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Saturday, October 31, 2015

भूख-2

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तोड़कर धरती की गहरी नींद
जग उठता है मिटटी का चूल्हा
अदृश्य सीढ़ियों से उतर आती है भूख


किसी हवन कुण्ड सा दिखता है चूल्हा
भूखे साधक को, पेट भरने के अनुष्ठान में
साधना को भंग करती है तृप्ति
चूल्हा ध्यानमग्न हो जाता है धरती की साधना में


बीत गया एक अरसा, बीते हुए मिट्टी को चूल्‍हे से
कितने साधक आए, की साधना और चले गये
गुम हो गये, लौटकर भूख के अतृप्त प्रदेश में
बनकर साक्षी देखता रहा समय का पैगंबर


नहीं जगाता अब किसी को भी नींद से मिट्टी का चूल्हा
कि धरती को अब नींद ही कहाँ है आती
भूख है कि अदृश्य सीढ़ियों से फिर भी उतर आती है!


----सुलोचना  वर्मा--------

Sunday, March 1, 2015

भूख

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मैंने देखा है उन्हें भूख से कुलबुलाते हुए
जब पार होती है उनके सहने की सीमा
वो चबाने लगते हैं संविधान के ही पन्ने
या शहीदों पर चढ़ी माला के फूलों को 
जिससे थोड़ा और पंगु हो उठता है देश
और थोड़ा भारी हमारे मुल्क की पताका
जो फहर तो जाती है ऊँचे आसमान में
विश्व के मानचित्र पर गर्व से नहीं लहराती


अब यह कोई आम भूख तो है नहीं
जो लगे अलसुबह के नाश्ते से लेकर
रात के खाने तक के सफर के ही बीच
यह एक ऐसी भूख है जो कभी नहीं मिटती
इसीलिए जब कभी नहीं भरता उनका पेट
मिठाई, रोटियों, फलों या सब्जियों से
जानने को अपनी इस भूख का आयाम
वो किसानों की जमीन ही खा जाते हैं


-----सुलोचना वर्मा----------