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Thursday, July 26, 2018

जीवन का स्वाद

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उन्होंने अपने बचपन में किसी बुजुर्ग को कहते हुए सुना था कि जीवन को स्वाद लेकर जीना चाहिए | चाय की प्याली में डुबोकर खाए गए बिस्कुट की तरह नहीं बल्कि पान की गिलौरी की तरह देर तक चबाकर | बस उसी रोज़ से वह जिंदगी के तमाम एहसासों को स्वाद से समझने लगीं | जब भी किसी ने उनसे लाड़ जताया, उन्होंने "चाशनी" सा महसूस किया | जब माता या पिता ने डपटा, तो उन्होंने "दालचीनी" महसूस किया | अपने माता-पिता के अतिरिक्त उन्हें सगे-संबंधी और पड़ोस के लोगों का भी भरपूर प्यार मिला था | एक लम्बे अरसे तक उनका व्यक्तित्व आकर्षक और सहानुभूतिपूर्ण ही रहा | किसी किस्म की क्रूरता से वह कोसों दूर रहीं |

रात के अंधेरे में या दिन के समय जब वह अकेली होतीं थीं, तो "बर्फ" जैसा महसूस करती थीं | ऐसे क्षणों में भयभीत होने के बावजूद किसी से मदद मांगने की बजाय वह इतिहास के साहसिक घटनाओं का स्मरण कर लेतीं या खुद को समझातीं कि अपने ऊपर भय को हावी होते देना स्वयं को कमजोर बना देना होता है | कभी आँखें बंद कर अतीत की चाशनी में डूब जातीं और इस पर भी अगर भय हावी रहता तो उसी अतीत से उधार लेकर दालचीनी चबाने लगतीं |

उनका असली नाम क्या था, यह तो किसी को पता ही न चलता यदि उस गाँव के पहले डॉक्टर की विधवा, जिसे लोग डॉक्टरनी कहते थे, से उनका लगाव न होता | वह बतौर नर्स सरकारी डिस्पेंसरी में कार्यरत थीं और उनके हिंदी उच्चारण से लोगों ने अनुमान लगाया था कि शायद वह पश्चिम बंगाल की रहने वालीं थीं | उम्रदराज स्त्री थीं, तो किसी ने उनके बारे में ज्यादा कुछ जानने की कोशिश नहीं की | जब वह उस गाँव में पहली बार आईं थीं, तब भी नहीं | वह हर किसी के लिए नर्स ही रहीं | शायद उस गाँव की पहली और इकलौती नर्स | उम्रदराज होने के बावजूद उनके नैन-नख्स इतने तीखे थे कि इस बात का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता था कि अपनी युवावस्था में वह बेहद खूबसूरत रही होंगी | उन दिनों नर्स सफेद रंग की साड़ी ही पहना करतीं थीं | कुछ लोग उन्हें विधवा समझते रहे तो कुछ अविवाहित | उनकी आवाज़ में एक किस्म का कड़कपन था जिसकी वज़ह से लोग उनसे थोड़ी दूरी बरतना ही श्रेयस्कर समझते थे |

नर्स का जन्म एक सुखी परिवार में हुआ था और उन्होंने बचपन से ही अपने माता-पिता के बीच ऐसा सुंदर सामंजस्य देखा था कि उन्हें लगता जब उनका ब्याह होगा तो उनका भी उनके जीवन साथी से वैसा ही सामंजस्य होगा | उस गाँव के लोगों को भले ही न मालूम हो, आपकी जानकारी के लिए यह बताना बेहद जरूरी है कि हमारी नर्स का नाम कनक प्रभा था, वह विधवा थीं और उनकी एक बेटी थी, जो शिक्षित तो थी , पर जिसने ब्याह करने के बाद घर बसा लेने को ही अपने जीवन का अंतिम लक्ष्य समझा | घर बसाने में वह इतना रम गयी कि यह भी भूल गयी कि भारत भू-खंड के किसी कोने में उसकी माँ भी रहती थी | नर्स, जो कि एक सम्पन्न परिवार की थीं, उनका ब्याह हुआ तो एक डॉक्टर से ही था, पर उन दोनों के बीच उस सामंजस्य का अभाव हमेशा रहा जो उसके माता-पिता के बीच था | फिर विवाह के चंद सालों के बाद ही उनके पति का कैंसर से निधन हो गया था | डॉक्टर पति ने कैंसर का पता चलते ही सबसे पहले कनक को नर्स ट्रेनिंग के लिए भेजा था और फिर वह जिस अस्पताल में कार्यरत थे, वहाँ सिफारिश कर कनक की नौकरी लगवा दी थी | नर्स कनक ने पति के इस उपकार को आजीवन याद रखा |

नर्स कनक लज़ीज़ मांसाहारी व्यंजनों की बेहद शौक़ीन थीं और बिना कलफ़ लगी साड़ियाँ नहीं पहनती थीं | गाँव में रहते हुए उन्होंने बेटी को शहर के हॉस्टल में रख पढ़ाया और फिर ग्रेजुएशन के बाद  उसके आगे न पढ़ने के फैसले को मंजूरी देते हुए उसका ब्याह एक संभ्रांत परिवार के लड़के से कर दिया | बावन वर्ष की आयु में अब वह एकबार फिर से अकेली हो गयी थी | अकेली तो वह पति की मृत्यु के बाद से ही हो गयी थी पर बेटी नामक ज़िम्मेदारी से मुक्ति क्या मिली, उन्होंने पहली बार अकेले हो जाने का "सुपाड़ी सा कसैलापन" महसूस किया | सप्ताह के अन्य दिनों में वक़्त की जिह्वा पर यह कसैलापन इतना नहीं चढ़ता जितना कि छुट्टी वाले दिन | इस कसैलेपन से कुछ देर बचने के लिए वह डॉक्टरनी के घर जाती और घंटो बिताकर शाम में लौट आती |

विवाह के दो वर्षों के बाद जब उनकी बेटी झिनुक माँ बनी, तो बहुत समय बाद उन्होंने मन में मिश्री घुलता हुआ सा अनुभव किया था | टेलीग्राम मिलते ही वह दो दिनों का सफर पूरा कर बेटी के ससुराल पहुँच गईं थीं | न सिर्फ माँ और नानी होने के नाते उन्होंने बेटी के घर की सभी ज़िम्मेदारियाँ संभाली, बल्कि एक नर्स होने की ज़िम्मेदारी भी बखूबी निभाई | अपना सारा समय बेटी और उसके बच्चे की देखभाल में लगाया करती थीं |

डेढ़ महीने बेटी के ससुराल में रहने के बाद एक दिन नर्स ने "चिरायता" सा महसूस किया | उनकी आँखों में सूजन आ गया था और उन्होंने साड़ी में कलफ़ लगाना छोड़ दिया था | वह अचानक से एकसाथ बीमार भी हो गयी थीं और बूढ़ी भी | तन अधिक बीमार था या मन, यह तो नर्स ही बता सकतीं थीं | बेटी के स्वभाव में यदि रूखापन न था, तो वह लगाव भी न था जो उन्हें वहाँ उसके पास रोक लेता |  बेटी व उसके परिवार की सेवा करने की बनिस्बत नर्स को अनजान मरीजों की सेवा करना बेहतर विकल्प लगा और वह फिर से दो दिनों के सफर के बाद अस्पताल आ गई थीं | उन पर एक किस्म की थकान हावी हो रही थी | कुछ ही महीनों में दायीं आँख में गुलाबी उभार नजर आने लगा | शुरुआत में किसी किस्म का दर्द नहीं था, तो नर्स को किसी उपचार की भी जरूरत नहीं महसूस हुई | फिर आँखों का डॉक्टर उस गाँव में तो क्या, आसपास के शहरों में भी न था | कई बार कई प्रकार के घरेलू उपचार करने के बाद जब कोई लाभ न हुआ, तो फिर उन्होंने उपचार के विषय में सोचना ही छोड़ दिया |

१९८८ की गर्मियों में अस्पताल में एक नए डॉक्टर का आगमन हुआ जो किसी बड़े शहर से स्थानान्तरण के फलस्वरूप इस गाँव में आए थे | कुछ दिनों के बीतते ही नए डॉक्टर ने नर्स से उनकी आँख के विषय में जानना चाहा था जिसे नर्स ने "कुछ नहीं....बस जरा सा उभार.." कहते हुए टालने की कोशिश की थी | डॉक्टर ने जब उन्हें कैंसर का अंदेशा जताते हुए दिल्ली जाकर अपने परिचित आँखों के डॉक्टर से दिखाने का सुझाव दिया था, तो मुस्कुराहट के साथ हाथ जोड़ कर आभार प्रकट करने के अलावे उन्होंने कुछ भी नहीं कहा |

नर्स उन दिनों दार्शनिक हो चलीं थीं या बेटी की उनके प्रति उदासीनता ने जीवन के लिए उनमें निरसता का संचार कर दिया था; जीवन में उनकी रूचि कम होने लगी | पहले उन्होंने डॉक्टरनी के घर जाना छोड़ा, जो उस गाँव में उनके जाने का एकमात्र ठौर था | फिर कुछ दिनों बाद अस्पताल भी छूटा | अब उनकी आँखों में उभार और सूजन के अतिरिक्त खुजली भी एक समस्या का रूप ले चुकी थी | वह आस-पड़ोस के बच्चों से अनुरोध कर और उन्हें पाँच -दस पैसों का लालच देकर अपनी दायीं आँख की बरौनी निकालने को कहतीं | बच्चे पैसों के लालच में अपने अभिभावकों से छुपा कर ऐसा करते भी |  अपने प्रति इस क्रूरता के बाद नर्स कुछ समय के लिए नमकीन महसूस करती | अगले दिन फिर आस-पड़ोस के बच्चों से वही मनुहार |

एक दिन जब वह सुबह उठीं और बच्चों को बुलाने आँगन के बाहर गयीं, बच्चे उन्हें देख छूप गए | उन्हें खट्टा महसूस करना चाहिए था, पर उन्होंने गौर किया कि ऐसा कुछ महसूस ही नहीं  हुआ | दिन में पड़ोस से कोई खाना दे गया | यह तो चाशनी महसूस करने वाली बात थी, पर आश्चर्य ! ऐसा कुछ भी महसूस न हुआ | घर बिखड़ा पड़ा था, रसोई में जूठे बर्तनों का अम्बार लगा था और उन्हें कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था | कुछ महसूस होने के अभाव में वह रात में घर का दरवाजा बंद नहीं कर पायीं |

अलसुबह उनके घर का दरवाजा खुला देख जब उनका हाल-समाचार लेने लोग उनके कमरे में गए, तो पाया कि उनकी इकलौती नर्स बेस्वाद हो चुके जीवन का त्याग कर चुकीं थी | आलमारी के शीशे से कलफ़ लगी साड़ियाँ झाँक रहीं थीं | पास के टेबल पर झिनुक के बचपन की तस्वीर रखी हुई थी, जिसमें वह माँ की साड़ी लपेट मुस्कुरा रही थी |

नर्स की मौत की खबर आग की तरह फैल चुकी थी | डॉक्टरनी, जो खबर सुनते ही नर्स के अंतिम दर्शन के लिए वहाँ गयीं थीं, नर्स का शव देख रोते हुए कह रहीं थीं “अभागी जीवन का स्वाद लेना चाहती थी और जिंदगी ने इसे ही पान की गिलौरी की तरह चबा डाला” |

Thursday, September 1, 2016

अर्शी फातिमा के लिए

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बनारस की किसी गली में रहती है कत्थई आँखों वाली एक लड़की
कत्थई आँखों वाली लड़की की रंगत है नरगिस के फूलों जैसी शफ्फाक़
जाफरानी रंग के कपडे पहनकर खिल उठती है कत्थई आँखों वाली लड़की 
और जब थिरकती है कत्थई आँखों वाली लड़की, आसमान फिरोज़ी हो जाता है

कत्थई आँखों वाली मुस्लिम लड़की को पसंद है घाट पर गंगा आरती देखना
लौटती है घाट से लड़की लिए आँखों में पारदर्शिता जल की और रंग आग का
तहज्जुद की नमाज़ पढ़ती लड़की की बंद आँखों से बहती है गंगा की धारा 
उसके चेहरे पर है नूर घाट पर प्रज्वलित अखंड ज्योति की शोभा यात्रा का

कत्थई आँखों वाली लड़की को पसंद है भटकना सड़कों पर धूसर रंग में
कई बरस बीते कि देखे हैं कत्थई आँखों वाली लड़की ने चम्पई रंग के सपने
ढूंढ लिया है अपने सपनों का साथी बनारसिया कत्थई आँखों वाली लड़की ने
कत्थई आँखों वाली लड़की को इश्क के गुलाबी कतान में बाँध लिया है जिसने

अब नहीं रह जायेगी लड़की, कहलायेगी "छोटी बहू" कत्थई आँखों वाली लड़की 
नहीं दिखेंगे कत्थई आँखों वाली लड़की के जाफरानी रंग के कपडे काले बुर्के में
महका करेगा अब तो नरगिस के फूलों का इत्र, सफ्फाक फूल नज़र नहीं आएगा
हम जानते हैं दुनिया के रस्म और दस्तूर फिर भी यह मंजर हमें नहीं भाएगा

ज़िंदा रखना सपनों का चम्पई रंग अपनी कत्थई आँखों में, उसे बहने न देना
सुनो कत्थई आँखों वाली लड़की, अपने विचारों में रखना प्रज्वलित अखंड ज्योति
बचा लेना अपने पांव में लगा धूसर रंग कत्थई आँखों वाली, हिना के ठीक नीचे
न भूलना तुम वह लड़की हो जिसके थिरकने से हो जाता है आसमान फिरोज़ी

तुम बचाये रखना शऊर ज़िंदा रहने का ज़िंदगी में, कत्थई आँखों वाली लड़की
तुम खिलना कत्थई आँखों वाली लड़की जैसे खिलता नरगिस का शफ्फाक़ फूल
तुम खिलखिलाना जैसे बहती है गंगा की चंचल धारा, कत्थई आँखों वाली लड़की
ओ कत्थई आँखों वाली लड़की, तुम भूलकर भी जीवन के रंगों को न जाना भूल

-----सुलोचना वर्मा-----

Saturday, August 27, 2016

भूल

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जब हमें सीखना था चीजों को बनाना 
हम खरीद रहे थे उन तमाम चीजों को 
जब हमें सीखना था शऊर बांटने का 
हम गिन रहे थे कुछ चीजों की कमी 

जब हमें करना था अपने चरित्र का निर्माण 
उन दिनों हम सीख रहे थे प्रतिस्पर्धा करना
जिन दिनों हमें जानना था महत्व चीजों का 
हम भागते चले जा रहे थे सफलता के पीछे 

हमने दोहराया उन भूलों को जिन्हें नहीं सुधारा कभी भी 
हमने चीजों को ही जिंदगी समझ लेने की बड़ी भूल की 
हमारी भूल से बढ़ा लीं हमने चीजें और छूटती गयी जिंदगी 
जबकि जिंदगी से अधिक खूबसूरत चीज और कुछ भी नहीं  

--सुलोचना वर्मा-----

Wednesday, June 15, 2016

बचे रहने का अभिनय

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हम जिंदा रहते हैं फिर भी 
उस पहाड़ की तरह जो दरकता है हर रोज़ 
या काट दिया जाता है रास्ता बनाने के लिए 
और फिर भी खड़ा रहता है सर उठाये 
बचे रहने का अभिनय करते हुए 

हम जिंदा रहते हैं फिर भी 
रसोईघर के कोने में पड़े उस रंगीन पोंछे की तरह 
जो घिस-घिसकर फट चुका है कई जगहों से 
और फिर भी हो रहा है इस्तेमाल हर रोज़ कई बार 
बचे रहने का अभिनय करते हुए 

हम जिंदा रहते हैं फिर भी 
मिट्टी के चूल्हे में जलते कोयले की तरह 
जो जल-जलकर बन जाता है अंगार 
और फिर भी धधकता रहता है 
बचे रहने का अभिनय करते हुए 

हमारी अभिनय क्षमता तय करती है हमारा जिंदा दिखना 
और हमारा जिंदा दिखना ही है विश्व की सबसे रोमांचक कहानी 

---सुलोचना वर्मा -----

Friday, January 15, 2016

दौड़ते हुए

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दौड़ते रहते हैं हम घड़ी के काँटों की मानिंद 
और ज़िन्दगी देखती है हमें बेतहाशा दौड़ते हुए 
ठीक उसी तरह जिस तरह हम देखते हैं उसे 
दौड़ते हुए पीछे छूटते चले गए रास्तों की तरह 

फिर होती हैं हमारी आँखें चार जिंदगी से एक दिन 
किसी अप्रत्याशित घटना की तरह अजनबी मोड़ पर 
हो उठती है प्रज्वलित हमारे विवेक की अखण्ड ज्योति 
न ख़त्म होनेवाली जरूरतों की आंधी उसे बुझा जाती है 

घड़ी के काँटों की मानिंद हम दौड़ने लगते हैं फिर से 
एक दिन नाप लेते हैं जीवन के तमाम रास्ते दौड़ते हुए
पहुँच जाते हैं घड़ी के सभी काँटे दौड़ते हुए बारह पर 
और क्रूर समय हमें अतीत बनाकर दौड़ता रहता है| 

-----सुलोचना वर्मा--------

Wednesday, August 5, 2015

इरोम चानू शर्मीला

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हौआ नहीं होता है मौत का आना
आप हो सकते हैं खर्च ठीक उसी तरह
जैसे खराब नल से टपकता है पानी


मृत्यु है जैसे कोई एक मछुआरा
जिसने फैला रखा है जाल हर तरफ
जल थल और आसमान तक में
आप मर सकते हैं बिना किसी योजना के
बस, ट्रक या मोटर कार के नीचे आकर
या फिर उतर सकती है पटरी से रेलगाड़ी
जिसमें आप इस वक्त सफर कर रहे हैं
फिर आम है विमान का दुर्घटनाग्रस्त हो जाना


हौआ नहीं होता है मौत का आना
आप हो सकते हैं खर्च ठीक उसी तरह
जैसे खराब नल से टपकता है पानी


चकित करता है मुझे अक्सर जिंदा रहना
उस बहादुर स्त्री इरोम चानू शर्मीला का
जिसने किया है इनकार मर-मर कर जीने से
और मर रही है हर पल जी-जी कर
जैसे उँगलियों को चाट रही हो खाने के बाद
कुछ इस तरह स्वाद ले रही जीवन का


जहाँ हममें से अधिकांश बीता रहे हैं जीवन
वह कह सकती है कि उसने इसे जीया सार्थकता से
बिस्कुट के छोटे - बड़े टुकड़ों की तरह नहीं
बल्कि पान की गिलौरी की तरह चबाकर


मुझे वह किसी किसान की तरह लगती है
जो रोप रही है बीज जीवन में आशाओं के
उसकी सोच जो है किसी पारसमणि के समान
मैं चाहती हूँ जा टकराए नियति का पत्थर उससे
और सोने सा चमक उठे मानवता का चेहरा


हौआ नहीं होता है मौत का आना
आप हो सकते हैं खर्च ठीक उसी तरह
जैसे खराब नल से टपकता है पानी


---------सुलोचना वर्मा -----------

Friday, April 3, 2015

मंजूगाथा

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ब्लू लाइन बस के नीचे आकर मंजू के पति की मौत हो गयी और दो बरस की ममता को साथ लिए मंजू नैहर

आ गयी| नैहर में अभी सात महीने ही बीते थे कि भाभियों ने उसे तंग करना शुरू कर दिया| मंजू की माँ को
यह समझते देर न लगी कि मंजू का वहाँ ज्यादा दिन रहना संभव नहीं हो पायेगा| वह मंजू के लिए नए वर की तलाश में लग गयी|
 
"अम्मा भी न हद करती हैं, कौन ब्याहेगा इस बेवा और एक लड़की की माँ को....लड़का होता तो और बात
थी; पर लड़की कोई नहीं गछेगा" उसकी भाभियाँ अक्सर आपस में बातें करते हुए कहती|
 
कई रिश्ते आते और चले जाते| फिर एकदिन पड़ोस के गाँव से एक रिश्ता आया| बीस साल की मंजू के लिए
लड़के की उम्र थोड़ी ज्यादा थी| यही कोई ३० साल का रहा होगा| पर उम्र की किसे परवाह थी!!! किशोर
सिंह ने न सिर्फ मंजू के रिश्ते के लिए हामी भरी बल्कि उसकी बेटी को अपनाने के लिए भी तैयार हो गया|
फिर क्या था, चट मँगनी और पट ब्याह|

शादी के बाद जब मंजू अपने नए ससुराल जा रही थी तो उसकी माँ ने ममता को अपने पास रख लिया|
"तू कुछ दिन वहाँ रह ले, वहाँ के कायदे क़ानून समझ ले, फिर इसे ले जाना| वैसे भी ममता ज्यादा समय अब मेरे पास ही रहती है " अम्मा ने मंजू को समझाते हुए कहा|
 
दिल पर पत्थर रखकर मंजू ने नए ससुराल का रुख किया था| यहाँ सभी कुछ ठीक-ठाक ही था| शादी के
बाद सातवें महीने जब मंजू नैहर लौटी, तो उसने अपनी माँ को बताया कि वह फिर से माँ बननेवाली है और
जंचगी तक नैहर ही रहेगी|
 
नौवाँ महीना बीतते ही मंजू ने एक लड़के को जन्म दिया| उसकी माँ को लगा कि अब सभी कुछ ठीक हो
जाएगा और मंजू की जिंदगी भी जीवन की पटरी पर दौड़ पड़ेगी| तीन महीने बाद जब मंजू ससुराल पहुंची, तो
बेटे के साथ बेटी को भी ले गयी|
 
जहाँ नन्ही सी ममता खुश थी कि वह अब अपनी माँ के साथ रहेगी; उसके यहाँ आने से परिवार के अन्य
सदस्यों की भवें तनी रहती थी| आखिरकार एक दिन किशोर ने खुद ही मंजू से कह दिया कि उसे और उसके
परिवारवालों को ममता का वहाँ रहना पसंद नहीं| उसने मंजू से ममता को वापस अपने नैहर भेजने को कहा
जिसके जवाब में मंजू ने कुछ नहीं कहा| वह अगले ही दिन अपने दोनों बच्चों को लेकर नैहर आ गयी|  जब
सप्ताह बीत गया, तो एक दिन किशोर आ धमका|  
 
"क्या हुआ, यहीं पड़े रहने का इरादा है क्या तुम्हारा"किशोर चिल्लाया|
 
"मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूँ; पर मेरे साथ मेरे दोनों बच्चे चलेंगे" मंजू की आवाज में ठहराव था|
 
"नहीं, मैं किसी गैर के बच्चे को नहीं अपना सकता; उसे यहीं रहना होगा"किशोर ने झल्लाते हुए कहा|
 
"फिर मैं अपने दोनों बच्चों को अकेले ही पाल-पोसकर बड़ा कर लूँगी| मैं अपनी बच्ची को अकेले नहीं छोड़
सकती" कहती हुई मंजू रुआँसा हो गयी थी|
 
"मैं भी देखता हूँ कि कब तक तुम्हारा यह तेवर कायम रह पाता है" कहता हुआ किशोर उलटे पाँव लौट गया|
वह लगभग आश्वस्त था कि मंजू बहुत देर सवेर उसके पास लौट आएगी|
 
नैहर रहते अभी तीन महीने ही गुजरे थे कि हालातों ने उससे अपने पैरों पर खड़े होने की फ़रमाइश करनी
शुरू कर दी| कभी बेटी को पेट भर खाना नहीं मिलता तो कभी बेटे के दूध में पानी मिलाने की नौबत आ
जाती| उसकी अपनी भूख और प्यास तो कब की ख़त्म हो चुकी थी| ऐसे में एक दिन वह अपने पड़ोस की
शीला के साथ काम की तलाश में शहर की ओर गयी और शान्ति अपार्टमेंट्स के गौतम घोष के घर में
कामवाली की नौकरी तय करके घर लौटी|
 
वक़्त के कंधे से कन्धा मिलाते हुए पता ही न चला कि कब बारह साल गुजर गए| उसकी बेटी ममता तड़के
सुबह उठकर घर के काम-काज में माँ की मदद करने के बाद सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए जाती थी|
स्कूल से लौटकर फिर माँ की मदद करने में जुट जाती| गाँव  के तीज-त्योहारों में ममता ही वहाँ की औरतों
को मेंहदी लगाती और जो भी पैसे मिलते, माँ को लाकर सब दे देती| उसका भाई, मनोज, सुबह देर से
उठता, तैयार होकर नाश्ता करके इंग्लिश मीडियम स्कूल जाता| स्कूल से लौटते ही गाँव के कुछ अन्य
शरारती बच्चों के साथ मिलकर किसी शैतानी में जुट जाता| मंजू अक्सर उसे लेकर परेशान रहती थी| ममता
की ममता थी कि उसे अपने भाई पर बड़ा लाड़-दुलार आता; उसकी शैतानियों पर भी|
 
मंजू जब ज्यादा परेशान होती तो अक्सर मिसेज घोष को कहती "पता नहीं क्या लिखा है मालिक ने मेरी
किस्मत में!!! इतनी मुसीबतों में भी छोड़े को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा रही हूँ और इक वो है कि पढ़ाई में मन ही
नहीं लगाता है| इतने पैसे ममता पर खर्च कर दूँ तो हर बार अव्वल आये"  
 
"तो ममता पर ही क्यूँ नहीं खर्च करती हो पैसे? गधे को घोड़े बनाने के चक्कर में उस बेचारी के साथ अन्याय
क्यूँ कर रही हो?"
 
"उसने पराये घर जाना है और फिर गधा ही सही, बुढापे में बेटा ही काम आएगा"
 
"कितने भाई हैं तुम्हारे?"
 
"तीन"
 
"फिर तुम्हारी माँ तुम्हारे साथ क्यूँ रहती है?"
 
कबूतर जैसे बिल्ली से बचने के लिए आँखे मूँद लेता है, मंजू बिना जवाब दिए सर झुकाए वहाँ से चल देती|
 
एक दोपहर जब मिसेज घोष टीवी में उन्नाव के किसी साधू के सपने को आधार मान भारतीय पुरातत्व संस्थान द्वारा सोने की खुदाई का समाचार देख रही थी, अचानक से कॉल बेल बजा| दरवाजा खोलते ही मिसेज घोष के सामने मंजू और ममता खड़े थे|
 
"इस समय?"
 
"हाँ, आपसे जरुरी बात करना था"
 
"हाँ, बोलो"
 
"मेरी तबियत बहुत खराब है; आप मेरा हिसाब कर दो"
  
"मतलब? क्या हुआ तुम्हें?"
 
"जी, मुंह आया है मेरा| कुछ खाया नहीं जा रहा"
 
"ये भी कोई बिमारी है भला?" कहते हुए मिसेज घोष हँसी नहीं रोक पायी|
 
"मुझे चक्कर आता है" मंजू चाहकर भी मिसेज घोष को नहीं समझा पा रही थी|
 
"डॉक्टर को दिखाओ, ठीक हो जाएगा"
 
"जी, दवाई तो ले ही रही हूँ| बस आप मेरा हिसाब कर दो"
 
"नहीं करती जा!! छुट्टी ले, आराम कर ले"
 
मंजू और ममता निराश होकर लौट गए| लौट क्या गए, फिर नहीं आये| मिसेज घोष ने कुछ दिन इंतज़ार करने के बाद दूसरी कामवाली को रख लिया|
 
लगभग एक महीने के बाद मिसेज घोष फोन पर अचानक ममता की आवाज़ सुनकर हैरत में पड़ गयी|
ममता रो रही थी|

"क्या हुआ तुम्हें?"

"आंटी, मम्मी हॉस्पिटल में है, तबियत बहुत खराब है| लगता है नहीं बचेगी" कहते हुए ममता सुबक रही थी|

"अरे, ऐसा नहीं कहते| मेरी बात कराओ मंजू से" मिसेज घोष परेशान हो उठी|

"नमस्ते दीदी" मंजू की आवाज़ लड़खड़ा रही थी|

"क्या हो गया तुम्हें?"

"अल्सर बता रहे हैं डॉक्टर"

"ओह!"

"मुझे पैसों की ज़रूरत है"

"हाँ, ममता को भेजो आज ही"

"नहीं, आज नहीं;रविवार को मैं खुद आऊँगी| आप पैसे और किसी के हाथ में नहीं देना; खासकर मेरे बेटे
को"

"ठीक है, जैसा तुम कहो" फोन रखकर मिसेज घोष अवसाद भरी चिंता में डूब गयी| थोड़ी देर बाद खुद को
सम्भालते हुए उठी और हड़बड़ी में नम्बर डायल करने लगी|

"शुनछो गौतोम, मोंजू आर बांचबे ना (सुनो गौतम, मंजू अब नहीं बचेगी)" मिसेज घोष ने पति को फोन लगाया|

"बांचबे ना? माने?(नहीं बचेगी? मतलब?)"

"ओर अल्सर होयेछे, ओ हॉस्पिटल ए(उसे अल्सर हुआ है, वह अस्पताल में है)"

"ओह"

फिर एक लम्बे मौन के बाद दोनों फोन रख देते हैं| पति-पत्नी, दोनों  ही बड़े संवेदनशील हैं|

यूँ तो रविवार का इंतज़ार हर बार लम्बा होता है; पर इस बार कुछ ज्यादा ही लम्बा था|

"तेरे आने का धोखा सा रहा है.........दिया सा रात भर जलता रहा है"शाम के वक़्त मिसेज घोष बेगम अबीदा परवीन के गाने सुन रही थी| कॉल बेल की घंटी के बजते ही दरवाजे की ओर भागी| सोचा शायद मंजू आयी होगी| दरवाजा खोला तो देखा मनीषा थी, उनकी नयी कामवाली|

"सुबह क्यूँ नहीं आयी?"

"क्या बताऊँ मैम, हमारे गाँव की एक लड़की आज अचानक से ख़त्म हो गयी| मैं वहाँ चली गयी थी|"

"हाँ, सारे गाँव का ज़िम्मा तुमने ही तो ले रखा है" मिसेज घोष ने व्यंग करते हुए कहा|

"मैम, यूँ तो कुछ ख़ास मिलना नहीं होता था हमारा, पर उसकी बेटी का रोना देख नहीं रहा गया| बहुत बुरा
हुआ उसके साथ...." मनीषा बोलती ही चली जा रही थी|

"बेटी?"मिसेज घोष को अचानक याद आता है कि मनीषा का ससुराल ही मंजू का मायका है|

"हाँ, आप तो जानते हो उसे| आपके यहाँ काम करने वो भी तो अपनी माँ के साथ आती थी"

"कौन? ममता?"

"हाँ"कहकर मनीषा बर्तन माँजने में व्यस्त हो गयी|

मिसेज घोष झट से फ़ोन लेकर मंजू का नंबर डायल करना चाहती है| अभी-अभी जो सुना, उस पर भरोसा
नहीं हो पा रहा है| मंजू का नम्बर बंद हो चूका है|

मिसेज घोष आँखों को बंद किये रॉकिंग चेयर पर झूलती रही|

भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे.......... मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ................ अबीदा तो जैसे मंजू के लिए ही गा रही थी|

एक महीने बाद, वह भी रविवार का दिन था| ममता अपनी नानी के साथ आयी| उसकी माँ ने मरने से पहले
उसे मिसेज घोष से पैसे लेने को कहा था| आज ममता ने अपनी माँ की चुन्नी से अपना सर ढँका हुआ था|
मिसेज घोष ने सवालों के ढेर लगा दिए| ममता चुप रही| उसकी नानी बता रही थी कि मंजू का दूसरा पति
आकर मनोज को अपने साथ ले गया| कहकर गया था कि मंजू का अंतिम संस्कार करने के सप्ताह बाद उसे
लेकर वापस आ जाएगा| एक महीना गुजर गया, अब भी लोगों को उसके आने का इंतज़ार है|
मिसेज घोष ने ममता के हाथों में रूपये पकड़ाते हुए कहा कि किसी भी मुसीबत में वह उनके पास आ
सकती है| यह सोचकर कि अब ममता का ख्याल रखनेवाला कोई नहीं है और सर्दियाँ दस्तक दे चुकी हैं,
ममता को नया कम्बल भी दिया|

कई महीने गुजर गए| मनोज अपनी नयी दुनिया में व्यस्त हो गया| उधर ममता ढूँढ रही है लोगों की आँखों में अपने लिए थोड़ी सी ममता..... 
 

Monday, November 10, 2014

एक गैर जरुरी कविता

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ज़रूरी नहीं होता कुछ घटनाओं का विशेष होना
जबकि घटते रहना उनका होता है बेहद ज़रूरी
जैसे कि लेते रहना श्वास होता है बेहद ज़रूरी
किसी विशेष दिन जिसमें ज़रूरत से हो अधिक 
कार्बन मोनो-ऑक्साइड की मात्रा हवा में


जैसे होना नाव पर सवार होता है बेहद ज़रूरी
किसी एक विशेष दिन जहाँ पानी में हो उफान
और दिनों से अधिक, और आप पेशे से हों मछुआरे


कहने को तो ज़रूरी यूँ कुछ भी नहीं होता
फिर भी होती हैं कुछ बातें बेहद ही ज़रूरी 
जो समझा जाती हैं आपको मुख़्तसर सी बात  
कि ज़रूरी है हौसला जिंदा रहने के लिए 
और बनाये रखने ले लिए जीवन को
एक मुकम्मल कविता जिंदगी तलक


-------सुलोचना वर्मा

Tuesday, August 12, 2014

पुनर्जन्म

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समझते थे लोग सिद्धांत पुनर्जन्म का
इस देश से लेकर सात समंदर पार तक
कि स्कित्जोफ्रेनिया का आविष्कार नहीं हुआ था तब


तब पेड़ से सेब के नीचे गिरने के लिए 
गुरुत्वाकर्षण के नियम की नहीं
जरुरत होती थी भगवान् की मर्ज़ी की


विश्वास से उत्पन्न हुई सकारात्मकता
देती चली गई साल दर साल 
शुभ और सुखद परिणाम


और भगवान् ??
उसके तो कई टुकड़े किये गए थे
हुआ था जब जन्म मनुष्य में विवेक का
फिर वो रह गया दर्ज़ होकर दंतकथाओं में 
उसे भी लेने पड़े कई जन्म
अपना आस्तित्व बचाए रखने की खातिर 


सबको पड़ी थी जन्मों के फेर की
कि लिखा था गीता में
आत्मा अमर है


जीता रहा इंसान किश्तों में बनकर संतोषी
तय हुआ कि दुःख है परिणाम पिछले जीवन के कर्मों का
और करता रहा अच्छे कर्म अगले जनम के लिए


जन्म लेती रही एक इच्छा मानव शरीर में
हर बार एक नया जन्म लेने की
और हर जन्म के साथ ही
होता रहा जन्म नयी-नयी इच्छाओं का
जन्म और मरण से इतर


पूरी हो जाती है कई इच्छाएं एक ही जीवन में कभी तो
लेना पड़ता है कई जन्म उस एक इच्छा के लिए
जिसके कभी ना पूरा होने की कहानियाँ
हम दंतकथाओं में सुनते आये हैं


-----सुलोचना वर्मा---------
 

Friday, June 27, 2014

ढोंगी

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इस समाज के कुछ लोग
मानते हैं उसे भगवान्
या फिर कोई अवतार
और वह गढ़ता है कुछ कहानियाँ
जिससे बना रहे यह भ्रम लोगों का


नहीं जानते लोग इस समाज के
कि जब वह बांच रहा होता है ज्ञान
महिला उत्पीड़न के विरुद्ध किसी सभा में
उसकी पत्नी कर रही होती है नाकामयाब कोशिश
अपने बदन के खरोंचो को छुपाने की
डाल रही होती है आँखों में गुलाब जल
कि कम हो रोने के बाद आँखों का सूजन
और वह बनी रहे सफल अभिनेत्री साल दर साल


भले ही चिल्लाता हो वह अपने बच्चे की जिद पर
और नहीं संभाल पाता हो उसकी बचकानी आदतें
या कर देता हो उसकी कुछ मांगे पूरी
गैर जिम्मेदाराना तरीके से, छुड़ाने को पीछा
पर कहाँ मानेंगे ये सब उस बस्ती के लोग
जहाँ वह पिलाता है हर पोलियो रविवार को
गरीब छोटे बच्चों को दो बूँद जिंदगी के
धूप में रहकर खड़ा समाज सेवा के नाम


करती है अचरज उसके घर की कामवाली
कि साहेब धमका आते हैं हर बार उसके पति को
जब भी वह उठाता है हाथ उसपर
और देती है दुआएं मालकिन को सुहागिन बने रहने की
सहम जाते हैं पुलिसकर्मी भी देखकर
उसके खादी के कुरते को
और लगाते हैं जयकारा साहेब के इस महान कृत्य पर


घर के सामने पार्क में खेलते सभी बच्चे हैं उसके दोस्त
और गली के हर कुत्ते ने खाया है उसके हाथ से खाना
मुहल्ले के सभी बुजुर्गों को झुक कर करता है प्रणाम
मदद के लिए सबसे पहले लोग उसे करते हैं याद


डाल आई है आज उसकी पत्नी
तलाक की एक तरफा अर्जी अदालत में
और सोच रही है कौन सी सूचना उसे मिलेगी पहले
एक झूठे रिश्ते से उसके निजात पाने की
या सार्वजनिक सेवा व सामुदायिक नेतृत्व का मैग्सेसे पुरस्कार
उस ढोंगी के नाम होने की !!!


सुलोचना वर्मा

Thursday, June 19, 2014

इच्छा-मृत्यु

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वो कर देगा आज़ाद
मुझे मेरी देह से
और बन जाएगा सूरज
दर्द से मेरी मुक्ति के मार्ग का
करता है यकीं वह
जिंदगी में जिंदगी के बचे होने पर
उसे है बेपनाह मोहब्बत
मेरी जिस्म से भी ज्यादा मेरी रूह से  !!!


सुलोचना वर्मा
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Euthanasia is the Word

Sunday, June 8, 2014

सहायिका

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नहीं कह पायी शुक्रिया मैं उस माली से
लगा गया जो पेड़
गुलाबी चम्पा का हमारी बगिया में

कहाँ दे पायी शाबाशी मैं उस चुनचुन चिड़िया को
दिखा गयी जो नाच
बस कुछ दाने चुगकर बालकनी में

पर कह देती हूँ धन्यवाद हर बार सहायिका से
जो करती है काम पैसे लेकर
बड़े ही अनमने तरीके से घर में

सहायिका का होना तय करता है
चम्पा का गुलाबी होना मेरे लिए
और यह जानना कि नाच सकती है चुनचुन चिड़िया

कितना ज़रूरी है सहायिका का होना जीवन में

-----सुलोचना वर्मा----------

Monday, May 26, 2014

उम्र

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मेरे तुम्हारे बीच
आकर ठहर गया है
एक लम्बा मौन
छुपी हैं जिसमे
उम्र भर की शिकायतें
हर एक शिकायत की
है अपनी अपनी उम्र

उम्र लम्बी है शिकायतों की
और उम्र से लम्बा है मौन

-----सुलोचना वर्मा------

Saturday, May 17, 2014

सादगी

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रूठ गयी चूड़ियाँ कलाई से
आईना देखता रहा 
बिंदी जा लिपटी मेरी परछाई से
और देखती रही एकटक मुझे |


मुझे मुझमे विलीन होता देख
जाते-जाते  बिछिया ने पाँव में काटी
एक ज़ोरदार चिकोटी  !


भारी हो उठा पाजेब द्वन्द में
घूँघरू मोती बरसाते रहे
बिलख उठा बाजू पर बँधा ताबीज़
पिघलता चला गया उसमे भरा मोम
और उड़ गयी दुआ पंख लगाकर दूर वीरानो में |


आँखों ने सोख लिया सारा का सारा काजल
और भरती ही चली गई अंतस की सुरमेदानी में |


घूर रही हैं पेशानी पर तैरते सवालों को
मेरी बेनाम सी अधूरी ख्वाहिशें
कुछ और उलझ गयी हैं
मेरे माथे की मुलायम लटें
शूल सा चुभ रहा है ह्रदय में
गले की हार से लगा लॉकेट
लहुलुहान कर गया मुझे बेतरतीब होकर
सादगी का ये प्रौढ़ आलिंगन !!!


(c)सुलोचना वर्मा

Monday, April 21, 2014

क्या होती हैं माँ

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सोचती हूँ लिख डालूँ एक कविता
वर्णन हो जिसमें माँ की ममता का
पढ़ें जिसे अनाथालय के बच्चे
और जान सके क्या होती है माँ


सोचा है कहूँगी उनसे
जेठ की तपती दुपहरी में
इकलौते छाते से ढंकती है जिसका सर
यमुना पुस्ता में रहनेवाले उस छोटे बच्चे से पूछे
पूछे मयूर विहार की उस नन्ही लड़की से
जिसकी गुड़िया के कपड़े सिले हैं माँ ने
अपनी रेशमी साड़ी के ज़रीदार आँचल से
बड़े ही चाव से, कई रातें जागकर
और जिसकी एक मुस्कान के लिए
माँ ने बिसार दिए अपने सारे दुःख
उसके माथे पर माँ का हाथ
आया है बनकर जवाब ईश्वर की प्रार्थना का


फिर सोचती हूँ ....
कहाँ लिख पाएगी कोई कविता
कि क्या होती हैं माँ 
और अनाथालय के बच्चों ने कभी थककर
माँ की गोद में सर भी तो नहीं रखा होगा
नहीं पुकारा होगा कभी अँधेरे में डरकर माँ को 
कहाँ देखा होगा कभी अपनी तकलीफों में
ढाढ़स बँधाता माँ का विह्वल चेहरा


ऐसे में मेरी कविता ढूँढती रह जायेगी अपने अर्थ
जिसके सारे शब्द समवेत स्वर में भी
नहीं बता पायेंगे कि क्या होती है माँ



Sunday, March 2, 2014

सम्बन्ध

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एक नया सम्बन्ध
जो पैदा होता है मंद मुस्कान लिए
अंतःकरण की उपजाऊ सतह पर
जब फूटता है संभावनाओं का विरवा
जैसे जैसे सम्बन्ध तय करता है
अपने उम्र की दूरियां
बढ़ता ही चला जाता है
पैमाना संबंधों का
जुड़ जाते हैं कई शब्द
क्या, किंचित, यदि जैसे
रह जाते हैं कई प्रश्न अनुत्तरित
और खामोशी बयाँ कर देती है
कुछ अनकहे वाकये
चढ़ने लगता है सम्बन्ध फिर
अनुबंध की सीढियां
आखिरी सीढ़ी अनुबंध की
लाकर खड़ा कर देती है
बौद्धिकता की उस छत पर
लग जाता है जहाँ रिश्तों पर
प्रतिबन्ध का ताला
और हर प्रतिबन्ध के उस पार
पास के किसी दरीचे से झाँक
मंद मंद मुस्कुराता है
एक नया सम्बन्ध


(c)सुलोचना वर्मा

Wednesday, February 26, 2014

अतुकांत

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मनुष्य की अनंत इच्छाएं
जान लेना चाहती है वह सब कुछ
जो परे है उसकी समझ से
मान लेना चाहता है मानव
स्वयं को बुद्धिजीवी
और तर्क ढूंढने लगती है
उसकी  बौद्धिकता
हर होनी के पीछे का
तोड़कर प्रकृति के हर नियम
कर लेना चाहता है
स्वयं को अनुशासित
निज भी गढ़ता है नित्य नए प्रमेय 
और रखता है दृढ विश्वास
उन पौराणिक कथाओं में
हुआ था जिनका सूत्रपात
पाषाण युग की किसी कन्दरा में
और व्यतीत हो जाता है
जीवन को छंद मान
मात्रा नापने और तुक बैठाने की
इस आपाधापी में
जीवन का हर वसंत
जो बना देती है जीवन को
एक पर्ण विहीन वृक्ष
शब्द सूखकर झड़ जाते हैं जिससे
वक़्त के क्रूर पन्नो पर
और नहीं कर पाते चिन्हित कोई भाव 
आह ! यदि जीवन धारा
ढल जाती बन अतुकांत कविता
तो शब्द पिघल पिघल कर
भाव की सरिता में बहते
और बहते बहते जा मिलते
अनंत के सागर में
होता जीवन तब सार्थक
धरती पर जन्म लेकर

सुलोचना वर्मा

Friday, February 14, 2014

मेरा चेतन कहता है


नहीं मिलते इस जड़ के तेवर मेरे चेतन से
ठन गयी है इन दोनों की आपस में
अजब सी उथल पुथल मची है मेरे अन्दर
साज़िश लहू बन दौड़ रही मेरे रग में


मेरा चेतन कहता है - चलो बेल का पेड़ लगायें
बूँद बूँद उसे सींचे निर्मल जल से
करे उत्सर्ग किसी शिवलिंग पर उसके पत्ते
और उसका अमृत  फल गरीबों में बांटें


बुदबुदाता है जड़ सुनकर चेतन की बातें
लगेंगे पुरे पंद्रह वर्ष बेल पर फल आने में
क्यूँ पेड़ सींचने में वक़्त करना है जाया
इससे तो कहीं भला है मर कर जल जाने में


इतराता है जड़ लिए कुटिल मुस्कान अधरों पर
सोचता क्या मैंने कभी गणित पढ़ा जीवन में
मुझसे तो  लम्बी मेरी पीड़ा की उम्र है 
क्या लग पायेगा इस चक्र, फल जीवन के वृक्ष में


खिलखिलाकर हँस देता है मेरा चेतन तब
कहता है हाथ धर जड़ के कंधे पर
नहीं देखा है मौत को मैंने अब तक
रख दो बीमारियों को वक़्त के चरखे पर


ये मेरे निर्धारित कार्यक्रम हैं , पुरे होकर रहेंगे
नहीं छुपेंगे जड़ की शिथिलता के बादलों में
मैं चेतन हूँ, अनंत हूँ , अमर हूँ गतिमान
क्या बाँध पायेगा कोई अशरीरी को साँकलों में


सुलोचना वर्मा


 

Sunday, February 9, 2014

बहुरुपिया

नही थी परवाह उसे लिंग या मज़हब की
अक्सर बदलकर आता वो अपनी वेश भूषा
बुनता धर्म और समाज के ताने बाने
हमारे गाँव रहता था एक बहुरुपिया


उसकी अभिनय क्षमता ढाल देती थी
उसे नये नये किरदारों में
वो लोगों के जीवन में लगाता सेंध
और निकाल लाता उनके अंदर से अनदेखा सच


कई चेहरे निकल आते थे
हरे नीले दरवाज़ों के पीछे से
जब बहुरुपिया निकल आता था सड़कों पर
दौड़ जाती थी खुशी लोगों के चेहरों पर


बहुरुपिए आज भी निकलते हैं सड़कों पर
पर नही दिखती खुशी की परछाई तक किसी चेहरे पर
कभी खुद को किसी और में ढूंढता; तो कभी किसी मे खुद को पाता
हर कोई जी रहा है दोहरी सी ज़िंदगानी


सीमित है धर्म अब, समाज बिखर सा गया
सिमट गयी घर की देहरी, मंदिर भी ताला जड़ा
अब जंगल के लूटेरों से लेकर, मंदिर के पुजारी तक
शहर की गलियों से, गाँव के नुक्कर तक, हर कोई बहुरुपिया है


सुलोचना वर्मा

Wednesday, February 5, 2014

पराया धन


बाँध दी गयी
दहलीज़ों में
बनी दान सामग्री
रिवाज़ों में
हो गयी अभिशप्त
घरों में
परिवर्तित की गयी
पत्थरों में
बाँट दी गयी
पतियों में
हो गयी तिरस्कृत
समाजों में
झोंक दी  गयी
तंदूरों में
निहित था
केवल दो शब्दों में
"उसके"
संपूर्ण जीवन का सार
"वह"
"पराया धन" थी


सुलोचना वर्मा