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Saturday, February 11, 2017

खाली बर्तन सा रिश्ता

आसपास के किसी घर में, जब किसी के हाथ से कोई खाली बर्तन गिर जाता है, तो देर तक वह आवाज हमारे कानों में गूँज रही होती है और हमें यह आवाज परेशान करती है| यही बात रिश्तों के साथ भी है| रिश्ता किसी का भी टूटता है, तो दर्द हमें भी होता है| ये खाली बर्तन इतना शोर क्यूँ करता है? हाथ से ज्यादातर खाली बर्तन ही गिरता है इसलिए कि हम उसे संभालने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करते| हमारा यह अतिरिक्त आत्मविश्वास हमें धोखा दे जाता है| रिश्ते भी तभी टूटते हैं जब वह प्रेम या परवाह से खाली हो जाते हैं| कल किसी परिचित का रिश्ता टूटा| बात भी कभी-कभार ही होती थी उससे, फिर भी एक शोर अब तक मेरे अन्दर मचा हुआ है|

पास के कमरे में बेटी हाई वॉल्यूम पर "चीप थ्रिल्स" सुन रही है, साथ में गा रही है और शायद थिरक भी रही है| कायदे से तो मुझे अपने अन्दर मचे इस शोर से मुक्ति पाने के लिए उसके साथ शोर मचाते हुए थिरक लेना चाहिए, पर मेरे अन्दर मचा यह शोर ही मुझे रोक लेता है| संजीदगी और संवेदनशीलता बेहद बुरी शय है| हम नहीं कह पाते "भाड़ में जाए दुनिया, हम बजाए हरमुनिया" 

Tuesday, December 27, 2016


इम्तिहान की बारिश के संग
देखें आत्मीय रिश्तों के रंग

Wednesday, June 29, 2016

रास्ता

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बनाया जा रहा है रास्ता
पहाड़ों को काटकर कहीं
तो कहीं रिश्तों को काटकर
वहाँ कड़ी है धुप, छाँव नहीं

---सुलोचना वर्मा--------

Wednesday, November 18, 2015

अव्यक्त

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मुझे समझना इतना जटिल तो न था
जितना होता है दुरूह व्याकरण
जैसे क्रिया के रूप, अव्यय, समास
मेरे दुःख में है शामिल सर्वनाम
जो आया तुम्हारे हिस्से संज्ञा की जगह


जहाँ मुझे समझने की कोशिश की
अंकगणित के किसी प्रमेय की तरह तुमने
सरल रही मैं बीजगणित के संकेतों सी
अज्ञात रहा मेरा मान तुम्हें आरम्भ से अंत तक
और नहीं निकल पाया रिश्तों के समीकरण का हल


रेवती, स्वाति,मृगशिरा या अनुराधा 
नहीं रही मैं आकाश में स्थित नक्षत्र ही
कि मुझ तक पहुँच पाना हो दुष्कर
मुझे जल्दी थी पहुँचने की मंजिल तक
और तुम्हें जाना ही नहीं था कहीं भी


कुछ बातें थीं मेरी जो रह गयीं अनुच्चारित
जानने की कोशिश ही नहीं की जिन्हें तुमने
किसी गैर-जरूरी प्रागैतिहासिक भाषा की तरह
जहाँ सालता रहा मुझे कुछ न कह पाने का कष्ट
अव्यक्त इच्छाएं तुम्हारी समय करता रहा स्पष्ट


----सुलोचना  वर्मा--------

Wednesday, September 9, 2015

आखिरी संवाद

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उस आखिरी संवाद में उसने खर्चे 
शब्दकोष के सबसे सधे हुए शब्द
की प्रेम की सबसे सुन्दर व्याख्या
सम्बन्ध को कहा प्रकृति का प्रारब्ध


खर्चे हुए शब्दों में थी गरमाहट
डेगची से निकलती भाप जितनी
प्रेम की व्याख्या में थी मादक गंध
होती है जैसी हिरण की कस्तूरी में 


सम्बन्ध को रखा उसने वक़्त के सरौते पर
कसैला ही निकलना था झूठ की कसैली को
देखा गया है ऐसा युगों से कि होता है अक्सर

विश्वासघात का प्रारब्ध ही सच्चे प्रेम की नियति

-----सुलोचना वर्मा------

Tuesday, February 17, 2015

दादी

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जैसे पिरोकार फूल माली बनाता है माला
दादी ने पिरोकार हमें बनाया था परिवार
चिपकता है जैसे डाक टिकट लिफाफे से
जुड़ा था वैसे ही लोगों से दादी का सम्बन्ध


जब हुई तैयार माला और जुड़ गए धागे के दोनो सिरे
दादी ने छोड़ी माला और खुद चली गयी देव-देवियों के पास
कि कितना भी मँहगा लगा हो डाक टिकट, वहाँ चिठ्ठी नहीं पहुँचती
और ज़रूरी भी था देवताओं तक पहुँचाना संदेश
दादी हम सब की प्रार्थना थी , सो खुद ही चली गयी


उस दिन से एक तारा चमकता है अधिक औरों से
बढ़ी है मिठास आँगन मे लगे चापाकल के पानी मे
सुरभित है द्वार पे लगी माधवी लता पहले से भी ज़्यादा
और भी हैं ऐसी कई बातें, जहाँ दादी दिखती हैं ज़िंदा



---सुलोचना वर्मा------------

Wednesday, September 24, 2014

एक आम सी कविता

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जब दिखेंगे आम के मंजर अगले बरस
फागुन बौरा उठेगा
और मैं हो जाउंगी सरसों की तरह
थोड़ी और पीली दर्द से


जब झूमेगा मौसम कोयल की कूक से
एक हुक मेरे अन्दर भी उठेगी


एक दिन वैशाख लगा जाएगा पेड़ पर टिकोला
और हो उठेगा खट्टा मेरे स्वाद का मन  

 
जेठ भारी हो जाएगा मन के मौसम में
ज्यूँ लद जायेगी टहनी पके फलों से


जब दिखेगा बिकता लंगड़ा सावन के बाज़ार में
मन गुज़रे मीठे पलों की बैशाखी ढूँढ लेगा


मुझे तुम पसंद रहे आम की तरह
हमारा साथ भी आम के मौसम जितना रहा


जी रही हूँ मैं अब तुम्हारी आम्रपाली सी यादें !!!

-----सुलोचना वर्मा---------

Friday, August 22, 2014

प्रेम और शिक्षा

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जब होगा प्रेम का विलय उदासीनता में
शिक्षा करेगी तय प्रेम का हश्र
समय की किताब में


इतिहास पढने वाला कर देगा दफ्न
प्रेम को गुज़रे वक़्त में
एक दिलचस्प कहानी बनाकर


किसी भाषा का स्नातक
चुभाता रहेगा शूल शब्दों का
प्रेम में साल दर साल


मनोविज्ञान का डिग्रीधारक
जो पढ़ नहीं पाया मन प्रेयसी का प्रेम में
बस करता रह गया वैज्ञानिक प्रयोग
कर देगा खारिज प्रेम को सिरे से
एक परिस्थिति का परिणाम भर बताकर


"ब्रेकिंग न्यूज़" सा तवज्जो देगा नए प्रेम को  
पत्रकारिता पढनेवाला, दीवानापन दिखलायेगा  
फिर बिसार देगा उसे किसी बासी खबर सा  
धरकर इल्ज़ाम प्रेम और परिस्थिति के माथे 
कि सिखाया है यही दस्तूर इस इल्म ने उसे  

ठीक ऐसे किसी समय में क्या करुँगी मैं?

रख दूँगी प्रेम के फ़र्न को वक़्त की फ़ाइल में
बड़े जतन से हर्बेरियम स्पेसिमेन सा
देखा करुँगी खोलकर फ़ाइल गाहे-बगाहे 
थोड़ा शोक मना लूंगी
फ़र्न में क्लोरोफिल के नहीं रहने का


मैंने वनस्पति विज्ञान पढ़ा है !

-----सुलोचना वर्मा ------

Tuesday, May 27, 2014

मेरे जैसा कुछ

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नहीं हो पायी विदा
मैं उस घर से
और रह गया शेष वहाँ
मेरे जैसा कुछ


पेल्मेट के ऊपर रखे मनीप्लांट में
मौजूद रही मैं
साल दर साल


छिपी रही मैं
लकड़ी की अलगनी में
पीछे की कतार में


पड़ी रही मैं
शीशे के शो-केस में सजे
गुड्डे - गुड़ियों के बीच


महकती रही मैं
आँगन में लगे
माधवीलता की बेलों में


दबी रही मैं
माँ के संदूक में संभाल कर रखी गयी
बचपन की छोटी बड़ी चीजों में 


ढूँढ ली गयी हर रोज़
पिता द्वारा
ताखे पर सजाकर रखी उपलब्धियों में


रह गयी मैं
पूजा घर में
सिंहासन के सामने बनी अल्पना में


हाँ, बदल गया है
अब मेरे रहने का सलीका
जो मैं थी, वो नहीं रही मैं |


---------सुलोचना वर्मा -------

Monday, May 26, 2014

उम्र

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मेरे तुम्हारे बीच
आकर ठहर गया है
एक लम्बा मौन
छुपी हैं जिसमे
उम्र भर की शिकायतें
हर एक शिकायत की
है अपनी अपनी उम्र

उम्र लम्बी है शिकायतों की
और उम्र से लम्बा है मौन

-----सुलोचना वर्मा------

Friday, May 16, 2014

स्वीकृति

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प्रेम की पराकाष्ठा कहें
या केवल एक विडंबना
आत्मा दे देती है स्वीकृति
प्रेम में पराधीनता की
मौनव्रत धारण किये


कदाचित सुन पाते अन्तर्नाद
मर्यादाओं की दहलीज़ पर खड़े मूक प्राण की
स्वीकारोक्ति के आचरण की
सुन लेते हैं जैसे लोग विरोधाभास
अक्सर किसी शीतयुद्ध में |


(c)सुलोचना वर्मा

Monday, May 12, 2014

पागल चित्रकार

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मेरे सपनों के कैनवास पर
जल से ही सही
पर उकेरुंगा तुम्हारी तस्वीर
और तुम्हें वृष्टि की सूरत देकर
रंग लेगा मल्हार अपनी तकदीर


पर नहीं चाहूँगा सोख ले तुम्हे मिटटी
तो इस चित्र में तुम्हे बरसना होगा पथरीली सतह पर
बह जाना होगा लेकर रूप सरिता का
नहीं चाहूंगा बंधों तुम कभी तटबंधों में
समर्पण तुमसे नहीं मांगूगा मैं वनिता का


तुम्हें अल्हड़पन देने को बलखा जायेगी मेरी तूलिका
फिर आँखें मूंदकर सुनूँगा तुम्हारा कल कल
ले जाना चाहता हूँ तुम्हे ऊँचे पहाड़ों तक
जहाँ निहारूंगा तुम्हे झरना बनते देख
अपने रोमानी जीवन के समस्त बहारों तक


साथ निभाऊंगा तुम्हारा मैं, दूर दूर रहकर
और करता रहूँगा प्रवाहित अपनी संवेदनाओं का शिलाखंड
जब जब करेगा नीरस मुझे तुम्हारा मौन
जबकि जानता हूँ यह मेरी भक्ति मात्र होगी
तुम्हारा प्रसाद पानेवाला होता हूँ मैं कौन


करूंगा वेदोच्चारण, गाऊंगा मंगल गान
जब होगा तुम्हारा मिलन अपने सागर के संग
वो बन जाएगा मांझी, थाम लेगा पतवार
और इस घटना के पश्चात सर्वस्व तुम्हारा होगा
बस रह जायेगी नम मेरे घर की दीवार


जानता हूँ जब वृष्टि बन जायेगी नदी,
वो गुजरेगी मेरे पथरीले अंतस से 
मैं हो जाऊँगा उसके जैसा पावन, निर्विकार
प्रेम में नदी को ही जीता रहूँगा कई साल 
आखिर मैं ठहरा एक पागल चित्रकार |


सुलोचना वर्मा

Monday, May 5, 2014

एक रही अनीता

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एक रही अनीता
और उसका होना रहा आशीर्वाद
जैसे ऋचाओं की गूँज पर ईश्वर से संवाद


उसकी छवि ऐसी धवल
जैसे हरश्रृंगार का फूल
और रश्मि प्रात नवल


जो एक रही अनीता
जा बसी नभ के उस पार 
हमारी यादों के झील में 
अनीता फिर भी रही


-----सुलोचना वर्मा ------

Tuesday, March 25, 2014

पीहर

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बाटिक प्रिंट की साड़ी में लिपटी लड़की 
आज सोती रही देर तक 
और घर में कोई चिल्ल पो नहीं 
खूब लगाए ठहाके उसने भाई के चुटकुलों पर 
और नहीं तनी भौहें उसकी हँसी के आयाम पर 
नहीं लगाया "जी" किसी संबोधन के बाद उसने 
और किसी ने बुरा भी तो नहीं माना
भूल गयी रखना माथे पर साड़ी का पल्लू 
और लोग हुए चिंतित उसके रूखे होते बालों पर 
और एक लम्बे अंतराल के बाद, पीहर आते ही
घर वालों के साथ साथ उसकी मुलाक़ात हुई 
अपने आप से, जिसे वो छोड़ गयी थी 
इस घर की दहलीज पर, गाँव के चैती मेले में 
आँगन के तुलसी चौरे पर, और संकीर्ण पगडंडियों में 

Sunday, March 2, 2014

सम्बन्ध

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एक नया सम्बन्ध
जो पैदा होता है मंद मुस्कान लिए
अंतःकरण की उपजाऊ सतह पर
जब फूटता है संभावनाओं का विरवा
जैसे जैसे सम्बन्ध तय करता है
अपने उम्र की दूरियां
बढ़ता ही चला जाता है
पैमाना संबंधों का
जुड़ जाते हैं कई शब्द
क्या, किंचित, यदि जैसे
रह जाते हैं कई प्रश्न अनुत्तरित
और खामोशी बयाँ कर देती है
कुछ अनकहे वाकये
चढ़ने लगता है सम्बन्ध फिर
अनुबंध की सीढियां
आखिरी सीढ़ी अनुबंध की
लाकर खड़ा कर देती है
बौद्धिकता की उस छत पर
लग जाता है जहाँ रिश्तों पर
प्रतिबन्ध का ताला
और हर प्रतिबन्ध के उस पार
पास के किसी दरीचे से झाँक
मंद मंद मुस्कुराता है
एक नया सम्बन्ध


(c)सुलोचना वर्मा

Saturday, January 25, 2014

रंग अनुराग का

यामिनी के आँचल में
छिपता है देखो सूरज
लोहित है, जो प्रखर है
दहकता सा गोला आग का
लगता है रंग काला है
प्रीत का, अनुराग का


भोजराज बँधे प्रणय-सूत्र में
पर बन ना पाए कारण
कभी मीरा की प्रीत का
कभी मीरा के वैराग का
लगता है रंग काला है
प्रीत का, अनुराग का


लाल-पीले टेसू और सरसों के फूल
है सुवासित पुष्प परिणाम
मकरन्दि मायाजाल का
भ्रमर के गुनगुन राग का
लगता है रंग काला है
प्रीत का, अनुराग का


जब धरा करती घन का आह्वान
तज कर दिनकर की तपिश
वसुधा को मिलता है अमृत
तब सौदामनि के त्याग का
लगता है रंग काला है
प्रीत का, अनुराग का


सुलोचना वर्मा

 

Wednesday, December 18, 2013

नया रिश्ता

हर एक शख्श आपसे जुड़ा नही होता
फिर भी हर कोई तो बुरा नही होता
मिल लेती हूँ हर किसी से हँस के की
चंद लोगों से ही महफ़िल पूरा नही होता
हर रिश्ता जीवन में कुछ नया लाया है
ना सोचो की समय किया मुफ़्त में जाया है
उधर दामिनी को गुज़रे बरस बीत आया है
आज इसी जहाँ में मैने मानस पिता पाया है

सुलोचना वर्मा

Sunday, October 6, 2013

बिखरते रिश्ते


नही बुनती जाल इस शहर में अब मकड़ियाँ
लगे हुए हैं जाले साज़िश 
की हर दीवार पर
बिखर गये हैं रिश्ते, अपनो की ही साज़िशो से
बस यादें टॅंगी रह गयी हैं घरों की किवाड़ पर
टुकड़े हुए रिश्तों के, ज़मीन के बँटवारे में
एक ही उपनाम है इस शहर के हर मिनार पर
क्यूँ बेच रहे हो आईने इस नुक्कर पर तुम
ये अंधो का शहर है, और धूल हर दीदार पर


सुलोचना 

Thursday, August 29, 2013

रिश्ता

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जो ख़त्म हो गया, वो प्रेम नही, दरकार था
क्या तौलना रिश्तों को दुनिया के तराजू में
यादें मीठी हों तो, मान लेना उपहार था
और अगर हों खट्टी, जान लेना उपकार था

हक़ीकत है ज़िंदगी की, प्रेम का अपना वज़ूद नही होता
बिना ज़रूरतों के प्यार, कँही भी मौज़ूद नही होता
क्यूँ लगाना दिमाग़ रिश्तों की ऐसी बाज़ारी में
रिश्ता वह मूलधन है, जिस पर कोई सूद नही होता

-----सुलोचना वर्मा-----