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Monday, August 15, 2016

संयोग

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हम उठा लाए ईंटें ढह चुके रिश्ते के मकान से 
हमने बनाया सपनों का एक नया आशियाना  
और ढह गया यह भी फकत चंद ही महीनों में 
हमें रहा दरारों पर घर बनाने का शौक पुराना 

समंदर जितना ही नमक था मेरी आँखों के पानी में 
पर शांत रहा समंदर कि हवा निभा रहा था उसका साथ 
मैं तरसती रही पाने को साथ तुम्हारा, तुम हवा हो गए 
तुमने देखा मेरा समंदर और किया किनारा छुड़ाकर हाथ 

लिखा था किताबों में नुस्खा सात बार गिरकर आठ बार उठने का 
पर कहाँ लिखा था कि कैसे उठा जाता है नजरों से गिरने के बाद 
न जाने कैसा था यह संयोग कि मैं हर बार चली धारा के विपरीत 
कि वो मरी हुई मछलियाँ थीं जो बह रहीं थी जल की धारा के साथ

-----सुलोचना वर्मा------

Wednesday, June 18, 2014

नमक

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हो आई मैं तुम्हारे सपनों की चहारदीवारी से
और टांग आई रूह की कमीज़
उस घर की दीवार पर लगे खूंटे में
कमरे में पसरे मौन ने बढाई
तुम्हारे शब्दों से मेरी घनिष्ठता
जिस वक़्त तुम उकेर रहे थे
मेरा तैलचित्र अपने ख़्वाबों के आसमान पर

टपक पड़ी थी एक बूँद पसीने की
मेरे माथे से तुम्हारी जुबान पर
सुनो, जब भर जाए तुम्हारे ख़्वाबों का कैनवास
उतार लेना मेरी रूह की कमीज़ खूंटे से
और ओढा देना मेरी आकृति को
निभाते रहना वचन ताउम्र साथ देने का
कि तुमने खाया है नमक मेरी देह का |


सुलोचना वर्मा