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Sunday, June 14, 2020

अवसाद -2

जब होता है अवसाद नदियों को
धार क्षीण होती है पहले
उग आती हैं फिर जलकुंभियाँ
फिर सूख जाती हैं नदियाँ एक दिन

जब होता है अवसाद पेड़ों को
उनसे बिछड़ जाते हैं पत्ते
छूट जाता है हरे रंग से वास्ता
और पेड़ बन जाता है ठूँठ

जब होता है अवसाद जानवरों को
क्षुधा हो जाती है शांत उत्साह की तरह
और शरीर उर्जाविहीन 
वे हो जाते हैं विदा देखते हुए कातर आँखों से

जब होता है अवसाद मनुष्यों को
दिखता है अंधकार दिन के उजाले में
मुक्ति और मृत्यु घुल जाते हैं आपस में
नमक और जल की तरह

बनकर साक्षी कई युगों के अवसाद का भी
पत्थरों को अवसाद नहीं होता
ज़िंदा होना होता है
अवसादग्रस्त होने की पहली शर्त ।

Friday, September 1, 2017

कष्टार्तव

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जकड लेता है जन्म-विषाद अजगर की तरह 
मचाता है हाहाकार भीषण दर्द श्रोणि क्षेत्र में 
किंचित यहीं से शुरू होती है भग्नयात्रा स्त्रियों की 

जिह्वा से कंठ के मार्ग उतरता काढ़ा आर्द्रक का 
देता है आजन्म स्वाद बचे रहने का मृत्यु-उत्सव में 
मन करता है चित्कार - रक्त-स्तम्भक नागकेसर 

कहता है मस्तिष्क बचे रहने की तीव्र इच्छा पर धरकर हाथ 
करना पड़ता है खुद को ध्वंश कई-कई बार गढ़ने के लिए 
फिर क्षुद्र देह्कोष और जीवन के मूल में निहित है रक्तपात 

Saturday, August 19, 2017

कोलेस्ट्रॉल

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हमारे रक्त में है वह मौजूद बन कई जन्मों का पाप 
पाप, जो मिला हमें जन्म लेते ही विरासत में पूर्वजों से 
और बाद में हमारे अपने कर्मफल स्वरूप 
पाप, जो नहीं घुल पाया रक्त में सदियों बाद भी 
अन्य तमाम पापों की तरह 
पाप, जिसने हृदय की कुण्डली में लिखा सर्वनाश  
और कुण्डली मार बैठ गया नाग की तरह धमनियों में 

न चलो, तो भी दुखता रहता है पाँव, पुराने प्रेम की तरह 
जो पैदल चलो, तो फूलने लगती है साँस 
कितने सहस्र वर्ष चलने पर धुलेगा यह पाप ?
बह गए एक-एक कर हमारे तमाम पूर्वज गंगा में 
पर नहीं धुल सका, रहा यह ऐसा पाप  
तो संसार का सार यही हुआ न 
कि बह जाती हैं तमाम इच्छाएँ आशा के साथ 
कि बह जाते हैं प्राणी और रह जाता है पाप !!!

बढ़ता - घटता रहता है रक्तचाप कोसी के जलस्तर की तरह 
खून गाढ़ा होता रहता है, डॉक्टर हो जाते हैं लाचार सरकार की तरह 
तो मान लिया जाय कि ऐसे ही आती रहेगी मृत्यु की भीषण बाढ़ 
और हम पहुँच जाएँगे अपने अंतिम पते पर मिटटी में 
जब भी करना चाहा महसूस सीने में दफ्न साँसों को, पाया स्पर्श शून्य का  
इस स्थिर प्रगाढ़ शून्याकार निःशब्द घेरे में हो बंद जिंदगी है बीतनी 
रह-रहकर ले रहे हैं हम जो लम्बी साँस, उसकी लम्बाई है कितनी ?

जिंदगी निःशब्द शब्दबिंदुओं का अंतराल मात्र है !!!

Sunday, August 13, 2017

थायराइड

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घर के नमक में आयोडीन को आए हुए कोई तेईस साल 
और शरीर से उसकी मात्रा घटे ग्यारह साल हो गए 
फिर जाती रही जमींदारी अपनी ही देह की जमीन की 
कि मांसपेशियाँ छोड़कर चली गयीं अपना पुराना पता 
और लटकती रही साल्वाडोर डाली के तैलचित्र की तरह 
पर तैलचित्र की तरह उन्हें तन की दीवार पर बाँधे रखना हुआ मुश्किल 
कोई समझाए मांसपेशियों को कि इतनी आज़ादी ठीक नहीं 
तो विद्रोही स्वर में गाती हुई अकर्मण्यता कर देती है चढ़ाई आँखों पर 
पारित ही करना पड़ता है तब निंद्रा का शांति प्रस्ताव 
निंद्रा भंग होते ही पड़ती है नजर जब मेज के दर्पण पर 
करती है चित्कार आँखें, कहती हैं चिल्लाकर "अनैतिक है यह"
मन बनकर रह जाता है जैसे जलियांवाला बाग
कि तभी पड़ती है नजर बुद्ध की हँसती हुई प्रतिमा पर 
जिनके शरीर का साम्राज्य है विशाल, थायराइड के मरीज की तरह 
केश ठीक वैसे ही घुँघराले हैं जैसे हो जाते हैं इस व्याधि में 
आँखें तन्द्रामय हैं या ध्यान में लीन, लगती अपनी जैसी ही हैं 
तफात बस इतना है कि मुस्कुरा पा रहे हैं बुद्ध !!

खैरियत बस इतनी है कि स्नायुतंत्र के घर अब भी जलायमान है विद्युत् 
विवेक भटक रहा है मस्तिष्क के गलियारों में और मांसपेशियाँ मुक्तांचल में  !!!

Saturday, March 4, 2017

मधुमेह

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लिखा है एक तम्बू के बाहर
शहर के सबसे मशहूर चौराहे पर 
"बंजारों का हिमालय आयुर्वेदिक दवाखाना"
लोगों की भीड़ खड़ी है जिसके बाहर ऐसे 
मानो लगा हो किसी गाँव में मंगल बाज़ार  

सुनती है बंजारन सब्र से मरीज का मर्ज 
फिर देती है जामुन के बीज और आम के पत्तों का चूर्ण 
बताकर दवा साल के पत्तों से बने दोने में 
बताती है ढूँढा था धरती पर बंजारों ने ही सबसे पहले औषधि 
और बंजारों के पास है हर उस मर्ज की दवा 
जिसे शहर के बड़े अस्पताल कहते हैं लाइलाज़ 

ओह! तो बंजारे ही करेंगे कल्याण समस्त मानव जाति का 
और रोग, जिनकी दवाईयों का नहीं चल सका है पता 
वह तमाम औषधियाँ कर रही हैं प्रतीक्षा बंजारों की ?

बँटता है प्रसाद मिश्री और दूध का 
गाँव की शीतला माता मंदिर के बाहर 
बच्चे ग्रहण करते हैं प्रसाद, माता तृप्त होती है 

मधुमेह वह अनाथ है जिसका नहीं है कोई इष्टदेव 
भटकता रहता है जो देह की एक जमीन से दूसरी ज़मीन तक 
बंजारों की ही तरह, बिना भेदभाव किए किसी प्रकार का 

हाय ! वह रुग्ण स्त्री बंजारे की तम्बू में मिश्री की डली छोड़ आई 
उसे  पुकारता है बरगद के नीचे का शीतला माता का मंदिर 

इसके पहले कि उसकी स्नायु में जमता अवसादों का मेघ 
कर दे भावशून्य उसे , वह खेलना चाहती है लुकाछिपी तोते के साथ 
जिसका ठिकाना है आम का वह पेड़, जिसके फल हैं उसे  बेहद प्रिय 
चुराकर अपने ही जीवन से वह रख लेना चाहती है एक प्रेम भरा अपराह्न 
जब चख सके अपना प्रिय फल, तोता चखकर बतायेगा जिसकी मिठास  

ओह ! वह बंजारन के आंचल में सिक्कों जैसे बताशे छोड़ आई 
चीटियाँ भूलने लगीं हैं उसके घर का रास्ता इन दिनों 
और उसकी जुबान की स्मृतियों में फँसा है चाशनी का तार 

कोई कस रहा है तंज, रहने दीजिये, ये बंजारे करेंगे ठीक आपका मधुमेह !!
जो खुद भटकते हैं दर ब दर और जिन्होंने नहीं भरा कभी गृह ऋण की क़िस्त
वो क्या ख़ाक समझेंगे आपका दुःख, कैसे करेंगे आपकी दुःखों का इलाज़ !!

आह ! वह बंजारन की नन्ही बेटी के हाथों में लेमनचूस छोड़ आई 
पर उसके घर में अब भी बचे हैं कुछ शेष उसकी अपनी बेटी के लिए 

कहती है उसकी बेटी, माँ, खाने हैं शक्कर पारे 
रखकर नमक पारे उसकी नन्ही हथेलियों पर 
सुनाती है कहानी राजकुमारी और नमक की 
बदले में मिलती है उसे बेटी की मीठी मुस्कान 

उफ्फ ! वह मंगल बाज़ार में शक्कर छोड़ आई 
फक्कड़ इन्सुलिन गाता है गीत मचलकर 
"मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया"

वह शहर के उस चौराहे पर गुड़ की डली छोड़ आई 
कुतर रही अब बैठ बीते दिनों की मीठी यादों का गजक 

वह गुजर रही है नीम के जंगल से इन दिनों 
नीम अँधेरा है जहां दिन और रात 
नहीं उगता जहाँ केसरभोग सा सूरज 

वह चौराहे से घर तक, हर कदम पर, कुछ रवा चीनी छोड़ आई 
ज़िद्दी स्वाद ने पकड़ रखा है जुबान की मधुर स्मृति का आँचल 
और वह आँचल की ओट से देख रही है मीठे भविष्य का आना

Monday, November 16, 2015

अवसाद

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लिपटा है हर अप्रकाशित अनुभूति से
अन्धकार की तरह काला कोई दुःख
रख देती हूँ मैं तह करके दुखों को
अपने ही शरीर के हर जोड़ पर
जम जाती है हड्डियों में कैल्शियम की तरह,
और इस प्रकार संभाल लेती है पीड़ा मुझे


मेरे सपने टटोलते हैं अंधकार मे आलोक
पर नहीं पकड़ पाते हैं एक भी कतरा
सुख का फ़ानूस जल-जलकर बुझ जाता है
दुःख है कि टिका रहता है ध्रुव तारा की तरह
अपने निर्धारित स्थान पर- स्पष्ट और धवल
दुःख आसमान है-रंग नीला और सीमाहीन


भले बंजर हो चुकी हो मेरे आँखों की जमीन
और अभिघात बन चुका दिखता हो जीवन
मैं गाउंगी गीत बहारों के, भुलाकर अवसाद
कि कर पाये उम्मीद निराशा पर वज्र संघात
रखा है मौत का सामान जहाँ हर कदम पर
वहाँ ज़िंदा रहना ही है मेरा एकमात्र प्रतिवाद

Thursday, June 4, 2015

मस्कुलर डिस्ट्राफी

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उसके नसों में बह रही है रिक्तता लहू की तरह
जो उसकी आँखों में है ठहरा, वह सूनापन है
शिथिलता जमी है मांसपेशियों में बर्फ की तरह
उसके अन्दर चरमराता हड्डियों का कम्पन है


उसकी साँसों में है दुर्गन्ध निराशा की
दिल की जगह जो धड़क रहा वो भय है
 जिंदा रहना उसका है एक बड़ी चुनौती
जो उसके रोमकूपों में है बसा, वो प्रलय है


उसकी साँसे तो चल रहीं हैं, पर वह जिंदा नहीं है
उसे इच्छा-मृत्यु देने में लोगों की सम्मति नहीं है
मुझे वह हम्पी के चट्टान से बने रथ की तरह लगती है
जिसमे पहिये तो लगे हैं, पर गति नहीं है|


-------सुलोचना वर्मा -----------