Showing posts with label पुष्प. Show all posts
Showing posts with label पुष्प. Show all posts

Thursday, February 27, 2014

सूरज

------------
सूरजमुखी के ख्वाहिशों का सूरज
जा बसा है दूर पश्चिम की ओर
और उसकी सुनहरी धूप सहला रही है
पीले टेशुओं वाले अमलताश को
किरणों ने बना लिया है पीले फूलों का गजरा
और खोंस लिया है अपने बालों में
इधर सिर झुकाए खड़ी है सूरजमुखी
कर रही है अवलोकन अपनी इच्छाओं का
बेहद करीब से देख लिया है
इस पुरे घटनाक्रम को
दूर से झांकते दहकते पलाश ने
और हो रहा है लज्जित अपने समलैंगिग रिश्ते पर
उधर निखर रहा है अमलताश
नए रिश्ते की गुनगुनी धुप पाकर
कल जब अलसाई सी धुप
उतर आएगी सूरजमुखी के आँगन
तो नहीं लगेगा कोई अभियोग सूरज पर
धुप में एकबार फिर नहाएगी सूरजमुखी
नहीं तौलेगी सूरज की मंशा प्रेम के तराजू पर
मुस्कुराकर कह देगी सम्बन्ध में अनुबंध नहीं होते

(c)सुलोचना वर्मा

Monday, February 3, 2014

क्षितिज के चंद्रहार

क्यूँ देखते हो तुम
अपनी अभिलाषा के रक्तिम पुष्प को
जो रुला जाती हैं तुम्हे
और दिवा-स्वप्न ही रह जाती है
दिव्य मुस्कान अधरो पर

 
जिन्हे तुम मोती कहते हो
वो अनार के दाने हैं
टूटकर बिखर जाएँगे
जब यौवन का सूरज ढलेगा
अनुभवों के पहाड़ों पर


वो काँपते अधरो की सिसकियाँ नही
पत्तियो की सरसराहट है
क्यूँ कोसते हो पतझड़ को
गाते हुए प्रेम वीथि में
आरज़ू के बहारों पर


जब इला सजकर दुल्हन सी
चली प्रीत की नगरिया
क्यूँ दिखलाते हो राग
तब विस्मृत कर अनुराग
डोली के कहाँरों पर


कभी की तारों की वृष्टि
कभी बरसाई शीतल चाँदनी
ना कुम्हलाओ ऐ अनुरागी
कब वसुधा हुई समर्पित
क्षितिज के चंद्रहारों पर

सुलोचना वर्मा