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Wednesday, July 18, 2018

बाउजी ने कहा

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ट्रेन की सीटी बजी
और वह चल पड़ी |
छोड़ते हुए बेटी का हाथ 
कट्टर माने जानेवाले बाउजी ने कहा -
"जा सिमरन जी ले अपनी जिंदगी"
और वह दौड़ पड़ी नायक की ओर 

फिल्म का अंतिम दृश्य देख सोचती रही 
वह असाधारण खूबसूरत युवती 
कि क्यूँ नहीं ऐसा उसके बाउजी ने कहा 
उसे उसकी मर्जी के खिलाफ ब्याहे जाने से पहले 
क्या उसकी जिंदगी अपनी नहीं थी !!!

Sunday, July 30, 2017

चरित्रहीन

(शरतचंद्र की किरणमयी के लिए)
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शरत बाबू ऐसे गए कि नहीं लौटे फिर कभी 
पर लेती रही जन्म तुम किरणमयी रक्तबीज सी 
दुनिया मनाती रही शरत जयंती बरस दर बरस 
नहीं बता गए शरत बाबू तुम्हारा जन्मदिन संसार को 
कि रहा आजन्म, जन्म लेना ही तुम्हारा सबसे बड़ा पाप 
और इस महापाप का ही तुम करती आ रही हो पश्चाताप 

अपने नयनों पर बनाकर पथरीला बाँध 
रोका तुमने अजश्र बूँदो का समुद्री तूफ़ान 
पास- परिवेश के पुरुषों का बन आसमान 
छुपाती रही अपनी समस्त असंतुष्टियों को 
स्निग्ध मुस्कान की तह में तुम घंटो चौबीस 
पढ़ाकर उन्हें अपने ही दुर्भाग्य का हदीस !!!

दिखता है तुम्हारे होठों पर मुस्कान का खिला हुआ ब्रह्मकमल 
जो बाँध लेता है अपनी माया से सबको, गहरे उतरने नहीं देता 
अदृश्य ही रह जाता है मन की सतह पर जमा कीचड़ लोगों से 
ठीक जैसा तुम चाहती हो अपनी लिखी कहानी की भूमिका में 
परिस्थितियों के बन्दीगृह का तुम अक्सर टटोलती हो साँकल 
गहन अन्धकार से नहा, पलकों पर लेती सजा, बिंदु -बिंदु जल 

निज को उजाड़ कर बसने देती हो पति का अहंकार घर 
रखती हो शुभचिंतकों को खुश अपनी अभिनय क्षमता से 
सजाती हो सामजिक आडम्बर से अपना प्रेमहीन संसार 
तुम्हारा असंदिग्ध भोलापन ही तो है सबसे बड़ी बीमारी 
कभी आईनाखाने जाकर देखो अपने होठों की उजासी 
हाँ, है तो फूलों सी ही बिलकुल, मगर वह फूल है बासी 

देखो उन मधुमक्खियों को, जो कर रही हैं चट 
छत्ते पर बैठ खुद अपना ही शहद संग्रह झटपट 
कि उन्हें पता है वो रहती हैं भालुओं के परिवेश में 
कब तक उड़ाती फिरोगी सपनों को सन्यासिनी के भेष में 
न करो फ़िक्र जमाने की, बाँध लो चाहनाओं को अपने केश में
क्या हुआ जो होना स्वतंत्र स्त्रियों का, है होना चरित्रहीन इस देश में 

अपने होठों पर फूलों की उजास नहीं, सूरज की किरण उगाओ  
सुनो समय की धुन लगाकर कान समयपुरुष के सीने से किरणमयी
बिखरो नहीं, गढ़ लो खुद को फिर एकबार अपने पसंद के तरीके से 
मत जिओ औरों की शर्त पर और, रखना सीख लो तुम शर्त अब अपने 
सुनती आई तो हो जमाने से जमाने की, सुनो अब केवल अपना ही कहना 
अपनी पुण्य आत्मा को कष्ट देने से तो है बेहतर तुम चरित्रहीन ही बनी रहना 

Tuesday, August 9, 2016

जरूरतें

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सम्मान और सामान
श्रुतिसम भिन्नार्थक शब्द थे
स्त्री के लिए पुरुष के शब्दकोष में
जिनका अर्थ तय करती थीं जरूरतें
वक्त बेरहम अक्सर पलट जाता था

---सुलोचना वर्मा -------

Monday, October 12, 2015

आकार

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सब जानते हैं  
कि वह नही बेल पाती
चाँद सी गोल रोटियाँ
और ना ही बेल पाती है
समभुज त्रिकोण वाले पराठे


पर वह भरती है पेट कुछ लोगों का
लाकर चावल, आंटे, नमक और घी
साथ ही लाती और भी कई ज़रूरी सामान
जो होने चाहिए किसी रसोई में

है शुद्ध कलात्मक क्रिया
पेट भर पाना, अपना और औरों का
कि जहाँ पेट हों भरे ,
लोग निहार सकते हैं चाँद को घंटों
और कर सकते हैं चर्चा उसकी गोलाई की


भरा पेट देता है दृष्टिकोण
कि आप देख पाएँ
बराबर है त्रिभुज का हर कोण


सामान्य है ना बेल पाना
रोटियों और पराठों का
कमाकर लाना भी सामान्य ही है


असामान्य है समाज का स्वीकार लेना
एक ऐसी स्त्री को, जो सभी का पेट भरते हुए
नही बेल पाती है सही आकार की रोटी और पराठे 


रसोई के बाहर अमीबा नज़र आती है स्त्री

-----सुलोचना वर्मा-------