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Thursday, August 14, 2014

उन दिनों

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नहीं उगे थे मेरे दूध के दांत उन दिनों
फिर भी समझ लेती थी माँ मेरी हर एक मूक कविता
जिसे सुनाती थी मैं लयबद्ध होकर हर बार
जैसे पढ़ा जाता है सफ़ेद पन्ने पर ढूध से लिखी इबारत को
ममता की आंच में स्पष्ट हो उठता था मेरा एक-एक शब्द


माँ ने अपनी कविता में मुझको कहा चाँद
और उस चाँद से की मेरी नज़र उतारने की गुज़ारिश


चाँद ने बदले में लिख डाली कविता
अपनी रौशनी से मुझ पर


उन दिनों चाँद पर एक औरत
दोनों पाँव पसारे
रेशमी धागों से गेंदरा सिला करती थी 
जिसके किनारों पर लगे होते थे
मेरी माँ की साड़ी के ज़री वाले पार


----सुलोचना वर्मा-----

Friday, December 6, 2013

निशि आभा

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मैं निशि की चंचल
सरिता का प्रवाह
मेरे अघोड़ तप की माया
यदि प्रतीत होती है
किसी रुदाली को शशि की आभा
तो स्वीकार है मुझे ये संपर्क
जाओ पथिक, मार्ग प्रशस्त तुम्हारा
और तजकर राग विहाग
राग खमाज तुम गाओ
मैं मार्गदर्शक तुम्हारी
तुम्हारे जीवन
की भोर होने तक


----------सुलोचना वर्मा-------------

Tuesday, May 28, 2013

आज उसे अभिमान हुआ है


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आज उसे अभिमान हुआ है
अमलतास की आड़ से वो मुझको देख रहा है
वो कल भी आया था मुझसे मिलने
घर की खिड़की बंद पड़ी थी, सो वो रूठ गया है
आज उसे अभिमान हुआ है
 
अमावश्या की रात जब, वो नदारत रहता है
छुपके मेरे पास आकर, मुझसे कहता है
तुम मेरे बचपन की साथी, पूर्णिमा यूँ ही इतराती
तंग गलिओं से वो, फिर वापस जाता है
पर आज उसे अभिमान हुआ है
 
संग मेरे जगकर, बाँट लेता था वह तन्हाई का ग़म
जब दुनिया रहती स्वप्नमय, और शबनम की आँखे नम
उसकी रौशनी में नहाकर, रात भी हो उठती अनुपम
अँधेरा होकर भी नहीं होता, मिट जाता हर सघन तम
पर आज उसे अभिमान हुआ है
 
घर के चौखट पर खड़ी हूँ, उससे मिलने को अड़ी हूँ
नही बताया फिर भी उसने, कब वो आ रहा है
मुझे यकीं है वो आएगा, बिहू मेरे संग गाएगा
यूँ भी प्रेमियों का मिलना, कब आसान हुआ है
बस आज उसे अभिमान हुआ है
 
सुलोचना वर्मा