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बेहद ज़रूरी था मेरा चुप रहना इक रोज
कि छुपे रहते मेरे सपने और मेरी भावनायें
मुझे ढूँढ लेना था कोई बहाना चुप्पी की खातिर
जैसे कि मैं देख सकती थी आसमान में चाँद
और घंटों निहार सकती थी उसे मौन रहकर
मुझे नहीं खनकने देना था मन के मंजीरे को
उसे दुहराने देना था कहरवा की पंचम मात्रा
कि नहीं समझ पाते हैं लोग मन की बातें
जैसे नहीं लग पाता है बबूल पर आम का फल
दिलों की जमीन की उर्वरकता समान नहीं होती
रच लेना था मुझे विचारों का एक समुद्र मन में
जहाँ मैं कर सकती थी गोताखोरी मौन रहकर
और तैरता हुआ आ पहुँचता वहाँ सारा संसार
जैसे पी जाता है आसमान नदी को चुपके से
और वाष्प से घन बनने की प्रक्रिया मूक होती है
डाल सकती थी मैं मुँह में पान की एक गिलोरी
और करती रह सकती थी जुगाली चुप रहकर
पर नहीं सूझी कोई भी ऐसी तरकीब चुप्पी की
खाली मन भर भी ले खुद को उदासियों से तो
खाली मुँह खाने के विकल्प में शब्द माँगता है
--------सुलोचना वर्मा-----------
बेहद ज़रूरी था मेरा चुप रहना इक रोज
कि छुपे रहते मेरे सपने और मेरी भावनायें
मुझे ढूँढ लेना था कोई बहाना चुप्पी की खातिर
जैसे कि मैं देख सकती थी आसमान में चाँद
और घंटों निहार सकती थी उसे मौन रहकर
मुझे नहीं खनकने देना था मन के मंजीरे को
उसे दुहराने देना था कहरवा की पंचम मात्रा
कि नहीं समझ पाते हैं लोग मन की बातें
जैसे नहीं लग पाता है बबूल पर आम का फल
दिलों की जमीन की उर्वरकता समान नहीं होती
रच लेना था मुझे विचारों का एक समुद्र मन में
जहाँ मैं कर सकती थी गोताखोरी मौन रहकर
और तैरता हुआ आ पहुँचता वहाँ सारा संसार
जैसे पी जाता है आसमान नदी को चुपके से
और वाष्प से घन बनने की प्रक्रिया मूक होती है
डाल सकती थी मैं मुँह में पान की एक गिलोरी
और करती रह सकती थी जुगाली चुप रहकर
पर नहीं सूझी कोई भी ऐसी तरकीब चुप्पी की
खाली मन भर भी ले खुद को उदासियों से तो
खाली मुँह खाने के विकल्प में शब्द माँगता है
--------सुलोचना वर्मा-----------