Tuesday, May 12, 2015

इक्कीसवीं सदी का मानव

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उसे दंभ है अपनी सहन शक्ति पर
कि वह झेल सकता है असंख्य पीड़ा
और निहार सकता है सहचरों के बदन से रिसता खून
बिना व्यक्त किये हुए कोई भी प्रतिक्रिया
और रह सकता है बिलकुल ही सहज
फिर दे सकता है वह वर्तमान के झूठ की गवाही 
अतीत के ही किसी गुप्त दरवाजे से

वह पड़ा रह सकता है बधिरों की तरह सुनते हुए
और भूल सकता है आँखों देखी घटनाएँ भी
वह कर सकता है प्रेम का भी विनिमय पैसों से
पाया गया है ऐसा विगत कुछ वर्षों में
कि गिरा है पैसा जब-जब मूल्य सूचकांक पर
साथ ही थोड़ा-थोड़ा वह भी गिरा है


गिरने से टूट गयी है उसकी हिम्मत
बिखर गया है उसका स्वाभिमान 
सिल गया है उसका विवेक
और क्षीण हुई कई अन्य क्षमताएँ भी|


--------सुलोचना वर्मा -----------------

Tuesday, May 5, 2015

नीला मुख

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जुलाई का महीना उमस भरा होता है, पर नीला की तो जिंदगी ही उमस भरी है| पता नहीं क्या सोचकर उसके माता-पिता ने उसका नाम नीला रखा था| उस पर यह संयोग ही है कि उसे नीले रंग से भी विशेष प्रेम है|


उस रोज़ जब नीला की सास ने फोन कर उसकी माँ से उसके अस्पताल में भर्ती होने की बात बतायी, तो उनके होंश उड़ गए| अगली ही फ्लाइट से नीला के माता-पिता कोलकाता से मुंबई पहुँच गये| नाइन हिल्स अस्पताल के रिसेप्शन एरिया में जाकर नीला के पिता ने रिसेप्शनिस्ट से पूछा "नीला कौन से रूम में एडमिट है?"

"रजिस्ट्रेशन नंबर बताइए"

"वो नहीं पता, हम तो अभी-अभी आये हैं| मैं नीला का फादर हूँ"

"डू यू मीन नीला मुख़र्जी?"रिसेप्शनिस्ट कम्प्यूटर पर नाम ढूँढते हुए पूछती है|

"यस, यस, नीला मुख़र्जी"

"रूम नंबर वन जीरो फोर एट"

"थैंक यू"

कमरे में घुसते ही उन दोनों ने नीला की ओर देखा| उसके होठों पर हमेशा की तरह मुस्कान थी पर आँखों में थी अनकही तकलीफ| माँ-बाप का प्रेम जैसे ही उसकी आँखों में उतरा, दर्द ने एक के बाद एक सारे लिबास उतार फेंके| उसके पसंदीदा परिधान की ही तरह उसकी आत्मा का रंग भी दर्द से नीला पड़ गया था|

नीला ने अपने माता-पिता को बताया कि उसे पिछले दो दिनों से तेज बुखार और बदन में दर्द था| आज सुबह उसे सोकर उठने में कुछ ज्यादा ही देर हो गयी और घर का सारा काम खत्म करने के बाद दिन का खाना बनाने में देर हो गयी| मेज पर खाना लगाकर उसने जैसे ही पुलक को आवाज दी, वह नीला को गालियाँ देता हुआ तेजी के साथ अपने कमरे से निकला और मेज तक आते ही उसपर रखा सारा समान उठाकर फेंकने लगा| जब नीला ने उससे ऐसा करने से मना किया तो मेज पर रखे काँटे चम्मच (फोर्क) से उसपर तबतक वार करता रहा जब तक उसकी सास ने आकर बीच-बचाव नहीं किया| उसकी चार साल की बेटी, परी वहाँ मौजूद थी जो लगातार चिल्ला रही थी "बाबा, प्लीज स्टॉप, डोंट किल माय मॉम"|  उसकी सास ने पुलक का हाथ पकड़कर कहा था कि अगर वह नहीं रुका तो नीला मर जायेगी और उसकी अपनी बेटी ही उसके खिलाफ बयान दे देगी| फिर उसकी सास उसे लेकर अस्पताल आयी जहाँ डॉक्टरों ने नीला को भर्ती कर लिया|

नीला के माँ-बाबा अवाक होकर उसे सुनते रहे| नीला के ससुरालवालों का रुख नीला के लिए अच्छा नहीं था, यह तो वह जानते थे लेकिन इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया जाएगा, उनकी सोच के बाहर था|

"उसने कहा उसे मेरी जैसी बीबी नहीं चाहिए"नीला रो पड़ी|

"क्यूँ?क्या बुराई दिख गई उस जानवर को तुझमे"नीला की माँ गुस्से से लाल हो रही थी|

"सुनो, रहने दो यह सब यहाँ; मैंने डॉक्टरों से बात कर ली है, नीला को कल सुबह डिस्चार्ज कर देंगे| फिर हम सब वहाँ जाकर उनलोगों से आमने-सामने बात करेंगे" नीला के पिता का दुःख अब उनके चेहरे पर उभर आया था|

"क्या बात करेंगे आप? ऐसा कोई पहली बार तो किया नहीं उसने!!! हाँ, आज उसने सारी हदें जरूर पार कर दी|"नीला इतनी मायूस हो चुकी है कि उसे लगभग पता है कि पुलक पर किसी की बात का कोई असर नहीं होना है|

अगली सुबह नीला को अस्पताल से डिस्चार्ज होने में साढ़े दस बज गए|

"पुलक तो अब घर पर नहीं होगा| तुम्हे पुलक के ऑफिस का पता तो मालूम है न ?"नीला के बाबा ने उससे पुछा|

"हम्म"नीला इससे अधिक कुछ कहने की हालत में नहीं है| उसके शरीर में अभी तक सूजन है|

अगले ही घंटे तीनों विले पार्ले पहुँच गए| नीला के बाबा ने पुलक के दफ्तर के बाहर खड़े होकर उसे फोन किया और बाहर आने के लिए कहा| सड़क के उस पार पुलक के दफ्तर के ठीक सामने बायोकॉन का दफ्तर था| नीला की माँ सामने लगे बायोकॉन के बोर्ड को एकटक देखे जा रही थी जिस पर लिखा था "द डिफरेंस लाइज इन आवर डीएनए"|

"हाँ, बात डीएनए की ही तो है| आदमी भले ही मंगल ग्रह पर चला जाय, पर पाषण युग की हिंसक प्रवृत्ति से निजात पाना उसके बस की बात ही नहीं है| यह २७ दिसम्बर, २००४ का मंगलवार नहीं है| यह तो अनंत काल से मर्दवादी सोच द्वारा स्त्रियों की मर्यादा के दमन का अमंगल दिन है| अन्तरिक्ष में पँहुच जाने के बाद भी औरतें कबीलाई समाज में ही रहती हैं और बँट जाती हैं इनकी जागीरों से लेकर उनकी वस्तुओं तक में; कुल मिलाकर स्त्री सम्पत्ति ही है|"नीला की माँ का प्रलाप शुरू हो चूका था|

"आपलोग घर चलें, वहाँ चलकर बात करते हैं| मुझे यहाँ कोई तमाशा नहीं चाहिए| मैं पार्किंग से कार निकालकर लाता हूँ"पीछे से पुलक की आवाज आयी|

दोहरे व्यक्तित्व का आदमी कितनी साफ़गोई से अपनी हैवानियत पर पर्दा डालकर इंसान बना रहता है|
दो घंटों के बाद सभी पुलक के घर पहुँचते हैं| नीला कार से बाहर आते ही जल्दी से माथे पर साड़ी का पल्लू रखती है जैसे कि माथे पर पल्लू रखने में थोड़ी देर हो गयी तो धूमकेतु आ गिरेगा|

अन्दर पहुंचकर जैसा कि नीला ने बताया था, पुलक एक ही बात दोहराये जा रहा था कि उसे अब नीला के साथ नहीं रहना है|

"क्यूँ" नीला के पिता कारण जानना चाह रहे थे|

"बस, मुझे नीला पसंद नहीं है"

"पसंद नहीं है? नीला कोई वस्तु नहीं है, जो कल पसंद आयी थी और आज पसंद नहीं है| अच्छा ख़ासा कमाते हो; फिर भी घर में कामवाली नहीं है| मेरी बेटी सुबह से रात तक तुम लोगों की तीमारदारी में लगी रहती है| फिर, हर समस्या का हल होता है| राजकुमारी की तरह पाला है हमने इसे और तुम्हे जानवरों जैसी हरकत करते शर्म नहीं आयी!!!" नीला के पिता आगबबुला हो रहे थे|

"आप अपनी बेटी ले जाइए भाई साहब| फिर कुछ हो गया तो मैं इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ले पाउंगी" नीला की सास ने बीच में टोकते हुए कहा|

"ऐसे माहौल में बेटी को छोड़कर तो हम भी चैन से नहीं रह पायेंगे| चलो नीला, अब तुम्हें यहाँ नहीं रहना"नीला की माँ रो रही थी|

नीला कमरे में गयी और थोड़ी देर बाद सूटकेस लिए परी के साथ कमरे से बाहर आयी| फिर चारों भारी मन से नीला के ससुराल से निकल पड़े|

चार घंटे बाद नीला अपने माता-पिता के साथ अपने घर में थी| घर में प्रवेश करते हुए उसके मन में यही बात चल रही थी कि सिर्फ यही घर उसका अपना है जहाँ वह ख़ुशी में खिलखिलाकर हँस सकती है; दर्द में चिल्लाकर रो सकती है और बीमार होने पर अपने बिस्तर पर पड़ी रह सकती है| अपने कमरे में पहुँचते ही वह बिस्तर पर किसी बोझ की तरह ढह गयी| परी ने हर बार की तरह नानी से राजकुमार की कहानी सुनाने की जिद की तो नानी ने कहा "वह कहानी तो बहुत पुरानी हो गयी है| कितनी बार सुना चुकी हूँ| आज तुम्हें लक्ष्मीबाई की कहानी सुनाती हूँ|"

नीला की माँ अब नीला के साथ-साथ परी की भी देखभाल कर रही थी| एक स्थाई डर हमेशा उनके साथ चला करता था, लेकिन वह निडर बनी रहने के लिए विवश थी|

चार महीने बाद एक दिन अचानक पुलक ने नीला के बाबा को फोन किया और कहा कि वह परी को लेने आ रहा है| नीला के बाबा ने मना कर दिया| उन्होंने कहा कि परी बहुत छोटी है और उसे माँ की ज़रूरत है| इतना कहकर उन्होंने फोन रख दिया|

नीला सामने सोफे पर लेटी मोबाइल पर इयरफोन लगाकर सर क्लिफ रिचर्ड्स के गाने सुन रही थी"इट्स सो फनी, वो डोंट टॉक एनीमोर"|

"पुलक का फोन था;कह रहा था कि परी को  आकर ले जाएगा| मैंने मना कर दिया|"नीला के बाबा उसके पास आकर बैठते हुए बोले|

"हम्म" नीला गाने में लीन थी|

"तुम भी तो कुछ कहो| तुम "हम्म" "हूँ" "हाँ" से ज्यादा कभी कुछ नहीं कहती|" नीला के बाबा को नीला का मौन खल रहा था|

"क्या कहूँ? जन्मदाता हैं आपलोग, मेरे लिए जो भी करेंगे, अच्छा ही करेंगे"नीला इतना कहकर अपने पलकों पर मोतियों के दाने लिए कमरे में चली गयी|

नीला की यह बात उसके बाबा के ह्रदय को शूल की तरह बेध गयी| साढ़े पाँच साल पहले जब नीला ने अपने पड़ोस के लड़के संजीत से शादी करने की इच्छा ज़ाहिर की थी तो उसके बाबा ने कहा था "हम तुम्हारे जन्मदाता हैं; तुम्हारे लिए जो भी करेंगे, अच्छा ही करेंगे"|

नीला के बाबा अपराधबोध से माथा झुकाए बैठे रहे|

दिन, सप्ताह और महीने गुजरते रहे| नीला के माता-पिता की परेशानियाँ भी बढ़ती रहीं| आस-पड़ोस के लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगे थे|

"पता नहीं हमारे बाद इसका क्या होगा| अगर बच्चा नहीं हुआ होता, तो फिर शादी की भी सोच सकते थे| अब इसके लिए किसी नौकरी का इंतजाम करना होगा| इसके आगे पहाड़ सी जिन्दगी पड़ी है, ऐसे ही पड़े रहने से थोड़े ही न चलेगा| इसके बाबा ने कई लोगों से बात की है पर हर कोई एक्सपीरियंस ढूँढता है| एमबीए खत्म होने के बाद हमने नीला को नौकरी नहीं करने दी| हम उसके ब्याह के दायित्व से जल्द से जल्द मुक्त हो जाना चाहते थे| तब कहाँ सोचा था कि ऐसा दिन भी आएगा" एक दिन नीला ने अपनी माँ को फोन पर किसी रिश्तेदार से कहते सुना|

नीला को अवसाद का ऑक्टोपस धीरे-धीरे जकड़ रहा था| कई बार आत्महत्या का ख्याल आता, फिर परी की ओर देखकर सोच में पड़ जाती|

सरस्वती पूजा के दिन नीला की माँ अपने कमरे से बाहर निकली और बेहोश हो गयी| एम्बुलेंस बुलाया गया और सभी अस्पताल पहुँच गए| थोड़ी ही देर बाद डॉक्टर ने आकर नीला के बाबा को बताया "इट्स माइल्ड हार्ट अटैक"|

नीला की माँ कुछ रोज़ अस्पताल रहकर घर लौट आयी| घर में इन दिनों कुछ था, जो नया था| परी को फोन पर पुलक से बात करते देख नीला की माँ को आश्चर्य हुआ|

जिस दिन नीला की माँ को दिल का दौरा पड़ा, उसी रोज़ शाम में नीला ने पुलक को फोन किया और परी से उसकी बात करायी| नीला को उस दिन लगा कि उसकी जिंदगी को ठीक करने की च्येष्टा में उसके माँ-बाबा की जिंदगी खराब हो रही थी| उसने मुंबई वापस जाने का मन बना लिया; हालाँकि वह जानती थी कि वापसी का रास्ता इतना आसान भी न था|

पिछले एक महीने से परी पुलक से बात करती और फिर ठीक उसके बाद नीला भी पुलक से बात करती| पहले पहल पुलक ने रौब दिखाया; पर नीला ने सब कुछ ठीक करने का मन बना लिया था| यह जानते हुए कि उसकी कोई भी गलती नहीं थी, वह पुलक से माफ़ी माँग बैठी| फिर पुलक भी परी को खोना नहीं चाहता था| आखिर परी भी तो उसी की संपत्ति थी|

होली से दो दिन पहले पुलक नीला और परी को लेने आया| नीला को फोन पर अपने आने की सूचना देकर वह बाहर कार में ही बैठा रहा|  नीला के माँ-बाबा उसके साथ बाहर तक आना चाह रहे थे, पर नीला ने उन्हें रोका| 
नीला परी को लेकर कार में बैठ गयी| कार आगे बढ़ता रहा और वह पीछे छूटती रही| उसे लगभग मालूम था कि दिन और तारीख के सिवाय कुछ नहीं बदलेगा|

"न जाने किस अदृश्य रेशमी डोर से बंधे हैं इन दोनों के रिश्ते| नहीं तो जो कुछ हुआ, उसके बाद इनका फिर से मिलना तो नामुमकिन ही लग रहा था| अच्छा हुआ बेटी ससुराल चली गयी| वैसे भी उसका असली घर तो वही है" नीला की माँ ने दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए उसके बाबा से कहा|

नीला के बाबा ने कार के ओझल होते ही अखबारों के पीछे खुद को छुपा लिया|

नीला को मुंबई लौटे चार महीना हो गया| अब भी कभी घर के काम करते हुए उसके माथे से पल्लू सरकता है तो उसके माथे पर धूमकेतु आ ही गिरता है| उसके चेहरे और आँखों के नीचे का स्याह उसके नाम को पहले की ही तरह सार्थक करता है| आजकल उसके पड़ोसी आपस में बात करते हुए उसे "नीला मुखर्जी" की जगह "नीला मुख" कहकर पुकारते हैं| नीला मुख अब किसी विष वमन का प्रत्युत्तर नहीं देती; मौनव्रत धारण किये स्वयं को नीलवसना में परिवर्तित होते हुए देखती है और जिंदगी से प्रतिशोध लेती है| उधर नीला मुख के जन्मदाता खुश हैं कि नीला ने इतना कुछ सहकर भी अपने परिवार को टूटने से बचा लिया| फिर इस उपक्रम में उसके खुद के कितने टुकड़े हुए, इस सवाल का हल तो गणित के प्रकाण्ड विद्वान् भी नहीं दे सकते; फिर किसी और की क्या मजाल है|

Friday, April 3, 2015

मंजूगाथा

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ब्लू लाइन बस के नीचे आकर मंजू के पति की मौत हो गयी और दो बरस की ममता को साथ लिए मंजू नैहर

आ गयी| नैहर में अभी सात महीने ही बीते थे कि भाभियों ने उसे तंग करना शुरू कर दिया| मंजू की माँ को
यह समझते देर न लगी कि मंजू का वहाँ ज्यादा दिन रहना संभव नहीं हो पायेगा| वह मंजू के लिए नए वर की तलाश में लग गयी|
 
"अम्मा भी न हद करती हैं, कौन ब्याहेगा इस बेवा और एक लड़की की माँ को....लड़का होता तो और बात
थी; पर लड़की कोई नहीं गछेगा" उसकी भाभियाँ अक्सर आपस में बातें करते हुए कहती|
 
कई रिश्ते आते और चले जाते| फिर एकदिन पड़ोस के गाँव से एक रिश्ता आया| बीस साल की मंजू के लिए
लड़के की उम्र थोड़ी ज्यादा थी| यही कोई ३० साल का रहा होगा| पर उम्र की किसे परवाह थी!!! किशोर
सिंह ने न सिर्फ मंजू के रिश्ते के लिए हामी भरी बल्कि उसकी बेटी को अपनाने के लिए भी तैयार हो गया|
फिर क्या था, चट मँगनी और पट ब्याह|

शादी के बाद जब मंजू अपने नए ससुराल जा रही थी तो उसकी माँ ने ममता को अपने पास रख लिया|
"तू कुछ दिन वहाँ रह ले, वहाँ के कायदे क़ानून समझ ले, फिर इसे ले जाना| वैसे भी ममता ज्यादा समय अब मेरे पास ही रहती है " अम्मा ने मंजू को समझाते हुए कहा|
 
दिल पर पत्थर रखकर मंजू ने नए ससुराल का रुख किया था| यहाँ सभी कुछ ठीक-ठाक ही था| शादी के
बाद सातवें महीने जब मंजू नैहर लौटी, तो उसने अपनी माँ को बताया कि वह फिर से माँ बननेवाली है और
जंचगी तक नैहर ही रहेगी|
 
नौवाँ महीना बीतते ही मंजू ने एक लड़के को जन्म दिया| उसकी माँ को लगा कि अब सभी कुछ ठीक हो
जाएगा और मंजू की जिंदगी भी जीवन की पटरी पर दौड़ पड़ेगी| तीन महीने बाद जब मंजू ससुराल पहुंची, तो
बेटे के साथ बेटी को भी ले गयी|
 
जहाँ नन्ही सी ममता खुश थी कि वह अब अपनी माँ के साथ रहेगी; उसके यहाँ आने से परिवार के अन्य
सदस्यों की भवें तनी रहती थी| आखिरकार एक दिन किशोर ने खुद ही मंजू से कह दिया कि उसे और उसके
परिवारवालों को ममता का वहाँ रहना पसंद नहीं| उसने मंजू से ममता को वापस अपने नैहर भेजने को कहा
जिसके जवाब में मंजू ने कुछ नहीं कहा| वह अगले ही दिन अपने दोनों बच्चों को लेकर नैहर आ गयी|  जब
सप्ताह बीत गया, तो एक दिन किशोर आ धमका|  
 
"क्या हुआ, यहीं पड़े रहने का इरादा है क्या तुम्हारा"किशोर चिल्लाया|
 
"मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूँ; पर मेरे साथ मेरे दोनों बच्चे चलेंगे" मंजू की आवाज में ठहराव था|
 
"नहीं, मैं किसी गैर के बच्चे को नहीं अपना सकता; उसे यहीं रहना होगा"किशोर ने झल्लाते हुए कहा|
 
"फिर मैं अपने दोनों बच्चों को अकेले ही पाल-पोसकर बड़ा कर लूँगी| मैं अपनी बच्ची को अकेले नहीं छोड़
सकती" कहती हुई मंजू रुआँसा हो गयी थी|
 
"मैं भी देखता हूँ कि कब तक तुम्हारा यह तेवर कायम रह पाता है" कहता हुआ किशोर उलटे पाँव लौट गया|
वह लगभग आश्वस्त था कि मंजू बहुत देर सवेर उसके पास लौट आएगी|
 
नैहर रहते अभी तीन महीने ही गुजरे थे कि हालातों ने उससे अपने पैरों पर खड़े होने की फ़रमाइश करनी
शुरू कर दी| कभी बेटी को पेट भर खाना नहीं मिलता तो कभी बेटे के दूध में पानी मिलाने की नौबत आ
जाती| उसकी अपनी भूख और प्यास तो कब की ख़त्म हो चुकी थी| ऐसे में एक दिन वह अपने पड़ोस की
शीला के साथ काम की तलाश में शहर की ओर गयी और शान्ति अपार्टमेंट्स के गौतम घोष के घर में
कामवाली की नौकरी तय करके घर लौटी|
 
वक़्त के कंधे से कन्धा मिलाते हुए पता ही न चला कि कब बारह साल गुजर गए| उसकी बेटी ममता तड़के
सुबह उठकर घर के काम-काज में माँ की मदद करने के बाद सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए जाती थी|
स्कूल से लौटकर फिर माँ की मदद करने में जुट जाती| गाँव  के तीज-त्योहारों में ममता ही वहाँ की औरतों
को मेंहदी लगाती और जो भी पैसे मिलते, माँ को लाकर सब दे देती| उसका भाई, मनोज, सुबह देर से
उठता, तैयार होकर नाश्ता करके इंग्लिश मीडियम स्कूल जाता| स्कूल से लौटते ही गाँव के कुछ अन्य
शरारती बच्चों के साथ मिलकर किसी शैतानी में जुट जाता| मंजू अक्सर उसे लेकर परेशान रहती थी| ममता
की ममता थी कि उसे अपने भाई पर बड़ा लाड़-दुलार आता; उसकी शैतानियों पर भी|
 
मंजू जब ज्यादा परेशान होती तो अक्सर मिसेज घोष को कहती "पता नहीं क्या लिखा है मालिक ने मेरी
किस्मत में!!! इतनी मुसीबतों में भी छोड़े को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा रही हूँ और इक वो है कि पढ़ाई में मन ही
नहीं लगाता है| इतने पैसे ममता पर खर्च कर दूँ तो हर बार अव्वल आये"  
 
"तो ममता पर ही क्यूँ नहीं खर्च करती हो पैसे? गधे को घोड़े बनाने के चक्कर में उस बेचारी के साथ अन्याय
क्यूँ कर रही हो?"
 
"उसने पराये घर जाना है और फिर गधा ही सही, बुढापे में बेटा ही काम आएगा"
 
"कितने भाई हैं तुम्हारे?"
 
"तीन"
 
"फिर तुम्हारी माँ तुम्हारे साथ क्यूँ रहती है?"
 
कबूतर जैसे बिल्ली से बचने के लिए आँखे मूँद लेता है, मंजू बिना जवाब दिए सर झुकाए वहाँ से चल देती|
 
एक दोपहर जब मिसेज घोष टीवी में उन्नाव के किसी साधू के सपने को आधार मान भारतीय पुरातत्व संस्थान द्वारा सोने की खुदाई का समाचार देख रही थी, अचानक से कॉल बेल बजा| दरवाजा खोलते ही मिसेज घोष के सामने मंजू और ममता खड़े थे|
 
"इस समय?"
 
"हाँ, आपसे जरुरी बात करना था"
 
"हाँ, बोलो"
 
"मेरी तबियत बहुत खराब है; आप मेरा हिसाब कर दो"
  
"मतलब? क्या हुआ तुम्हें?"
 
"जी, मुंह आया है मेरा| कुछ खाया नहीं जा रहा"
 
"ये भी कोई बिमारी है भला?" कहते हुए मिसेज घोष हँसी नहीं रोक पायी|
 
"मुझे चक्कर आता है" मंजू चाहकर भी मिसेज घोष को नहीं समझा पा रही थी|
 
"डॉक्टर को दिखाओ, ठीक हो जाएगा"
 
"जी, दवाई तो ले ही रही हूँ| बस आप मेरा हिसाब कर दो"
 
"नहीं करती जा!! छुट्टी ले, आराम कर ले"
 
मंजू और ममता निराश होकर लौट गए| लौट क्या गए, फिर नहीं आये| मिसेज घोष ने कुछ दिन इंतज़ार करने के बाद दूसरी कामवाली को रख लिया|
 
लगभग एक महीने के बाद मिसेज घोष फोन पर अचानक ममता की आवाज़ सुनकर हैरत में पड़ गयी|
ममता रो रही थी|

"क्या हुआ तुम्हें?"

"आंटी, मम्मी हॉस्पिटल में है, तबियत बहुत खराब है| लगता है नहीं बचेगी" कहते हुए ममता सुबक रही थी|

"अरे, ऐसा नहीं कहते| मेरी बात कराओ मंजू से" मिसेज घोष परेशान हो उठी|

"नमस्ते दीदी" मंजू की आवाज़ लड़खड़ा रही थी|

"क्या हो गया तुम्हें?"

"अल्सर बता रहे हैं डॉक्टर"

"ओह!"

"मुझे पैसों की ज़रूरत है"

"हाँ, ममता को भेजो आज ही"

"नहीं, आज नहीं;रविवार को मैं खुद आऊँगी| आप पैसे और किसी के हाथ में नहीं देना; खासकर मेरे बेटे
को"

"ठीक है, जैसा तुम कहो" फोन रखकर मिसेज घोष अवसाद भरी चिंता में डूब गयी| थोड़ी देर बाद खुद को
सम्भालते हुए उठी और हड़बड़ी में नम्बर डायल करने लगी|

"शुनछो गौतोम, मोंजू आर बांचबे ना (सुनो गौतम, मंजू अब नहीं बचेगी)" मिसेज घोष ने पति को फोन लगाया|

"बांचबे ना? माने?(नहीं बचेगी? मतलब?)"

"ओर अल्सर होयेछे, ओ हॉस्पिटल ए(उसे अल्सर हुआ है, वह अस्पताल में है)"

"ओह"

फिर एक लम्बे मौन के बाद दोनों फोन रख देते हैं| पति-पत्नी, दोनों  ही बड़े संवेदनशील हैं|

यूँ तो रविवार का इंतज़ार हर बार लम्बा होता है; पर इस बार कुछ ज्यादा ही लम्बा था|

"तेरे आने का धोखा सा रहा है.........दिया सा रात भर जलता रहा है"शाम के वक़्त मिसेज घोष बेगम अबीदा परवीन के गाने सुन रही थी| कॉल बेल की घंटी के बजते ही दरवाजे की ओर भागी| सोचा शायद मंजू आयी होगी| दरवाजा खोला तो देखा मनीषा थी, उनकी नयी कामवाली|

"सुबह क्यूँ नहीं आयी?"

"क्या बताऊँ मैम, हमारे गाँव की एक लड़की आज अचानक से ख़त्म हो गयी| मैं वहाँ चली गयी थी|"

"हाँ, सारे गाँव का ज़िम्मा तुमने ही तो ले रखा है" मिसेज घोष ने व्यंग करते हुए कहा|

"मैम, यूँ तो कुछ ख़ास मिलना नहीं होता था हमारा, पर उसकी बेटी का रोना देख नहीं रहा गया| बहुत बुरा
हुआ उसके साथ...." मनीषा बोलती ही चली जा रही थी|

"बेटी?"मिसेज घोष को अचानक याद आता है कि मनीषा का ससुराल ही मंजू का मायका है|

"हाँ, आप तो जानते हो उसे| आपके यहाँ काम करने वो भी तो अपनी माँ के साथ आती थी"

"कौन? ममता?"

"हाँ"कहकर मनीषा बर्तन माँजने में व्यस्त हो गयी|

मिसेज घोष झट से फ़ोन लेकर मंजू का नंबर डायल करना चाहती है| अभी-अभी जो सुना, उस पर भरोसा
नहीं हो पा रहा है| मंजू का नम्बर बंद हो चूका है|

मिसेज घोष आँखों को बंद किये रॉकिंग चेयर पर झूलती रही|

भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे.......... मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ................ अबीदा तो जैसे मंजू के लिए ही गा रही थी|

एक महीने बाद, वह भी रविवार का दिन था| ममता अपनी नानी के साथ आयी| उसकी माँ ने मरने से पहले
उसे मिसेज घोष से पैसे लेने को कहा था| आज ममता ने अपनी माँ की चुन्नी से अपना सर ढँका हुआ था|
मिसेज घोष ने सवालों के ढेर लगा दिए| ममता चुप रही| उसकी नानी बता रही थी कि मंजू का दूसरा पति
आकर मनोज को अपने साथ ले गया| कहकर गया था कि मंजू का अंतिम संस्कार करने के सप्ताह बाद उसे
लेकर वापस आ जाएगा| एक महीना गुजर गया, अब भी लोगों को उसके आने का इंतज़ार है|
मिसेज घोष ने ममता के हाथों में रूपये पकड़ाते हुए कहा कि किसी भी मुसीबत में वह उनके पास आ
सकती है| यह सोचकर कि अब ममता का ख्याल रखनेवाला कोई नहीं है और सर्दियाँ दस्तक दे चुकी हैं,
ममता को नया कम्बल भी दिया|

कई महीने गुजर गए| मनोज अपनी नयी दुनिया में व्यस्त हो गया| उधर ममता ढूँढ रही है लोगों की आँखों में अपने लिए थोड़ी सी ममता..... 
 

Monday, March 16, 2015

अन्नदाता

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वह मरता तो है आम इंसानों की ही तरह
ख़त्म होती है उसकी भी चिंता उसी के साथ
और छूट जाता है संघर्ष से उसका सम्बन्ध भी मरकर  
पर मिट्टी में मिलकर उसकी तरह कोई खुश नहीं होता


जहाँ आम इंसान छोड़ जाता है वसीयत मरने से पहले
वह छोड़ जाता है अपने हिस्से की धूप बच्चों की खातिर
कभी रख जाता है एक जोड़े बैल तो कभी एक ट्रैक्टर
और दे जाता है उन्हें अन्नदाता बने रहने की ज़िम्मेदारी 


जहाँ टंग जाता है आम इंसान मरते ही दीवारों पर अक्सर
कृत्रिम फूलों की माला से सजे सुन्दर महँगे फोटो फ्रेम में
मर जाना अन्नदाता का यहाँ एक बेहद ही आम घटना है
एक ऐसी आम घटना जिसका कहीं कोई ज़िक्र नहीं होता


जहाँ अन्नदाता पसीना बहाकर मेहनत से अन्न उगाते हैं
आम इंसानों की इस धरती पर देवी व देवता पूजे जाते हैं
ये अन्नदाता भी कहीं न कहीं देवताओं की तरह ही होते हैं
जहाँ हो सुख और पेट हों भरे, अन्नदाता कहाँ याद आते हैं 


------सुलोचना वर्मा --------

Sunday, March 15, 2015

किसान

भर आया फागुन का आकाश
तो भर आया उसका भी गला
और भर आई उसकी आँखें भी


ज्यूँ बरसने लगी बूँदे बारिश की
और धीरे-धीरे मिट्टी बैठ जाने लगी
बैठने लगा उसका कलेजा भी


सो गयी खेत में खड़ी फसल
जगी रही बर्षा रानी कुछ यूँ
जागता रहा सोते हुए वह भी


रुकी बारिश कर फसल बर्बाद
बर्बाद हुआ वह फसल से ज्यादा
वह इंसान तो है ही, किसान भी


-----सुलोचना वर्मा ---------

Wednesday, March 11, 2015

प्रकृति में प्रकृति

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वह गर्मियों में घूमने नहीं गयी हिमालय
और जमने दिया बर्फ अपनी इच्छाओं पर
नहीं देखा उसने कभी पुरी का समंदर भी 
पर डालती रही रेत आँखों के सैलाब पर

नहीं पढ़ा कभी न्यूटन के गति का तीसरा नियम
फिर भी करती रही कड़ी मेहनत घर और बाहर
सुनाया ही कब किसी ने हिग्ग्स बोसॉन के बारे में उसे
विश्वास रहा कि मानती रही कण-कण में होता है भगवान्

नहीं चखा अभी तक घर में पड़ा सल्फास उसने
और मरती रही देखकर फरवरी महीने की बारिश
वह निश्चित तौर पर किसान की पत्नी ही रही होगी
प्रकृति में प्रकृति को भला और किसने जिंदा रखा है

----सुलोचना वर्मा-------

Sunday, March 1, 2015

भूख

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मैंने देखा है उन्हें भूख से कुलबुलाते हुए
जब पार होती है उनके सहने की सीमा
वो चबाने लगते हैं संविधान के ही पन्ने
या शहीदों पर चढ़ी माला के फूलों को 
जिससे थोड़ा और पंगु हो उठता है देश
और थोड़ा भारी हमारे मुल्क की पताका
जो फहर तो जाती है ऊँचे आसमान में
विश्व के मानचित्र पर गर्व से नहीं लहराती


अब यह कोई आम भूख तो है नहीं
जो लगे अलसुबह के नाश्ते से लेकर
रात के खाने तक के सफर के ही बीच
यह एक ऐसी भूख है जो कभी नहीं मिटती
इसीलिए जब कभी नहीं भरता उनका पेट
मिठाई, रोटियों, फलों या सब्जियों से
जानने को अपनी इस भूख का आयाम
वो किसानों की जमीन ही खा जाते हैं


-----सुलोचना वर्मा----------