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Wednesday, January 17, 2018

कर्तव्य

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अगर डाक विभाग अब भी बंद नहीं हुआ, तो  शायद उन पिछड़े गाँवों की वज़ह से जहाँ आज भी कोरियर सर्विस उपलब्ध नहीं है| 

मधुरा की तबियत ठीक नहीं चल रही थी| डायबिटिक न्यूरोपैथी आपको अंदर ही अंदर इतना हिलाती-डोलाती रहती है कि अगर आपके पाँव के नीचे की धरती डोल भी जाए, तो भी आपको कुछ पता नहीं चलता| आप समाज के साथ मिलकर हिलने-डोलने के सुख से वंचित रह जाते हैं|

पोस्टमैन ने फोन करके कहा "आपका पार्सल आया है| गाड़ी भिजवाइये या आकर ले जाइए"| 

मधुरा ने  पूछा "ये नियम कब लागू हुआ कि जिसका पार्सल है वो गाड़ी भिजवाएगा या आकर ले जाएगा"| 

पोस्टमैन: "मदद माँग रहा हूँ"| 

मधुरा : "मैं बीमार हूँ और घर पर कोई नहीं है| मेरी मदद कीजिये"| 

पोस्टमैन: "ठीक है फिर"

मधुरा : "तो अब आप कब आएँगे"

पोस्टमैन: "देखेंगे| दो-तीन दिनों में जब फुर्सत होगी| हमारे पास बहुत काम है" 

ऐसा कहकर पोस्टमैन ने फोन रख दिया| कुछ दिनों तक पार्सल रखकर गाड़ी भिजवाने या खुद आकर ले जाने का आग्रह करता रहा | मधुरा के कई बार यह बताने पर कि वह बीमार है और नहीं आ सकती, एक ही वाक्य दोहराता रहा कि वह व्यस्त है और जब समय होगा, पार्सल दे जाएगा इसी बीच मधुरा ने ट्विटर पर केंद्रीय दूरसंचार मंत्री, इंडिया पोस्ट और प्रधानमंत्री कार्यालय को संबोधित करते हुए कई ट्वीट किया जिसका कोई नतीजा नहीं निकला| 

कई दिन बीत जाने के बाद एक संध्या जब मधुरा ने इंडिया पोस्ट की ट्रैकिंग साईट पर चेक किया, तो स्टेटस देखकर हैरान थी| लिखा था "डिलीवरी अट्टेम्पटेड, डोर क्लोज्ड" जबकि वह घर पर ही थी| मधुरा ने डाक बाबू को फोन कर पूछा कि स्टेटस में ऐसा क्यूँ लिखा है| उन्होंने इतना कहकर फोन रख दिया "मेरी तबियत खराब थी, इसलिए नहीं आया| अब कुछ तो स्टेटस डालना पड़ता, इसलिए ये डाल दिया"|  

मधुरा के गुस्से का ठिकाना न रहा और इसबार उसने फिर से फोन मिलाकर कहा "जानकर दुःख हुआ कि आपकी तबियत खराब है| कल तक ठीक हों जाएँ, तो मेरा मेरा पार्सल अवश्य डिलीवर कर दें वरना गणतंत्र दिवस  के दिन हमारी अब तक की बातचीत की रिकार्डिंग मैं मेरे प्यारे देशवासियों को सुनाउंगी और उनसे आग्रह करूँगी कि आपकी तीमारदारी करे| आखिर एक सरकारी कर्मचारी की अस्वस्थता का सवाल है जिसकी सैलरी हमारे टैक्स के पैसों  से आती है|" 

इतना सुनते ही घबराकर उन्होंने कहा "मुझे मेरा कर्तव्य समझाने के लिए धन्यवाद" और फोन रख दिया|  

अंततः गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर डाक बाबू को उनका मूल कर्तव्य समझ में आ गया और मधुरा को उसका पार्सल मिल गया |