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Friday, November 1, 2013

दीपावली

हे शीतन समीर !
तुम तनिक विराम ले लो
दीपों का उत्सव आने को है


अमावश्या की सघन कालिमा
फिर से चहूं ओर छाने को है
अवकाश पर होंगे चाँद औ तारे
असंख्य जूगनू टिमटिमाने को है
हे शीतन समीर..................


रोन्द डाली गयी माटी फिर
चाक उसे घुमाने को है
देने को दिए की आकृति
कुम्हार उसे सहलाने को है
हे शीतन समीर..................


बिटिया रानी चपल हाथों से
चटक रंगोली बनाने को है
घरोंदा भी क्या खूब सजेगा
बस फुलझड़ियाँ जलाने को है
हे शीतन समीर..................


दीप प्रज्वलित घर औ देहरी पर
अंधकार अब हटाने को है
कर चरितार्थ दीप के दिव्यार्थ को
मानव मन-तिमिर मिटाने को है
हे शीतन समीर..................


सुलोचना वर्मा