Friday, December 6, 2013

निशि आभा

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मैं निशि की चंचल
सरिता का प्रवाह
मेरे अघोड़ तप की माया
यदि प्रतीत होती है
किसी रुदाली को शशि की आभा
तो स्वीकार है मुझे ये संपर्क
जाओ पथिक, मार्ग प्रशस्त तुम्हारा
और तजकर राग विहाग
राग खमाज तुम गाओ
मैं मार्गदर्शक तुम्हारी
तुम्हारे जीवन
की भोर होने तक


----------सुलोचना वर्मा-------------

Thursday, December 5, 2013

चन्द्र

ये सर्व वीदित है चन्द्र
किस प्रकार लील लिया है
तुम्हारी अपरिमित आभा ने
भूतल के अंधकार को
क्यूँ प्रतीक्षारत हो
रात्रि के यायावर के प्रतिपुष्टि की
वो उनका सत्य है
यामिनी का आत्मसमर्पण
करता है तुम्हारे विजय की घोषणा
पाषाण-पथिक की ज्योत्सना अमर रहे
 युगों से  इंगित कर रही है
इला की सुकुमार सुलोचना
नही अधिकार चंद्रकिरण को
करे शशांक की आलोचना


सुलोचना वर्मा

Friday, November 29, 2013

व्याकरण

भावनाओं को शब्दों से ही पढ़ लो
क्यूँ व्याकरण के पीछे हो पड़े
कब आम लोगों ने व्याकरण का अनुसरण किया
कब अच्छे लगे लोगों को संबोधन 'हे', 'अरे'
क्यूँ सुगम जीवन को जटिल बनाया
बना डाले यूँ हि किसने नियम ये कड़े
पिता के घर पर "संज्ञा" हुआ करती थी
बन गयी "सर्वनाम" पति के द्वार खड़े

हादशा; जो "त्वम" से शुरू हुआ था
और "आवाम" पर आकर अटका था
ना जाने कब "युवाम" और "यूयम" के रास्ते
हौले हौले "वयम" पर आ धमका है
हर परिस्थिति का "कारक"
"अपादान" की उत्पत्ति को भाँपता है
रिश्तों का "संधि-विच्छेद" करने
जीवन व्याकरण का नक्षत्र आ चमका है

लता का शब्द रूप पढ़-पढ़ कर,पढ़-पढ़ कर
ना जाने कितनो के ही आँसू बह गये
वो ज़ुल्म, जो हमारे बालमन पर हुआ था
परीक्षा उत्तीर्ण होने की चाह में सह गये
जीवन तब से कितना आगे निकल गया है
और एक आप हैं, की बस वहीं रह गये
मेरे हमकदम हो लो, मेरे बुद्धिजीवि मित्रों
साथ चलना ही जीवन है, ऐसा महापुरुष कह गये

सुलोचना वर्मा

Friday, November 1, 2013

दीपावली

हे शीतन समीर !
तुम तनिक विराम ले लो
दीपों का उत्सव आने को है


अमावश्या की सघन कालिमा
फिर से चहूं ओर छाने को है
अवकाश पर होंगे चाँद औ तारे
असंख्य जूगनू टिमटिमाने को है
हे शीतन समीर..................


रोन्द डाली गयी माटी फिर
चाक उसे घुमाने को है
देने को दिए की आकृति
कुम्हार उसे सहलाने को है
हे शीतन समीर..................


बिटिया रानी चपल हाथों से
चटक रंगोली बनाने को है
घरोंदा भी क्या खूब सजेगा
बस फुलझड़ियाँ जलाने को है
हे शीतन समीर..................


दीप प्रज्वलित घर औ देहरी पर
अंधकार अब हटाने को है
कर चरितार्थ दीप के दिव्यार्थ को
मानव मन-तिमिर मिटाने को है
हे शीतन समीर..................


सुलोचना वर्मा

Saturday, October 19, 2013

टूटे दरख़्त

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क्यूँ मायूस हो तुम टूटे दरख़्त
क्या हुआ जो तुम्हारी टहनियों में पत्ते नहीं
क्यूँ मन मलीन है तुम्हारा कि
बहारों में नहीं लगते फूल तुम पर
क्यूँ वर्षा ऋतु की बाट जोहते हो
क्यूँ भींग जाने को वृष्टि की कामना करते हो


भूलकर निज पीड़ा देखो उस शहीद को
तजा जिसने प्राण, अपनो की रक्षा को
कब खुद के श्वास बिसरने का
उसने शोक मनाया है
सहेजने को औरों की मुस्कान
अपना शीश गवाया है


क्या हुआ जो नहीं हैं गुंजायमान तुम्हारी शाखें
चिडियों के कलरव से
चीड़ डालो खुद को और बना लेने दो

किसी ग़रीब को अपनी छत
या फिर ले लो निर्वाण किसी मिट्टी के चूल्‍हे में
और पा लो मोक्ष उन भूखे अधरों की मुस्कान में
नहीं हो मायूस जो तुम हो टूटे दरख़्त......



 
सुलोचना वर्मा

Thursday, October 10, 2013

दुर्गा पूजा


शक्ति के उपासक हैं ये लोग
यहाँ स्कंदमाता की पूजा होती है
गणेश कार्तिक को भोग लगता है
और अशोक सुंदरी फुट फुट रोती है


चंदन नही, रक्त भरे हाथों से
देवी का शृंगार करते हैं
गर्भ की कन्याओं का जो
वंश के नाम संहार करते हैं

अचरज होता है क्यूँ शक्ति के नाम पर
नौ दिनो का उपवास होता है
कहाँ मिलेंगी कंजके लोगों को
जहाँ गर्भ उनका अंतिम निवास होता है


कभी मन्त्र से, कभी जाप से
नर तुमको छल रहा है
मत आओ इस धरती पर देवी
यहाँ तो चिरस्थायि
भद्रकाल चल रहा है


सुलोचना वर्मा

Sunday, October 6, 2013

बिखरते रिश्ते


नही बुनती जाल इस शहर में अब मकड़ियाँ
लगे हुए हैं जाले साज़िश 
की हर दीवार पर
बिखर गये हैं रिश्ते, अपनो की ही साज़िशो से
बस यादें टॅंगी रह गयी हैं घरों की किवाड़ पर
टुकड़े हुए रिश्तों के, ज़मीन के बँटवारे में
एक ही उपनाम है इस शहर के हर मिनार पर
क्यूँ बेच रहे हो आईने इस नुक्कर पर तुम
ये अंधो का शहर है, और धूल हर दीदार पर


सुलोचना