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Saturday, May 21, 2016

धुआँ

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श्मशान में जलती हुई लाश से उठता धुआँ 
बनकर हाहाकार उठता है आकाश की ओर 
और एक इंसान हो जाता है परिवर्तित शून्य में 
जिससे थोड़ी और बढ़ जाती है आयु ईश्वर की 
थोड़ा और बड़ा हो जाता है व्यास शून्य का 
समय भी इन सभी के साथ हो उठता है कठिन 

इंसान, जो धुआँ बन जाता है; लौटकर नहीं आता 
उसके लौट आने से सुलझ सकता है फेर समय का 
और समय के ठीक हो जाने से विलुप्त हो सकते हैं ईश्वर
इसलिए इंसान, जो धुआँ बन जाता है; लौटकर नहीं आता 

------सुलोचना वर्मा-------

आत्महत्या

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जल रहे थे जंगल, सूख रहीं थीं नदियाँ 
काटे जा रहे थे पहाड़
और इस तरह बीत रही थी सदियाँ 

सहने की सीमा थी, पृथ्वी अवसादग्रस्त हुई 
वह पृथ्वी के अनंत प्रेम में था पागल 
ईश्वर ने आत्महत्या कर ली!

----सुलोचना वर्मा------

Sunday, August 17, 2014

चरवाहा

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मेरे छोटे से घर में है एक बड़ी सी खिड़की
और है दूर-दूर तक फैला हरा-भरा खलियान
उस बड़ी सी खिड़की के सामने


गुजरती है उस बड़े से खलिहान से होकर 
एक बेहद ही संकड़ी सी पगडण्डी
जिस पर से रोज गुजरता है एक चरवाहा
जो गाता है निर्गुण बांसुरी पर
अपने छरहरे बदन पर अंगोछा लिए


नहीं गा पाता है वह अब राग कम्बोज
कि चढ़ गयी भेंट उसकी आराधिका
संकीर्ण सामजिक मापदंडों की
और उसका शाश्वत प्रेम
दर्ज़ होकर रह गया है
उसकी बाँसुरी की धुनों में


जहाँ उसे गाना था राग आशावरी
निराश हो चली हैं उसकी तमाम छोटी आशाएं
याद दिला जाते हैं उसे उसके बड़े शुभचिन्तक
कि वह रहता है उसी इन्द्रप्रस्थ में
जहाँ शासन था कभी कौरवों का
जहाँ अब भी रहते हैं धृतराष्ट्र और दुःशासन
अपने-अपने आधुनिक व अद्यतन रूप में


उसे अब कृष्ण कोई नहीं मानता !

-----सुलोचना वर्मा-----

Friday, June 6, 2014

सच्चाई है माँ

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जब खीझ जाती हूँ किसी पर
तो कहती हूँ "ओह जीसस"
"हे भगवान्" भी कह देती हूँ कभी कभार


जब गर्मी कर देती है पस्त
आवाज़ देती हूँ "अल्लाह" को
और मांगती हूँ पानी जो बरसे बनकर फुहार


पर जब भी गिर पड़ती हूँ खाकर ठोकर
जुबाँ पर होता है जीवन का पहला शब्द
चिल्लाती हूँ "माँ" जब भी होता है अन्धकार


माँ है चट्टानों पर लिखी गई एक दुआ
जिसे पढ़ते हैं सभी धर्मों के लोग
अपनी अपनी भाषा में
ईश्वर अफवाह है; सच्चाई है माँ


सुलोचना वर्मा