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Sunday, August 17, 2014

चरवाहा

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मेरे छोटे से घर में है एक बड़ी सी खिड़की
और है दूर-दूर तक फैला हरा-भरा खलियान
उस बड़ी सी खिड़की के सामने


गुजरती है उस बड़े से खलिहान से होकर 
एक बेहद ही संकड़ी सी पगडण्डी
जिस पर से रोज गुजरता है एक चरवाहा
जो गाता है निर्गुण बांसुरी पर
अपने छरहरे बदन पर अंगोछा लिए


नहीं गा पाता है वह अब राग कम्बोज
कि चढ़ गयी भेंट उसकी आराधिका
संकीर्ण सामजिक मापदंडों की
और उसका शाश्वत प्रेम
दर्ज़ होकर रह गया है
उसकी बाँसुरी की धुनों में


जहाँ उसे गाना था राग आशावरी
निराश हो चली हैं उसकी तमाम छोटी आशाएं
याद दिला जाते हैं उसे उसके बड़े शुभचिन्तक
कि वह रहता है उसी इन्द्रप्रस्थ में
जहाँ शासन था कभी कौरवों का
जहाँ अब भी रहते हैं धृतराष्ट्र और दुःशासन
अपने-अपने आधुनिक व अद्यतन रूप में


उसे अब कृष्ण कोई नहीं मानता !

-----सुलोचना वर्मा-----

Wednesday, August 28, 2013

जन्माष्टमी

28.8.2013
ऐ चरवाहे ......
तू निर्गुन क्यों गाता  है
क्या आशावरी नही आती तुम्हे
ये प्रश्न उभर आता है
ये कौरवों का देश है
यहाँ हैं धृतराष्ट्र अनेक
बढ़ गया  दुःशासन का दुःसाहस
सिला रह गया उसका विवेक
अर्जुन को मिला था ज्ञान गीता का
सो दे रहा वो उपदेश
कर्म करते रहने का
बिसर गया निर्देश
राग कंबोजी फिर से गाओ
ना रहे कोई विषमता
मर्दों में पौरुषता भर दो
और स्त्रियों में ममता
शंख, सुदर्शन फिर उठा लो
हो जाओ रथ पर सवार
अवतरित हो नये रूप में
करो मानवता का उद्धार
एक नही कई नंद हैं
सब कर रहे इंतजार


-----सुलोचना वर्मा-----