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Sunday, July 4, 2021

नहीं कहा पिता ने कभी

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एक दिन किसी साहसिक कथा ने पसारे अपने पंख 

और जिस उम्र में ब्याही जा रही थीं मेरी सखियाँ 

पिता ने मुझे पढ़ने, कुछ बनने के लिए दूर शहर भेजा 


एक दिन अंधकार सहसा गया सालाने अवकाश पर  

और जब लड़कियों का स्वप्न देखना भी होता था गुनाह 

पिता ने मुझे दिलाया मेरा पसंदीदा रंगीन धूप चश्मा


एक दिन कहानियों से रूपकथा उतर आई जीवन में

और जहाँ समाज में कन्याओं का दान किया जाता रहा 

पिता ने की मेरे प्रेमी से रो-रोकर मेरे लिए प्रेम की याचना    


दिन प्रतिदिन पितृसत्ता ढ़ोते पुरुष ने सहा प्रेम का चाबुक 

प्रेम है, ऐसा कुछ नहीं कहा पिता ने कभी 

प्रेम है, पिता ने हर बार निभाकर दिखाया   


Friday, September 11, 2015

उन दिनों-२ (पिता के लिए)

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पड़ जाते थे बल पिता की पेशानी पर उन दिनों
सोचते हुए हमारे उज्जवल भविष्य के विषय में 
पर हम नहीं देख पाते थे चिन्ता उन रेखाओं में
और करते थे याद मानचित्र पर बनी कर्क रेखा को


उन दिनों हमारी समस्त चिन्तायें करती थी वास 
पृथ्वी की उत्तरतम काल्पनिक अक्षांश रेखा पर
जिसपर चमकता है सूर्य लम्बवत दोपहर के समय
तब आकाश के चाँद से लेकर परियों के देश तक
भौगोलिक हुआ करती थीं हमारी तमाम समस्यायें


पिता के मेहनत से जमा हुई सिक्कों की रेजगारी
तो हमारे रंगीन सपनों में उग आये ऊँचे पहाड़
वह दूरदृष्टि ही थी किसी उपत्यका में बसे पिता की
कि हम लाँघ सके चुनौतियों की कई पर्वत श्रृखला


अब, जबकि समय बह गया है पानी की तरह
सोच रही हूँ इस जीवन के डमरुमध्य में खड़ी मैं
पिता ने जोड़े थे परिश्रम की दोमट मिट्टी के कण
तब जाकर कहीं उर्वरा हुई हमारी जीवन की जमीन


याद नहीं रहता मुझे कोई भी मानचित्र आजकल
जब भी देखती हूँ अब, मुझे पिता ब्रह्माण्ड लगते हैं|


-------सुलोचना वर्मा---------

Sunday, June 21, 2015

जन्मदाता

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लेकर जाते रहे जहाँ हम अपनी फरियाद
रही हमारे जीवन में किसी मंदिर जैसी माँ
पिता हुए तीर्थ स्थल जीवन की धरती पर
कि पूरी हुई हमारी जितनी माँगें थीं वहाँ


दुनिया में थी भीड़ और भटक जाना था तय
फिर माँ जैसा कोई अवलम्ब होता है कहाँ
हम भूले, हम भटके, फिर घर को भी लौटे
कि पिता नाम का मानचित्र अंकित रहा यहाँ


-----सुलोचना वर्मा-----