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Friday, March 7, 2014

हरा रंग

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(१)


आ गया है फागुन
और साथ ले आया है मंज़र
तुम्हारे साथ मेरी आखिरी होली का
यह लाल नहीं, हरा रंग है
इतनी आसानी से नहीं उतरेगा
यह कहकर जो तुमने मला था चेहरे पर
अपनी उँगलियों के पोरों से 
और मैं विह्वल हो उठी थी अंतस तक


(२)

हर बार ले आती हूँ वही हरा रंग
महसूस करती हूँ उन्हें छूकर
उँगलियों के पोरों से
वो बतियाने लगते हैं
मचल जाते हैं बच्चों सा
और जब भरते हैं किल्लोल
मन श्याम श्याम होता है
मैं मीरा बन जाती हूँ


(३)

वो श्याम की होली थी
मीरा करती भी तो क्या
प्रेम में राधा बन गयी
ओढ़कर बसंती चुनरिया
प्रीत के रंग में रंग गयी
और मैं .....
तुम्हारे प्रेम में अब तक लाल हूँ
और वह हरा रंग उसे ज़िंदा रखता है


(c)सुलोचना वर्मा

 

Wednesday, March 5, 2014

दोहे- फागुन के

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संग फागुनी रंग लें, होली का त्यौहार|
बहती बासंती चपल, सुरभित मंद बयार||

 
नव कोंपल धारण करे, ज्यों तरु जीर्ण उतार|
तज कुभाव तू भी मनुज, भर मन उच्च विचार||


देता फागुन मास है, सबको यह संदेश|
पर हित सोचें भूलकर, सकल राग अरु द्वेष||


आमों वाली डालियां, बौराती सुन फाग|
गेहूं सरसों झूमतें, मद लहरित बन बाग||


वासंती धरणी हुई, फसल पकी खलिहान|
महकी अमिया भ्रमर दल, गाते गुनगुन गान||


टेसू तरुवर पे लदें, लग लग कर बहु अंग|
निखर संवर देखों चढ़ा, चटख फागुनी रंग||


अनुरागी अंतस लिए, भर पिचकारी रंग|
खेलत बनवारी हुलस, होली राधा संग||


मंदिर लो बरसा बहुल, ठाकुर जी पर रंग|
स्वयं लाल मीरा हुई, जगत् देखकर दंग||


है सुलोचना फाग यह, मधुर प्रेम का राग|
प्रीत राधिका की कभी, मीरा का वैराग||


(c)सुलोचना वर्मा