Sunday, February 12, 2017

साथ चलना

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चल पड़ी थी मैं किसी गोधूलि बेला में तुम्हारे साथ 
कर प्रतिवेश के विधिनिषेध की देहरी को पार 
कि तुम्हारे साथ चलना था किसी सृष्टिसुख में होना 

ठीक जैसे हमारा परस्पर दुःख नहीं छोड़ता हमें अकेला 
जो चलते हम कुछ और कदम साथ
तो शायद नियति रचती कुछ और ही खेला 

नियति दुविधा में थी हमारी ग्रहण-योग्यता को लेकर 
या तुम भांप चुके थे गति का विधान 
प्रणय अभ्यास में तुम समय के साथ रहे  

चल रही हूँ इन दिनों मैं अकेली आस्तित्व के साथ 
बेकल करता है स्मृतियों का निःशब्द तुषारापात 
जीवन बीत रहा है जैसे निष्प्रदीप एक रात 

मालूम तो नहीं मुझे ठीक जा रही हूँ किस ओर 
क्यूँ करूँ चिंता मैं गंतव्य के दूरियों की अब 
जब चलती ही जा रही हूँ अहर्निश स्व-विभोर

Saturday, February 11, 2017

खाली बर्तन सा रिश्ता

आसपास के किसी घर में, जब किसी के हाथ से कोई खाली बर्तन गिर जाता है, तो देर तक वह आवाज हमारे कानों में गूँज रही होती है और हमें यह आवाज परेशान करती है| यही बात रिश्तों के साथ भी है| रिश्ता किसी का भी टूटता है, तो दर्द हमें भी होता है| ये खाली बर्तन इतना शोर क्यूँ करता है? हाथ से ज्यादातर खाली बर्तन ही गिरता है इसलिए कि हम उसे संभालने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करते| हमारा यह अतिरिक्त आत्मविश्वास हमें धोखा दे जाता है| रिश्ते भी तभी टूटते हैं जब वह प्रेम या परवाह से खाली हो जाते हैं| कल किसी परिचित का रिश्ता टूटा| बात भी कभी-कभार ही होती थी उससे, फिर भी एक शोर अब तक मेरे अन्दर मचा हुआ है|

पास के कमरे में बेटी हाई वॉल्यूम पर "चीप थ्रिल्स" सुन रही है, साथ में गा रही है और शायद थिरक भी रही है| कायदे से तो मुझे अपने अन्दर मचे इस शोर से मुक्ति पाने के लिए उसके साथ शोर मचाते हुए थिरक लेना चाहिए, पर मेरे अन्दर मचा यह शोर ही मुझे रोक लेता है| संजीदगी और संवेदनशीलता बेहद बुरी शय है| हम नहीं कह पाते "भाड़ में जाए दुनिया, हम बजाए हरमुनिया" 

Thursday, February 9, 2017

दुनियादारी

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मैंने ऐसा तो नहीं कहा
कि लोग छोड़ दे समस्त दुनियादारी
कैसे कहूँ ऐसा !

बिखर रहा है धरती पर समाज उन दिनों से
जब सपने में भी नहीं सोचा था किसी वैज्ञानिक ने
जीवन के संभावना होने की मंगल ग्रह पर

अब जबकि हम पहुँच चुके हैं मंगल ग्रह पर सच में
और पाल रहे हैं उम्मीद जीवन का वहाँ
तो क्या यह नहीं है सामाजिक बिखराव के अगले स्तर की नींव ?

काँधों पर शव ढ़ोते लोग चल रहे हैं वृताकार इस तरह
जैसे कि वो कर रहे हों प्रदक्षिणा धरती की
श्मशान से लौटते यात्री भूल रहे हैं करना गंगास्नान 
और कर रहे हैं प्रस्थान मलय पर्वत की ओर
होकर चंदन की सुगंध से वशीभूत

तो यहाँ ले आयी है दुनियादारी हमें  !

जमीन को जमींदोज कर जमींदार
पका रहे हैं तंदूर पर बगेरी
प्रतिरोध अब एक वर्जित शब्द है
फिर कोई चीज है दुनियादारी!

Wednesday, February 8, 2017

शिल्प

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खड़ा रहता है पहाड़ सर उठाये 
कि धरती सह लेती है उसके हिस्से का दर्द 
उसे उठाये हुए निरंतर अपनी गोद में 

भय नहीं जानता पहाड़ 
कि भय स्वभाव है टूटने का 
टूटकर बिखर जाने का पत्थरों में 

पहाड़ अगर पहाड़ है
तो पत्थर से ही गढ़े जाते हैं शिल्प 
शिल्प अगर शिल्प  है 
तो सारा संसार है उसका ठिकाना 

तो प्रेम ?

पहले पहाड़ था प्रेम, 
फिर तो पत्थर भी नहीं रहा 
अब शिल्प बन बिकता है बाजार में !

और प्रेम?

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1.
मैं नदी हो जाना चाहती थी 
कि मुझे तुम समुद्र दिखते थे 
घुलकर तुम्हारे जल में होना चाहती थी एक 

और प्रेम?

था बहती हुई नदी के मानिंद प्रेम 
जो प्रेम में पड़ बहना गया भूल 
प्रेम को घेरे बना रहा ताल चंद रोज़  
बचा प्रेम की समाधि पर रेत ही मूल 
अब चुभता है आँखों में, उड़ता है जब धूल !

2.
मैं तुम्हारी जमीन हो जाना चाहती थी  
जहाँ तुम बोते बीज अपनी पसंद के 
और मैं हरी हो जाती, लहलहाती 

और प्रेम?

प्रेम की धरती हमेशा उर्वराशील थी 
तुमने खेती की उपेक्षा के नील की 

3.
मैं हो जाना चाहती थी रात 
जहाँ तुम बन जुगनू टिमटिमाते 
मेरी सुन्दरता में लगाते चार चाँद 

और प्रेम?

प्रेम की हुई रात, चाँदनी छायी 
बस यही बात जुगनू को न भायी 

4.
मैं चाहती थी कि तुम बन पाते मेरा अंतिम निवास 
जहाँ मैं कर पाती विश्राम हो निश्चिंत सांझ ढले  
और तुम जुटा पाते मेरे लिए शांति का बतास 

और प्रेम?

प्रेम बतास था, उड़ गया 
मेरा अंतिम निवास उजड़ गया 

तुम्हारे बाद (क्षणिकाएँ)

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1.
बाद तुम्हारे स्मृतियाँ 
रहती हैं तो रहे 
मार्च महीना और पपीहा 
पिहू पिहू कहे 

2.
देकर दर्द बेइन्तेहाँ  
तोड़ा बेआवाज 
सुर ही कैसे सधे जब
टूटा दिल का साज 

3.
नैनों से रूठे नैना 
न ही मिलन, न ही चैना 

4.
मैं बदली, गुजरी थी तलैया ऊपर
थे अक्स तुम, मैंने पानी समझा था 
मैं बरसी नेह की मेह लेकर, सब गड्डमड्ड   
तुम कविता थे, मैंने कहानी समझा था 

5. 
दिन गुजर रहा कुछ ऐसे
जैसे पेड़ से टूटा पत्ता 
जो बीता साथ, वही जीवन था 
बच गयी हैं साँसें अलबत्ता 

Sunday, February 5, 2017

इमोटिकॉन

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हाथों में स्मार्टफोन लिए 
इनबॉक्स के पत्रशिल्पी 
भूल जाते हैं अक्सर मादरी ज़बान
और बतियाते हैं सुविधा की विदेशी भाषा में 

जहाँ बात-बात में इमोटिकॉन चेपते 
वह दिखना चाहते हैं आधुनिक 
नहीं करती है उनका ध्यान आकर्षित 
उनके शब्दकोष के अक्षरों की यह दरिद्रता 

इमोटिकॉन संभाल लेता है भावनात्मक आवेगों को 
बिना इस्तेमाल किए मादरी ज़बान के वो तमाम शब्द 
जिनका प्रयोग माना जाता है अनुचित पत्राचार में
शिष्टाचार के मद्देनजर, भद्रलोक के संसार में 
फिर यह बचा भी तो लेता है व्याकरण के अतिरिक्त बोझ से 

मुझे भयाक्रांत करती है एक आशंका 
कि मुझे नहीं है विशेष समझ चित्रकला की 
और अगर होते रहें इसी तरह लोग स्मार्ट दिन-प्रतिदिन 
किसी रोज गुम हो जाएँगे समस्त अक्षर इतिहास की गुफाओं में 

शायद किसी रोज़ हम वापस पहुँच जाएँ उसी आदिम समाज में 
जहाँ है दर्ज कंदराओं के पाषाण पर हमारे पूर्वजों का होना चित्रों में 
पर भूल जाएँ स्वयं पाषाण होकर दर्ज करना अपना होना पाषाण पर 
पत्राचार के मशीनी भाव में डूबे हम मानव और मानवी 

जहाँ पाषाण शिल्पी महसूस कर सकते हैं दर्द पत्थरों का तराशते हुए 
इनबॉक्स के पत्रशिल्पी बन रहे हैं स्वयं पाषाण सा- इमोटिकॉन 
जो बस दिखता ही है भावपूर्ण जबकि होता है भावशून्य असल में 

इन दिनों मेरी मूक प्रार्थनाओं में उभर आता है अक्स  
किसी अज्ञात पाषाण शिल्पी का अक्सर बंद आँखों में 
कि किसी रोज जब हम हों चुके हों परिवर्तित पाषाण में
एक वही तो होगा जो तराशकर हमें फिर मनुष्य बनाएगा

देख लेना, अंततः शिल्पी ही शिल्पी को बचाएगा !!!