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Friday, October 6, 2017

काजल

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काजल 
है लक्ष्मण रेखा
सुख द्वारा खींची गई 
आँखों की देहरी पर 
आँसुओं के लिए 

दुःख का रावण 
आता रहता है 
वेश बदलकर 
बार-बार 

Monday, February 13, 2017

शाम्भवी योग

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किसी  रक्तपूर्णिमा की रात 
मेरे अभिधान से झड़े थे कुछ शब्द
विषाद के रंग में सने  
रोप आयी थी उन्हें मैं घर के दक्षिण दुआर पर 
कि कहा था पिता ने विदाई से ठीक पहले 
नहीं दिखाना कभी किसी को अपना दुःख 

डाला मेरे दुखों पर बारिश ने पानी और रौशनी सूरज ने
जब बदला करवट मौसम ने और चली बसंती हवा 
उग आया पेड़ मेरे दुखों पर, खिला जिस पर रक्त जवा 

चढ़ा रहें है पत्थर के महादेव को रक्त जवा 
आजकल, मेरे ही असीम दुखों के अधिष्ठाता
मेरे अश्रुजल से हो रहा है उनका जलाभिषेक 

मौन हैं देवता, चुप हूँ मैं भी 
खुली हैं आँखें हम दोनों की 
और कुछ देख भी नहीं रहे 
शाम्भवी योग कहते हैं जिसे

देवता ढूँढ रहे हैं सूत्र 
मनुष्य होने का, योग द्वारा 
कि समझ सकें इंसानों के तुच्छ दुःख 
मैं हूँ प्रतीक्षारत कि न जाने लगेंगे कितने कल्प 
मुझे पत्थर हो जाने में !!

समझना चाहती हूँ मैं देवताओं की विवशता !

Wednesday, May 25, 2016

चापाकल

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मुझे पुकारते हैं बीत गए बचपन के वो दिन 
जब चापाकल के पानी से बुझती थी हमारी प्यास 
दर्ज है उस चापाकल की जगत में दिखते पीलेपन में 
पानी में मौजूद लौह तत्व आज भी बनकर संताप  

मेरे बेहद करीब है पीले रंग का यह पुरातन दुःख 
कि मेरी शिराओं में दौड़ते रक्त में यही पीलापन है मौजूद 
जिससे धड़क रहा है मेरा हृदय और चल रही है मेरी श्वास 
कुछ तकलीफें जिंदा रहती हैं इसी तरह हमेशा, आसपास 

---सुलोचना वर्मा----


Monday, November 16, 2015

अवसाद

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लिपटा है हर अप्रकाशित अनुभूति से
अन्धकार की तरह काला कोई दुःख
रख देती हूँ मैं तह करके दुखों को
अपने ही शरीर के हर जोड़ पर
जम जाती है हड्डियों में कैल्शियम की तरह,
और इस प्रकार संभाल लेती है पीड़ा मुझे


मेरे सपने टटोलते हैं अंधकार मे आलोक
पर नहीं पकड़ पाते हैं एक भी कतरा
सुख का फ़ानूस जल-जलकर बुझ जाता है
दुःख है कि टिका रहता है ध्रुव तारा की तरह
अपने निर्धारित स्थान पर- स्पष्ट और धवल
दुःख आसमान है-रंग नीला और सीमाहीन


भले बंजर हो चुकी हो मेरे आँखों की जमीन
और अभिघात बन चुका दिखता हो जीवन
मैं गाउंगी गीत बहारों के, भुलाकर अवसाद
कि कर पाये उम्मीद निराशा पर वज्र संघात
रखा है मौत का सामान जहाँ हर कदम पर
वहाँ ज़िंदा रहना ही है मेरा एकमात्र प्रतिवाद