लगा। माँ ने  एक काँधे पर बैकपैक और दुसरे पर बच्चे को उठाया और उतर गयी। वह सोचने लगा कि बच्चे की भूख किस्तों में मिटी होगी। रिश्ते और ज़िम्मेदारियों के बीच बँट माँ ने किस्तों में खुद  को जीया होगा। क्या बच्चे की भूख से ज्यादा जरूरी मुद्दा था सही स्टेशन पर उतरना!!  

सामने के सीट पर बैठी एक माँ अपने 4 साल के लड़के को मेट्रो में दौड़कर दूसरोँ की सीट पर जाने से रोका था। बच्चे के नहीं मानने पर उसने कहा था अगर वह ऐसा करेगा तो उसे कोई बोरियों में बंद कर ले जाएगा और हाथ काट देगा। समर याद कर मुस्कुराया था कि ठीक ऐसा ही बचपन में उसके भी माता-पिता डराने के लिए  कहते थे।  वह सोचने लगा बैलगाड़ी से बुलेट ट्रेन के जमाने में आ गए, पर बच्चों को डराने का तरीका नहीं बदला ! माँ का असली मुद्दा शायद अपने डर को बच्चे तक स्थानांतरित करना था ?

बिस्तर पर लेटा वह अभी करवटें ही बदल रहा था कि उसे आँगन में किसी के गिरने की आवाज़ सुनाई दी | वह सरपट आँगन की तरफ दौड़ पड़ा और वहां जाकर उसने देखा कि उसके पड़ोस में रहने वाले शम्भूनाथ पंडित जी का बड़ा बेटा, तथागत ,औंधे मुँह गिरा पड़ा है | समर उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाता है और जैसे ही तथागत उठता है, समर की नज़र पड़ती है आँगन में बिखरे पड़े कुछ बेशकीमती सामानों पर | समर गुस्से से लाल होकर तथागत के गाल पर दो तमाचे जड़ देता है और उसे अपने घर के एक कमरे में बंद कर शम्भुनाथ पंडित और उनकी स्त्री को बुला लाता है | 

"देखिये पंडित जी, माना कि तथागत बेरोजगार है और गरीबी से जूझ रहा है, पर इसका मतलब यह तो कतई नहीं कि वह चोरी करे" समर की ऊँची आवाज़ पर मुहल्ले के कुछ और लोग उसके घर आते हैं |

" एक तो तुमने इसे मारा, इसकी बेरोज़गारी का मज़ाक बनाया और अब लोगों को इकठ्ठा कर तमाशा बना डाला.....किस मिटटी के बने हो" शम्भूनाथ पंडित की पत्नी सावित्री का इतना कहना था कि पंडित जी भी सुर में सुर मिलाकर कहने लगे "भला इस तरह दी जाती है किसी को उसकी गरीबी की सज़ा ... और तुम मुहल्लेवाले, क्यों आ जाते हो बेरोज़गारी का तमाशा देखने  " 

पंडित जी की बात सुनकर लोग अपने अपने घरों में लौटने लगे | लौटते हुए लोग आपस में बात कर रहे थे, समर को भला बुरा कह रहे थे और उनकी बातचीत का मुद्दा था तथागत की बेरोज़गारी, उसकी गरीबी और उसकी दयनीय स्थिति !!!! तथागत के माता-पिता भी उसे संग लेकर अपने घर चले गए |

समर बुत बना घर के आँगन में खड़ा रह गया | उसने न्याय करने के लिए तथागत के माता -पिता को बुलाया था ; परन्तु उन लोगों ने चोरी के मुद्दे को बदल कर उन मुद्दों को उछाला जिस पर उन्हें समाज से सहानुभूति मिल सकती थी और मिली भी | असली मुद्दा रह गया !

Saturday, February 8, 2014

मुठ्ठी भर आसमान

गुड्डी, इक इठलाती रंगीन पतंग, जब भी आसमान की सैर पर जाती, तो चिड़ियों को बिना किसी बंधन के उड़ता देख यही सोचती कि काश ! उसे भी ऐसी आज़ादी होती | उसे डोर के साथ बँधे रहने में घुटन सी महसूस हो रही थी | वह  इस बंधन को तोड़ हवा के साथ उड़  जाना चाहती थी  | सोचती थी हवा का साथ मिलेगा तो अपने पंख पर वर्चस्व की आशाओं का बोझ लेकर वह  पूरी दुनिया घूम सकेगी | जब जिधर  हवा का रुख़ होगा, तब उधर ही चल देगी|

घुटन  होने पर लोग ऐसा काम कर जाते हैं जिसके बारे में कभी सोचा भी ना हो | बस, फिर क्या था| एक दिन जब डोर गुड्डी को अपने साथ आसमान ले जाना चाहता था, गुड्डी कुछ सोचकर दूसरी तरफ चल पड़ी-हवा के ठीक विपरीत दिशा में |  पतंग तब आसमान की ओर बढ़ती है जब हवा का प्रवाह पतंग के उपर और नीचे से होता है, जिससे पतंग के उपर कम दबाव और पतंग के नीचे अधिक दबाव बनता है। यह विक्षेपन हवा की गति कि  दिशा के साथ क्षैतिज खींचाव भी उत्पन्न करता है। हवा आश्चर्य के साथ और डोर मायूस होकर अस्त व्यस्त अवस्था में ज़मीन पर आती पतंग को देखता रहा | 

गुड्डी को ज़मीन पर आते देख लोग दौड़ते हुए उसकी तरफ बढ़ रहे थे | दौड़ने वालों में वो भी थे जिन्हे पतंगबाज़ी का शौक था; और वो भी जो सिर्फ़ पतंग लूटना जानते थे, जिनका पतंग उड़ाने से कोई सरोकार नही था | वो इन पतंगो को लूटकर किसी तहख़ाने में जमा करते और अपनी शान में पतंगबाज़ी की झूठी कहानियाँ गढ़ते |

गुड्डी तो आज़ाद होना चाहती थी | अभी आज़ाद हुई भी नही थी की उसकी आज़ादी को उसकी आवारगी जान कई हाथ उसकी तरफ बढ़ने लगे | वह भाँप गयी की उसके चिथड़े होने में तनिक भी समय नही लगेगा | आख़िर थी तो वह काग़ज़ की ही एक पतंग| उसने एक भी क्षण बिना  गँवाए, पकड़ लिया हवा का दामन और चल पड़ी डोर के साथ | अब वह हर परिस्थिति में डोर के साथ बँधी रहती है | उसे उसकी आज़ाद होने की कोशिश का वह भयावह दृश्य और उससे मिला अनुभव डोर से बाँधे रखता है| वह जान चुकी है कि उसे नभ का अपरिमित विस्तार नही मिल पाएगा ; पर चेहरे पर संतोष है इस बात का की उसके पास भी मुठ्ठी भर ही सही, पर अपना थोड़ा सा आसमान तो है|

सुलोचना वर्मा

Saturday, June 29, 2013

सोनपरी-सुआइनोआ

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एक बड़ी सूनामी ने सोनपरी सुआइनोआ और उसके साथी को नेमियागी प्रांत में समुद्र तट

पर ला छोड़ा | वे अपना रास्ता भटक चुके थे | परीलोक का रास्ता ढूँढते हुए वे नज़दीक के घर में
गये| उनका परिचय एक युवक, रोशिंजो से हुआ| सुआइनोआ के साथी ने उसे  रोशिंजो  के पास
रखते हुए कहा कि वह जल्द ही परीलोक जाने के रास्ते का पता लगाकर उसे वापस ले जाएगा|
सुआइनोआ आज से पहले किसी इंसान से साथ नही रही| उसे बड़ा अजीब लग रहा था; पर
परिस्थिति ही कुछ ऐसी थी कि उसे अपने साथी के निर्णय को मानना पड़ा|

जैसे जैसे दिन बीता, सुआइनोआ ने इंसान के साथ रहना सीखा| रोशिंजो  को सुआइनोआ की
सुंदरता और उसका भोलापन अच्छा लगने लगा| उसने सुआइनोआ की परियों सी देखभाल की|
सुआइनोआ को रोशिंजो  से प्यार हो गया|

गर्मी की रातों मे सुआइनोआ अपने पंख फड़फड़ाकर हवा ले आती और सर्दियों में उन्ही पंखों के
बीच रोशिंजो  को सुलाती| उसके लिए रोज़ दुआ करती| रोशिंजो  को जिस किसी चीज़ की ज़रूरत
होती, अपनी जादुई छड़ी घूमाकर ले आती|

एक दिन रोशिंजो  ने सुआइनोआ से कहा की उसे किसी ज़रूरी काम से बाहर जाना है और वो
जल्द ही लौट आएगा| सुआइनोआ ने मायूसी से हामी भरी| रोशिंजो  दूसरे शहर जाकर बस गया|
कभी कभी सुआइनोआ से मिलने आ जाता था| एक बार जब रोशिंजो  वापस जा रहा था,
सुआइनोआ उसके पीछे चल पड़ी| रोशिंजो  को इसका पता चलता, तब तक शहर आ चुका था|
कुछ दिन सुआइनोआ वहाँ रुकी  और फिर रोशिंजो  के पुराने घर पर आ गयी| वहाँ जाकर
रोशिंजो  का घर संभालने लगी| उधर रोशिंजो  को सुआइनोआ की कमी खलने लगी| वह अक्सर
सुआइनोआ सी दिखने वाली लड़कियाँ खरीद लाता|  

एक दिन अचानक सुआइनोआ का साथी लौट आया| उसे परीलोक जाने का रास्ता मिल चुका था|
सुआइनोआ वापस नही जाना चाहती थी| सो उसने जादू की छड़ी घुमाई और रोशिंजो  के पास जा
पहुँची| रोशिंजो  की ज़िंदगी में सुआइनोआ सी दिखनेवाली कई लड़कियाँ आ चुकी थीं| उसने
सुआइनोआ से कहा कि उसे अपने साथी के साथ परिलोक जाना चाहिए|  यह सुनकर सुआइनोआ
को दुख हुआ और वो अपने साथी के साथ परिलोक जा पहुँची| वापस जाने से पहले सुआइनोआ ने
अपनी जादुई छड़ी घुमाई और रोशिंजो  की छवि को अपने दिल में क़ैद कर लिया|
अब सुआइनोआ का मन परिलोक में नही लगता| वह रोशिंजो  को याद करती| हर पूर्णिमा की रात
वो चाँद के उजालों के साथ धरती पर आती और रोशिंजो  को देखती| उन लड़कियों को भी देखती,
जो रोशिंजो  के लिए केवल विनोद का साधन थीं| फिर भी उसे रोशिंजो  से मिलकर अच्छा लगता
था|

अपनी मेहनत और सुआइनोआ की दुआओं से रोशिंजो अमीर इंसान बन चुका था| साधारण सी
दिखने वाली एक असाधारण लड़की से शादी भी की| पिछ्ले पूर्णिमा को जब सुआइनोआ आई; तो रोशिंजो  की पत्नी, शुमेजुमी से भी मिली| उसे उपहार में अपनी जादू की छड़ी दे आई|

कल भी पूर्णिमा की रात थी| सुआइनोआ रोशिंजो  से मिलने धरती पर आ पहुँची| रोशिंजो  ने घर
का दरवाजा बंद कर लिया था| खिड़कियों पर पर्दे लग चुके थे| किसी पर्दे की आड़ से रोशिंजो 
सुआइनोआ को रोते हुए वापस जाते देख रहा था|

सुआइनोआ परिलोक लौट आई है| अब वो रोशिंजो  को भूलना चाहती है; पर भूलना तो इंसान की
फ़ितरत है!!! वह जादुई छड़ी, जिसे घूमाकर रोशिंजो  की छवि दिल में क़ैद की थी और दिल के
दरवाजे पर ताला कसा था, वो तो रोशिंजो  की पत्नी को भेंट कर आई थी|

रोशिंजो  सुआइनोआ से नही मिलना चाहता| शायद यह भी नही चाहता कि सुआइनोआ उसे कभी
देखे| तभी तो घर का पता बदल लिया है|उसे शायद मालूम नही कि उसकी छवि सुआइनोआ की
दिल में क़ैद है| उसे देखने के लिए सुआइनोआ को किसी चीज़ की ज़रूरत नही; वो अपनी आँखे
बंद करेगी और दिल में क़ैद रोशिंजो  की छवि देख लेगी|

इतने दिनों तक इंसानो के साथ रहकर भी सुआइनोआ इंसानी फ़ितरत नही अपना पाई| रोशिंजो 
के लिए अब भी दुआएँ मांगती है| रोशिंजो  अक्सर सकुचाते हुए पर्दे की आड़ से आसमान की
तरफ देख लेता है|

अब गर्मियों मे सुआइनोआ आँखे बंदकर अपने पंख फड़फड़ाती है और सर्दियों में पंख समेटकर
आँखें बंद कर लेती है|

----------सुलोचना वर्मा---------------