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Saturday, March 19, 2016

भारत माता की जय

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सख्त परहेज है उन्हें क्रांति की तमाम बातों से 
जबकि वो कर सकते हैं बातें घंटों देशभक्ति की 
जहाँ प्रतिरोध को रखते हैं वो देशद्रोह की श्रेणी में 
वो कर सकते हैं उग्र प्रदर्शन अपनी शक्ति की 

उनकी समझ से है परे तर्क और विज्ञान की भाषा 
कि अंधविश्वासी होना है उनका जन्मसिद्ध अधिकार 
आपत्ति नहीं उन्हें सामाजिक छुआछूत और घृणा से 
बस आप नहीं कर सकते हैं तो अपनी मर्जी से प्यार 

उनकी बातों में है घृणा का मवाद, कुंठा की लय 
कर सकते हैं वो निर्वस्त्र स्त्रियों को भी बीच सड़क में 
और चिल्ला सकते हैं खड़े होकर निर्लज्ज और निर्भय
"भारत माता की जय"! "भारत माता की जय"!

रो देती है भारत माता देखकर अपनी ऐसी दुर्दशा 
जहाँ मानवता की सुनहरी फसल का हो रहा हो क्षय 
चिल्ला रहे हैं उसके बच्चे  कर एक-दूसरे की हत्या 
 "भारत माता की जय"! "भारत माता की जय"!

-----सुलोचना वर्मा-----------

Friday, September 11, 2015

हवा का रुख बदल रहा है

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हवा का रुख बदल रहा है!
बता गये लौटते हुये ओखला विहार के प्रवासी पक्षी
हरे-भरे पेड़, जो काटे गये रोजगार के नाम पर
काटे जाने से पहले बता गये कि रुख बदल रहा है!
कह गयी पुरवैया चुपके-चुपके से कानों में
कि देखो- हवा का रुख बदल रहा है!
सुबह और शाम निरन्तर बढ़ती धुएं की मोटी परत
जो कि हासिल है विकास की, चिढ़ा कर कहती है
बदल रहा है! बदल रहा है!
हवा का रुख बदल रहा है!

खेतों में लगा प्याज कह रहा है टमाटर से
बदल रहा है! हवा का रुख बदल रहा है!
हरे खेतों पर उग आये कंक्रीट के जंगल
कब से बता रहे हैं  --- बदल रहा है!
धुंधलाता तारा, बाउल का इकतारा 
सभी तो कह रहे हैं  --- बदल रहा है!
बदल रहा है! बदल रहा है!
हवा का रुख बदल रहा है!

गँवायी जिन्होंने जमीन भूमि अधिग्रहण में
बसी रही गरीबी जिनके घर के हर कण में
उन्हें तो पता है --- बदल रहा है!
चाय बगान के दरवाजों पर लटकते ताले
खाने को नहीं जिनके सूखी रोटी के निवाले
उन्हें तो पता ही है --- बदल रहा है!
बदल रहा है! बदल रहा है!
हवा का रुख बदल रहा है!

पत्रिकाओं में कवि और अखबार की छवि
सभी बता रहे हैं  --- बदल रहा है!
इस दौर का खुलूस, सड़कों का जुलूस
बता रहा है  --- बदल रहा है!
विचार अक्षुण्ण, बुद्धिजीवी का खून
कह रहा है --- बदल रहा है!
बदल रहा है! बदल रहा है!
हवा का रुख बदल रहा है!

-------सुलोचना वर्मा------------

Saturday, March 22, 2014

सुनो भगत

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सुनो भगत, तुम्हे कर रही हूँ संबोधित  
अपने ह्रदय पर एक अपराध बोध लिए
लज्जा आती होगी तुम्हे हमारी कृतघ्नता  पर
और पछतावा अपनी शहादत के लिए


काँप रहे हैं लोग बदलाव के विचारों से
और कर रहे हैं अब तमंचे पे डिस्को 
वही तमंचा, जिसे तुमने उठाया था
क्रान्ति और आज़ादी के लिए  


कर रहे लोग व्याख्या, क्रांति का शब्दों में
हैं अपने अपने फायदे, है अपना अपना अर्थ
ले रहे हैं प्राण अपने ही देशवासियों का
हिंसा और साम्प्रदायिकता के लिए


लगाते हैं तुम्हारे पोस्टर करने को दिखावा
केवल और केवल एक प्रतीक स्वरुप मान
भरकर क्रान्ति का नए स्वर में हुंकार
करते हैं  इस्तेमाल तुम्हे राजनीति के लिए


खड़े हैं दो अलग अलग ध्रुवों पर - वो और तुम
क्रमशः कुमकुम और रक्त लिए अपने अपने माथे पर
तुम अमर हो आज भी देश के हर इन्क़लाब  में
और वो, मौन हैं अपनी धृष्टता के लिए 


विस्मृत हुआ तुम्हारी क्रांति का अंतिम पड़ाव 
तुम्हारे ही जान से प्यारे इस हिन्दुस्तान  को
ऐसे में क्या तुम आ सकोगे फिर एक बार
अपनी क्रांति की पुनरावृति के लिए


सुलोचना वर्मा