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Thursday, June 16, 2016

अच्छे दिन

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इस देश के आकाश में लगा है ऐसा चंद्रग्रहण 
कि ग्रास हुई जाती हैं हमारी तमाम आकांक्षायें 
ऐसे में हमारे राजनेता बन बैठे हैं राजज्योतिष 
और दे रहे हैं हमें तसल्ली अच्छे दिनों की ऐसे 
कि जैसे ग्रह बदलते हों दिशा उनकी ही इच्छा से 

उनके दामन पर लगी हैं छींटे मंगल ग्रह के रंगत जैसी  
जबकि वह दिखना चाहते हैं बृहस्पति ग्रह जैसा सुन्दर 
उनकी जुबान पर भले ही दिखता हो प्रभाव कर्क राशि का 
वो बताते हैं खुद को सहनशील तुला राशि के समान 
और लग जाता है देश की कुण्डली में कालसर्प योग 

हाय! कैसे हो निवारण देश की कुण्डली में लगे इस दोष का 
कि जानते हैं हमारे राजनेता, हाँ वही जो बन बैठे हैं राजज्योतिष 
कि देश की अधिकतर जनता आज भी करती है विश्वास 
अपने कर्मों से कहीं अधिक भाग्य और भाग्यविधाता पर 
और वो बेच रहें हैं भ्रम का ताबीज़ भरकर तसल्लियों का मोम 

राजनेता, हाँ वही, जो बन बैठे हैं राजज्योतिष 
अब देश के भाग्यविधाता बन जाना चाहते हैं 
हमारे कर्मों के मुँह पर मचाता है शोर चेचक का दाग 
और हम हैं कि टीवी के सामने एकाग्रता से बैठकर 
फेयर एंड लवली का विज्ञापन देख रहे होते हैं!

विज्ञापन के बीज मन्त्र से आहुति ले रहे हैं देश के भाग्यविधाता 
और जनता है संतुष्ट कि अब जल्द ही आयेंगे अच्छे दिन !!!

--सुलोचना वर्मा----

Saturday, March 19, 2016

भारत माता की जय

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सख्त परहेज है उन्हें क्रांति की तमाम बातों से 
जबकि वो कर सकते हैं बातें घंटों देशभक्ति की 
जहाँ प्रतिरोध को रखते हैं वो देशद्रोह की श्रेणी में 
वो कर सकते हैं उग्र प्रदर्शन अपनी शक्ति की 

उनकी समझ से है परे तर्क और विज्ञान की भाषा 
कि अंधविश्वासी होना है उनका जन्मसिद्ध अधिकार 
आपत्ति नहीं उन्हें सामाजिक छुआछूत और घृणा से 
बस आप नहीं कर सकते हैं तो अपनी मर्जी से प्यार 

उनकी बातों में है घृणा का मवाद, कुंठा की लय 
कर सकते हैं वो निर्वस्त्र स्त्रियों को भी बीच सड़क में 
और चिल्ला सकते हैं खड़े होकर निर्लज्ज और निर्भय
"भारत माता की जय"! "भारत माता की जय"!

रो देती है भारत माता देखकर अपनी ऐसी दुर्दशा 
जहाँ मानवता की सुनहरी फसल का हो रहा हो क्षय 
चिल्ला रहे हैं उसके बच्चे  कर एक-दूसरे की हत्या 
 "भारत माता की जय"! "भारत माता की जय"!

-----सुलोचना वर्मा-----------

Sunday, March 1, 2015

भूख

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मैंने देखा है उन्हें भूख से कुलबुलाते हुए
जब पार होती है उनके सहने की सीमा
वो चबाने लगते हैं संविधान के ही पन्ने
या शहीदों पर चढ़ी माला के फूलों को 
जिससे थोड़ा और पंगु हो उठता है देश
और थोड़ा भारी हमारे मुल्क की पताका
जो फहर तो जाती है ऊँचे आसमान में
विश्व के मानचित्र पर गर्व से नहीं लहराती


अब यह कोई आम भूख तो है नहीं
जो लगे अलसुबह के नाश्ते से लेकर
रात के खाने तक के सफर के ही बीच
यह एक ऐसी भूख है जो कभी नहीं मिटती
इसीलिए जब कभी नहीं भरता उनका पेट
मिठाई, रोटियों, फलों या सब्जियों से
जानने को अपनी इस भूख का आयाम
वो किसानों की जमीन ही खा जाते हैं


-----सुलोचना वर्मा----------

Wednesday, January 14, 2015

अखबार

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क्या पढ़ते हो अखबार तुम भी 
जिसमे होता है ज़िक्र मुद्दों का
जो उगलती हैं आग की लपटें
क्या तुम तक पहुँचती है ताप
सुन पाते हो क्या शब्दों को तुम


क्या तुम भी देखते हो सपने 
सामान्य मनुष्यों की ही तरह
तो क्या देखा कभी ऐसा ख्व़ाब
जिसमे तुमने जलायी हो मशाल
अमावश्या की किसी रात में


हम पढ़ रहे हैं ज़िक्र अखबारों में 
रैलियों का,व्यवसायिक जलसों का
जिनकी अगुआई करते हो तुम 
पर नहीं पढ़ पाते तुम्हारी प्रतिक्रिया
किसी भी सामाजिक सरोकार पर


क्या झुकी थी तुम्हारी भी आँखे
जब निर्वस्त्र की गयी आदिवासी लड़की
क्या कहा तुमने सांत्वना सन्देश में
जो नहीं छाप पाया कोई भी अखबार
या नहीं पढ़ पाए वे तुम्हारा मौन


आखिर कुछ तो बड़बड़ाया ही होगा तुमने
जब नहीं मिल पायी श्मशान में दो गज़ जमीन
दलित लड़की को अपनी ही अंत्येष्टि में यहाँ
अच्छा यह बताओ कैसा था स्वाद उस दही का
जो खाया तुमने किसी पर्व पर एक दलित के घर


तनिक बताओ कि क्या रही तुम्हारी प्रतिक्रिया 
जब आहत हुए मछुआरे तट रक्षकों के हाथों
और देश की सेना कर आई नष्ट कोई पुलिस चौकी
जैसे खो जाते हैं मसले बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच
क्यूँ क्षीण हो जाती है इन मसलों पर आवाज़ तुम्हारी


बताओ न, क्या पढ़ते हो अखबार तुम भी

------सुलोचना वर्मा------------

Wednesday, January 7, 2015

स्वतंत्रता

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जलायी है मशाल किसी हरिया ने आज़ादी की
जहाँ आग की लपटें गाती हैं गीत मुक्ति का
मुक्ति दर्द और भूख से,अभाव और निराशा से
नुकसान से और लाभ से,नस्ल और क्रोध  से
विफलता और सफलता से,वर्तमान और अतीत से
संघर्ष और युद्ध से, लालच से और वासना से
अज्ञानता से और किसी अनभिज्ञ परिस्थिति से
नफरत से और ईर्ष्या से, गरीबी और बीमारी से
गलत और अपराध से,अन्धकार और अहंकार से


गाती है गीत कोई राफ़िया बानो स्वतंत्रता का
जिसमे लयबद्ध शब्द छेड़ते हैं तान आज़ादी की 
आज़ादी भ्रम और बंधन से मुक्ति की 
जीवन का आनंद लेने की और खुश रहने की
ज्ञान प्राप्त करने की और विकसित होने की
सोच पाने की और घटनाओं का संज्ञान लेने की 
खतना नहीं करवाने की और गर्भ धारण करने की
स्वयं के निर्णय के आधार पर कार्य कर पाने की
स्वतंत्रता चुनने की और अस्वीकार कर पाने की


जो हम किसी प्रकार के भेद से परे होते केवल मनुष्य
तो फिर दरकार होती हमें बस ऐसी स्वतंत्रता की
जो हमें वो ही बने रहने दे जो हम असल में हैं
फिर हमारे पास होती स्वतंत्रता स्वाभिकता की
जीने की और मरने की, हँसने की और रोने की 
बात करने और सुनने की, प्यार करने और शांति की
संक्षिप्त में कहें तो अपने ढंग से जीवन जी लेने की


हाँ, हम सब  हैं ग़ुलाम कि नहीं रह सके स्वाभाविक
जबकि हम हैं वासी  लोकतंत्रात्मक स्वतंत्र देश के 
और है कहने को हमारा भी अपना एक संविधान
जो देता है हमें स्वतंत्रता विचारों की अभिव्यक्ति की
जो करता है बातें राष्ट्र की एकता और अखण्डता की
व्यक्ति की गरिमा की और प्रतिष्ठा की समता की
फिर हो जाता है परतंत्र अपने ही अनुच्छेदों में
और करता है लम्बा इंतज़ार उसमे संशोधन का
कायम रहती है ऐसे सम्प्रुभता हमारे गणराज्य की 


----सुलोचना वर्मा---------

Friday, May 2, 2014

एक नदी

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मेरे और तुम्हारे देश के बीच
बहती है एक नदी
जो तय करती है हम दोनों की
अपनी- अपनी पहचान
जिसे मैं गंगा कहती हूँ और तुम पद्मा
नदी, जो एक है
बँटकर भी नहीं बदल पाती है अपना स्वाद
और झेलती रहती है असंख्य पीड़ा
उसकी असंतुष्टि भर देती है उसमे अवसाद का उन्माद
बहा ले जाती है दूर दूर तक अपने दोनों किनारों को
निज के विभाजन का उत्तरदायी जान
करती है चित्कार, जो गूँजता है शुन्य में
जिसे नहीं सुन पाते किसी भी एक देश के बासिन्दे
फिर हमारी निर्ममता पर होकर विवश
समेट लेती है अपने दोनों किनारों को
और ढूँढने लगती है अपने आस्तित्व का अर्थ |

नदी का आत्ममंथन, कहीं मंद ना कर दे उसकी धार
और उसके निज के होने के अभिप्राय का अनुसंधान
कहीं ना कर दे उसे किसी अनजान पथ पर विचलित
आखिर वो नदी है; और उसे पालन करते रहना है 
निर्दिष्ट दिशा में अविरल चलते रहने का क्रम......

जब बाँटा गया नदी को
तो तय कर दी गयी उसकी भाषा
हमारी सीमा-रेखा में वो करेगी छल-छल
और तुम्हारे देश में कल-कल बहेगी
हमारी सोच कितनी भी संकीर्ण हो
नदी का विशाल ह्रदय है
लम्बी कर देती है हर उस वस्तु की छाया
जो उसमे जाकर गिरती है !
बता देती है हर एक को उसकी औकात
या यूँ कहें कि व्यक्त करती है
अपने उदार व्यक्तित्व को नए प्रकाश में |

नदी की बात छोड़ो, हम अपनी बात करते हैं
चलो अपने सपनो को हम आज पंख देते हैं
और प्रेम को देते हैं एक नया आयाम
सुनो, मैं इस पार से झांकती हूँ अपने गंगा में
तुम उस पार अपने पद्मा में झाँको
और नदी, जो है हम दोनों की अपनी
कर देगी विस्तृत हमारी छाया
और नदी के लगभग बीचोबीच
हमारे मिलन का साक्षी होगा अनंत आकाश !!!!

सुलोचना वर्मा

Saturday, March 22, 2014

सुनो भगत

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सुनो भगत, तुम्हे कर रही हूँ संबोधित  
अपने ह्रदय पर एक अपराध बोध लिए
लज्जा आती होगी तुम्हे हमारी कृतघ्नता  पर
और पछतावा अपनी शहादत के लिए


काँप रहे हैं लोग बदलाव के विचारों से
और कर रहे हैं अब तमंचे पे डिस्को 
वही तमंचा, जिसे तुमने उठाया था
क्रान्ति और आज़ादी के लिए  


कर रहे लोग व्याख्या, क्रांति का शब्दों में
हैं अपने अपने फायदे, है अपना अपना अर्थ
ले रहे हैं प्राण अपने ही देशवासियों का
हिंसा और साम्प्रदायिकता के लिए


लगाते हैं तुम्हारे पोस्टर करने को दिखावा
केवल और केवल एक प्रतीक स्वरुप मान
भरकर क्रान्ति का नए स्वर में हुंकार
करते हैं  इस्तेमाल तुम्हे राजनीति के लिए


खड़े हैं दो अलग अलग ध्रुवों पर - वो और तुम
क्रमशः कुमकुम और रक्त लिए अपने अपने माथे पर
तुम अमर हो आज भी देश के हर इन्क़लाब  में
और वो, मौन हैं अपनी धृष्टता के लिए 


विस्मृत हुआ तुम्हारी क्रांति का अंतिम पड़ाव 
तुम्हारे ही जान से प्यारे इस हिन्दुस्तान  को
ऐसे में क्या तुम आ सकोगे फिर एक बार
अपनी क्रांति की पुनरावृति के लिए


सुलोचना वर्मा