Saturday, May 27, 2017

माया के प्रलोभन में



--------------------------------------------------
वे समुद्र से पलायन कर आए हुए लोग हैं,
वह सागर है - 'अर' !

या वह कर आए हैं पलायन 
सोमरस-स्रावी उस पीपल की छाया से 
माया के प्रलोभन में !

अभेद यह जगत !

क्या दिन क्या रात जलती है रौशनी सदा ही 
इहकाल परकाल सब एकाकार 
स्निग्ध, सर्पगंधा, नभोनील चाँद तैरता है हृदयाकाश में 
मायारूपी रौशनी झड़-झड़ जाती है 
देते हैं आहुति उस रौशनी में जीवकुल पशुकुल सभी 
आहुति से होती है सृष्टि धुंएँ की 
धुंएँ से मेघ, मेघ से बारिश की !
आलोकमेघ ! पुष्पवर्षा !
बारिश से पैदा होता है अनाज 
साल दर साल लौट आता है साल 
कट जाता है अनंत चन्द्रमास धराधाम में 
भरी पूर्णमासी में - न ही आहार, न ही तंद्रा, न ही निंद्रा 
विभ्रांत मनुष्य कुल, करता रहता है इकट्ठा अनाज पृथ्वी पर हमेशा

मूल कविता :- चंचल बशर (बांग्लादेश के कवि )
अनुवाद :- सुलोचना 

মায়াপ্রলোভনে 
--------------------

তারা সমুদ্র থেকে পালিয়ে আসা মানুষ,
সেই সাগর --'অর'!

কিংবা তারা পালিয়ে এসেছে 
সোমরসস্রাবী সেই অশত্থের ছায়া থেকে 
মায়াপ্রলোভনে !

অভেদ এ জগৎ !

দিন নাই রাত নাই সদাই রৌশন জ্বলে!
ইহকাল পরকাল সব একাকার 
স্নিগ্ধ, পুষ্পগন্ধা, নভোনীল চাঁদ ভাসে হৃদাকাশে 
মায়ারুপ আলো ঝুরে ঝুরে পরে 
সেই আলোতে আহুতি দেয় জীবকূল পশুকুল যত 
আহুতি থেকে সৃষ্টি হয় ধূম 
ধুম থেকে মেঘ, মেঘ থেকে বৃষ্টি !
আলোকমেঘ ! পুষ্পবৃষ্টি !
বৃষ্টি থেকে জন্ম নেয় শস্য 
বছর ঘুরে ঘুরে বছর  আসে 
অনন্ত চন্দ্রমাস কেটে যায় ধরাধামে 
ভরা পূর্নিমায় - আহার নাই ঘুম নাই নিদ্রা নাই 

বিভ্রান্ত মনুষ্যকুল , চিরকাল পৃথিবীতে শস্য কুড়ায়

Saturday, April 29, 2017

रश्क हुआ जाता है

--------------------------------------------------------------------------------------------------

१.

सन २००३ में बहुराष्ट्रीय कम्पनी क्वार्क में हमारे बॉस रहे अतुल गुप्ता ने कहा था "जब भी किसी से कुछ सीखना हो, तो स्पंज बन जाना"।  बात गहरी थी, सो मन में गाँठ बाँध ली| फिर एकबार दफ्तर में रंग को बतौर विषय पढ़ाते हुए प्रोफेसर राव ने कहा था "आल मेन आर कलर ब्लाइंड (सभी पुरुष वर्णान्ध होते हैं )"| बड़ा अटपटा लगा था क्योंकि हमने तो जीव विज्ञान में वर्णान्धता को एक रोग की तरह पढ़ा था। पूछने पर उन्होंने बताया कि किसी भी रंग को उसकी सम्पूर्णता में स्त्रियाँ ही देख पाती हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि जिस लाल रंग को एक स्त्री ९८ से १०० प्रतिशत वाला लाल देखती है, एक पुरुष उसे शायद ८० से ९० प्रतिशत तक ही लाल देख पाता है। प्रतिशत ऊपर या नीचे हो सकता है। उस दिन पता चला कि जानने के लिए कितना कुछ है दुनिया में और किसी के बारे में बिना जाने राय कायम करना कितना बेकार काम है। दुनिया हमारी जानकारी और सोच के आगे भी है। अलग-अलग दफ्तरों में काम करते हुए हमें जीवन के ऐसे रंग दिखे, जिन्हें देखने के लिए केवल आँखों का होना काफी नहीं था, एक अलग नजरिए की जरुरत थी|

कुछ समय पहले दफ्तर में एक इंजीनियर स्पीकर पर बादशाह के गाने सुन रहा था | थोड़ी देर तक झेलने के बाद मुझसे न रहा गया और मैंने उससे कहा "कोई अंग्रेजी गाना लगा दो, भजन लगा दो, ठुमरी ही लगा दो, पर बादशाह को घर जाकर ही सुनना| हमारा दिन मत ख़राब करो| अभी उसने बहस ही छेड़ा था कि बादशाह के गाने मे क्या खराबी है, मेरा फोन बज उठा और मैं फोन रिसीव करने कमरे से बाहर चली गयीजब वापस लौटी, तो आशा भोंसले का गीत बज रहा था| मुझे उस इंजीनियर ने कहा "अब तो आप खुश होंगी | ठुमरी चला दी मैंने"
मैंने कहा "यह ठुमरी नहीं, साधारण फ़िल्मी गीत है| तुम्हे पता है इस गीत को माला सिन्हा पर फिल्माया गया था "
उसने कहा "इतना ठुमक-ठुमक कर गा तो रही है, अब ठुमरी और कैसा होगा"
अभी हँसते हँसते लोटपोट हुई जा रही थी कि पास बैठा दूसरा सॉफ्टवेयर इंजीनियर पूछ बैठा "ये वही माला सिन्हा हैं न जिन्हे लोग वैजयंती माला के नाम से भी जानते हैं?"
हँसते हँसते पेट में दर्द हो गया | मनीष और इम्तियाज़ को कभी नहीं भूलूँगी| उन दोनों ने मुझे तब हँसाया जब मुस्कुराने के लिए भी प्रयत्न करना पड़ रहा था| ठीक उस वक़्त नहीं कह पायी थी; पर अब जब भी वह घटना याद आती है, तो दिल से कहती हूँ- शुक्रिया !!

मुझे उन दोनों के भोलेपन पर खूब रश्क हुआ |

२.

मेरा मानना है कि सुविधा संपन्न लोगों के लिए अनभिज्ञता विलासिता है| सुखी रहने का सार भी शायद इसी में निहित है| कुछ महीनों पहले मेरी एक सहेली ने पूछा था "ये जीमेल क्या होता है?" उसकी अनभिज्ञता पर रश्क हुआ था|

कुछ समय पहले मैंने दफ्तर की एक लड़की से पूछा "तुम्हारी हॉबी क्या है?"

जबाब मिला "ऑनलाइन शॉपिंग"

मैंने कहा कि यह तो आज की तारीख में हम सभी कमोबेश करते ही हैं| फिर मैंने उसे उदाहरण देते हुए पूछा "मान लो दफ्तर में छुट्टी है और घर पर भी अकेली हो और इन्टरनेट डाउन है, क्या करोगी"

जबाब मिला "ऑफ़लाइन शॉपिंग"

मुझे हँसी भी आई और उस पर प्यार भी | रश्क भी हुआ कि उसने सिलाई, गाने, लिखने-पढ़ने, घर सजाने जैसा कोई काम शौक में शुमार नहीं किया| दिल्ली में रहते हुए एक साल हुआ है और उसे सिर्फ कनाट प्लेस और मयूर विहार पता है| अगले महीने नॉएडा शिफ्ट करेगी| मैंने पूछा "किस सेक्टर में"

जवाब मिला "मेरे पति को पता है| उन्होंने देखा है| उन्होंने तो किसी मूवर्स और पैकर्स वाले से भी बात कर ली है"

"अच्छा किया, कौन सा मूवर्स और पैकर्स?"

"मेरे पति को पता है|"

मैंने आगे उससे कुछ नहीं पुछा| पूरे यकीन के साथ कह सकती हूँ कि उसे सीरिया या फिलिस्तीन समस्या के बारे में भी कुछ पता नहीं होगा| उसे न तो बस्तर में आदिवासियों के साथ हो रही घटनाओं से कुछ लेना देना है और न ही कुपवाड़ा में मारे गए सैनिकों से | उसे तो यह भी पता न होगा कि एमसीडी चुनाव में क्या हुआ| ऑनलाइन शॉपिंग किया और खुश हो लिए | कनाट प्लेस गए, खादी से कुर्ता खरीदा और खुश हो लिए | उसके दुखों में शुमार है कमरे के एसी का ठीक से काम न करना या ठण्डे पेयजल का उपलब्ध न होना उससे बस रश्क हुआ जाता है| हम भी तो उसकी तरह अपनी एक दुनिया बना सकते थे जहाँ देश-विदेश और समाज के गम सेंध नहीं लगा पाते | अपनी खुशियाँ और अपने गम हम परिभाषित करते| हमसे हो न सका और अब हम कर ही क्या सकते हैं सिवाय रश्क करने के |


३.

ठीक जिस रोज़ आपकी तबियत नासाज हो और आप दफ्तर से छुट्टी लेने के बजाय "वर्क फ्रॉम होम" का विकल्प चुनें कि सप्ताह भर पहले से ही किसी विदेशी कस्टमर के साथ आपका और आपकी टीम का स्काइप कॉल निर्धारित था, ठीक तभी आपके ऊपर वाले फ्लैट में किसी को दीवार पर ड्रिल मशीन चलाने की जरुरत आन पड़ती है, ठीक तभी सोसाइटी का माली भी घास तराशने की मशीन लेकर घास काटने आ पहुँचता है, ठीक तभी पड़ोस के किसी घर में किसी बच्चे को रोना होता है, ठीक तभी किसी को उस बंद फ्लैट के दरवाजे पर लगातार दस्तक देना होता है, जिसके कालिंग बेल पर बजता हो "जय जगदीश हरे !"
ऐसा हादसा तो अंकल पोजर के साथ भी न हुआ होगा !! ऐसे में आपको उन तमाम सुविधा संपन्न लोगों से रश्क हुआ जाता है जिन्हें नौकरी करने की जरुरत नहीं या फिर जो अपनी तमाम सुविधाओं के लिए दूसरों पर आश्रित हैं और चैन की जिंदगी बसर कर रहें हैं|

४ .

खबर यह है कि सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस ने सन २०१६ और २०१७ के बीच लगभग आठ  से नौ हजार कर्मचारियों को कार्यमुक्त किया है। ये कर्मचारी ऑटोमेशन के चलते कार्यमुक्त किए गए हैं। ऑटोमेशन के चलते जॉब कम हो रही हैं जिससे लोगों को निकाला जा रहा है।
अमेरिका में चुनाव जीतने के बाद ट्रम्प महोदय ने अपना चुनावी वादा निभाया और अमेरिका में अब भारत से जाने वाले सॉफ्टवेयर इंजिनियरों की संख्या में काफी कमी आ गयी । कुल मिलाकर यहाँ बेरोजगारी और बढ़ गयी।
ठीक ऐन वक़्त पर किसी सुबह समाचार पत्र में पढ़ने को मिला कि हाई स्कूल ड्रॉपआउट धर्मपाल गुलाटी (जी हाँ, एमडीएच मसालों वाले) एफएमसीजी सेक्टर के हाईएस्ट पेड सीईओ हैं।
स्कूल के दिनों में हमने शास्त्रीय संगीत सीखा कि जीवन में लय बना रहे। कॉलेज के दिनों में हमनें वनस्पति विज्ञान पढ़ा कि हरियाली बची रहे जीवन में। फिर क्या, एक दिन संगीत के किसी अनुष्ठान में दूसरा पुरस्कार मिला जिसे स्पॉन्सर किया था किसी कंप्यूटर इंस्टिट्यूट ने। कंप्यूटर के प्रेम में ऐसी पड़ी कि आगे की सभी पढ़ाई अलग-अलग संस्थानों से आईटी में ही किया। पिछले कुछ वर्षों में हमने भी ऑटोमेशन के कई सारे प्रोजेक्ट डिलीवर किए। अब लग रहा है कि हमने तो कुल्हाड़ी पर ही पाँव रख दिया।

माँ बेहद लज़ीज खाना बनाती हैं। उन्होंने बहुत कोशिश की कि मैं भी उनकी तरह पाककला में दक्ष हो जाऊँ, पर मैं उन दिनों मुँह में मुलेठी दबाये जीवन में लय और लय में मिठास ढूँढ रही थी। मसालों से ही नहीं किचन से भी दूर रही। अब जब जिंदगी मसालेदार खबरों से हमारा सामना करवा रही है, तो स्वाद तीखा ही लगेगा न!!!  काश कि हमने मसालों की चिंता की होती !! रश्क तो होना ही था !

५.

कुछ समय पहले जब मैंने ऑटोमेशन का ज़िक्र करते हुए लिखा था कि किस प्रकार ऑटोमेशन के चलते इनफ़ोसिस के आठ  से नौ हजार  लोग कार्यमुक्त हो गए और किस प्रकार हमने खुद कुल्हाड़ी पर पाँव रख दिया, तो कुछ लोगों ने आईटी क्षेत्र  से होने के नाते हमारे प्रति संवेदना व्यक्त की और कुछ चिंतित हुए। कुछ लोग शायद यह सोचकर मुस्कुराये भी कि यह शायद आईटी से ही जुड़ा मसला हो और हमें हमारे कर्म के अनुसार फल मिला हो। यह ऑटोमेशन सिर्फ आईटी के लिए ही चिंताजनक है, ऐसी बात नहीं है। साल २०१८ में, गूगल और टेस्ला दोनों कम्पनियाँ ड्राईवर-लेस (चालक विहीन) कार सड़कों पर उतारने का मन बनाया। इन कारों पर वर्ष २००९ से काम चल रहा है और कई बार सफल परीक्षण भी हो चूका है। यक़ीनन कोई भी बदलाव वक़्त की माँग करता है, पर शायद किसी ड्राईवर के लिए यह अच्छी खबर नहीं है।
सात जनवरी २०१७ को फ़ोर्ब्स में प्रकाशित खबर के मुताबिक चीन में एक रोबोट ने तीन सौ अक्षरों का एक आलेख एक सेकण्ड में लिख डाला। इस आलेख के आँकड़े पत्रकारों के द्वारा उसी विषय पर लिखे आलेख के आँकड़ों से ज्यादा सटीक थे। रोबोट पत्रकारिता सिर्फ पत्रकारों की आशंकित बेरोजगारी से जुड़ा मुद्दा भर नहीं है। कंप्यूटर हो या रोबोट, लॉजिक से चलते हैं। जैसा लॉजिक भरा जाएगा, वैसा काम करेगा।मुझे लगता है एकदिन धरती पर रोबोट राज होगा और हम इंसान उनकी गुलामी करेंगे। बात सिर्फ मशीनों पर निर्भरता की ही नहीं है, जानकारियाँ अब सीमित की जा रही हैं| सभी को जल्दी है और इस जल्दबाजी में पिछड़ते चले जा रहे हैं| वह समय दूर नहीं जब मुझे बतौर मनुष्य रोबोट से रश्क होगा !

Saturday, April 8, 2017

कष्ट

--------------------------------------------------------------------------
सुनो नताशा, 
न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

धो डालो यथाशीघ्र अपनी उँगलियों के पोरों पर जमे नक्षत्र-विषाद
नहीं तो जान लो नताशा, आएगा कोई राक्षस भिक्षुक के वेश में 
तुम्हारे कष्टों को तो नहीं ही हरेगा, तुम्हें छल जाएगा 
पौराणिक महाकाव्यों में उल्लेख है ऐसी कहानियों का

ठहरो नताशा, मत उगलो अग्निवर्षा करते शब्दबीज 
जिससे जल जाए तुम्हारे घर का दक्षिण दुआर 
जो संयोगवश प्रवेश द्वार भी है तुम्हारे घर का 
संभलो कि यह तमाशबीन समय है 
जानती तो हो न नताशा,  घर छोड़कर वन को निकली स्त्रियाँ 
भैरवी ही बनती हैं, बुद्ध नहीं बनती कदापि 

याद करो नताशा कि तुम्हारी माँ ने कहा था प्रेम नहीं करना 
कर सीता से यशोधरा तक का उल्लेख, कहा था
अत्यंत सुंदर स्त्रियों के भाग्य में प्रेम नहीं होता  
माँ के मुख से निकली बात किसी मंत्रोच्चार से कम तो नहीं होती नताशा
फिर कौन सा मुँह लेकर कहोगी कि वो जो रिश्ता था, अब रिसता है|

देखो नताशा, तुम्हारी खंडित स्मृतियों की परिक्रमा करता है शब्दयान 
और तुम्हें घेरे बैठी हैं कई दुर्लभ कवितायेँ 
तो करो प्रतिज्ञा कि नहीं पढ़ोगी प्रेम की आयूहीन कविता आजन्म 
हृदयहीन समाज की धिक्कारसभा में 

सुनो नताशा, 
यदि अपने दुखों के रंगों में रंग नील-बसना ही बनना है 
तो आसमान बन जाओ, करो अपने व्यक्तित्व का विस्तार अपरिमित 
किसी की छत बन जाओ, सजा लो कष्टों को बना सूरज, चाँद और तारे 
करो वृष्टि स्नेह की, जब दिल भर आये 

चलो, उठो नताशा, बहुत दूर जाना है 
और देखो आसमान की ओर सर उठाकर, कहीं कोई करुणाधारा नहीं है 
पर याद रहे नताशा,  न करना उल्लेख प्रेम या स्वाधीनता का कभी
कि मानवता की पृष्ठभूमि पर फूटता है कष्ट का झरना इन्हीं दो पर्वतों से 

सुनो नताशा, 
न करो धारण अपने कष्टों को आभूषणों की तरह 
छुपा लो गड़े खजाने की तरह उन्हें, 
नहीं तो मुश्किल में पड़ोगी

Sunday, March 12, 2017

फ़िदा हुसेन का घोड़ा

--------------------------------------------------
अपने ख्वाबों की बदलती ज्यामिति पर
जिसे बन जाना था पाइथोगोरस सा 
और गढ़ने थे जिसे नित्य नए प्रमेय 
मैंने देखा है खुली आँखों से उस शख्स को 
बदलते हुए अनगढ़े ख्वाबों को रंगों में,
फिर उन रंगों को बदलते कैनवास पर 
बिखरी हुई आड़ी-तिरछी लकीरों में,
बदलते देखा है उन लकीरों को फिर 
अलग-अलग ज्यामितीय आकारों में, 
देखा फिर ज्यामितीय आकारों को 
बदलते हुए एक मुकम्मल आकृति में 
देखा है इन आकृतियों को कई बार बनते घोड़ा
कभी रंगीन तो कभी श्वेत-श्याम रंगों में 
और इस प्रकार फ़िदा हुसेन की तूली से गुजरकर 
अनगढ़े ख्वाबों को घोड़ा बन दौड़ते कैनवास पर 
कई बार मैंने देखा है खुली आँखों से

यदि लगता है आपको कि मर गए हैं आपके ख्वाब 
यदि लगता है आपको कि ख्वाब अब बचे ही नहीं 
यदि लगता हो आपको कि ख्वाब जैसा कुछ था ही नहीं कभी 
तो जागकर शून्यता के ध्यान से देखिये फिदा हुसेन के घोड़े को 
जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे अलग-अलग रंगों में 
आगे बढ़ते हुए क्या देखा है आपने कभी मुड़कर अपने छूटे हुए ख्वाबों को ?

आप देखेंगे कि हमारे अपने ही ख्वाबों का चित्रांतर है फिदा हुसेन का घोड़ा 
जिसे स्पर्श कर पाने के लिए दरकार है अंतर्दृष्टि की 
जिसके शरीर से एक ज्यामितीय आकार निकालकर रख लेना चाहता है मन 
फिदा हुसेन के घोड़े की नाल में दिखता है मस्तुल हमारे ख्वाबों की नौका का

फिदा हुसेन का घोड़ा जो दिखता है कैनवास पर पीछे मुड़कर देखता 
बना है ज्यामितीय आकारों से और हर आकार का है अपना एक कैनवास 
मंचन हो सकता है उस हर एक कैनवास पर हमारी ख्वाबों के पसंद के किसी नाटक का 
जिसे देखकर पता चलता है कि होता है कितना जरूरी ख्वाबों को आकार देना !

हम जब भी देखते हैं कोई ख्वाब, हमें देखना चाहिए फिदा हुसेन के घोड़े को 
जो देखता है मुड़-मुड़ कर पीछे बारबार, आगे दौड़ते हुए भी पूरे सामर्थ्य के साथ 
कि मन को चाहिए होती है अथाह हॉर्स पावर शक्ति आगे बढ़ते रहने के लिए 
और आकार देने के लिए पीछे मुड़ कर देखते हुए अपने छूटे हुए अनगढ़े ख़्वाबों को






Monday, March 6, 2017

बस इक आशा

-----------------------------------------------------------------------
गाढ़े नीले रंग की स्याही में है दर्ज़
मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं में तैर रही दमित स्मृतियाँ 
जिन्हें विस्मृत करने के अभ्यास में किए जा रही हूँ कंठस्थ 
अब भी आच्छादित है जिन पर रक्त अक्षत अच्छे दिनों के अनुष्ठान का 

धरने पर है अनुच्चारित शब्दों का जुलूस
ध्वनि के द्वार पर, नीरवता में लीन
कोई जाप या मंत्रोच्चार नहीं, है बस इक आशा 
कि सुनाएगा कभी जीवन पियानो बीथोवन की नाइन्थ सिम्फ़नी

समयपुरुष पोंछ देता है उन तमाम स्नेहसिक्त आँखों की अनुभूतियों को 
जो कर सकता था काम मलहम का मेरी वेदना पर  
अबाध्य मन जा रहा है दंडकारण्य की ओर
है बस इक आशा कि लौट आएगा अच्छे दिनों का प्रवासी पक्षी 

अवकाश पर हैं धरती के समस्त देवी-देवता इन दिनों 
कि विलीन हो जाती हैं समस्त प्रार्थनाएँ निर्वात में 
है बस इक आशा कि आएगा कोई पैगम्बर वक़्त का 
और करवाएगा मेरा साक्षात्कार अच्छे दिनों के देवता से 

Saturday, March 4, 2017

मधुमेह

------------------------------------------------------------------
लिखा है एक तम्बू के बाहर
शहर के सबसे मशहूर चौराहे पर 
"बंजारों का हिमालय आयुर्वेदिक दवाखाना"
लोगों की भीड़ खड़ी है जिसके बाहर ऐसे 
मानो लगा हो किसी गाँव में मंगल बाज़ार  

सुनती है बंजारन सब्र से मरीज का मर्ज 
फिर देती है जामुन के बीज और आम के पत्तों का चूर्ण 
बताकर दवा साल के पत्तों से बने दोने में 
बताती है ढूँढा था धरती पर बंजारों ने ही सबसे पहले औषधि 
और बंजारों के पास है हर उस मर्ज की दवा 
जिसे शहर के बड़े अस्पताल कहते हैं लाइलाज़ 

ओह! तो बंजारे ही करेंगे कल्याण समस्त मानव जाति का 
और रोग, जिनकी दवाईयों का नहीं चल सका है पता 
वह तमाम औषधियाँ कर रही हैं प्रतीक्षा बंजारों की ?

बँटता है प्रसाद मिश्री और दूध का 
गाँव की शीतला माता मंदिर के बाहर 
बच्चे ग्रहण करते हैं प्रसाद, माता तृप्त होती है 

मधुमेह वह अनाथ है जिसका नहीं है कोई इष्टदेव 
भटकता रहता है जो देह की एक जमीन से दूसरी ज़मीन तक 
बंजारों की ही तरह, बिना भेदभाव किए किसी प्रकार का 

हाय ! वह रुग्ण स्त्री बंजारे की तम्बू में मिश्री की डली छोड़ आई 
उसे  पुकारता है बरगद के नीचे का शीतला माता का मंदिर 

इसके पहले कि उसकी स्नायु में जमता अवसादों का मेघ 
कर दे भावशून्य उसे , वह खेलना चाहती है लुकाछिपी तोते के साथ 
जिसका ठिकाना है आम का वह पेड़, जिसके फल हैं उसे  बेहद प्रिय 
चुराकर अपने ही जीवन से वह रख लेना चाहती है एक प्रेम भरा अपराह्न 
जब चख सके अपना प्रिय फल, तोता चखकर बतायेगा जिसकी मिठास  

ओह ! वह बंजारन के आंचल में सिक्कों जैसे बताशे छोड़ आई 
चीटियाँ भूलने लगीं हैं उसके घर का रास्ता इन दिनों 
और उसकी जुबान की स्मृतियों में फँसा है चाशनी का तार 

कोई कस रहा है तंज, रहने दीजिये, ये बंजारे करेंगे ठीक आपका मधुमेह !!
जो खुद भटकते हैं दर ब दर और जिन्होंने नहीं भरा कभी गृह ऋण की क़िस्त
वो क्या ख़ाक समझेंगे आपका दुःख, कैसे करेंगे आपकी दुःखों का इलाज़ !!

आह ! वह बंजारन की नन्ही बेटी के हाथों में लेमनचूस छोड़ आई 
पर उसके घर में अब भी बचे हैं कुछ शेष उसकी अपनी बेटी के लिए 

कहती है उसकी बेटी, माँ, खाने हैं शक्कर पारे 
रखकर नमक पारे उसकी नन्ही हथेलियों पर 
सुनाती है कहानी राजकुमारी और नमक की 
बदले में मिलती है उसे बेटी की मीठी मुस्कान 

उफ्फ ! वह मंगल बाज़ार में शक्कर छोड़ आई 
फक्कड़ इन्सुलिन गाता है गीत मचलकर 
"मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया"

वह शहर के उस चौराहे पर गुड़ की डली छोड़ आई 
कुतर रही अब बैठ बीते दिनों की मीठी यादों का गजक 

वह गुजर रही है नीम के जंगल से इन दिनों 
नीम अँधेरा है जहां दिन और रात 
नहीं उगता जहाँ केसरभोग सा सूरज 

वह चौराहे से घर तक, हर कदम पर, कुछ रवा चीनी छोड़ आई 
ज़िद्दी स्वाद ने पकड़ रखा है जुबान की मधुर स्मृति का आँचल 
और वह आँचल की ओट से देख रही है मीठे भविष्य का आना

Wednesday, March 1, 2017

रात

-----------------------------------------------
आएगा प्रकाश
कहता है भोर की ओर देख  
रात का बतास 

शब्द बतास का खिल जाता है बन फूल 
हवा में तैरती है गंध रात की रानी की 
स्वप्न में टिमटिमाता है जुगनू व्याकुल 

अँधेरा खिलखिलाता है 
नींद के कानन में चेतना की जागृति 
स्वप्न की विलासिता है 

दीये की बाती में रात की उदासियाँ जलती हैं 
होता है अंतराल बस एक स्वप्न भर का 
दिन के उजाले में स्वप्न की परियाँ हाथ मलती हैं 

निकल पडूँगी पदयात्रा पर मैं भी साथ
आएँगे जब दिन के उदास देवी-देवता 
और सीख लूँगी एक नए दिन का पाठ