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Wednesday, June 26, 2019

जल


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जल से तरंग के अन्तर्ध्यान होते ही
क्षय होने लगती है आयु जीवों की
हृदय नहीं, वह जल का है कलकल संगीत
जो धड़कता है बायीं ओर वक्ष के
बिना जल के जलती है पृथ्वी
जब जल से पृथक होता है तरंग
और मनुष्य धरा के संगीत से
हुआ करता था धरा पर बहता हुआ
पृथ्वी का सुगम संगीत कभी
लगभग बेसुरी हो चुकी पृथ्वी पर जल
बोतलबंद व्यवसाय है इन दिनों

Wednesday, July 18, 2018

एक छटाक सुख के लिए

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हुगली किनारे टहलते हुए नदी से मैंने पूछा 
पवित्र नदी क्या तुम मुझे दे सकती हो एक छटाक सुख ?
नदी ने कहा यदि घूम सको मेरी लहरों का जनपद 
और पढ़ सको उन लहरों पर लिखा जल काव्य 
तो शायद महसूस कर सको एक किस्म का सुख !

फिर वहीं उड़ते राम चिरैया से मैंने पूछा 
प्रिय पक्षी क्या तुम दे सकते हो मुझे एक छटाक सुख ?
राम चिरैया ने गाते हुए कहा कि बता सको अगर 
कौन सा राग गा रहा हूँ इस वक्त मैं 
तो शायद महसूस कर सको एक किस्म का सुख !

अंततः पास छवि आँकते एक चित्रकार से  मैंने पूछा 
हे चित्रकार ! क्या तुम दे सकते हो मुझे एक छटाक सुख ?
उसने मुझे थोड़ी देर देखा और फिर कहा 
तुम्हारे अधरों के हर कोण पर है अग्नि स्रोत  
अगर मुझे छूने दो अपने अधर पल्लव 
बाहर से निस्तेज होकर जल उठोगी अंदर से 
तो शायद महसूस कर सको एक किस्म का सुख !

अपने दुखों से हो भयाक्रांत मैं भटकती रही ताउम्र 
बस एक छटाक सुख के लिए 
जबकि मेरे आसपास ही था मौज़ूद किस्म-किस्म का अदृश्य सुख !

Sunday, February 26, 2017

पर्वतारोहण

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एक दिन बना लूँगी मैं अपना ठिकाना
किसी हरे-भरे पहाड़ पर  
ढूँढते हुए आस्ताना 

फिर एक दिन तपस्या में लीन आदिम पुरुष सा पहाड़  
माँगेगा मुझसे आश्रय, बन प्रणय भिक्षुक 
और प्रतिदान में चाहूँगी मैं अभयदान 
तब हमारे प्रणय अभ्यास का फल 
लेगी जन्म हमारी नैसर्गिग संतान, बन वितस्ता सी कोई नदी 

उस दिन करते हुए हमारा अनुसरण 
अपने अमरत्व के लिए 
बहुत-बहुत लोग करेंगे पर्वतारोहण 

तपस्या कर रहा है पहाड़ अनंतकाल से कि आएगा माहेन्द्र-क्षण
दे रही है आहुति कालिंदी, इक्षुला, तमसा जैसी नदियाँ इस अनुष्ठान में 
मंत्रोच्चार कर रहे है हिलाकर पत्तों को सनोबर और देवदार के वृक्ष  
मैं ढूँढ रही हूँ सूत्र पहाड़ को पिघलाने का !

दुविधा में है भगीरथ का समयपुरुष !!

Thursday, February 16, 2017

नदी की आत्मकथा

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जब लौट आयी मैं कोलकाता के बाबुघाट से 
तो देखा नदी ने लिख दी थी अपनी आत्मकथा 
मेरे दुपट्टे के किनारों पर अपने जल से 

पढ़ रही हूँ आत्मकथा नदी की इन दिनों 
तो उतर रही है एक नदी मेरे भीतर भी 
नींद की नौका अक्सर ले जाती है मुझे हुगली पार 

लौटने से महज कुछ घंटों पहले भी गयी थी घाट पर 
जब फिसलकर गिरी थी सीढ़ियों पर घाट के 
मेरी आँखों से छलका जल जा मिला था नदी में 
और चखा था नदी ने मेरे दुखों का स्वाद 

अब कुछ बूँद बनकर बह रही हूँ मैं भी नदी के साथ 
साझा है यात्रा में हमारा परस्पर अन्तर्जलीय दुःख 
नदी महज नदी नहीं, एक प्रान्त है, हर लहर उसका जनपद 

निकल जाना चाहती थी बैठ डिंघी में किसी रात निरूद्देश 
जैसे बहता रहता है नदी पर केले के पत्ते पर रखा नैवैद्य 
कौशिकी अमावश्या की अगली सुबह काली पूजा के बाद 

किया है नालिश अपनी आत्मकथा में नदी ने धर्म के ठेकेदारों का 
कि उनके व्यर्थ के कर्मकाण्ड का बोझ सहना पड़ता है उसे 
और लिए धरती का कचड़ा वह कूद रही है समंदर में  
कर रही है वह कई सदियों से प्रायोजित आत्महत्या इस प्रकार

किंकर्तव्यविमूढ़ नदी नहीं दे पायी जवाब आज तक 
भूपेन हजारिका के गीत का 'ओ गंगा बहती हो क्यों'
तैरता है गंगा का संगीत हुगली के पानी में 
गंगा का स्थायी है, अंतरा हुगली का 

करती हूँ नदी को याद मैं इतना इन दिनों 
नहीं किया होगा भगीरथ ने भी स्मरण उतना गंगा का 
धरती पर होने के लिए अवतरित 
लम्बी होती है आत्मकथा हमेशा ही किसी मन्त्र की अपेक्षा  

बाबुघाट के सुनहले जल पर खूब दमक रहा था आसमान 
उसी आसमान में विचरता है मेरी स्मृतियों का राम चिरैया 
उस राम चिरैया के होठों के बीच है दबा हुगली का संसार 
उस संसार पर शोध कर रहे हैं इन दिनों देश के वैज्ञानिक 

मेरी स्मृतियों के पाँव सने हैं हुगली की रेत में अब भी 
जबकि मैं बैठी हूँ देश की राजधानी के पास छोटे शहर में 
जहाँ सिटी पार्क में बैठ किसी नीलकंठ को सूना रही हूँ 
नदी की आत्मकथा; नीलकंठ सुनता है, कुछ नहीं कहता  

एक रात नींद की नौका पर सवार मैं फिर उतरी हुगली पार 
नदी के जल को छूकर पूछा "तुम्हें ठीक किस जगह दर्द है'?
नदी ने कहा इशारों में - रेत पर, सुन्दरी के पेड़ों की जड़ के पास 
बची हुई हिलसा मछलियों की छटपटाहट के ठीक मध्य

हुगली के दुःख से मलिन है बांग्लादेश की पद्मा 
पद्मा की हिलसा मछली गाती है हुगली की हिलसा का विरह 

गंगा का कोई मजहब नहीं है 
हिन्दू हो या मुसलमान, मिटाती है प्यास सभी की 
नहा सकता है कोई भी इसके जल में 
और यह बनी रहती है पवित्र 
नहीं लिखा गया कोई मन्त्र इसके शुद्धिकरण के लिए 

लौट ही रही थी मैं कि मेरे पाँव पखारती नदी ने कहा 
"बचा लो मुझे, जो करती हो प्यार, मुझे रहना है जिंदा"
देखा मैंने शहर की गंदगी को नदी में मिलाते नलिका को 
क्या कहती, चुप ही रही और खूब हुई शर्मिंदा 

उसी क्षण पढ़ा था मैंने मोबाईल में अंतर्जाल पर 
जल प्रदुषण पर हुए शोधों के विषय में 
और पाया था कि खेल रहे हैं जल वैज्ञानिक 
पृथ्वी पर कबड्डी का खेल अन्धकार में  

गैर सरकारी संगठन बेच रहे हैं दुःख अलग-अलग मंचो पर 
कि नदी का दुःख ही है उनका प्रिय व्यवसाय 
हम किए जा रहे हैं प्रदुषण से प्रणय 
और किए जा रहे हैं वहन प्रदुषण प्रणय के साथ 

बता रहे हैं सुंदरवन से चलकर कोलकाता तक पहुँचे सुन्दरी के पेड़ 
कि जान्हवी इन दिनों लौटना चाहती है स्वर्ग 
धरती पर जान्हवी जहन्नुम की साक्षी है !

रोती है गंगा आलमगीर मस्जिद के बाहर; अल्लाह नहीं सुनते 
बिलखती है हुगली कालीघाट पर; देवी रहती है मौन

कर तपस्या भगीरथ ने गंगा को बुलाया था धरती पर स्वर्ग से 
धरती के हम मानव मानवियों का श्रम उसे बना न डाले "स्वर्गीय" !!

नींद की नौका, जो ले गयी थी मुझे बाबुघाट पर हुगली किनारे 
छोड़ गयी है मुझे भोर की छोर पर 
अनुसरण करते हुए सूरज की स्वर्ण रेखाओं का 
घेर रखा है एक अपरिचित मौन ने मुझे इन दिनों 
कि नदी ने अपनी आत्मकथा में छोड़ रक्खे हैं कुछ पन्ने रिक्त !

Sunday, September 4, 2016

कोलकाता के बाबूघाट पर

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बिन माझी की एक नाव 
बँधी थी कोलकाता के बाबूघाट पर 
जो कर रही थी शायद किसी की प्रतीक्षा
और ऊंघ रही थी क्लांति से होकर चूर

वह वैशाख की अपराह्न बेला थी जब मैं पहुंची घाट पर
सूरज ने तान रखा था पीला कतान सा गंगा के ऊपर 
ऐसे में एक उमस ही थी जो फैली थी दूर- दूर तक
घाट पर गंगा के जल के अतिरिक्त  
समय की बहुतायत कर रही थी इंगित मुझे और नाव को
परस्पर एक-दुसरे के एकाकीपन की ओर
मैं भीड़ के बीच खड़ी थी अकेली ठीक वैसे 
जैसे पड़ी थी अकेली बिन माझी की नाव 
कोलकाता के बाबूघाट पर 

हवा में तैरते हुए कुछ शब्द कर रहे थे अतिक्रमण मानस पर 
रासमणि, गंगा स्नान, ढीमर जाति, देवी मन्त्र, शूद्र वर्ण और भी कई ...
रह रहकर ध्यान भंग कर रहीं थीं गंगा की शांत लहरें 
जो टकरा रहीं थी पास आती हुई हमारी डिंघी के पाल से उसी तरह 
जैसे मैं टकरा गयी थी अचानक बिसरि हुई स्मृतियों से उस क्षण
कोलकाता के बाबूघाट पर 

घिर आयी अजीब सी उदासी उस नौका से दूर डिंघी से दक्षिण की तरफ बढ़ते हुए 
जैसे पड़ी हो कोई हिचकी, कोई हुक या कोई चीख नाव के ठीक नीचे रेत पर  
जिसे नहीं कर पायी हो शांत बरसों पहले बुझी चिता की आग 
लिपटी है एक उदासी नौका पर रखे पाल से जो चीख-चीख कर सुनाना चाह रही हो कहानी 
सदियों पहले घाट पर हुए दमन और अत्याचार की
जो पाना तो चाहती है मोक्ष अपने अतीत से, पर वर्तमान के जल में घुल नहीं पा रही 
कि शायद आये कोई अपना कभी घाट पर और तर्पण कर जाए  
ऊब-डूब कर रही थी एक गहरी उदासी मेरे अंदर भी 
उनके लिए जो एक जमाने जीवित थे और इन घाटों पर मरे
उनके लिए भी जो नहीं रहेंगे एक दिन इन घाटों और मंदिरों को देखने के लिए बचे 

अजीब था पर मैं कर रही थी यात्रा दो नावों पर वस्तुतः एक ही कालखंड में 
मैं जी रही थी कोई पौराणिक क्षण अपने भीतर उसी तरह
भोगता है मिथक काल का मानुष इतिहास जैसे
बढ़ रही थी मेरी डिंघी अपने गंतव्य की ओर 
जबकि मेरा एक पाँव अब भी था उस नाव पर 
जो बँधी थी कोलकाता के बाबूघाट पर 

गंगा की लहरों को पाल से चोटिल कर रही थी कई अन्य नौकाएं 
जो चल रहीं थीं हमारी डिंघी के समानांतर 
वो सभी नौकाएं ढों रहीं थीं उदासियाँ किस्म-किस्म की 
मानो उदासियों का मेला लगा हो गंगा के घाट पर 
उस प्रहर भी सबसे तेज चल रही थी वह नाव 
जिस पर अपनी स्मृतियों में सवार थी मैं अब भी 
और जो बँधी थी कोलकाता के बाबूघाट पर 

उतर गयी डिंघी से मैं कालीघाट पर ठीक संझा-बाती के समय 
पर फिर भी रही सवार बाबूघाट के उस नाव पर जैसे 
मैं थी उस काठ की नौका पर ठोका गया कोई कील 
जो चीख रहा है मोक्ष, जिसे सुन पाने के लिए चाहिए गंभीरता नदी की 
बाबूघाट से दक्षिणायन होती गंगा लगती है गले सागर के कुछ देर चलकर 
अभी मैं चली ही थी लेकर अपने भीतर मृत्यु का बोध 
जो हुआ मुझे घाट और मंदिर के बीच 
कि गंगा की धारा ऐसे लहराई जैसे कोई सगा लहरा रहा हो हाथ विदाई के क्षण में 
मुझे हुआ बोध जीवन का, 
जो है वर्तमान, गतिशील और इतिहास से परे
मैं बैठ गयी कुछ देर मूंदे आँख घाट किनारे 
पार्श्व में गा रहा है बाऊल मीठा धीरे-धीरे 
"कोन घाटे लागाईबा तोमार नाव, सुजॉन माझी रे"

----सुलोचना वर्मा -----

Friday, June 3, 2016

गंगाजल

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उतर आये हैं इलाहाबाद और दिल्ली की सड़कों पर नौजवान 
 मांगते हुए रोजगार का अधिकार
और वो हैं कि गंगाजल की होम डिलिवरी की बात कर रहे हैं 

बैठे हैं हरिद्वार के किसी कोने में पर्यावरण प्रेमी और समाज सेवी 
 गंगा बचाओ आन्दोलन पर 
और वो हैं कि गंगाजल की होम डिलिवरी की बात कर रहे हैं 

हे नौजवानों, हे पर्यावरण प्रेमियों, हे समाज सेवियों !
यह वक़्त है चौकन्ना रहने का 
दरअसल वो तुम्हारे घर तक पहुंचकर तुम्हारे मनसूबों पर पानी फेर देना चाह रहे हैं  

---सुलोचना वर्मा---------

Tuesday, August 11, 2015

लोहे का पुल

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कुछ समय पहले हमारे गाँव बखरी बाज़ार जाते हुए 
पार करना होता था लोहे का एक पुल डरहा में
ठीक इसके नीचे बहती थी एक टूटे कमर वाली नदी
जो चमक उठती थी तेज धुप में आईने की तरह


पड़ गई हैं अब बहुत दरारें इस जर्जर लोहे के पुल मे
गाँव वालों के साथ सरकारी महकमे के रिश्तों की तरह
और ढह सकता है यह किसी भी क्षण भरभरा कर
इस देश के जननायक के प्रति हमारी आस्था की मानिंद


गाँव वाले यहाँ तक आते तो हैं तेज क़दमों से चलते हुए
पर ठिठक कर हैं रुक जाते कि विपत्ति अचानक ही है आती  
हालाँकि नीचे बहते नदी में इतना भी नहीं बचा है पानी
कि डूब सके कोई एक साल का बच्चा भी इसमें
फिर कौन होना चाहेगा आहत कीचड़ में सन कर
जबकि नहीं छुपी है सरकारी अस्पताल की हालत किसी से
जो कि है इस जगह से कोई चार -पाँच मील दूर


करती हूँ फिर भी यह उम्मीद मैं
कि जाऊं जब अगली बार मैं अपने गाँव 
देखूं कि हो गयी है मरम्मत टूटे पुल की
जो लोहे का होकर भी जर्जर है पड़ा 
दौड़ रहें हो उस पर लोग और मोटर गाड़ी
कि वह महज एक लोहे का पुल ही नहीं
जरिया है सम्पर्क का, दस्तावेज है इतिहास का 
जिसे नहीं बहने देना चाहिए सूख चुकी नदी में भी
कि बचा रहा इतिहास और बचा रहे सम्पर्क
फिर साथ गाँव वालों का बना रहे न रहे !!!


--------सुलोचना वर्मा---------------

Monday, December 1, 2014

बेटियाँ

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हो जाती हैं विदा बेटियाँ मायके से
लेकर संदूक में यादों का जखीरा
जैसे करता है विदा पहाड़ नदी को
और लाती है नदी अपने साथ खनिज


बनाती जैसे डेल्टा नदी समुद्र में मिलने के पूर्व
अनेक शाखाओं में कर स्वयं को ही विभाजित
बाँट लेती हैं बेटियाँ खुद को दो अलग घरों में 
कि ऐसा करना ही होता है उनका तयशुदा धर्म


जहाँ खो देती है नदी अपना मीठा स्वाद
विशाल समंदर के खारे फेनिल जल में
लपेटना होता है अक्सर जुबान पर शहद 
नमकीन पसंद करनेवाली इन बेटियों को


सुनो नदियाँ, तुम नर्मदा सी बन जाओ
कि नहीं बाँटना पड़े खुद को बनाने को डेल्टा
बेटियाँ तुम कहना सीख लो
कि तुम्हे नमकीन है पसंद!!!


----सुलोचना वर्मा ---------

Tuesday, November 18, 2014

अच्छे के लिए

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इक वो रहा जैसे है मौजूद हवा फिजाओं में
इक रही वो जैसे कि बहती है नदी कलकल सी
और पसंद रहा दोनों को करना बातें सब्र तलक  


जो बहती रही बनकर नदी
मोड़ लेना चाहती थी रुख अपना
कि बनी रहे हमसफ़र हवा की
और मुश्किल था जीना बिन हवा के


जो इक रहा हवा सा
न था मयस्सर उसे डूबना पानी में
कि अभी बची थी नदियाँ और भी कई


नदी ने समंदर में कूदकर जान दे दी
उधर गूंज रहा है हवा का गीत फिजाओं में
जो भी होता है ; होता है अच्छे के लिए


-------सुलोचना वर्मा

Tuesday, June 10, 2014

गंगा दशहरा

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जो फेंका तुमने निर्माल्य को नदी में
मछली दे देगी श्राप तड़पकर
और तुम बन जाओगे मछली अगले जनम में
फिर होगा तुम्हारा जन्म किसी नाले में

 
मत डालो अब गंगा में धुप-लोबान
कि वह जल रही है धरती की चिता पर 
सती की मानिंद, एक लम्बे समय से 


क्यूँ कुरेद रहे हो उसका मन तुम बारहों मास
और बना रहे हो झील निकालकर उसमे से रेत
लील लेगी एक दिन तुम्हे भी उसकी बदली हुई चाल 


जाओ, शंखनाद कर रोक लो नदी पर बनता बाँध
कर आओ प्राण प्रतिष्ठा पहाड़ों पर लगाकर कुछ पेड़
फिर सुनाओ मछलियों को जिंदगी का पवित्र मन्त्र
और मना लो गंगा दशहरा इस सही विधि के साथ


-------सुलोचना वर्मा--------

Monday, May 12, 2014

पागल चित्रकार

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मेरे सपनों के कैनवास पर
जल से ही सही
पर उकेरुंगा तुम्हारी तस्वीर
और तुम्हें वृष्टि की सूरत देकर
रंग लेगा मल्हार अपनी तकदीर


पर नहीं चाहूँगा सोख ले तुम्हे मिटटी
तो इस चित्र में तुम्हे बरसना होगा पथरीली सतह पर
बह जाना होगा लेकर रूप सरिता का
नहीं चाहूंगा बंधों तुम कभी तटबंधों में
समर्पण तुमसे नहीं मांगूगा मैं वनिता का


तुम्हें अल्हड़पन देने को बलखा जायेगी मेरी तूलिका
फिर आँखें मूंदकर सुनूँगा तुम्हारा कल कल
ले जाना चाहता हूँ तुम्हे ऊँचे पहाड़ों तक
जहाँ निहारूंगा तुम्हे झरना बनते देख
अपने रोमानी जीवन के समस्त बहारों तक


साथ निभाऊंगा तुम्हारा मैं, दूर दूर रहकर
और करता रहूँगा प्रवाहित अपनी संवेदनाओं का शिलाखंड
जब जब करेगा नीरस मुझे तुम्हारा मौन
जबकि जानता हूँ यह मेरी भक्ति मात्र होगी
तुम्हारा प्रसाद पानेवाला होता हूँ मैं कौन


करूंगा वेदोच्चारण, गाऊंगा मंगल गान
जब होगा तुम्हारा मिलन अपने सागर के संग
वो बन जाएगा मांझी, थाम लेगा पतवार
और इस घटना के पश्चात सर्वस्व तुम्हारा होगा
बस रह जायेगी नम मेरे घर की दीवार


जानता हूँ जब वृष्टि बन जायेगी नदी,
वो गुजरेगी मेरे पथरीले अंतस से 
मैं हो जाऊँगा उसके जैसा पावन, निर्विकार
प्रेम में नदी को ही जीता रहूँगा कई साल 
आखिर मैं ठहरा एक पागल चित्रकार |


सुलोचना वर्मा

Friday, May 2, 2014

एक नदी

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मेरे और तुम्हारे देश के बीच
बहती है एक नदी
जो तय करती है हम दोनों की
अपनी- अपनी पहचान
जिसे मैं गंगा कहती हूँ और तुम पद्मा
नदी, जो एक है
बँटकर भी नहीं बदल पाती है अपना स्वाद
और झेलती रहती है असंख्य पीड़ा
उसकी असंतुष्टि भर देती है उसमे अवसाद का उन्माद
बहा ले जाती है दूर दूर तक अपने दोनों किनारों को
निज के विभाजन का उत्तरदायी जान
करती है चित्कार, जो गूँजता है शुन्य में
जिसे नहीं सुन पाते किसी भी एक देश के बासिन्दे
फिर हमारी निर्ममता पर होकर विवश
समेट लेती है अपने दोनों किनारों को
और ढूँढने लगती है अपने आस्तित्व का अर्थ |

नदी का आत्ममंथन, कहीं मंद ना कर दे उसकी धार
और उसके निज के होने के अभिप्राय का अनुसंधान
कहीं ना कर दे उसे किसी अनजान पथ पर विचलित
आखिर वो नदी है; और उसे पालन करते रहना है 
निर्दिष्ट दिशा में अविरल चलते रहने का क्रम......

जब बाँटा गया नदी को
तो तय कर दी गयी उसकी भाषा
हमारी सीमा-रेखा में वो करेगी छल-छल
और तुम्हारे देश में कल-कल बहेगी
हमारी सोच कितनी भी संकीर्ण हो
नदी का विशाल ह्रदय है
लम्बी कर देती है हर उस वस्तु की छाया
जो उसमे जाकर गिरती है !
बता देती है हर एक को उसकी औकात
या यूँ कहें कि व्यक्त करती है
अपने उदार व्यक्तित्व को नए प्रकाश में |

नदी की बात छोड़ो, हम अपनी बात करते हैं
चलो अपने सपनो को हम आज पंख देते हैं
और प्रेम को देते हैं एक नया आयाम
सुनो, मैं इस पार से झांकती हूँ अपने गंगा में
तुम उस पार अपने पद्मा में झाँको
और नदी, जो है हम दोनों की अपनी
कर देगी विस्तृत हमारी छाया
और नदी के लगभग बीचोबीच
हमारे मिलन का साक्षी होगा अनंत आकाश !!!!

सुलोचना वर्मा