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Saturday, August 27, 2016

भूल

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जब हमें सीखना था चीजों को बनाना 
हम खरीद रहे थे उन तमाम चीजों को 
जब हमें सीखना था शऊर बांटने का 
हम गिन रहे थे कुछ चीजों की कमी 

जब हमें करना था अपने चरित्र का निर्माण 
उन दिनों हम सीख रहे थे प्रतिस्पर्धा करना
जिन दिनों हमें जानना था महत्व चीजों का 
हम भागते चले जा रहे थे सफलता के पीछे 

हमने दोहराया उन भूलों को जिन्हें नहीं सुधारा कभी भी 
हमने चीजों को ही जिंदगी समझ लेने की बड़ी भूल की 
हमारी भूल से बढ़ा लीं हमने चीजें और छूटती गयी जिंदगी 
जबकि जिंदगी से अधिक खूबसूरत चीज और कुछ भी नहीं  

--सुलोचना वर्मा-----

Wednesday, June 1, 2016

उन दिनों(प्रेम)

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                          1.
उसने कहा "मैं हूँ और मेरा वक़्त है"
और ऐसा कहकर माँग लिया मेरा साथ  
वह एक बेहद थका हुआ समय था 
जिसमे चल पड़े थे हम तेज क़दमों से 
उन दिनों हमारा वक़्त हमसे माँग रहा था केवल प्रेम  

                         2.
वक़्त जो माँग रहा था प्रेम, बदल गया 
अब सिर्फ था वह और थी उसकी जरूरतें 
उन जरूरतों की सूचि में कहीं भी नहीं थी मैं 
लाज़िम था मेरी जरूरतों को नहीं दिया उसने अपना वक़्त  
ऐसे में अब सिर्फ बेशर्म वक़्त ही था जो रह गया मेरे पास  

                        3.
मुस्कुरा देती हूँ मैं अक्सर यह सोचकर कि मालूम था उसे 
कि बंद पड़ी थीं तमाम घड़ियाँ मेरे घर की, एक अरसे से
और मैं नहीं चल रही थी समय के साथ मिलाकर ताल 
वह जानता था बख़ूबी कि वक़्त नहीं लगता है वक़्त बदल जाने में 
और यह भी कि जरूरतें बदल जाती हैं वक़्त के ही साथ 

                       4.
आज भी बंद पड़ी हैं तमाम घड़ियाँ मेरे घर की 
कि उसमें दर्ज है वह समय जब हम पहली बार मिले थे 
घड़ी में तीन बजाते काँटों की शक्ल बनाती है आकार उसकी ऊँची नाक की
जो थोड़ा और तन जाती है मेरी हर शिकायत के बाद 
गिर रही हूँ मैं प्रेम की गहरी खाई में इन दिनों, मुझे घेरे खड़ा है वक़्त का ऊँचा पहाड़ !!!!

आई ऍम फॉलिंग इन लव - प्रेम में गिर जाना जिसे कहते हैं!!!

---सुलोचना वर्मा -------

Friday, September 11, 2015

उन दिनों-२ (पिता के लिए)

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पड़ जाते थे बल पिता की पेशानी पर उन दिनों
सोचते हुए हमारे उज्जवल भविष्य के विषय में 
पर हम नहीं देख पाते थे चिन्ता उन रेखाओं में
और करते थे याद मानचित्र पर बनी कर्क रेखा को


उन दिनों हमारी समस्त चिन्तायें करती थी वास 
पृथ्वी की उत्तरतम काल्पनिक अक्षांश रेखा पर
जिसपर चमकता है सूर्य लम्बवत दोपहर के समय
तब आकाश के चाँद से लेकर परियों के देश तक
भौगोलिक हुआ करती थीं हमारी तमाम समस्यायें


पिता के मेहनत से जमा हुई सिक्कों की रेजगारी
तो हमारे रंगीन सपनों में उग आये ऊँचे पहाड़
वह दूरदृष्टि ही थी किसी उपत्यका में बसे पिता की
कि हम लाँघ सके चुनौतियों की कई पर्वत श्रृखला


अब, जबकि समय बह गया है पानी की तरह
सोच रही हूँ इस जीवन के डमरुमध्य में खड़ी मैं
पिता ने जोड़े थे परिश्रम की दोमट मिट्टी के कण
तब जाकर कहीं उर्वरा हुई हमारी जीवन की जमीन


याद नहीं रहता मुझे कोई भी मानचित्र आजकल
जब भी देखती हूँ अब, मुझे पिता ब्रह्माण्ड लगते हैं|


-------सुलोचना वर्मा---------

Thursday, August 14, 2014

उन दिनों

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नहीं उगे थे मेरे दूध के दांत उन दिनों
फिर भी समझ लेती थी माँ मेरी हर एक मूक कविता
जिसे सुनाती थी मैं लयबद्ध होकर हर बार
जैसे पढ़ा जाता है सफ़ेद पन्ने पर ढूध से लिखी इबारत को
ममता की आंच में स्पष्ट हो उठता था मेरा एक-एक शब्द


माँ ने अपनी कविता में मुझको कहा चाँद
और उस चाँद से की मेरी नज़र उतारने की गुज़ारिश


चाँद ने बदले में लिख डाली कविता
अपनी रौशनी से मुझ पर


उन दिनों चाँद पर एक औरत
दोनों पाँव पसारे
रेशमी धागों से गेंदरा सिला करती थी 
जिसके किनारों पर लगे होते थे
मेरी माँ की साड़ी के ज़री वाले पार


----सुलोचना वर्मा-----