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Friday, August 21, 2020

तुम्हारे साथ

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तुम्हारे साथ स्वर्ग नहीं जाऊँगी प्रिय  

मुझे पुकारती है नीलगिरी की पहाड़ियाँ

दिन रात आमंत्रित करती है बंगाल की खाड़ी

पुकारता है महाबलीपुरम का मायावी बाज़ार

नंदमबाक्क्म के आम के बागान में दावत उड़ाते पंछी

पुकारता है संयोग, पुकारता है अभियोग

कि लौटने की समस्त तिथियाँ मिट गई हैं पञ्चांग से

पुकारता है प्रेम, पुकारता है ऋण

पुकारता है असमंजस, पुकारता है रुका हुआ समय


जहाँ पुकार रही हैं मुझे असंख्य कविताएँ

मैं हो विमुख उनसे चल पडूँ तुम्हारे साथ!

नहीं कर सकती ऐसा अधर्म, ऐसा पाप!


प्रिय, तुम निकल पड़ो किसी यात्रा पर 

लिखो अपने पसंद की कविताएँ होकर दुविधामुक्त

देखना मैं मिलूंगी तुम्हें उन कविताओं में अक्षरशः

मैं नष्ट स्त्री हूँ, मुझे स्वर्ग की नहीं तनिक भी चाह !


Thursday, December 20, 2018

नर्क

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कहो सहेला, आओगे मेरी अंतिम यात्रा में ?
यह तो बताओ सहेला कि चिता की अग्नि 
पहले जलाएगी मेरी पाँच गजी या मेरे बालों को 
जिनमें उँगलियाँ उलझाने की बात करते थे तुम 
और यह कार्य इतना कठिन था कि छोटा पड़ गया 
दिन, महीना, साल, पञ्चांग का कोई भी शुभ मुहूर्त 

चिता की आग मुझे कितना जला सकेगी सहेला ?
उतना, जितना तुम्हारे विषाद में जला है यह मन ?
या उतना, जितना जल जाने पर खत्म हो जाती है अनुभूति ?

जानते हो सहेला, हो चुकी अभ्यस्त तुम्हारे दिए गए नर्क में रहने की ऐसी 
कि किसी प्रकार के स्वर्ग की कल्पना मात्र से ही हो उठती हूँ असहज 
सविनय अवज्ञा कर दूँगी यदि यम देवता ने सुनाया स्वर्ग भेजने का फैसला 
धरना दूँगी उस नर्क के द्वार पर और वहाँ से इस नर्क को करूँगी प्रणिपात !

यह बताओ सहेला, क्या उस नर्क में भी यातना देने वाले को प्रेमी ही कहते हैं? 

Thursday, July 26, 2018

अगर तुम होते

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यदि तुम संगीत होते
तो रागों में होते खमाज
प्रेम ढूँढ लेता हमें रोज़
रात्रि के द्वितीय प्रहर में

यदि तुम मौसम होते
ऋतुओं में होते बसंत
माघ-सा होते महीनों में
जहाँ प्रेम करता कल्पवास

यदि तुम वृक्ष होते
तो होते आम का पेड़
जिस पर प्रेम डालता झूला
और सावन गाता कजरी

यदि तुम रंग होते
अवश्य ही होते आसमानी
प्रेम के माथे पर
एक आकाश-सा तन जाते

और भी बहुत कुछ
हो सकते थे मेरे तुम
अगर तुम होते
सचमुच होते |

Monday, September 18, 2017

तसलीमा नसरीन की कविता

बांग्ला से अनुवाद : सुलोचना

१. प्रेम
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॥ प्रेम ॥ यदि मुझे काजल लगाना पड़े तुम्हारे लिए, बालों और चेहरे पर लगाना पड़े रंग , तन पर छिड़कनी पड़े सुगंध, सबसे सुंदर साड़ी यदि पहननी पड़े, सिर्फ़ तुम देखोगे इसलिए माला चूड़ी पहनकर सजना पड़े, यदि पेट के निचले हिस्से के मेद, यदि गले या आँखों के किनारे की झुर्रियों को क़ायदे से छुपाना पड़े, तो तुम्हारे साथ है और कुछ, प्रेम नहीं है मेरा। प्रेम है अगर तो जो कुछ है बेतरतीब मेरा या कुछ कमी, या कुछ भूल ही, रहे असुंदर, सामने खड़ी हो जाऊँगी, तुम प्यार करोगे। किसने कहा कि प्रेम ख़ूब सहज है, चाहने मात्र से हो जाता है! इतने जो पुरुष देखती हूँ चारों ओर, कहाँ, प्रेमी तो नहीं देख पाती!!
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२. व्यस्तता
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मैंने तुम्हारा विश्वास किया था, जो कुछ भी था मेरा सब दिया था,
जो कुछ भी अर्जन-उपार्जन !
अब देखो ना भिखारी की तरह कैसे बैठी रहती हूँ!
कोई पीछे मुड़कर नहीं देखता।
तुम्हारे पास देखने का समय क्यों होगा! कितने तरह के काम हैं तुम्हारे पास!
आजकल तो व्यस्तता भी बढ़ गई है बहुत।
उस दिन मैंने देखा वह प्यार  
न जाने किसे देने में बहुत व्यस्त थे तुम,
जो तुम्हें मैंने दिया था।

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३. आँख 
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सिर्फ़ चुंबन चुंबन चुंबन
इतना चूमना क्यों चाहते हो?
क्या प्रेम में पड़ते ही चूमना होता है!
बिना चुंबन के प्रेम नहीं होता?
शरीर स्पर्श किये बिना प्रेम नहीं होता?

सामने बैठो,
चुपचाप बैठते हैं चलो,
बिना कुछ भी कहे चलो,
बेआवाज़ चलो,
सिर्फ़ आँखों की ओर देखकर चलो,
देखो प्रेम होता है कि नहीं!
आँखें जितना बोल सकती हैं, मुँह क्या उसका तनिक भी बोल सकता है!
आँखें जितना प्रेम समझती हैं, उतना क्या शरीर का अन्य कोई भी अंग समझता है!


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१. প্রেম
---তসলিমা নাসরিন
যদি আমাকে কাজল পড়তে হয় তোমার জন্য ,
চুলে মুখে রং মাখতে হয়,
সবচেয়ে ভালো শাড়িটা যদি পড়তে হয়,
গায়ে সুগন্ধী ছিটোতে হয়,
যদি তলপেটের মেদ,
শুধু তুমি দেখবে বলে মালাটা চুড়িটা পড়ে সাজতে হয়,
তবে তোমার সঙ্গে অন্য কিছু, প্রেম নয় আমার।
যদি গলার বা চোখের কিনারের ভাঁজ কায়দা করে লুকোতে হয়, প্রেম হলে আমার যা কিছু এলোমেলো, যা কিছু খুঁত,যা কিছুই ভুলভাল অসুন্দর থাক, সামনে দাঁড়াবো, তুমি ভালবাসবে।


কে বলেছে প্রেম খুব সহজ, চাইলেই হয়!
এত যে পুরুষ চারিদিকে, কই, প্রেমিক তো দেখি না!

২. ব্যস্ততা তোমাকে বিশ্বাস করেছিলাম, যা কিছু নিজের ছিল দিয়েছিলাম, যা কিছুই অর্জন-উপার্জন ! এখন দেখ না ভিখিরির মতো কেমন বসে থাকি ! কেউ ফিরে তাকায় না। তোমার কেন সময় হবে তাকাবার ! কত রকম কাজ তোমার ! আজকাল তো ব্যস্ততাও বেড়েছে খুব। সেদিন দেখলাম সেই ভালবাসাগুলো কাকে যেন দিতে খুব ব্যস্ত তুমি, যেগুলো তোমাকে আমি দিয়েছিলাম। ৩. চোখ খালি চুমু চুমু চুমু এত চুমু খেতে চাও কেন? প্রেমে পড়লেই বুঝি চুমু খেতে হয়! চুমু না খেয়ে প্রেম হয় না? শরীর স্পর্শ না করে প্রেম হয় না? মুখোমুখি বসো, চুপচাপ বসে থাকি চলো, কোনও কথা না বলে চলো, কোনও শব্দ না করে চলো, শুধু চোখের দিকে তাকিয়ে চলো, দেখ প্রেম হয় কি না! চোখ যত কথা বলতে পারে, মুখ বুঝি তার সামান্যও পারে! চোখ যত প্রেম জানে, তত বুঝি শরীরের অন্য কোনও অঙ্গ জানে!

Saturday, April 8, 2017

कष्ट

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सुनो नताशा, 
न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

धो डालो यथाशीघ्र अपनी उँगलियों के पोरों पर जमे नक्षत्र-विषाद
नहीं तो जान लो नताशा, आएगा कोई राक्षस भिक्षुक के वेश में 
तुम्हारे कष्टों को तो नहीं ही हरेगा, तुम्हें छल जाएगा 
पौराणिक महाकाव्यों में उल्लेख है ऐसी कहानियों का

ठहरो नताशा, मत उगलो अग्निवर्षा करते शब्दबीज 
जिससे जल जाए तुम्हारे घर का दक्षिण दुआर 
जो संयोगवश प्रवेश द्वार भी है तुम्हारे घर का 
संभलो कि यह तमाशबीन समय है 
जानती तो हो न नताशा,  घर छोड़कर वन को निकली स्त्रियाँ 
भैरवी ही बनती हैं, बुद्ध नहीं बनती कदापि 

याद करो नताशा कि तुम्हारी माँ ने कहा था प्रेम नहीं करना 
कर सीता से यशोधरा तक का उल्लेख, कहा था
अत्यंत सुंदर स्त्रियों के भाग्य में प्रेम नहीं होता  
माँ के मुख से निकली बात किसी मंत्रोच्चार से कम तो नहीं होती नताशा
फिर कौन सा मुँह लेकर कहोगी कि वो जो रिश्ता था, अब रिसता है|

देखो नताशा, तुम्हारी खंडित स्मृतियों की परिक्रमा करता है शब्दयान 
और तुम्हें घेरे बैठी हैं कई दुर्लभ कवितायेँ 
तो करो प्रतिज्ञा कि नहीं पढ़ोगी प्रेम की आयूहीन कविता आजन्म 
हृदयहीन समाज की धिक्कारसभा में 

सुनो नताशा, 
यदि अपने दुखों के रंगों में रंग नील-बसना ही बनना है 
तो आसमान बन जाओ, करो अपने व्यक्तित्व का विस्तार अपरिमित 
किसी की छत बन जाओ, सजा लो कष्टों को बना सूरज, चाँद और तारे 
करो वृष्टि स्नेह की, जब दिल भर आये 

चलो, उठो नताशा, बहुत दूर जाना है 
और देखो आसमान की ओर सर उठाकर, कहीं कोई करुणाधारा नहीं है 
पर याद रहे नताशा,  न करना उल्लेख प्रेम या स्वाधीनता का कभी
कि मानवता की पृष्ठभूमि पर फूटता है कष्ट का झरना इन्हीं दो पर्वतों से 

सुनो नताशा, 
न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

Sunday, February 12, 2017

साथ चलना

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चल पड़ी थी मैं किसी गोधूलि बेला में तुम्हारे साथ 
कर प्रतिवेश के विधिनिषेध की देहरी को पार 
कि तुम्हारे साथ चलना था किसी सृष्टिसुख में होना 

ठीक जैसे हमारा परस्पर दुःख नहीं छोड़ता हमें अकेला 
जो चलते हम कुछ और कदम साथ
तो शायद नियति रचती कुछ और ही खेला 

नियति दुविधा में थी हमारी ग्रहण-योग्यता को लेकर 
या तुम भांप चुके थे गति का विधान 
प्रणय अभ्यास में तुम समय के साथ रहे  

चल रही हूँ इन दिनों मैं अकेली आस्तित्व के साथ 
बेकल करता है स्मृतियों का निःशब्द तुषारापात 
जीवन बीत रहा है जैसे निष्प्रदीप एक रात 

मालूम तो नहीं मुझे ठीक जा रही हूँ किस ओर 
क्यूँ करूँ चिंता मैं गंतव्य के दूरियों की अब 
जब चलती ही जा रही हूँ अहर्निश स्व-विभोर

Wednesday, February 8, 2017

शिल्प

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खड़ा रहता है पहाड़ सर उठाये 
कि धरती सह लेती है उसके हिस्से का दर्द 
उसे उठाये हुए निरंतर अपनी गोद में 

भय नहीं जानता पहाड़ 
कि भय स्वभाव है टूटने का 
टूटकर बिखर जाने का पत्थरों में 

पहाड़ अगर पहाड़ है
तो पत्थर से ही गढ़े जाते हैं शिल्प 
शिल्प अगर शिल्प  है 
तो सारा संसार है उसका ठिकाना 

तो प्रेम ?

पहले पहाड़ था प्रेम, 
फिर तो पत्थर भी नहीं रहा 
अब शिल्प बन बिकता है बाजार में !

और प्रेम?

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1.
मैं नदी हो जाना चाहती थी 
कि मुझे तुम समुद्र दिखते थे 
घुलकर तुम्हारे जल में होना चाहती थी एक 

और प्रेम?

था बहती हुई नदी के मानिंद प्रेम 
जो प्रेम में पड़ बहना गया भूल 
प्रेम को घेरे बना रहा ताल चंद रोज़  
बचा प्रेम की समाधि पर रेत ही मूल 
अब चुभता है आँखों में, उड़ता है जब धूल !

2.
मैं तुम्हारी जमीन हो जाना चाहती थी  
जहाँ तुम बोते बीज अपनी पसंद के 
और मैं हरी हो जाती, लहलहाती 

और प्रेम?

प्रेम की धरती हमेशा उर्वराशील थी 
तुमने खेती की उपेक्षा के नील की 

3.
मैं हो जाना चाहती थी रात 
जहाँ तुम बन जुगनू टिमटिमाते 
मेरी सुन्दरता में लगाते चार चाँद 

और प्रेम?

प्रेम की हुई रात, चाँदनी छायी 
बस यही बात जुगनू को न भायी 

4.
मैं चाहती थी कि तुम बन पाते मेरा अंतिम निवास 
जहाँ मैं कर पाती विश्राम हो निश्चिंत सांझ ढले  
और तुम जुटा पाते मेरे लिए शांति का बतास 

और प्रेम?

प्रेम बतास था, उड़ गया 
मेरा अंतिम निवास उजड़ गया 

तुम्हारे बाद (क्षणिकाएँ)

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1.
बाद तुम्हारे स्मृतियाँ 
रहती हैं तो रहे 
मार्च महीना और पपीहा 
पिहू पिहू कहे 

2.
देकर दर्द बेइन्तेहाँ  
तोड़ा बेआवाज 
सुर ही कैसे सधे जब
टूटा दिल का साज 

3.
नैनों से रूठे नैना 
न ही मिलन, न ही चैना 

4.
मैं बदली, गुजरी थी तलैया ऊपर
थे अक्स तुम, मैंने पानी समझा था 
मैं बरसी नेह की मेह लेकर, सब गड्डमड्ड   
तुम कविता थे, मैंने कहानी समझा था 

5. 
दिन गुजर रहा कुछ ऐसे
जैसे पेड़ से टूटा पत्ता 
जो बीता साथ, वही जीवन था 
बच गयी हैं साँसें अलबत्ता 

Sunday, January 15, 2017

प्रिय

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प्रिय, क्या तुम गा सकते हो कोई गीत मेरे लिए आज?
अभिधान से झड़े शब्दों को लेकर लिखा गया सम्मोहन गीत नहीं
तुम्हारी वाम अस्थियों की मज्जा में उपजता हुआ एक स्नेहिल गीत 
किसी शीतार्त संध्या माथे पर बोसा जड़ते होठों की उष्णता का गीत 
अच्छा यह तो बताओ, क्या तुम्हें गाना आता है प्रिय?

किसी रोज़ लक्षद्वीप घुमाने ले चलोगे प्रिय?
सुना है कि यह बना ज्वालामुखीय विस्फोट से निकले लावा से
उस शाम मैं देखूँगी तुम्हारे अन्तस के उद्गार से निकलता लावा फैलता मेरी आँखों में
और घोल आऊँगी अपनी आँखों का लवण अरब सागर के नीले जल में 
क्या तुम्हें तैरना आता है प्रिय?

जानते हो प्रिय, तुम्हारा होना है किसी प्रारब्ध सा मेरे लिए 
तुम्हारे नहीं होने की आशंका से मैं लौट जाना चाहती हूँ सिंधु घाटी सभ्यता में 
और पूछना चाहती हूँ मोहन जोदड़ो की कांस्य मूर्ति से तुम्हारा पता 
ठहर के देखना चाहती हूँ तुम्हारे मिल जाने पर उसी की मुद्रा में, फिर खो जाना चाहती हूँ उसी की तरह 
तुम्हें दिशाओं का बोध तो होगा न प्रिय?

देख लेना प्रिय, एकदिन तुम करोगे मुझे प्रतिष्ठित ह्रदय में लिए अपार श्रद्धा  
कि जान जाओगे माया से घिरे इस संसार में मैं बनी रही तुम्हारी छाया 
करना स्नान स्नेह के जल में, ओढ़ लेना प्रेम, ध्यान को करना अर्पित नयन कमल
कर देना विसर्जित निज को उस रोज प्रेम के पावन सिन्धु में, अनुष्ठान पूरा कर लेना  
प्रेम और पूजा की विधि अलग तो नहीं होती न प्रिय?

प्रिय, क्या तुम जानते हो मुझे सबसे अधिक तुम हो प्रिय?



Thursday, January 5, 2017

तुम देखना

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जो करना प्रेम मुझसे सच में, तो मत कहना
कि तुम्हें चलना है समंदर किनारे मेरे साथ 
किसी रोज़ आना , पकड़ लेना मेरा हाथ कसकर 
और ले चलना फिर मुझे समंदर किनारे चुपचाप 
तुम देखना, उस रोज़ मैं नदी बन उतरूँगी तुम्हारे अंदर 
तुम्हें अपना समंदर बना लूँगी

जो करना प्रेम मुझसे सच में, तो मत कहना मुझसे कभी 
कि तुम्हें देखना है तारों भरा आकाश मेरे साथ किसी रात 
जो दिखे किसी रात आकाश में टिमटिमाते तारे और दिन से ज्यादा 
ले आना मुझे खुले आसमान के नीचे बिना कुछ बताये 
तुम देखना, मैं बसा लूँगी तुम्हें अपनी आँखों के आसमान में
तुम्हें नयनतारा कहकर पुकारूँगी

जो करना प्रेम मुझसे सच में, तो नहीं बनाना बहाने मुझसे नहीं मिलने के 
कि झूठ नहीं रह पाता है झूठ अधिक दिनों तक प्रेम के उजाले में
बता देना वह कारण चाहे वह सुनने में कितना ही बुरा लगे 
मैं करूँगी कोशिश कि समझ सकूँ तुम्हें तुम्हारी जगह से 
तुम देखना, अदृश्य हो जाऊँगी, नजर नहीं आऊँगी, तुम ओढ़ लेना 
मैं दिशा बन जाऊँगी

जो करना प्रेम मुझसे सच में, तो मत कहना कुछ; सिर्फ जताना 
मत बुनना झूठे सुन्दर शब्दों का मकरंदी मायाजाल 
कि माया की काया नहीं ठहर पाती है वक़्त के जलजले में 
तुम ईमानदार रहना रिश्ते में, बस प्रेम ही करना 
तुम देखना मैं रहूंगी हमेशा तुम्हारे ही आसपास 
मैं तुम्हारी छाया बन जाउंगी 

Tuesday, December 27, 2016

चाहतें

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​माँग ली मैंने तुमसे तुम्हारी सबसे उदास शामें
और मेघ ढंके आकाश वाली तमाम काली रातें
बदले में मैंने चाहा तुमसे केवल तुम्हारा सावन 

बाँट लिया मैंने तुमसे अपना खिला हुआ वसंत 
और संजोकर रखे बहार के अपने सपने अनंत 
आस रही कि तुम रंग दोगे मन का घर-आँगन

तुमने हरा किया मेरे पुराने जख्मों को सावन में 
वसंत और बहार अब उतरता ही नहीं आँगन में 
एकांत की नीरवता से लीपा मन के घर का प्रांगण

तुम्हारी निष्ठुरता ने जगाया मुझमें अलख ज्ञान का 
होकर बुद्ध एकाकीपन के बोधिवृक्ष तले गई जान 
कि प्रेम में जिसे चाहते हैं, उससे कुछ नहीँ चाहते

प्रेम में चाहनाओं का तर्पण ही मुक्त हो जाना है !!

Friday, December 9, 2016

आवाज

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तुम्हारी आवाज सुने जब बीत जाते हैं कई - कई दिन 
आँगन के पेड़ पर बैठ रूपक ताल में अहर्निश पुकारते 
कपोत की आवाज ही मुझे लगती है तुम्हारी आवाज 

तुम्हारी आवाज जैसे पतझड़ में झड़े पत्तों की विकलता 
तुम्हारा मौन जैसे झड़कर गिर जाने के बाद मोक्ष की शांति 
द्रुत विलंबित और अतिविलम्बित लय की चंद रागिनियाँ 

तुम्हारी आवाज सुने फिर बीत गए हैं कई दिन 
इसी बीच कई बार हुई बारिश और मैने सोचा 
तुम्हें खूब भाता यदि सुन पाते गीत टपकते बूंदों का 
कटहल के पेड़ से, कमरे की टीन की छत पर 
फिर सोचा कैसा लगता यदि तुम गाते काफी थाट में
कुमार गंधर्व की तरह मियां मल्हार "बोले रे पपीहरा"

नहीं, मैं नहीं पकड़ पा रही तुम्हारी ध्वनि का कम्पन 
ठीक-ठाक किसी भी शय में
जबकि वह हो रहा है संचारित मेरी स्मृतियों में, आभास में 

यदि मैं होती संगीत विशारद या संगीत अलंकार
बाँध देती तुम्हारी आवाज 
किसी ताल में, किसी राग में, किसी लय में

अभ्यास कर सिद्ध कर लेती !!

Sunday, December 4, 2016

ओलोंग चाय

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चाय की पत्तियों की मानिंद महकती तुम्हारी यादें 
हैं प्रेम की पगडंडी पर उगी मेरी हरित चाहनाएँ 
अक्सर घुल जाता है मेरा चीनी सा अभिमान जिसमें 
और मैं बीनती रह जाती हूँ बीते हुए खूबसूरत लम्हें 

मानो घोषपुकुर बाईपास से दार्जिलिंग तक का सफर 
दौड़ता है स्मृतियों का घोड़ा चुस्की दर चुस्की कुछ ऐसे 
सिर्फ "ओलोंग" सुन लेने से बढ़ जाता है जायका चाय का 
मैं संज्ञा से सर्वनाम बन जाना चाहती हूँ अक्सर ठीक वैसे 

जिंदगी होती है महँगी मकाईबाड़ी के ओलोंग चाय की ही तरह 
काश यहाँ भी मिलती कुछ प्रतिशत छूट देते हैं जैसे बागान वाले 
शायद चढ़ चुका है हमारे मन के यंत्र पर चाय के टेनिन का रंग 
वरना सुन ही लेते पास से आ रही सदा हम निष्ठुर अभिमान वाले 

चाय की खुशबू

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पतीले से भाप बन उठती चाय की खुशबू 
खोल देती है यादों का खजांचीखाना
चाय में हौले - हौले घुलती मिठास 
दे देती है इक आस अनायास 
कि आओगे तुम एकदम अचानक 
बिन मौसम की बारिश की तरह 
और नहीं होगा जाया मेरा तनिक ऊंचाई से 
चाय छानने का संगीतमय लयबद्ध अभ्यास 

चाय की पहली चुस्की देती है जीभ को जुम्बिश मगर 
तुम्हारी अफ़्सुर्दगी का कसैलापन चाय पर तारी रहता है 
हर चुस्की पर हम देते तो हैं खूब तसल्ली दिल को अपने 
पर कमबख्त ये दिल है कि फिर भी भारी-भारी रहता है|

वक्त-2

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हम जी सकते थे जिंदगी  
देखते हुए एक-दूसरे की आँखों में 
पर देखा हमने परस्पर को 
जमानेवालों की नजरों से 
अपनी आँखें होते हुए भी 

बड़ा ही बेदर्द और जालिम निकला वक़्त 
वक्त न दिया कमबख्त ने, हमे लील गया 


Thursday, November 24, 2016

गंधस्मृति

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अप्रैल महीने की तेज धुप और रह-रहकर छू जाती ठण्डी बयार झरना में आलस भर रही थी| शाम के साढ़े चार बज रहे होंगे| बालकनी में बैठी वह तय कर चुकी थी कि अब सीधे उठकर कमरे में जायेगी और सो जायेगी| अभी वह कमरे में पहुँची ही थी कि बगल की मेज पर रखे नियुक्ति पत्र ने उसे याद दिलाया कि दो दिनों के बाद उसे अपने नये दफ्तर जाना है| छह महीनों की लम्बी अवधि के बाद वह फिर घर की दहलीज से बाहर कदम रखेगी; इसलिए वह अच्छे से तैयार होकर दफ्तर जाना चाहती थी| पर पिछले छह महीनों में उसने घर पर रहते हुए गाउन और बाहर जीन्स टीशर्ट ही पहना था| छह महीने पहले अचानक उसकी तबियत बिगड़ने लगी और डॉक्टर ने कैंसर होने का शक जताते हुए कई प्रकार के जाँच की सलाह दी थी| कैंसर का नाम सुनते ही उसने नौकरी छोड़ घर में रहने का फैसला लिया था| पर कई प्रकार के रक्त परीक्षण, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और सिटी स्कैन के बाद यह तय हुआ कि उसे कैंसर नहीं बल्कि अंडाशय का सुजन है जिसे दवा खाकर ठीक किया जा सकता है| तीन महीनों में वह ठीक भी हो गयी| अगले कुछ महीनों मे नौकरी की तलाश भी पूरी हो गयी|  

झरना ने सोने का कार्यक्रम स्थगित कर दफ्तर पहनकर जाने के लिए कपड़े का चयन करना उचित समझा और अगले ही पल साड़ियों से भरा सूटकेस खोलकर बैठ गयी | सूटकेस मे सबसे ऊपर बायीं ओर लाल रंग की शिफॉन की साड़ी थी और उसके नीचे बैंगनी रंग की रेशमी साड़ी| उसके नीचे नीले रंग की रेशमी साड़ी और उसके ठीक नीचे  मलमल के कपड़े में लपेटकर रखी हुई मेहरूनी रंग की बनारसी साड़ी थी जिसे पहनकर उसने अम्लान के साथ सात फेरे लिए थे| दायीं ओर भी लगभग रेशमी साड़ियां ही रखीं थी| झरना समझ गयी थी कि उसे अब दूसरे सूटकेस और आलमारी में झाँकना होगा| पर कुछ सोचते हुए झरना ने सूटकेस से बनारसी साड़ी निकाली थी और उस साड़ी को पास खींचकर सूंघा था| अब भी रजनीगंधा की महक बची थी उस साड़ी में| रजनीगंधा उसका और अम्लान का सबसे पसंदीदा फूल था| अम्लान हर मौके पर और कई बार तो बिना किसी मौके के ही झरना को रजनीगंधा के फूलों का गुलदस्ता देकर अपने प्रेम का इजहार करता था| इसलिए उसने शादी के दिन रजनीगंधा की खुशबु वाला इत्र छिड़का था| यह शादी नहीं, क्रांति थी; परिवार और समाज से लड़कर जातिवाद को धता बताती हुई क्रांति| रजनीगंधा की खुशबू झरना को कई साल पीछे ले गयी|

झरना की जिंदगी में कोई बहुत बड़ा सपना नहीं था| वह छोटी-छोटी खुशियों में जिंदगी ढूँढ लेती थी| अम्लान के साथ सात फेरे लेते हुए उसे लगा था कि जिंदगी अब उसकी मुठ्ठी में कैद हो जायेगी और रजनीगंधा सी महक उठेगी| आत्मनिर्भर थी, इसलिए अम्लान से प्रेम और इज्जत के सिवाय झरना किसी और चीज की उम्मीद भी नहीं रखती थी| पर प्रेम? प्रेम तो परवाह की चाह रखता ही है| सुहागरात के दिन कमरे में झरना के प्रवेश करते ही अम्लान ने अपनी ओर से सफाई दी "जानता हूँ, तुमने उम्मीद की होगी कि सेज रजनीगंधा के फूलों से सजी होगी| पर वो पाँच हजार माँग रहे थे और मुझे लगा हमने अभी तो जिंदगी शुरू की ...अभी न जाने कितनी ज़िम्मेदारियाँ आयेंगी..."

"मैंने तो कोई शिकायत नहीं की तुमसे" कहते हुए झरना ने बीच में ही अम्लान को टोका था| पर यह बात उसे अंदर तक चुभ गयी थी| यह दिन ख़ास था जो फिर कभी नहीं आनेवाला था | अपने घर-परिवार और सामाजिक रस्मों का निर्वाह करते हुए शादी के ज्यादातर खर्चे झरना ने ही उठाये थे| अम्लान से इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती थी? वैवाहिक जीवन के पहले ही दिन रजनीगंधा उसके जीवन से गायब था| झरना व्यावहारिक थी, सो उसने खुद को समझा लिया था| 

हाथों से मेंहदी का रंग छूटने से पहले ही अम्लान ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया था| घर की सभी आर्थिक ज़िम्मेदारी झरना के काँधे पर डाल दी गयी थी| अभिमानी होने के कारण झरना ने कभी इस बात का प्रतिकार भी नहीं किया| फिर अम्लान ने छोटी-छोटी बातों पर झरना पर हाथ उठाने में भी देर नहीं की| झरना खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही थी पर वह हर हाल में चीजों को बेहतर करना चाहती थी| परिवारवालों से लेकर रिश्तेदारों तक और दोस्तों से लेकर परिचितों तक सभी ने झरना को अम्लान से शादी न करने की हिदायत दी थी| झरना ने किसी की बात का परवाह न करते हुए सिर्फ अपने प्रेम के भरोसे खुद को अम्लान को सौंप दिया था| अब उसे खुद को सही साबित करना था हर हाल में| झरना नहीं चाहती थी कि लोगों का प्रेम से विश्वास उठ जाए| 

लड़ते-झगड़ते कई साल बीत गए| दोस्तों और परिवारवालों ने अम्लान को कई बार समझाने की नाकामयाब कोशिशें भी की| इसी बीच झरना ने टिया को जन्म दिया| कहाँ तो झरना सोच रही थी बेटी के जन्म से अम्लान ज़िम्मेदार हो उठेगा, पर हुआ ठीक इसके विपरीत| टिया के जन्म से लेकर उसकी पढाई की ज़िम्मेदारी भी अब झरना के हिस्से आ गयी| अम्लान के व्यवहार में कोई परिवर्तन न हुआ| फिर हालात इतने खराब हुए कि झरना ने अम्लान से दूरियाँ बना लीं| वह तलाक लेकर अलग हो जाना चाहती थी, पर अम्लान बच्ची को वजह बनाकर उसी घर में रह गया| झरना अब मशीन बनकर रह गयी थी; शायद पैसा कमाने की मशीन|

झरना अभी अतीत की ही सैर कर रही थी कि अचानक टिया आ धमकी और आते ही उस साड़ी पर हाथ फेरते हुए कहा "अरे! कितनी सुन्दर साड़ी है! आप यह साड़ी क्यूँ नहीं पहनती?"

"पहना था न अपनी शादी में" कहते हुए झरना ने सहज होने का अभिनय किया और झटपट से वह साड़ी वापस मलमल में लपेटकर सूटकेस में रख सूटकेस बंद कर दिया| फिर वह टिया के साथ बैठकर उसके होमवर्क करवाने लगी| 




2

झरना अँधेरे कमरे में आँखें खोल सारी रात जागती रही और न जाने क्या-क्या सोचती रही| टिया ने अपने मां-बाप को बचपन से लड़ते -झगड़ते देखा है। उसके जीवन पर इसकी कैसी भयंकर छाया आकर पड़ी होगी? अगर जाँच में डॉक्टर के अनुमान के मुताबिक कैंसर की ही पुष्टि हुई होती तो? अम्लान अंतिम समय में उसका क्या हश्र करता? टिया की जरूरतों को कौन पूरा करता? आज भी तो वह घर में ही रहकर टिया की देखभाल करना चाहती है पर भाग्य को अपनी ही रुद्र लीला दिखाने से फुर्सत हो, तब न?

झरना अभी तक सोच में पड़ी थी कि भोर की लाली में सूर्य की प्रथम किरण झरना के चेहरे पर पड़ी| यह शनिवार का दिन था| टिया को स्कूल नहीं जाना| नाश्ता बनाने की कोई जल्दबाजी नहीं| सोमवार को नए दफ्तर का पहला दिन है और उसने अभी तक यह तय नहीं किया कि वह क्या पहनकर जायेगी| कुछ ऐसी ही मनोदशा लिए वह बिस्तर से उठकर पश्चिम दिशा की ओर वाले कमरे में गयी और आलमारी का दरवाजा खोला| आलमारी में सभी कपडे तह करके बड़े करीने से रखे हुए थे| हैंगर में स्लेटी रंग की साड़ी टंगी थी, जिस पर हरे रंग के बूटे और नारंगी रंग के फूल कढ़े हुए थे| इस साड़ी में उसे देख सुलभ ने कहा था "मुझसे शादी कर लो"| इस साड़ी में केल्विन क्लेन के सीकेइनटूयू परफ्यूम की खुशबु अब तक जिंदा थी|  झरना हैंगर से साड़ी उतारकर उस पर हाथ फेरने लगी और उन सुकून भरे पलों को याद करने लगी जो उसने सुलभ के साथ बिताए थे| 

एकबार किसी पत्रिका को पढ़ते हुए झरना का ध्यान खींचा एक आलेख ने| स्त्री के प्रति समाज के मनोविज्ञान की पड़ताल करता हुआ आलेख झरना को भीतर तक छू गया| उसने आलेख ने नीचे नाम पढ़ा -"सुलभ शांडिल्य"| अब वह सुलभ के लिखे आलेख ढूँढकर पढने लगी| सुलभ के जादुई शब्दों का जादू झरना के सर चढ़ कर बोल रहा था| फिर एक दिन झरना ने आलेख के नीचे लिखे फोन नंबर पर फोन लगाया और सुलभ को उसके आलेख के लिए बधाई दी| सुलभ से बात करते हुए झरना को वह भी अपनी ही तरह बेहद व्यवहारिक लगा| फिर फोन करने का सिलसिला शुरू हुआ| अब उन दोनों की बातें आलेख के इतर निजी जिंदगी के विषय में होने लगी| सुलभ ने अपने छूटे हुए प्रेम के बारे में उसे बताया और झरना ने अपने टूटकर बिखरे हुए प्रेम की कहानी सुलभ को सुनायी| सुलभ समय देकर धैर्य के साथ घंटों झरना की बातें सुनता| झरना, जो इतने सालों से मौन व्रत लिए हिम के समान कठोर बन चुकी थी, सुलभ से बातें करते हुए झर-झर बह जाती थी और अपने मन का बोझ उतार कर हल्का महसूस करती थी| सुलभ नाम जैसा ही सुलभ था| बातों ही बातों में प्रेम हो गया| फिर मुलाकातों का सिलसिला भी शुरू हो गया था| पहली मुलाकत में ही सुलभ ने झरना से कहा था "तुमसे कोई पुराना रिश्ता सा लगता है...शायद प्रारब्ध...वरना हम ऐसे नहीं मिलते..यह महज संयोग नहीं हो सकता कि मेरी छूटी हुई प्रेमिका भी यही परफ्यूम लगाती थी| मुझे तुमसे उसकी गंध आ रही है"  उसके पास जाते ही झरना का सारा दर्द हवा हो  जाता|  झरना अपनी तकलीफों से आज़िज आकर कभी उसके पास जाती, तो सुलभ उसे सुनते हुए कभी अपने रुमाल से उसके माथे के पसीने को पोंछता, तो कभी उसे अपने हाथों से पानी पिलाता|  फिर दोनों टूटकर प्रेम करते| बात करते हुए झरना सब्जी काटती और सुलभ खाना बनाता था| एकबार जब झरना सब्जी काट रही थी, उस दौरान सुलभ ने तीन बार दोहराया था "नया चाकू है तेज धार वाला, ध्यान से काटना"| झरना को माँ की याद आ गयी थी| मायके के बाद कभी किसी ने इतनी परवाह नहीं की थी| सुलभ तो उम्र में भी उससे कई साल छोटा था, फिर भी उसके साथ रहते हुए झरना किशोरी बन जाती थी| खाने का पहला निवाला सुलभ हर बार झरना को अपने हाथों से खिलाता था|  झरना खुद को नीलवसना और उसे नीलकंठ पुकारती थी| झरना ने एकदिन सुलभ से पूछा भी था "तुम्हें इस गंध से प्रेम है इसलिए मेरी परवाह करते हो या मुझे प्रेम करते हुए इस गंध से अपने खोये हुए प्रेम को जगाने की कोशिश करते हो?" 

"क्या तुमने मुझे बताया था कि जब मिलने आओगी तो ठीक यही परफ्यूम लगाकर आओगी?" सुलभ के इस उत्तर ने झरना को निरुत्तर कर दिया था| वह फिर से जिंदगी जीने लगी थी| पर वक्त ने ऐसा सितम किया कि सुलभ हमेशा के लिए खूबसूरत याद बनकर रह गया| उस रोज सुलभ ने एक बड़े से आलू पर पहले चाकू से सुलभ लिखा, फिर उसके नीचे चाबी का चिन्ह बनाया और फिर उसके पास झरना लिखा| "सुलभ की झरना" ऐसा लिखकर उसने झरना को देते हुए कहा था "अ गिफ्ट फॉर समवन यू लव"| झरना को उसकी यह हरकत बचकानी भी लगी थी और प्यारी भी| सो उसने उस आलू को अपने बैग में रख लिया था| 

घर लौटकर झरना घर के कामों में व्यस्त हो गयी थी| टिया की आदत थी कि जब भी झरना बाहर से घर आती, वह उसकी बैग में चॉकलेट या चिप्स नुमा चीजें ढूँढती| अपने इस प्रयास में कभी -कभार वह सफल भी हो जाती थी; इसलिए उसकी कोशिश जारी रहती थी| इसबार उसे आलू मिला और उसे आश्चर्य हुआ| फिर वह आलू पर उभरे नामों को हिज्जे लगाकर पढने लगी| चाबी के चिन्ह का मतलब नही समझ पायी थी; इसलिए आलू लेकर सीधे अम्लान के पास पहुँच गयी थी| उसके बाद अम्लान ने सुलभ के घर जाकर ऐसा तमाशा खड़ा किया था कि उसे वह मुहल्ला ही छोड़ना पड़ा था| उसे उस मुहल्ले में कोई घर देने को तैयार न था, बमुश्किल पास के मोहल्ले में एक घर किराए पर मिल सका था| झरना को भी कई दिनों तक प्रताड़ित करता रहा था अम्लान और बारबार यही पूछता "तुम उसे बहुत प्यार करती हो?" झरना कुछ भी नहीं कहती; बस आखों से झरना बहा देती|

"थोड़ा साहस कर लेते सुलभ! अब कोई भी मेरे आस्तित्व के पेड़ से अमरबेल सा लिपटकर तुम्हारी तरह प्यार नहीं करता| आईने में शक्ल देखती तो हूँ हर रोज, पर जान ही नहीं पाती कि मैं ठीक भी हूँ या नहीं| अब मुझसे मेरे दुःख कोई नहीं सुनता| अथाह धैर्य था तुम्हारे पास| काश! थोड़ा साहस भी होता| घर के सामने बिजली की तार पर अब कोई नीलकंठ नजर नहीं आता| मेरे अभिमानी अधरों को अब कोई प्रेम की परिभाषा नहीं बताता| अब मेरी आँखों में काजल देख किसी की बाहों की मछलियाँ नहीं तड़पती| तुम से अलग क्या हुई, लगता है जैसे अपने वजूद से ही जुदा हो गयी| बस गाहे -बगाहे कानों में गूँजता रहता है तुम्हारा अंतिम वाक्य "याद रखना कि हम परिस्थितिवश अलग हो गए| प्रेम हमसे अलग नहीं हुआ| इस प्रेम को मैं भी सहेज कर रख लूँगा और तुम भी सहेज कर रखना| यह प्रेम एक-दुसरे में हमें जिंदा रखेगा| मुझे भुलाना हो तो बारबार खुद को याद दिलाना कि मुझमे साहस की कितनी कमी थी कि जिस वक़्त मुझे तुम्हारा साथ देना चाहिए, मैं पूरी दुनिया से अपनी शक्ल छुपा रहा हूँ| मैं तुम्हें कभी नहीं भूलूँगा और हमेशा प्यार करता रहूँगा"| हाँ, जब भी अम्लान मन को कष्ट पहुंचाता है या श्रीकांत की बेपरवाही मुझे बेचैन करती है, मुझे याद आता है तुम्हारा टूटकर प्रेम करना और मैं टूटकर बिखरने लगती हूँ| ऐसे ही पलों में इस  साड़ी पर हाथ फेरकर कहती हूँ कि देखो मैंने सहेज कर रख लिया है प्रेम| साड़ी को सूँघकर उसके गंध से तुम्हारी स्मृतियों तक का सफर करती हूँ| काश तुम देख पाते कि खोया हुआ प्रेम जोड़ता नहीं, अन्दर ही अंदर तोड़ता है|" मन ही मन बुदबुदाते हुए झरना की आँखों से खारे जल का झरना फूट पड़ा था| 

बीते दिनों की स्मृतियाँ झरना को इस कदर बेचैन कर गयीं कि वह एकदम से उस कमरे से बाहर निकलकर मेहमानों के कमरे में आ गयी और कमरे में रखे कुर्सी पर उल्टा बैठ कुर्सी से लिपट गयी|



आज उसकी पीठ को कुर्सी का सहारा नहीं चाहिए, उसे बस किसी के सीने में सर छुपाने का मन है| कुर्सी पर नीले रंग का तौलिया लटक रहा था|  वह अपने चेहरे को उस तौलिये पर आहिस्ता-आहिस्ता रगड़ रही थी कि अचानक उसके जेहन में  श्रीकांत उभर आया| उसे अचानक याद आया कि वह कैसे श्रीकांत के बाल भरे सीने पर अपना चेहरा ऐसे ही रगड़ा करती थी| यक-ब-यक उसे मेहरूनी और सुनहरे रंग की वह सलवार कमीज़ याद आयी जिसे पहन वह आखिरी बार श्रीकांत से मिलने गयी थी| दफ्तर में पहले दिन पहनने के लिए शायद यही ठीक रहेगा| झरना अपने कमरे में गयी और लाल रंग के ट्राली बैग को खींचकर मेहमानों वाले कमरे में ले आयी| बैग में सबसे उपर रखी थी वह सलवार कमीज़| झरना ने उसे बैग से निकाला| उसमे से क्रिस्चियन डिओर की खुशबू आ रही थी| जब वह पहली बार श्रीकांत से मिलने गयी थी, तो श्रीकांत ने गाड़ी में बैठते ही पूछा था "यह तुम्हारी खुशबू है या कार परफ्यूम की? मैं मदहोश हुआ जा रहा हूँ"| उसके बाद झरना जब भी श्रीकांत से मिलने गयी हर बार क्रिस्चियन डिओर का परफ्यूम ही लगाया| 

"क्यूँ आए तुम मेरी जिंदगी में श्रीकांत!! मैं तो तुम्हारे जीवन की सूखी धरती पर बारिश की  बूँदे बन बरस रही थी और तुम मेरी जिंदगी में ठीक ऐसे ही आए थे जैसे आती है गुनगुनी धुप बारिश के बाद| मैंने तुम्हारा हाथ उस वक़्त थामा, जब तुम टूटकर बिखर रहे थे| मैं कुछ समय पहले ही सुलभ के चले जाने के अवसाद से बाहर आ पायी थी| अवसाद क्या होता है, अच्छी तरह समझती हूँ और यही वजह थी कि तुम्हें अवसाद से बचा लेना चाहती थी| मैंने तो तुमसे हमारे मिलने के कुछ ही दिनों बाद बता दिया था कि मैं एक टूटा हुआ खिलौना हूँ| फिर भी तुमने मेरे साथ ऐसा किया!!! अपनी जरुरत भर मुझे प्रेम के भ्रम रखा और अब ऐसे अंतर्ध्यान हो गए हो, जैसे कि वह सब एक सपना था| इतना ही कह दिया होता कि अब प्रेम नहीं रहा और तुम आगे बढ़ चुके हो| काश तुम देख पाते कि मैंने तो तुम्हारे घर से लौटने के बाद इस सलवार कमीज को बिना धोये ही सहेज कर रख लिया| इस खुशबु में कैद हो तुम| तुम्हारे हिस्से का दुःख भी मेरा था| पर तुमने अपने दुःख में अकेले रहने का निर्णय लिया| जब भी पूछती हूँ, कहते हो "मैं हूँ तुम्हारे पास ही, बस अपनी तकलीफों से घिरा हूँ" पर मैं महसूस ही नहीं कर पाती| जब मुझे तुम्हारी जरुरत होती है, तुम नहीं होते हो| तुम्हारे शब्दों का तुम्हारे व्यवहार में परिलक्षित न होना मुझे अनगिनत आशंकाओं से भर देता है|  तुम्हारे होने का भ्रम तुम्हारे नही होने के आभास से कहीं ज्यादा प्रबल है|" मन ही मन कहती हुई झरना ने सलवार कमीज को भारी मन से वापस उसी बैग में रख दिया था| 

बैग कमरे में वापस रख झरना सोसाइटी के बाहर खुले मैदान में चली गयी| जब भी उसका मन भारी होता, वह साँसों में ताज़ी हवा भरने के लिए यहाँ आकर खड़ी हो जाती थी| मैदान के चारों ओर महोगनी के पेड़ लगे थे| उन दिनों उस मैदान को एक सुंदर पार्क में तब्दील करने की कोशिश की जा रही थी| पेड़ों के नीचे भूरे रंग की अलग-अलग तख्तियों पर सफेद रंग से महान लोगों के विचार लिखे गए थे| पेड़ों पर फूल लगने शुरू हो चुके थे| झरना सोच रही थी कि कैसी विडम्बना थी कि उसके घर के कोने- कोने में प्रेम तरह-तरह की सुगंधों में क़ैद था पर उसके जीवन में दूर-दूर तक प्रेम का लेशमात्र न था| कुछ ही देर में फूलों की मादक गंध-शक्ति ने झरना को चहुंओर से घेर लिया था| यह एक स्मृति विहीन गंध थी| इस गंध में सिर्फ खुशबू और मादकता थी, किसी प्रकार का कोई दुःख या अवसाद का चिन्ह नहीं जड़ा था| टहलते हुए वह एक पेड़ के नीचे जा खड़ी हुई और पास की तख्ती पर लिखे हुए विचार पढ़ने लगी| उस पर लिखा था -

फूलों की खुशबू से उबर जाना हार का एक मनोरम रूप है। (बेवरली निकोल्स)

"और प्रेम की खुशबू ? उसके लिए भी तो ठीक यही बात सही होती होगी न? पर कौन कमबख्त उबर पाया है प्रेम की खुशबू से!!! फूलों की खुशबू से उबर भी जाए कोई, पर प्यार की खुशबू......." झरना मन ही मन बुदबुदाती हुई अगले पेड़ के नीचे लगी तख्ती पर लिखे हुए विचार पढ़ने लगी| उस पर लिखा था -

अपने दिल में एक हरा पेड़ रखें और शायद किसी दिन एक गाती हुई चिड़ियाँ आ जाए| (चीनी कहावत)

"और क्या पता कि उस पेड़ पर भी एक दिन ऐसे ही मादक गंध वाले फूल खिले" झरना ने महोगनी के फूलों की ओर देखते हुआ कहा था|

कुछ समय इस पार्क में बिताने के बाद झरना अब हल्का महसूस कर रही थी| वह वापस घर की ओर चल पड़ी| चौथी मंजिल पर जाने के लिए झरना अमूमन लिफ्ट का ही प्रयोग करती थी, पर उस दिन उसने सीढियाँ चढ़ते हुए कई बार मन ही मन दोहराया था "नहीं, मैं हार नहीं मानूँगी| मुझे प्रेम की खुशबू से नहीं उबरना| मैंने आज अपना गंध पा लिया है| जब कभी बीते दिनों की गंध स्मृति मुझे अवसाद की ओर ले जायेगी, मैं इस गंध में खुद को ढूँढ लिया करूँगी| प्रेम के इस पेड़ को हरा रखूँगी अपने लिए हर हाल में कि एक दिन मेरे मन का पाखी फिर से गा पाए कोई गीत|"

घर पहुँचते ही उसने आलमारी की तह से निकाली थी खाकी रंग की पतलून और सफेद रंग की कमीज जिसे पहन सोमवार को वह नए दफ्तर गयी थी| उस शाम पास के मॉल से वाल फ्लावर्स का महोगनी टीकवुड परफ्यूम भी खरीद लायी थी जिसे पहले हल्का सा अपने कपड़ों पर लगाया था और फिर आलमारी में रखे कपड़ों पर बेतरतीबी से छिड़का था| कुछ ही समय में झरना एकबार फिर से घर और नौकरी में व्यस्त हो गयी थी| उसके बाद जब कभी रजनीगंधा की महक उसके नासारंध्रों तक पहुँची, जब भी उसने लाल ट्राली बैग खोला या जब कभी कहीं किसी को कैल्विन क्लेन की खुशबू से सना पाया, उसने याद किया केवल प्रेम, जो उसमें अब भी हरा था| उसका आत्मविश्वास उसे अवसाद में जाने से रोक पाने में सफल हो रहा था|

वह जून महीने की एक धधकती हुई दोपहर थी जब झरना के फोन स्क्रीन पर एक जाना-पहचाना नाम उभर आया था| श्रीकांत ने पहले उसका हाल -समाचार पूछा था और फिर इधर -उधर की बातें करते हुए उसके नए दफ्तर का पता पूछ लिया था| उस शाम जब झरना दफ्तर से निकल पार्किंग एरिया में लगी अपनी कार के पास आयी, तो वहाँ श्रीकांत खड़ा था| श्रीकांत के हाथों में था रजनीगंधा का गुलदस्ता और उस गुलदस्ते पर लगा था एक कार्ड जिसे श्रीकांत ने ही बनाया था| उस पर लिखा था "जिन दिनों जिंदगी में तकलीफों की बारिश हो रही थी, तुम उग आई थी रजनीगंधा की इन फूलों की तरह जो बारिश के मौसम में उगती हैं और उमस को खुशबू में बदल देती है| कुछ दिनों से सुबह सैर करने जा रहा हूँ और फूलवाले के पास से गुजरते हुए यह खुशबू मुझे तुम्हारी याद दिलाती है| मैं तुम्हें इस खुशबू में याद करता हूँ| जानता हूँ अजीब ही है कि फूल हमें खुशबू देते हैं और मैं खुशबू को फूल दे रहा हूँ|" -खुशबू का श्रीकांत    

झरना उस समय कुछ नहीं कह पायी थी; बस श्रीकांत से लिपटकर देर तक रोती रही थी| 

अगले दिन जब झरना श्रीकांत से मिलने के लिए तैयार हो रही थी, उसने क्रिस्चियन डिओर का परफ्यूम हाथ में उठाया और कुछ सोचकर वापस रख दिया | महोगनी टीकवुड परफ्यूम खुद पर छिड़कते हुए वह मन ही मन कह रही थी "मैं अपनी गंध पहचान गयी हूँ;  इस खुशबू को बिखरने न दूँगी"|

Sunday, September 18, 2016

होने और नहीं होने के बीच

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तुम्हारे होने से - सुनती हूँ प्रेम की इतिकथा अन्धकार के नक्षत्र सभा में
तुम्हारे होने से - रात महकती है बन पारिजात, सुबह जैसे रेशमी कपास
तुम्हारे होने से - तन्द्रा से चूर आँखें काटती हैं निंद्राहीन रात प्रेम के ज्वार में
तुम्हारे होने से - तनिक देर से डूबता है भोर का तारा शुक्र आसमान में
तुम्हारे होने से - स्निग्ध सोंधे सुगंध से भर जाती है आसपास की चौहद्दी
तुम्हारे होने से - करता है विनिमय मांस का आदिम अजगर - सा प्रेम
तुम्हारे होने से - प्रेम कहाँ रह पाता है केवल प्रेम सप्ताह के किसी भी एक दिन

और जब नहीं हो तुम

तुम नहीं हो - तो भावनाएँ करती हैं अजश्र विलाप यातनाओं के धिक्कार सभा में
तुम नहीं हो - तो जलता है जुगनू लग रात्रि के हृदय, जैसे मैं तुम्हारी स्मृतियों से 
तुम नहीं हो - तो स्थिर हुआ है मेरा लावण्य मरी हुई मछली की आँखों के समान
तुम नहीं हो - तो मेरा जीवन बोध भटक रहा है किसी विवेकहीन अनजाने देश में
तुम नहीं हो - तो नहीं झरता मौलसिरी अश्रुपात पर, मुंह से अब लावा नहीं फूटता
तुम नहीं हो - तो आछन्न रखती है एक प्रकार की विध्वंशकारी नीरवता गहरे तक
तुम नहीं हो - तो तुम ही हो मौजूद पहले से भी ज्यादा जीवन में बन प्रबल माया

यह विडम्बना ही तो है कि मौन का अनुवाद करना नहीं सीख पायी मैं अब तक
और मुझे बेतरह भयाक्रांत करती रहती है प्रतिपल संकेतों की भाषा गणित की तरह
किसी गल्प, छंदबद्ध कविता या भाषापाठ के किसी नवीन शब्द में बता दो तुम 
जो छेड़ जाते हो मन की वीणा के सातों सुर सप्ताह के सातों दिन हो कि नहीं हो?

---सुलोचना वर्मा -----

Saturday, August 27, 2016

इन्तजार

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उसके अंदर बहता है अदृश्य समुद्र 
जिसमें गहरे डूब जाना चाहती थी मैं 
मुझे ठहर जाना था पानी में कूदकर 
आह दुर्भाग्य ! मुझे तैरना आता था 

आजकल मुझे है लहरों का इन्तजार !!!

--सुलोचना वर्मा-----

Friday, August 26, 2016

एक दिन

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एक दिन मैं बहती हुई मिलूँगी समंदर के फेनिल जल में 
तुम्हें उस जल का स्वाद पहले से कहीं अधिक खारा लगेगा 
एक दिन मैं बहती हुई जा मिलूँगी नरम हवा के साथ
उस रोज हवा में होगी सांद्रता पहले से कुछ ज्यादा ही 
एक दिन मैं बहती हुई पहुँच जाऊँगी तुम्हारी चेतना तक 
और जम जाऊँगी कैलाश पर्वत पर जमे बर्फ की तरह 

एक दिन शायद तुम मुझे करोगे याद देर तक भूलवश 
उस रोज मैं पिघल जाऊँगी, बहने लगूँगी बनकर तरल   
फिर कहाँ जा पाऊँगी कहीं और, रहूँगी तुम्हारे अंदर ही 
बहती रहूँगी तुम्हारे रक्त के साथ हृदय की धमनियों तक 

---सुलोचना वर्मा -----