Wednesday, July 18, 2018

एक छटाक सुख के लिए

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हुगली किनारे टहलते हुए नदी से मैंने पूछा 
पवित्र नदी क्या तुम मुझे दे सकती हो एक छटाक सुख ?
नदी ने कहा यदि घूम सको मेरी लहरों का जनपद 
और पढ़ सको उन लहरों पर लिखा जल काव्य 
तो शायद महसूस कर सको एक किस्म का सुख !

फिर वहीं उड़ते राम चिरैया से मैंने पूछा 
प्रिय पक्षी क्या तुम दे सकते हो मुझे एक छटाक सुख ?
राम चिरैया ने गाते हुए कहा कि बता सको अगर 
कौन सा राग गा रहा हूँ इस वक्त मैं 
तो शायद महसूस कर सको एक किस्म का सुख !

अंततः पास छवि आँकते एक चित्रकार से  मैंने पूछा 
हे चित्रकार ! क्या तुम दे सकते हो मुझे एक छटाक सुख ?
उसने मुझे थोड़ी देर देखा और फिर कहा 
तुम्हारे अधरों के हर कोण पर है अग्नि स्रोत  
अगर मुझे छूने दो अपने अधर पल्लव 
बाहर से निस्तेज होकर जल उठोगी अंदर से 
तो शायद महसूस कर सको एक किस्म का सुख !

अपने दुखों से हो भयाक्रांत मैं भटकती रही ताउम्र 
बस एक छटाक सुख के लिए 
जबकि मेरे आसपास ही था मौज़ूद किस्म-किस्म का अदृश्य सुख !

Saturday, July 7, 2018

सौमित्र के छह अध्याय

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1. प्रथम अध्याय - "हीरा"

सौमित्र चट्टोपाध्याय कोलकाता से कला संकाय में स्नातक करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए लंदन गए | काले बालों को छोड़, वह दिखते भी अंग्रेज थे | वहाँ उन्हें एक अंग्रेज लड़की, लूसी से प्रेम हो गया | दोनों साथ रहने लगे | जब पढाई पूरी हुई, तो भारत लौटने की बजाय उन्होंने लंदन के ही एक स्कूल में नौकरी कर ली | लूसी अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर करने के बाद लंदन के एक कॉलेज में पढ़ा रही थी | वह असाधारण कविताएँ लिखती थी | सौमित्र लूसी से अधिक प्रेम करते थे या उसकी कविताओं से, यह कहना मुश्किल था | दोनों साथ-साथ एक सुंदर जीवन (शायद सुंदर समय कहना ठीक होगा ) जी रहे थे  | सौमित्र पहले कैनवास पर चित्र उकेरते और लूसी उस चित्र को देख कविता लिखती | दोनों  कला के दीवाने थे | फिर एक दिन सौमित्र के पिता का तार आया कि उनकी तबियत ठीक नहीं और वह चाहते हैं कि सौमित्र भारत लौट आए | सौमित्र अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे | पिता की तबियत खराब सुन फ़ौरन लौट आए|

 घर लौटकर पाया कि उनके माता-पिता उनके विवाह की तैयारियां कर रहे थे | उन्होंने बहुत साहस के साथ अपने माता-पिता को लूसी और अपनी नौकरी के विषय में बताया | सुनते ही उनके जमींदार पिता ने उनसे कहा "हमने तुम्हें पढ़ने के लिए लंदन भेजा कि समाज में तुम्हारा रुतबा बढ़े और तुम उस अंग्रेज लड़की के चक्कर में पड़ स्कूल मास्टरी करने लगे ! छी ! छी ! कान खोलकर सुन लो, अब तुम लंदन वापस नहीं जा रहे हो"

"हम दोनों एक - दूसरे से बहुत प्रेम करते हैं और मैंने उससे वायदा भी किया है कि मैं उसे अपनी जीवन संगिनी बनाऊंगा" सौमित्र ने नजरें झुकाकर धीमे स्वर में कहा |

"किसने कहा था वायदा करने को? तुम्हारा विवाह हमारे समाज की ही किसी लड़की से होगा; उस विदेशी से नहीं| इसके आगे कुछ कहा तो मैं तुम्हें अपना वारिस मानने से इंकार कर दूँगा | मरते समय तुम्हारे हाथ का जल भी नहीं ग्रहण करूँगा | कुपुत्रः  बाघाय नमः" कहते हुए सौमित्र के पिता ज़ोर-ज़ोर से हाँफने लगे |

पिता को बेतरह हाँफते देख सौमित्र की माँ रोते हुए उसके पिता की पीठ सहलाते हुए कहने लगी "अगर इनको कुछ हो गया, तो मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूँगी"

सौमित्र से आगे कुछ नहीं कहा गया | अगले पाँच दिनों तक घर की स्थिति तनावपूर्ण ही रही | तीनों प्राणी खाने की मेज पर मिलते और आपस में बिना कुछ कहे सुने ही खाना खाकर चले जाते | छठे दिन खाने के साथ करौंदे का अचार खाते हुए सौमित्र ने सोचा कि यदि इतने वर्षों तक विदेश में रहकर विदेशी खाना खाने के बाद भी उन्हें करौंदे का अचार खाते हुए अलौकिक स्वाद की अनुभूति हो सकती है, फिर प्रेम तो शाश्वत है, अमर है| प्रेम को बचाने के लिए विवाह आवश्यक क्यूँ  होने लगा | उन्होंने उसी दिन गोधूली बेला में लूसी को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने लंदन से लौटने से लेकर अब तक हुई घटनाक्रमों का विवरण देने के बाद लूसी से विवाह न कर पाने के लिए माफ़ी माँगते हुए एक कविता भी लिखी जिसका हिंदी रूपान्तरण इस प्रकार है -

"पड़ी हैं कुछ बेशकीमती स्मृतियाँ स्मरण अरण्य की किसी उपेक्षित गुफा में 
जिनका है अपना ही कोई अदृश्य तिलस्मी अंतर्द्वार 
गुफा, जहाँ नहीं है मौजूद कोई भी खिड़की या कोई रौशनदान ही 
खुलता है उसका द्वार अकस्मात कुछ ऐसे  
जैसे दिया हो दस्तक जंग लगे हुए फाल्गुन के सांकल ने 
और किया हो उच्चारण शून्य में दबी जुबान 
अरबी उपन्यास के जादुई शब्द "खुल जा सिमसिम" का 
द्वार के खुलते ही दिखता है करीने से सजाकर रखा हुआ 
खजाना स्मृतियों का, दमकता है अंधेरे में  

निरूद्देश नौका पर हैं सवार निरुपाय स्मृतियाँ 
भाषा भूल चुकी स्मृतियाँ पोषित हो रही हैं हमारी करोटी में 
किसी परजीवी की तरह और चला रहीं हैं काम शब्दों का 
होकर निःशब्द, कर रही हैं संक्रमित हमारे मन को बार-बार 

धूसर स्मृतियों के तन पर लगे हैं मोरपंख 
जब छा जाता है मन के आकाश पर भावनाओं का मेघ 
और गिरने लगती हैं रिमझिम बूँदें गगनचारिणी आँखों से 
नाचता है स्मृतियों का अबाध्य मयूर "

पत्र के अंत में लिखा कि इकलौती संतान होने के कारण माता-पिता की देखभाल करना उनका कर्तव्य है और वह हालात के आगे मजबूर हैं| यह भी लिखा कि लूसी को वह मरते दम तक नहीं भूल पाएँगे और लूसी के लिए उनका प्रेम भी कभी खत्म नहीं होगा | 

पत्र लिखने के बाद वह कुछ हल्का महसूस कर रहे थे | अलबत्ता अगले रोज़ की पहली डाक से वह पत्र लूसी के पते पर भेज दिया गया | घर आते ही ऐलान कर दिया कि वह लूसी को विवाह के लिए मना कर चुके हैं| घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी | सौमित्र बाबु के लिए नए सिरे से वधु की तलाश शुरू की गयी | 

"हम जानते थे सोमू कि तुम हमारा मान रखोगे | तुम हीरा हो , हीरा " कहते हुए सोमू की माँ ने उसका माथा चूमा था | 


2. द्वितीय अध्याय - "प्रेम का हत्यारा "

गाँव लौटते ही सौमित्र वही पुराने सोमू हो गए | एक निर्णय लेकर चिठ्ठी लिख देने से मन हल्का जरूर हो गया था पर समय-समय पर लूसी की यादें सोमू का मन मलीन कर जातीं | रात को सोने से पहले लूसी की बनाई हुई कॉफ़ी बेहद याद आती | हर सुबह आँखें खोल बिस्तर पर लूसी का न होना मन ही नहीं दिन भी खराब कर रहा था | वह याद करता किस तरह रात में टूट कर प्रेम करने के बाद लूसी उसकी कमीज पहनकर सो जाती | खाने की मेज पर सोमू की सूजी हुई आँखों को देख उसके पिता कहते "पुरुष नहीं रोते बेटे | तुम जमींदार खानदान के हो, अपने व्यक्तित्व में वैसा रौब भी लाओ"

सोमू केवल सुनते; कुछ नहीं कहते |  कुछ कहने की कोई गुंजाईश ही कहाँ थी |  उन्होंने स्वयं को व्यस्त रखने के लिए जमशेदपुर की एक बड़ी कम्पनी में एक छोटी नौकरी का बंदोबस्त कर लिया |  हालात के मद्देनजर घरवालों को भी लगा कि व्यस्त रहने और जगह परिवर्तन से सोमू लूसी को भूल जाएगा | सोमू के जमशेदपुर जाने से एक दिन पहले लूसी का पत्र आया | लूसी ने पत्र में जवाब स्वरुप सिर्फ एक कविता लिख भेजा था, जिसका हिंदी रूपांतरण इस प्रकार है -

"उचित है विदा लेना मनुष्य का अपने भ्रम से  
प्रेम की रात ढलने से भी पहले ही जीवन में 
कि चला जाता है विद्युत् आँधी के पूर्वाभास में 

उचित है उठा लेना काँधे भर ज़िम्मेदारी 
जीवन में बने खूबसूरत रिश्तों का 
कि बना रहे फर्क प्रेम और सुविधा में 

स्वार्थ के दौर का का गुजर जाना उचित है|"

कहने को कविता की महज कुछ पंक्तियाँ थीं, पर हर पंक्ति सोमू के हृदय में शूल की तरह चुभ कर रह गयी | वह अपने पहले प्रेम का हत्यारा साबित हो चूका था | वह गुनाहगार अधिक था या मजबूर ज्यादा, इसकी गणना करते हुए सुबह हो गयी और वह जमशेदपुर के लिए रवाना हो गया |

3.तृतीय अध्याय - "रुक्मिणी का रियाज "

जमशेदपुर में जहाँ सोमू के ठहरने की व्यवस्था की गयी थी, वहाँ हर शाम पड़ोस के घर से किसी लड़की के गाने की आवाज आती थी | वह हर संध्या गाने का रियाज़ करती और सोमू अपने आँगन में चाय पीते हुए उस आवाज़ में खो जाते | कई बार उत्सुकता बस छत की ओर जाती सीढ़ियों पर चढ़ पड़ोस के घर के उस कमरे की खिड़की की ओर झाँकते, जहाँ वह रियाज़ कर रही होती थी | लड़की की नजर सोमू से मिलती तो वह गाना छोड़ अपलक उसे निहारती | सोमू आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी था | लगभग डेढ़ महीने तक यह सिलसिला चला | एक शाम जब चाय पीते हुए वह आवाज़ सोमू तक नहीं पहुँची, उसे बेचैनी महसूस हुई| पहले तो उसने सीढ़ियों पर चढ़ उस कमरे में झाँका और लड़की को वहाँ न देख उसने पड़ोस के घर जाकर दरवाजे पर दस्तक दिया | 

"जी, आप ?" दरवाजा खोलते ही सामने खड़ी स्त्री ने पूछा |

"जी, मैं........वो...आपके घर से रोज़ इस समय गाने की आवाज़ आती थी, आज नहीं आई, तो सोचा पूछ लूँ कि सब ठीक तो है न"

"अच्छा | रुक्मिणी हमारी भांजी है| कोलकाता के एक स्कूल में संगीत सिखाती है| गर्मी की छुट्टियाँ बीताने यहाँ आई थी | छुट्टियाँ खत्म होने को हैं, इसलिए वापस चली गयी| आप अंदर आइये न" कहते हुए उस स्त्री ने सोमू को घर के बैठक में आने का न्योता दिया | 

"नहीं, फिर कभी| कोलकाता के किस स्कूल में हैं"सोमू  ने अधीर होकर पूछा |

इस प्रश्न पर उस स्त्री ने चुप रहना वाजिब समझा | अंततः सोमू ने अपना व अपने पिता का परिचय देते हुए बताया कि वह भी कोलकाता का रहवासी है और वह कोलकाता में ही रहकर किसी शैक्षणिक संस्थान में नौकरी करना चाहता है और इसीलिए उस स्कूल का नाम जानना चाहता है| उसके पिता के परिचय से रू-ब-रू हो उस स्त्री ने स्कूल का नाम बता दिया | सोमू उन्हें धन्यवाद ज्ञापित कर लौट आया | 

अगले दो दिनों तक वह बेचैन रहा | रुक्मिणी का चेहरा जेहन से हटने का नाम नहीं ले रहा था | शुक्रवार शाम दफ्तर से लौटते ही वह शाम की ट्रेन से कोलकाता रवाना हुआ | सोमवार को वह उस स्कूल के मुख्य द्वार पर खड़ा रुक्मिणी का इंतजार करने लगा | लगभग साढ़े नौ बजे सोमू के सामने एक रिक्शा रुका और उसका इंतजार खत्म हुआ | रुक्मिणी सामने सोमू को देख हैरान थी | वह एकटक सोमू को देखती रही |

"तुम्हारी आवाज कब मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गई, पता ही न चला | जब एक रोज़ तुम्हारी आवाज मुझ तक नहीं आई, मैं तुम्हारी मामी से तुम्हारे विषय में प्रश्न करने का दुस्साहस कर बैठा | आज तुम्हारे पास हूँ जबकि मुझे तो यह भी नहीं पता कि तुम्हारी जिंदगी में कोई पुरुष है भी या.."कहते हुए सोमू रुक्मिणी की आँखों में देखने लगा |

रुक्मिणी ने धीमे स्वर में कहा था "नहीं है" और फिर शरमाते हुए स्कूल परिसर में दाखिल हो गयी थी | सोमू शाम के साढ़े चार बजे तक स्कूल के आसपास मंडराता रहा | 

"आप अभी तक यहाँ हैं" रुक्मिणी सोमू को देख आश्चर्यचकित थी |

"क्या करता| तुमसे बात करने ही आया था | बात बिना पूरी किए कैसे चला जाता" सोमू स्नेहसिक्त आँखों से रुक्मिणी को देखता रहा | 

"अरे !" रुक्मिणी को समझ नहीं आ रहा था कि उसे कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए |

"देखो, अब या तो तुम ज़मशेद्पुर आओगी या मुझे कोलकाता आना पड़ेगा| तुम्हारी आवाज के बिना मेरी शाम बड़ी तकलीफदेह होती है" सोमू जवाब का इंतजार कर रहा था |  

"आपका तो घर भी है इस शहर में "रुक्मिणी ने इससे ज्यादा कुछ कहना ठीक न समझा |

"हम्म..करता हूँ कोई बंदोवस्त.. करना ही पड़ेगा" कहते हुए सोमू उसे कुछ देर एकटक देखता रहा और फिर दोनों कालीघाट की ओर निकल पड़े |

अब सोमू हर शनिवार की रात कोलकाता आ जाते और रविवार का दिन रुक्मिणी के साथ बिताकर वापस जमशेदपुर चले जाते | सोमू का समय फिर सुंदर हो चला था | सुंदर समय को साढ़े चार माह ही बीता था कि एक रविवार रुक्मिणी के किसी परिचित ने उन्हें कालीघाट पर देख लिया और फिर बात रुक्मिणी के पिता तक जा पहुँची | 

"स्वावलंबी बेटी किसी पुरुष का हाथ थामे कालीघाट में ...."रुक्मिणी के पिता तरह-तरह की अटकलें लगा रहे थे | शाम में रुक्मिणी के घर आते ही उससे अप्रत्याशित प्रश्न किया गया जिसका उसने सही जवाब दिया | सोमू के पिता का परिचय पा कर रुक्मिणी के पिता ने उसे सोमू को घर बुलाने के लिए कहा  | रुक्मिणी ने उन्हें बताया कि सोमू जमशेदपुर में कार्यरत है और अगले रविवार को ही मिलना संभव हो सकेगा | अगले रविवार जब सोमू रुक्मिणी से मिलने पहुँचा, वहाँ रुक्मिणी के साथ उसके पिता भी थे | वह सोमू को आग्रह कर घर ले गए और दिन के खाने के बाद रुक्मिणी से विवाह का प्रस्ताव भी दिया | सोमू उन्हें विवाह का आश्वासन देकर घर आया, तो सोचा बिना देर किए उसे अपने माता-पिता से बात करनी चाहिए | किसी और से पता लगे, उससे बेहतर होगा कि वह  स्वयं ही बात करे | वह लगभग आश्वस्त था | इस बार लड़की उनके समाज की थी, सो सोमू को आपत्ति की कोई गुंजाईश नहीं दिखी |

"क्या नाम बताया? नकुल डे ?" सोमू के पिता ने लाल जिल्द चढ़ी कानून की किसी किताब को पलटते हुए पूछा |

"जी" 

"विवाह कोई बच्चों का खेल नहीं | यह विवाह संभव नहीं और आप अपने विवाह की चिंता छोड़ काम में मन लगाईये | हम आपके लिए उपयुक्त कन्या तलाश रहे हैं| मिलते ही आपका ब्याह कर देंगे" उसके पिता ने बिना उत्तेजित हुए कहा | 

"क्यूँ  संभव नहीं  यह विवाह ? रुक्मिणी तो आपके ही समाज की लड़की है" सोमू क्रोधित था |

"लगता है लन्दन रहकर आप सब भूल गए | हम ब्राह्मण हैं और वो कायस्थ | छोटे कुल की वधु नहीं आ सकती इस घर में" कह कर  सोमू के पिता अपने काम में मगन हो गए |

"कुछ फर्क नहीं पड़ता इन सभी बातों से | ये आदिम युग की बातें हैं | रुक्मिणी एक पढ़ी - लिखी लड़की है और कोलकाता के एक  स्कूल में संगीत पढ़ाती है" सोमू पिता के दरबार में दलीलें दे रहा था |

"बहुत फर्क पड़ता है| चार अक्षर पढ़ कर आजकल की लडकियाँ हमारे सामाजिक रीति-रिवाजों को चूल्हे में डाल रही है और उस पर स्वाबलंबी हो, तो क्या कहने | हमारा तो आदर ही नहीं करेगी | इस घर में कोई ब्राह्मण की लड़की ही आएगी | मुझे आगे कुछ नहीं सुनना" कहते हुए सोमू के पिता ने उसके दूसरे प्रेम का अतिम अध्याय लिख दिया |

सोमू गुस्से से लाल तो था ही, गोरा होने के कारण उसके गुस्से का रंग चेहरे पर भी दिख रहा था और उसकी लाल आँखों में आँसू थे | 

जब सोमू पिता के कमरे से निकल रहा था तो पिता ने कहा था "पुरुष नहीं रोते| कम से कम लडकियों के लिए तो कभी नहीं"

सोमू अगले दिन जमशेदपुर लौट गया | उसने रुक्मिणी को चिठ्ठी लिख कर सब बताया और विवाह न कर पाने के लिए क्षमा याचना की |

4.चतुर्थ अध्याय - "वनदेवी परिचय"

शामें अब सोमू को उदास कर जातीं थीं और इसी उदासी से उबरने के लिए उसने बचत के रुपयों से ग्रामोफोन खरीद लिया था | पर स्मृतियाँ अदृश्य सुरंगों से होते हुए सोमू तक पहुँच जाती | ग्रामोफोन पर किशोरी अमोनकर राग हंसध्वनि गातीं " आज सजन संग मिलन बनिलवा" और वह रुक्मिणी के लिए तड़प उठता | उसे अहसास हुआ कि संगीत के प्रति उसकी आसक्ति  ही उसे रुक्मिणी तक ले गयी थी | ऐसे में विरह के सफर में संगीत उसका साथी नहीं हो सकता | लूसी की संगति में रहकर वह चित्रकारी भी करने लगा था | लूसी ने उसे चित्रकारी की कई बारीकियाँ सिखाई थीं | सोमू ने अपने अकेलेपन के सफर में रंगों का साथ चुना | अब उसके कमरे में हर आकर के कैनवास थे और कई प्रकार के रंगों की शीशियाँ थीं | जिंदगी अक्सर विस्मृत करती है| होना तो यह था कि कूची और रंग उसे लूसी की स्मृतियों के करीब ले जाते, पर कैनवास पर जो वह उकेर रहा था, वहाँ एक वनदेवी थी, जो अज्ञात कुलशील थी | उसके माथे पर फूलों का ताज था | उसके केश घुटनों तक लम्बे थे और उसकी दोनों भवें  आपस में जुड़ी हुईं थी | कैनवास पर कई बार वन देवी खीर बना रही होतीं तो कभी मछलियों के मध्य जल में तैर रही होती | ऐसा नहीं था कि रंगों से खेलते हुए उसे लूसी की याद नहीं आती, पर वह अपने अतीत को किसी अदृश्य चेहरे में गुम कर देना चाहता था | एक ऐसे चेहरे में, जो उस तथाकथित समाज का हिस्सा न हो, जो मनुष्य को वर्ण और हैसियत के आधार पर बाँटता है | एक ऐसे चेहरे में, जहाँ वह चरित्र अपने में इतना पूर्ण है कि उसे किसी की आज्ञा की कोई जरुरत नहीं | सोमू के तस्वीरों की तारीफ़ करते हुए भले ही लोग उसे चित्र प्रदर्शनी में शामिल होने की सलाह देते, पर सोमू के लिए वह चित्र पूजा के निर्माल्य के बराबर थे, किसी को कैसे बेचता | उसके कई परिचित उससे चित्र माँगकर निराश हो चुके थे | 

नौकरी और रंगों के बीच सात महीने कट गए और शारदीय महापर्व दुर्गा पूजा का समय आ गया | बीते सात महीनों में सोमू को उसके पिता ने कई बार घर बुलाया पर हर बार सोमू कोई बहाना बना देता |  पिता समझ रहे थे कि बेटा नाराज है, सो दुर्गा पूजा पर उसे घर ले जाने वह स्वयं जमशेदपुर आ गए थे | अब सोमू के पास घर जाने के अतिरिक्त कोई चारा न था |

सोमू घर तो पहुँच गए थे या यूँ कहे कि ले जाए गए थे, पर उत्सवधर्मिता के लिए मन में जिस उल्लास की जरूरत होती है, वह तो दूर-दूर तक न था | वह सुबह देर तक सोया रहता, दिन में कहानी की किताबें पढता और शाम दोस्तों को शतरंज खेलने के लिए घर पर ही बुला लेता |  घर के अहाते में पूजा  का बड़ा सा पंडाल लगा था पर सोमू झाँकने तक न गया | षष्ठी की पूजा के दिन सोमू की माँ ने उसे सुबह - सुबह जगाया और उसे नहाकर पंडाल तक आने की जिद की | वह उनके हुक्म की तामील करे इसलिए अपना कसम देना भी नहीं भूलीं | थोड़ी उधेर बुन के बाद सोमू तैयार होकर जब पंडाल पहुँचा, पुष्पांजलि का समय था |  वह भीड़ को चीरता हुआ पुष्पांजलि के लिए फूल लेने हेतु जब बेदी के करीब पहुँचा, वहाँ उसके अंजुरी में फूल भरने के बाद एक लड़की करबद्ध कर आँखें मूँद पुजारी के साथ-साथ मन्त्र बुदबुदाने लगी | पूरा पंडाल या तो देवी की प्रतिमा की ओर देख रहा था या ऑंखें मूँद प्रार्थना में लीन था | सोमू हैरान हो लाल पार की सफेद साड़ी पहनी उस लड़की को एकटक देखता रहा | धवल त्वक, कमर से लम्बे केश, जुड़ी हुई भवें; वह साक्षात वनदेवी के दर्शन कर रहा था | सोमू ने मंत्रोच्चार के बाद अन्य लोगों की तरह फूलों को बेदी पर अर्पण करने की बजाय अपनी वनदेवी पर अर्पित किया | वनदेवी ने एकबार पलटकर देखा और फिर पुष्प -पात्र लिए लोगों में फूल वितरण करने लगी | सोमू ने हर बार फूल वनदेवी को ही अर्पित किया | वनदेवी पूजा समाप्त होते ही घर के अंदर चली गयी | सोमू ने अपनी माँ से वनदेवी का परिचय पूछा तो पता चला वनदेवी और कोई नहीं उनके महाराज (रसोईया) की बेटी थी जो कुछ दिनों पहले अपने पिता की अस्वस्थता का समाचार पाकर आई थी | अब रसोई उसके ही जिम्मे था | 

"अच्छा ! क्या नाम है उसका?" सोमू ने माँ से पूछा |

"अन्नपूर्णा" कहती हुई माँ प्रसाद वितरण में मगन हो गयीं थी |

उस दोपहर किताब पढ़ते हुए सोमू को रह-रह कर किताब के पन्नों पर अन्नपूर्णा का चेहरा उभरता दिख रहा था | पढ़ने में उसका मन नहीं लग रहा था | रात में भी उसे ठीक से नींद नहीं आई | वह अचंभित था कि कैसे उसके तैलचित्र की वनदेवी से उसका साक्षात्कार हुआ था | कैसे संभव था यह जबकि वह कभी पहले उससे मिला तक न था | 

वह अगले रोज़ सुबह सूर्योदय होते ही उठकर नदी किनारे टहलने चला गया | थोड़ी देर टहलने और कसरत करने के बाद भानु सिंह की पदावली गुनगुनाता हुआ वह मुँह धोने के लिए घाट की सीढ़ियों से जैसे ही नीचे उतरा, सामने का दृश्य देख अवाक् हो गया | अन्नपूर्णा जल में स्नान करती हुई तैर रही थी और उसके आसपास रह-रहकर मछलियाँ उछलती हुई नदी की विपरीत धारा की ओर बढ़ रहीं थी | सोमू को एकबार लगा था कि उसकी नींद पूरी न होने की वज़ह से उसे यह सब दिख रहा था| उसने आगे बढ़कर नदी का जल अपने चेहरे पर छिडका था और पुनः वही दृश्य देख स्वयं को अस्वस्थ मान भागता हुआ घर आकर चादर ओढ़ सो गया था | पुरे दिन कमरे में ही रहा |

महाष्टमी के दिन माँ के मनुहार पर भी वह पूजा मंडप तक नहीं गया, तो माँ ही भोग का प्रसाद लेकर उसके कमरे में आ गयी और उसे अपने हाथ से खिलाने लगी |  भोग चखते ही जैसे उसकी जन्मों की भूख तृप्त हुई थी | 

"किसने बनाया यह भोग?" पूछते हुए वह शायद उत्तर जानता था |

"और कौन ? अन्नपूर्णा" माँ ने उसके मुँह में निवाला डालते हुए कहा | 

वह माँ की हाथ से चुपचाप भोग की खिचड़ी खाता रहा जबकि उसके मन में एक अलग ही खिचड़ी पक रही थी | उसे अन्नपूर्णा से एकांत में मिलना था | उससे मिलकर बताना था कि वह उसकी वनदेवी है| 

नवमी के दिन सुबह उठकर सोमू वनदेवी से मिलकर बात करने की लालसा लिए नदी किनारे गया | वहाँ वनदेवी अपने रुग्ण पिता को स्नान करा रही थी | वह दृश्य देख सोमू करुणा से भर गया | वह अन्नपूर्णा से चाहे तो बात कर सकता था; महाराज कुछ नहीं कहते | पर उसने बिना कुछ कहे लौट जाना ही उचित समझा |

विजयादशमी के दिन सिंदूर खेला के बाद जब देवी की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया गया, सोमू सीधे रसोई में जा हाजिर हुए | 

"जी, आपको कुछ चाहिए ? आज बाकी सभी लोग विसर्जन में गए हैं| मैं अकेली हूँ" अन्नपूर्णा ने सहमते हुए पूछा | 

"तुमसे ही बात करने आया हूँ" सोमू ने धीमे स्वर में कहा |

"जी...."अन्नपूर्णा बस इतना ही पूछ सकी |

"तुम कहाँ से आई हो ? क्या तुम विश्वास करोगी यदि मैं कहूँ कि मैंने तुम्हें देखने से पहले ही तुम्हारा चित्र बनाया ? क्या तुम जानती हो तुम मेरी वनदेवी हो? मुझे लगता है तुम मेरी चित्रों से निकलकर मेरा पीछा करती हुई यहाँ तक आ गयी हो" सोमू  एक साँस में कह गया था |

इतना सुनते ही अन्नपूर्णा खिलखिला कर हँस पड़ी थी और कहा था "बाबु, मैंने तो सुना कि आप तो लंदन से बहुत कठिन पढ़ाई कर यहाँ लौटे हैं | क्या ज्यादा पढ़ने से लोगों को ऐसा कुछ होने लगता है?"

"पागल नहीं हूँ मैं | किसी रोज़ तुम्हें वो तस्वीर भी दिखाऊंगा | कहो, शर्त लगाओगी? अगर चित्र की वनदेवी की शक्ल हु-ब -हु तुमसे मिली, तो मुझसे ब्याह करोगी?"सोमू अधीर हो चूका था |

अन्नपूर्णा ने बिना कोई उत्तर दिए लज्जा से अपने दोनों हाथों से अपनी आँखें बंद कर लीं थी | 

सोमू इसे स्वीकार का लक्षण समझते हुए कमरे में लौट आया | वह देर तक सोचता रहा था कि ग्रामीण अंचल में पली -बढ़ी उस लड़की में कितना आत्मविश्वास था | इतना तो शायद उसमें भी न था |  वह लड़की क्या थी, साक्षात माया थी | जादुई आकर्षण था उसमें | अगले दिन उसे जमशेदपुर के लिए रवाना होना था, इसलिए उसने रात्री भोजन के बाद अपने पिता से अन्नपूर्णा के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा था | सुनते ही पिता आगबबूला हो गए थे | 

"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? यह नहीं हो सकता" पिता ने स्पष्ट कह दिया था  |

"पर अन्नपूर्णा ब्राह्मण है| आपको इस बार कोई आपति नहीं होनी चाहिए" सोमू ने अपना पक्ष रखा था |

"ब्राह्मण है तो क्या हुआ, है तो हमारे महाराज की ही बेटी | कहाँ हम और कहाँ वो| मैंने तुम्हारा रिश्ता कूचबिहार के एक जमींदार घराने में पक्का कर दिया है| दोल पूर्णिमा के बाद कोई अच्छा दिन देख  तुम्हारा विवाह करा देंगे | तुम्हें अब ब्याह के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं" सोमू के पिता ने फरमान सुना डाला था |

"क्या? आपने मेरा ब्याह पक्का कर दिया ? मुझसे बिना पूछे ? मैंने तो उस लड़की को देखा भी नहीं?" सोमू गुस्से से लाल था |

"हमने कौन सा तुम्हारी माँ को देखा था ब्याह से पहले | माता-पिता जो करते हैं अपनी संतान का भला सोचकर ही करते हैं| हमारी पसंद पर भरोसा रखो" कहते हुए सोमू के पिता उसकी पीठ थपथपाते हुए कमरे से बाहर निकल गए |

सोमू रात भर न सो सका था  | मन में कई तरह के ख्याल आए | सुबह जमशेदपुर रवाना होने से पहले वह अन्नपूर्णा से मिलने गया था तो उससे कहा था कि वह अगली बार जब आएगा तो उसे अपने साथ ले जाएगा और उससे ब्याह कर लेगा | 

सोमू अगली बार पंद्रह दिनों के अन्तराल पर लौटा, तो उसे अपने घर के अहाते में विवाह मंडप दिखा, जिसके चारों ओर केले का पेड़ लगा था | वह एक किस्म के अनजान भय से घिर गया | उसने भारी मन से घर में प्रवेश किया और सीधे रसोई की ओर भागा | वहाँ उसकी माँ खाना बना रही थी | वह अवाक् हो माँ को देखता रहा था | माँ ने बताया था "महाराज की तबियत अचानक बिगड़ गयी थी | वह चाहता था उसके जिंदा रहते उसकी इकलौती बेटी का ब्याह हो जाए | तुम्हारे पिता ने उसकी आखिरी इच्छा पूरी कर दी | पास के गाँव के एक लड़के से अन्नपूर्णा का ब्याह कर दिया | उसका ब्याह भी हुआ और महाराज भी बैकुंठ सिधार गया| ईश्वर उसकी आत्मा को शांति दे"

सोमू यात्रा से थका हुआ तो था ही, अन्नपूर्णा की शादी की बात सुन टूट सा गया था | वह अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर औंधे मुँह पड़ गया था | उसके दिनभर अन्न-जल ग्रहण न करने की बात सुन उसके पिता उसे रात्री भोजन के लिए बुलाने स्वयं आए थे |

अभी उसके पिता अपने चिर-परिचित अंदाज में उसे समझाना शुरू ही किए थे "बेटे, पुरुष नहीं रोते ..."

"हाँ, कापुरुष रोते हैं ; जैसे मैं हर बार अपना प्रेम खोकर रोता हूँ| पहली बार पुरुष बनने चला था, आप लोगों ने मुझसे वह मौका भी छीन लिया" सोमू ने अपने पिता को वाक्य पूरा करने नहीं दिया |

अगली सुबह सोमू जमशेदपुर लौट गया |

5 पंचम अध्याय - "अन्नपूर्णा का वैधव्य"

रंग उसे लूसी की याद दिलाता तो चित्र की वनदेवी उसे अन्नपूर्णा की ; संगीत उसे रुक्मिणी की याद दिलाता | उसने अपने अतीत से भागने के लिए योगाभ्यास शुरू किया | खाली समय में शारीरिक व्यायाम के अतिरिक्त वह ध्यान लगाने के विभिन्न तरीकों को सीखने लगा | चार महीनों से वह घर भी नहीं गया था | अचानक एक रविवार उसके माता-पिता जमशेदपुर आ गए और उसे बताया कि अगले महीने के प्रथम सप्ताह ही उसका विवाह तय हुआ है| योगाभ्यास और ध्यान का ही असर रहा होगा कि सोमू ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी | तीन दिन बाद सोमू यंत्रवत माता-पिता के साथ कोलकाता चला गया | विवाह की खरीदारी से लेकर विवाह के नियम -क़ानून तक अपने माता-पिता के हर निर्देश का पालन किया | 

पत्नी, जो गहनों से लदी थी, देखने में औसत थी | विवाह के कुछ महीनों में सोमू को यह भी पता चल गया कि उसे न तो लिखने-पढ़ने में कोई रूचि है, न ही संगीत में | कभी उसने सोमू के चित्रों में भी किसी प्रकार की कोई रूचि नहीं दिखाई | सोमू इस बात से बेहद दुखी रहता था | उसने अपने बनाये चित्र कोलकाता के भंडार कक्ष में रखवा दिया था |

दिन, महीने , साल बदलते रहे और सोमू दो बच्चों के पिता बने | सोमू कभी अपना अतीत विस्मृत नहीं कर पाए | परिस्थितियों ने उन्हें चैन से रहने न दिया | अपनी छोटी संतान के अन्नप्राशन पर जब सोमू कोलकाता गए, उनके लौटने के ठीक दो दिन पहले रुक्मिणी की सीढ़ियों से गिरने से मृत्यु हो गयी | वह उसकी अंत्येष्टि में शामिल हुए और घर लौटकर रोने की बजाय देर तक ग्रामोफोन  पर किशोरी अमोनकर को सुना | 

इस घटना के तीन साल बाद सोमू के पिता चल बसे | पिता के श्राद्ध पर उसने ब्राह्मण भोज के समय अन्नपूर्णा को खाना बनाते देखा | वह विधवा के वेश में थी |  सोमू के पूछने पर उसने बताया कि उसका विवाह जिस युवक से किया गया था, वह शराबी था | शादी के दो साल बाद एक दिन वह स्नान करने नदी में गया, तो नहीं लौटा | कई दिनों बाद उसकी लाश लौटी |  दो -चार घरों में खाना बनाकर किसी प्रकार उसका गुज़ारा चल रहा था | 

"मेरे साथ जमशेदपुर चलोगी? हमारे साथ रहना " सोमू ने भावुक होकर कहा था | 

" इस विधवा से ब्याह करेंगे बाबु?"अन्नपूर्णा ने व्यंग्य करते हुए पूछा था |

सोमू ने जब कोई उत्तर नहीं दिया, अन्नपूर्णा ने कहा था "वनदेवी हूँ,  दासी नहीं बन पाऊँगी | मेहनत कर अपना पेट पाल सकती हूँ | संभव हो तो आप मुझे वनदेवी का चित्र उपहार में दे जाइये"

सोमू ने जमशेदपुर लौटने से पहले भंडार कक्ष से ढूँढकर वनदेवी का चित्र अन्नपूर्णा को दिया था |  

सोमू की माँ अकेली रह गयी थी और वह सोमू के साथ जमशेदपुर भी नहीं जाना चाहती थी | सोमू जब कभी उन्हें अपने साथ ले जाने की बात करता, वो कहतीं कि उन्हें उसी घर में अपना प्राण त्याग करना है जहाँ उसके पिता की स्मृतियाँ हैं| सोमू अब हर महीने कोलकाता का एक चक्कर लगाने लगे थे | पिता की अंत्येष्टि के अगले महीने जब वो अपनी माँ से मिलने आए, तो माँ ने उन्हें कुलदेवी के दर्शन करवाने का आग्रह किया | कुलदेवी का मंदिर ग्राम के दूसरे छोड़ पर था | जब सोमू माँ को लेकर वहाँ पहुँचे, उन्हें वनदेवी का वह चित्र, जो उसने अन्नपूर्णा को उपहार में दिया था, कुलदेवी की प्रतिमा के ठीक ऊपर टंगा दिखा | अगली सुबह उसने अन्नपूर्णा से शिकायत के लहजे में जब पूछा था कि उसने उस चित्र को मंदिर में क्यूँ टांगा, तो उसने जवाब में कहा था "प्रेम के लिए इस संसार में कोई मंदिर नहीं है| उस चित्र को कुलदेवी के ऊपर टांग कर मैंने यह स्थापित करने की कोशिश की है कि प्रेम से बड़ा कोई भगवान नहीं होता"| यह सुन कर सोमू कुछ कह ही नहीं पाया | उसके अंदर जैसे कुछ चटखा | वह चीख कर रोना चाहता था, पर आँखों में अश्रु जल आने से पहले मानस पटल पर पिता का कहा गूँजने लगता "पुरुष नहीं रोते" |  उसने मन ही मन सोचा कि अन्नपूर्णा सचमुच की देवी ही होगी जो शापित हो इहलोक में विचर रही है|   

6 षष्ठ अध्याय - "पुरुष नहीं रोते"

बीते वर्षों में बहुत कुछ बदला | सोमू एकबार फिर सौमित्र हो गए | कई पदोन्नति, कई तबादला और अंतिम तबादला कोलकाता में हुआ | उनके अंतिम तबादले के वर्ष ही उनकी माँ का स्वर्गवास हो गया था | पत्नी से उनका संबंध औपचारिक रह गया | बच्चे बड़े हो गए और अब उनके अपने बच्चे थे | संतोष की बात यह रही कि उनके बच्चे उनका बेहद ख्याल रखते हैं| रंग और चित्र से नाता भले ही टूट सा गया, पर उनसे प्रेम न छूटा | ग्रामोफ़ोन अब सजावट का सामान बन कर रह गया था | सौमित्र अब मोबाइल के एक क्लिक पर किशोरी अमोनकर से लेकर प्रभा अत्रे तक किसी को भी सुन सकते थे | उनके पढ़ने का शौक कब लिखने में तब्दील हो गया, यह उन्हें भी पता न चला | शायद अकेलेपन के अपने नितांत निजी क्षणों में अतीत का तीर जब सीने में चुभता, वह उसे पन्नों पर उतार देते | उनकी कविताओं में लूसी के प्रेम को पढ़ा जा सकता और रुक्मिणी के मृत्यु विलाप को | 

सौमित्र अब अस्सी पार कर चुके हैं|  अपने बच्चों से अपनी अंतिम इच्छा ज़ाहिर करते हुए सौमित्र ने कह दिया है कि मृत्योपरांत उन्हें चंदन की लकड़ी पर न जलाया जाए | वह चाहते हैं कि लकड़ी की जगह उन सभी कैनवास का प्रयोग चिता के लिए किया जाए जिस पर उन्होंने कभी वनदेवी और वन के चित्र उकेरे थे | अपने बच्चों से कहा कि जलती हुई चिता से उठती रंगीन लपटों में जीवन को देखे और उनके लिए कभी आँसू न बहाए | पत्नी से कुछ नहीं कहा | पत्नी और उनके बीच किसी प्रकार का संवाद तभी होता है जब वह अत्यंत आवश्यक हो |

हर शाम वह बिला नागा हुगली नदी के किनारे बैठ ध्यान करते हैं और फिर घर पहुँचकर संध्या करने बैठ जाते हैं| आसपास के लोगों को भले ही लगता है कि सौमित्र शांभवी मुद्रा में योगरत होते हैं, यह सिर्फ सौमित्र ही जानते हैं कि उनके ध्यान में नदी होती है जिसमें पानी की सतह के नीचे हिलसा मछलियां और सतह के ऊपर अन्नपूर्णा तैर रही होती है| कभी -कभी जल की जगह कुलदेवी की पूजा बेदी, मछली की जगह कुलदेवी और अन्नपूर्णा की जगह वनदेवी का चित्र उभर आता है| संध्या अर्चना करते हुए गायत्री मंत्र नहीं बुदबुदाते | रुक्मिणी को ध्यान करते हुए एक ही प्रश्न बारबार पूछते हैं "तुम मुझे कभी क्षमा कर पाओगी?"|

सौमित्र अब नहीं रोते | सौमित्र अब ध्यान लगाकर अतीत के अश्रु जल में गोता लगाते हैं|

होलिका दहन

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बुंदेलखंड के जमींदार हिरण्यकश्यप अपने इकलौते बेटे प्रह्लाद की अंधभक्ति को लेकर बेहद चिंतित थे | प्रह्लाद ने एकबार अपनी माँ कयाधु को कहते सुन लिया था कि ईश्वर की आराधना से संसार में किसी भी वस्तु को प्राप्त किया जा सकता है और यही बात उसके बाल मन में घर कर गयी थी | वह अपना ज्यादातर वक़्त पूजा-अर्चना में लगाया करता था और हर बात के लिए ईश्वर पर आश्रित रहने लगा था | न उसका मन पढ़ने में लगता न ही खेलने में | वह अपने आसपास के लोगों से भी कटा-कटा सा रहता था | शुरू-शुरू में जमींदार हिरण्यकश्यप ने बच्चे की इन गतिविधियों को उसके विकास की उम्र मानकर और बालपन की बालसुलभ प्रवृत्ति मानकर अनदेखा किया; परन्तु जब कुछ समय के बाद भी यह गतिविधियाँ कम होने की बजाय बढ़ती रहीं, तो वे प्रह्लाद से कठोरता से पेश आए | इसी क्रम में एकदिन उन्होंने अपने आदेशपाल से घर से सभी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ निकाल उन्हें जंगल में रख आने का आदेश दिया | आदेशपाल ने आज्ञा का यथाशीघ्र पालन किया और जमींदार के घर की सभी देवी-देवताओं की मूर्तियों को जंगल में रख आया |

जमींदार हिरण्यकश्यप लगभग आश्वस्त हो चुके थे कि घर से मूर्तियों के निष्कासन से उनकी समस्या का समाधान हो गया था कि तभी किसी ने उन्हें सूचना दी कि प्रह्लाद जंगल चला गया और वहाँ जाकर वह ईश्वर के तप में लीन हो गया |  उन्हें महसूस हुआ कि उन्होंने जल्दबाजी में गलत फैसला ले लिया | वह प्रह्लाद को लाने स्वयं जंगल गए पर प्रह्लाद ने उनके समक्ष शर्त रखा कि वह घर तभी जाएगा जब वह जंगल में रखी मूर्तियों को घर ले जा सकेगा | हिरण्यकश्यप को प्रह्लाद के बाल हठ के आगे झुकना पड़ा और वह प्रह्लाद और मूर्तियों के संग भारी मन से घर लौट गए |

अगले दिन शरत पूर्णिमा थी | हिरण्यकश्यप ने काफी विचार करने के बाद अपनी समस्या के समाधान के लिए अपनी छोटी बहन होलिका को बुला भेजा | जमींदार को होलिका की सूझबूझ पर बहुत विश्वास था | होलिका हिमाचली लड़के इलोजी से प्रेम करती थी और एक अरसे से उससे विवाह करना चाहती थी परंतु इस अन्तर्जातीय विवाह को हिरण्यकश्यप मान्यता देने को तैयार न थे | उस रोज़ जब बड़े भाई के बुलावे पर होलिका आई तो भाई ने बहन के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि यदि वह अगले वर्ष शरत पूर्णिमा के दिन तक किसी प्रकार प्रह्लाद की अंधभक्ति समाप्त करने में सफल रही, तो वह स्वयं इलोजी से उसका विवाह करवाएँगे | होलिका अपने बड़े भाई के इस प्रस्ताव पर राज़ी हो गयी | उसके पास इलोजी से विवाह करने का और कोई दूसरा रास्ता भी न था |

अगले दिन जब प्रह्लाद पूजा करने बैठा, तो होलिका ने उससे कहा "तुम इतना पूजा-पाठ करते हो, काश ! कि तुम्हें इसका पुण्य भी उतना ही मिलता"

"उतना ही मिलता !!! क्या कहना चाहती हैं आप?" प्रह्लाद नहीं समझ पा रहा था |

"देखो, पूजा तुम करते हो | फूल और फल हमारा माली उगाता है; प्रसाद तुम्हारी माँ बनाती हैं और पूजा के स्थान की सफाई तो घर का सहायक करता है| तुम्हारी पूजा का पुण्य तुम्हारे अतिरिक्त उन सभी को बराबर हिस्से में मिलता है| तो पूरा पुण्य तुम्हें तो नहीं मिला न ?" कहते हुए होलिका प्रह्लाद की आँखों में देखने लगी |

"अरे हाँ !!!" कहता हुआ प्रह्लाद सोच में पड़ गया था|

"परेशान होने की कोई बात नहीं| अगर तुम चाहो, कल से बागीचे की देखभाल में माली की मदद कर सकते हो और कुछ समय बाद तुम्हें स्वयं फूल और फलों को उगाना आ जायेगा| इसी प्रकार तुम हमारे गोशाला जाकर गायों की सेवा कर सकते हो, उन्हें चराने ले जा सकते हो और उन्हें दूहना भी सीख सकते हो | हो सके तो सहायक के बदले कल से पूजा स्थान की सफाई तुम ही करो" कहती हुई होलिका ने उसे एकसाथ कई उपक्रमों में व्यस्त रखने का कारगर उपाय ढूँढ लिया था | प्रह्लाद की सहमती देख लगे हाथ उसने माली से लेकर सहायक तक सभी को उचित निर्देश दे दिया |

प्रह्लाद ईश्वर को पाने के लिए कुछ भी कर सकता था | अगले दिन सुबह उठते ही पहले वह माली के साथ काम पर लग गया | फिर वह गौशाला गया और गौ पालन के गुर सीखने लगा | पूजा स्थान की सफाई सबसे आसान काम था |  इन कामों में अब प्रह्लाद को तीन से चार घंटों का समय देना पड़ता था | फिर शारीरिक श्रम के चलते वह शाम में थकान की वज़ह से जल्दी ही सो जाता | पूजा के लिए अब कम समय मिलता; पर वह संतुष्ट रहता कि पूजा का सारा पुण्य उसे अकेले ही मिल रहा था | कुछ ही महीनों में प्रह्लाद ने अपनी लगन से ये सब काम तो सीखा ही; साथ ही गाय और पेड़-पौधों से उसे लगाव हो गया | लाजिम भी था जिनके साथ वक़्त बिताया, उनसे लगाव तो होना ही था |

अभी पाँच महीने ही बीते थे कि एक दिन फिर होलिका पूजा के ऐन वक़्त प्रह्लाद के सामने उपस्थित हुईं  और कहने लगीं "मैं बेहद खुश हूँ कि अब तुम अपनी पूजा की सारी व्यवस्था स्वयं करते हो | ईश्वर भी तुमसे बेहद खुश होंगे | बस एक बात की कमी है अब"

"अब किस बात की कमी है!!" प्रह्लाद ने आश्चर्यचकित होकर पुछा था |

"बिना शिक्षा के तुम न मन्त्र का सही उच्चारण जानते हो न ही कर्मकांड की सही विधि का ही ज्ञान है तुम्हें | इस सबके लिए जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है, वह तो विधिवत शिक्षा के पश्चात ही मिलना संभव हो सकता है और यह है बड़ा मुश्किल काम | न जाने तुम कर पाओगे या ... " कहती हुई होलिका एक बार फिर प्रह्लाद की आँखों में देखने लगी |

"क्यूँ नहीं कर सकता | जरूर करूँगा | ईश्वर के लिए तो मैं कुछ भी कर सकता हूँ" प्रह्लाद ने होलिका की अपेक्षानुसार ही उत्तर दिया था |

कुछ समय के बाद प्रह्लाद ने अपने पिता से कहकर एक प्रतिष्ठित विद्यालय में अपना नामांकन करवाया और मन लगाकर पढ़ने लगा | प्रकृति और ईश्वर को जानने की ऐसी उत्सुकता कि पाठ्यक्रम के इतर पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रह्लाद पुस्तकालय भी जाने लगा |  अब वह पूजा के लिए मुश्किल से आधा घंटा ही निकाल पाता था | कुछ समय बाद उसके वैज्ञानिक प्रयोगों की माया थी कि वह ईश्वर की अपेक्षा प्रकृति में अधिक विश्वास करने लगा था |

जमींदार हिरण्यकश्यप अपने पुत्र में इस सकारात्मक बदलाव देख बेहद प्रसन्न हुए और अपनी बहन से किए हुए वायदे के मुताबिक शरत पूर्णिमा को उसका ब्याह उसके प्रेमी इलोजी के साथ धूमधाम से करवाया | उन्हें इस बात का भी भान हुआ कि किसी भी समस्या का हल हठ या कठोरता की अपेक्षा सूझबूझ से किया जाना चाहिए | इसी उपलक्ष्य में उन्होंने पुराने जर्जर हो चुके रीति रिवाजों के बहिष्कार के लिए प्रतीकात्मक तौर पर पुराने जर्जर हो चुके सामानों को जलाया और इसे होलिका के नाम पर होलिका दहन कहा | होलिका दहन में होलिका को जलाया जाना पुरानी बात थी; आज के जमाने में होलिका द्वारा समाज की रुढ़िवादी परम्पराओं और वर्जनाओं को जला नए प्रतिमान गढ़ने को होलिका दहन कहा गया |

Saturday, June 30, 2018

मलय रॉयचौधुरी की कविताएँ

1. तितली प्रजन्म की नारी तुम चित्रांगदा देव 

रवीन्द्रनाथ, यह लेकिन ठीक नहीं हो रहा है |
चित्रांगदा कह रही थी आप प्रतिदिन
उसे रोक लेते हैं, आपको साबुन
लगाने के लिए, सुना है बूढ़े हो गए हैं इसलिए
अकेले स्नानघर जाने में आप
डरते हैं, और हाथ भी नहीं पहुँचता है
देह के सर्वत्र, बालों में शैम्पू वगैरह करना--
पोशाक खोलते ही, आसंग-उन्मुख नीली
तितलियाँ उडती हैं उसके ही शरीर से
और वो गाती हैं आपका लिखा हुआ गीत !

यह आप क्या कर रहे हैं ? आपकी
प्रेमिकाएँ बूढ़ी जर्जर हैं तो क्यूँ
मेरी प्रेमिका को फँसाना चाह रहे हैं !

2. खसखस का फूल 

कुचाग्र का तुम्हारे गुलाबी रंग अवंतिका
शरीर तुम्हारा हरे रंग से ढँका अवंतिका
खरोंचता हूँ निकलता है गोंद अवंतिका
चाटने देती हो, नशा होता है अवंतिका
हो दर्दनाक गिराती हो पेट अवंतिका

3. अन्तरटॉनिक

बीड़ी फूँकती हो अवंतिका
चुम्बन में श्रम का स्वाद पाता हूँ
देशी पीती हो अवंतिका
श्वास में नींद की गंध पाता हूँ
गुटखा खाती हो अवंतिका
जीभ पर रक्त का स्पर्श पाता हूँ
जुलूस में जाती हो अवंतिका
पसीने में तुम्हारे दिवास्वप्न पाता हूँ |

4. उत्सव 

तुम क्या कभी श्मशान गयी हो अवंतिका ? क्या बताऊं तुम्हें !
ओह वह कैसा उत्सव है, कैसा आनंद, न देखो तो समझ नहीं पाओगी --
पञ्चांग में नहीं ढूँढ पाओगी ऐसा उत्सव है यह | कॉफ़ी की घूँट लेता हूँ |
अग्नि को घेर जींस-धोती-पतलून-बनियान व्यस्त हैं अविराम
मद्धिम अग्नि कर रही है तेज नृत्य आनंदित होकर, धुंए का वाद्ययंत्र
सुनकर जो लोग अश्रुपूरित आँखों से शामिल होने आए हैं उनकी भी मौज
अंततः शेयर बाज़ार में क्या चढ़ा क्या गिरा, फिर टैक्सी
पकड़ सामान्य निरामिष खरीदारी पुरोहित की दी हुई सूची अनुसार --
चलना श्मशान काँधे पर सबसे सस्ते पलंग पर सोकर लिपस्टिक लगाकर ...
ले जायेंगे एक दिन सभी प्रेमी मिल काँधे के ऊपर डार्लिंग ...

5. प्रियंका बरुआ 

प्रियंका बरुआ तुम्हारे
होठों का महीन उजाला
मुझे दो न जरा सा

विद्युत् नहीं है
कई साल हुए
मेरी उँगलियों में हाथों में

तुम्हारी उस हँसी से
जरा सा बुझा दोगी क्या
मेरे जलते होठों को

जब भी कहोगी तुम
कविता की कॉपी से
निकालकर दे दूँगा तुम्हें

सुना है आग भी है
तुम्हारी देह के किसी खाँचे में
माँगते हुए शर्म महसूस करता हूँ

जुगनू का हरा
प्रकाश हो, तो भी चलेगा
दो न जरा सा

होंठ जो सूख गया है
प्रियंका बरुआ देखो
कविता लिखना भी हुआ बंद

तुम्हारे कभी के दिए हुए
अंधकार में अब भी
डूब जाती है हाथों की उँगलियाँ

तुम्हारी उस हँसी से
जरा सा बुझा दोगी क्या
मेरे जलते होठों को

जब भी कहोगी तुम
कविता की कॉपी से
निकालकर दे दूँगा तुम्हें

6. विज्ञानसम्मत कीर्ति 

पंखा टांगने के उस खाली हुक से
गले में नायलोन की रस्सी बाँध लटक जाओ
कपाट सटाकर दरवाजे के पीछे
ऊँची तान पर रेडिओ चलाकर झटपट
साड़ी साया कमीज खोलकर टूल के उपर
खड़े होकर गले में फाँसी की रस्सी पहन लेना
सारी रात अंधकार में अकेली लटकती रहना
आँखें खुलीं जीभ बाहर निकला हुआ
दोनों ओर बेहोश दो हाथ और स्तन
जमी हुई षोडशी के शून्य पाँव के नीचे
पृथ्वी की छुआछूत से परे जहाँ
बहुत पुरुषों के होठों ने प्यार किया है
उस शरीर को छूने में डरेंगे आज वो लोग

लटको, लाश उतारने के लिए हूँ मैं |

7. दलाल 

यह क्या कुलनारी ! तुम जहाज घाट पर देह बेचने आयी हो
लूँगी पहना हुआ पानखोर दलाल नहीं रखा ?
सफ़ेदपोश कवि शरीर को छलनी कर देगा
शंख और लोहे की चूड़ियाँ उतार दोनों हाथों से खींच लेंगे तुम्हें लॉरी पर
लॉक अप में निर्वस्त्र मध्यरात्रि.......उस समय गाना तुम रवीन्द्र संगीत

छी कुलपुत्री ! तुम सबको करने देती हो प्यार
जिस-तिस के साथ जहाँ तहाँ सो जाती हो
चारोंओर रंगीन आँखों वाले मंजे हुए ठग सब पर नजर रखे हुए हैं, याद रखना

मैं तो स्ट्रेचरवाही हूँ कुछ भी नहीं कर सकूँगा
शायद टिफिन डब्बे में ले आऊँगा रोटी और आलू-जीरे का भुजिया
गाना सुनाने के बीच झुक-झुक कर पैसा उठाऊँगा
सुबह होते ही गंगा के किनारे तुम खड़ी रहकर उल्टी करना
अस्पताल में मिलेगा बेडपैन ग्लूकोज बोतल में पानी
गंदे बिस्तर के पास सोया हुआ तन्द्रागत कुत्ता  |

8. वज्रमुर्ख का तर्क 

आज शुक्रवार है | वेतन मिला है | शायद शरतकाल की पूर्णिमा है |
महीन मेघ के मध्य खेल रही है ज्योत्स्ना | मध्यरात्रि | सुनसान सड़क |
जरा सी ताड़ी चढ़ाई है | गुनगुना रहा हूँ अतुलप्रसाद |
कहीं कुछ नहीं है, अचानक आवारा कुत्तों का दल
भौंकने लगता है | पीछा करता है | दौड़ता रहता हूँ असहाय |
नहीं समझ पाया पहले | राजपथ आकर होंश आता है |
वेतन गिर गया है कहीं हाथ से | कैसे लौटूँगा घर ?
कोई भी तो विश्वास नहीं करेगा | सोचेंगे खेला होगा रेस,
गया होगा वेश्या के घर, दोस्तों के साथ उड़ाया होगा |
बंधु - बांधव कोई नहीं है | रेस भी नहीं खेला कब से |
दूसरी स्त्रियों के खुले वक्ष पर अंतिम बार हाथ कब लगाया था
भूल गया हूँ | नहीं जानता विश्वास नहीं करता कोई भी क्यूँ |
मुझे तो लगता रहता है, जो नहीं किया वही किया है शायद |
जो नहीं कहा, मैंने वही कहा | फिर इस पूर्णिमा का मतलब क्या है ?
क्यूँ इस वेतन का मिलना ? क्यूँ गाना ? क्यूँ ताड़ी ?

फिर घुसना पड़ेगा बेहद गंदी गली में | निर्घात कुत्ते
गंध सूंघकर जान जाएँगे | घेर लेंगे चारोंओर से |
जो होना है हो जाए | आज साला इस पार या उस पार |

9. धनतंत्र का क्रमविकास 

कल रात बगल से कब उठ गयी
चुपचाप अलमारी तोड़कर कौन सा एसिड
गटागट पीकर मर रही हो अब
उपजिह्वा गल चुकी है दोनों गालों में है छेद
मसूरे और दाँत बहते हुए दिख रहे हैं चिपचिपे तरल में
गाढ़ा झाग, घुटने में हो रहा है ऐंठन से दर्द
बाल अस्तव्यस्त, बनारसी साड़ी साया
खून से लथपथ, मुठ्ठी में कजरौटा
सोले से बना मुकुट रक्त से सना रखा है एक ओर
कैसे कर पायी सहन, नहीं जान पाया
नहीं सुन पाया कोई दबी हुई चीत्कार
तो क्यूँ सहमति दी थी गर्दन हिलाकर
मैं चाहता हूँ जैसे भी हो, तुम बच जाओ
समग्र जीवन रहो कथाहीन होकर

10. स्वच्छ दीवार

वह दीवार कैसी दिखती है
उसे नहीं पता
दीवार जिसकी है वह भी कभी
नहीं जान पायी
वह केवल जानती है कि है
दीवार
बचा-बचा कर रखा है
उस युवक के लिए
जिसे वह तोड़ने देगी
युवा लोग फिर भी पसीने से तर हो जाते हैं
एक स्वच्छ पतली
दीवार तोड़ते हुए
हजारों-हजार सालों से
तोड़ी जा रही है दीवार
रक्त के साथ रस से निर्मित
वह दीवार
जिसकी टूटती है उसे गर्व नहीं होता
जो तोड़ता है उसका भी
अहंभाव नाचता है पसीने में
रस का नागर होने का ख़िताब मिला है
प्रेमी को
प्रेमिका दिखाएगी चादर में रक्त लगाकर
अध्यवसाय में समय के साथ लड़कर
दीवार टूटने का वह आनंद
दोनों जन का
जिसने तोड़ा और जिसका टूटा
सेलोफेन सा महीन
दीवार न तोड़कर मनुष्य
जन्म नहीं लेगा
इसलिए
सभी दीवारों को
स्वच्छ मांस से निर्मित
सेलोफेन सा हो या
लोहे की ईंट की अदृश्य
सीमारेखा की
प्रेम के पसीने में भिगोकर
तोड़ देना है जरूरी
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1. প্রজাপতি প্রজন্মের নারী তুই চিত্রাঙ্গদা দেব

রবীন্দ্রনাথ, এটা কিন্তু ভালো হচ্ছে না।
চিত্রাঙ্গদা বলছিল আপনি প্রতিদিন
ওকে রুকে নিচ্ছেন, আপনাকে সাবান
মাখাবার জন্য, বুড়ো হয়েছেন বলে
আপনি নাকি একা বাথরুমে যেতে
ভয় পান, আর হাতও পৌঁছোয় না
দেহের সর্বত্র, চুলে শ্যাম্পু-ট্যাম্পু করা--
পোশাক খুললে, আসঙ্গ-উন্মুখ নীল
প্রজাপতি ওড়ে ওরই শরীর থেকে
আর তারা আপনার লেখা গান গায় !

এটা আপনি কী করছেন ? আপনার
প্রেমিকারা বুড়ি থুতথুড়ি বলে কেন
আমার প্রেমিকাটিকে ফাঁসাতে চাইছেন !

2. পপির ফুল

বোঁটায় তোর গোলাপ রঙ অবন্তিকা
শরীরে তোর সবুজ ঢাকা অবন্তিকা
আঁচড় দিই আঠা বেরোয় অবন্তিকা
চাটতে দিস নেশায় পায় অবন্তিকা
টাটিয়ে যাস পেট খসাস অবন্তিকা

3. অন্তরটনিক

বিড়ি ফুঁকিস অবন্তিকা
চুমুতে শ্রমের স্বাদ পাই
বাংলা টানিস অবন্তিকা
নিঃশ্বাসে ঘুমের গন্ধ পাই
গুটকা খাস অবন্তিকা
জিভেতে রক্তের ছোঁয়া পাই
মিছিলে যাস অবন্তিকা
ঘামে তোর দিবাস্বপ্ন পাই

4. উৎসব

তুই কি শ্মশানে গিয়েছিস কখনও অবন্তিকা ? কী বলব তোকে !
ওহ সে কী উৎসব কী আনন্দ, না দেখলে বুঝতে পারবি না--
পাঁজিতে পাবি না খুঁজে এমনই উৎসব এটা । কফিতে চুমুক দিই।
আগুনকে ঘিরে জিন্স-ধুতি-প্যান্ট-গেঞ্জি মেতে আছে ননস্টপ
মিচকে আগুন তেড়ে নাচছে আনন্দ খেয়ে, ধোঁয়ার বাজনা
শুনে কাঁদো-চোখে যারা সব অংশ নিতে এসেছে তারাও মজা
শেষে শেয়ার বাজারে কী উঠল কী নামল আবার ট্যাকসি
ধরে ছোটো নিরামিষ কেনাকাটা পুরুতের দেয়া লিস্টি মেনে--
চলিস শ্মশানে কাঁধে চিপেস্ট পালঙ্কে শুয়ে লিপ্সটিক মেখে...
নিয়ে যাব একদিন সবাই প্রেমিক মিলে কাঁধের ওপরে ডারলিং...

5. প্রিয়াংকা বড়ুয়া

প্রিয়াংকা বড়ুয়া তোর
ঠোঁটের মিহিন আলো
আমাকে দে না একটু

ইলেকট্রিসিটি নেই
বছর কয়েক হল
আমার আঙুলে হাতে

আগুনও আছে নাকি
তোর দেহে কোনো খাঁজে
চাইতে বিব্রত লাগে

জোনাকির সবুজাভ
আলো থাকলেও চলে
দে না রে একটুখানি

ঠোঁট যে শুকিয়ে গেছে
প্রিয়াংকা বড়ুয়া দ্যাখ
কবিতা লেখাও বন্ধ

তোর ওই হাসি থেকে
একটু কি নিভা দিবি
আমার শুকনো ঠোঁটে

যখনি বলবি তুই
কবিতার খাতা থেকে
তুলে দিয়ে দেব তোকে

6. বিজ্ঞানসন্মত কীর্তি

ফ্যান টাঙাবার ওই খালি হুক থেকে
কন্ঠে নাইলন দড়ি বেঁধে ঝুলে পড়ো
কপাট ভেজিয়ে দরোজার চুপিসাড়ে
উঁচুতানে রেডিও চালিয়ে তাড়াতাড়ি
শাড়ি শায়া জামে খুলে টুলের ওপরে
দাঁড়িয়ে গলায় ফাঁস-রশি পরে নিও
সারারাত অন্ধকারে একা ঝুলে থেকো
চোখ ঠিকরিয়ে জিভ বাইরে বেরোনো
দুপাশে বেহঁশ দুই হাত আর স্তন
জমাট ষোড়শি শূন্য পায়ের তলায়
পৃথিবীর ধরাছোঁয়া ছাড়িয়ে যেখানে
বহু পুরুষের ঠোঁটে আদর খেয়েছ
সে-শরীর ছুঁতে ভয় পাবে তারা আজ

দোলো লাশ নামাবার জন্য আছি আমি ।

7. দালাল

এ কী কুলনারী তুমি জাহাজঘাটায় দেহ বেচতে এসেছো
লুঙি-পরা পানখোর দালাল রাখোনি
সাদাপোষাকের কবি শরীর ঝাঁঝরা করে দেবে
শাঁখা-নোয়া খুলে তারা দুহাত হিঁচড়ে টেনে তুলবে লরিতে
লকাপে ল্যাংটো মাঝরাত.....সে-সময়ে গেয়ো তুমি রবীন্দ্রসংগীত

ছিহ কুলখুকি তুমি সবায়ের আদর কুড়োও
যারতার সাথে গিয়ে যেখানে-সেখানে শুয়ে পড়ো
চারিদিকে কটাচোখ ধ্রুপদী জোচ্চোর সব নজর রাখছে মনে রেখো

আমি তো স্ট্রেচারবাহী কিছুই করতে পারব না
হয়তো টিফিনবাক্সে এনে দেব রুটি আর আলুজিরে ভাজা
গান শোনাবার মাঝে ঝুঁকে-ঝুঁকে পয়সা কুড়োবো
ভোর হলে গঙ্গার পাড়ে তুমি দাঁড়িয়ে-দাঁড়িয়ে বমি কোরো
হাসপাতালেতে পাবে বেডপ্যান গ্লুকোজ বোতলে জল
তালচিটে বিছানায় পাশে শোয়া ঘুমন্ত কুকুর ।

8. বজ্রমূর্খের তর্ক

আজকে শুক্কুরবার । মইনে পেয়েচি । বোধায় শরতকালের পুন্নিমে ।
পাতলা মেঘের মধ্যে জোসনা খেলচে । মাঝরাত । রাস্তাঘাট ফাঁকা ।
সামান্য টেনিচি তাড়ি । গাইচি গুনগুন করে অতুলপ্রসাদ ।
কোথাও কিচ্ছু নেই হঠাত নেড়ি-কুকুরের দল
ঘেউ ঘেউ করে ওঠে । তাড়া করে । বেঘোরে দৌড়ুতে থাকি ।
বুঝতে পারিনি আগে । রাজপথে এসে হুঁশ হয় ।
মাইনেটা পড়েচে কোথাও হাত থেকে । কী করে ফিরব বাড়ি ?
কেধ তো বিশ্বাস করবে না । ভাববে খেলেচে রেস,
গিয়েচে মাগির বাসা, বন্ধুদের সাথে নিয়ে বেলেল্লা করেচে ।
বন্ধুবান্ধব কেউ নেই । রেসও খেলি না কতকাল ।
অন্য স্ত্রীলোকের খোলা-বুকে হাত শেষ কবে দিয়েচি যে
ভুলে গেচি । জানি না বিশ্বাস করে না কেউ কেন ।
আমার তো মনে হতে থাকে, যা করিনি সেটাই করিচি বুঝি ।
যা কইনি, সেকথা বলিচি । তাহলে এ পুন্নিমের মানে ?
কেন এই মাইনে পাওয়া? কেন গান ? কেন তাড়ি ?

আবার ঢুকতে হবে রামনোংরা গলির ভেতরে । নির্ঘাত কুকুরগুলো
গন্ধ শঁকে টের পাবে । ছেঁকে ধরবে চারিদিক থেকে ।
যা হবার হয়ে যাক । আজ শালা এস্পার কিংবা ওস্পার ।

9. ধনতন্ত্রের ক্রমবিকাশ
শেষরাতে পাশ থেকে কখন উঠেছ
চুপচাপ আলমারি ভেঙে কী অ্যাসিড
ঢকঢক করে গিলে মরছ এখন
আলজিভ খসে গেছে দুগালে কোটর
মাড়িদাঁত দেখা যায় কষেতে বইছে
গাঢ় ফেনা হাঁটুতে ধরেছে খিঁচ ব্যথা
চুল আলুথালু বেনারসি শাড়ি শায়া
রক্তে জবজবে মুঠোতে কাজললতা
শোলার মুকুট রক্ত-মাখা একপাশে
কী করে করেছ সহ্য জানতে পারিনি
শুনতে পাইনি কোনো চাপা চীৎকার
তবে কেন সায় দিয়েছিলে ঘাড় নেড়ে
আমি চাই যেকরেই হোক বেঁচে ওঠো
সমগ্র জীবন থাকো কথাহীন হয়ে

१०. স্বচ্ছ দেওয়াল

সে দেওয়াল কেমন দেখতে
জানে না
দেওয়ালটা যার সেও কখনও
জানেনি
সে কেবল জানে রয়েছে
দেওয়ালখানা
বাঁচিয়ে বাঁচিয়ে রাখছে
সেই যুবকের জন্য
যাকে সে ভাঙতে দেবে
যুবকেরা তবু গলদঘর্ম হয়
স্বচ্ছ একটা পাতলা
দেওয়াল ভাঙতে
হাজার হাজার বছর যাবত
চলছে দেওয়াল ভাঙা
রক্তের সাথে রসের তৈরি
সেই দেওয়াল
যার ভাঙে তার গর্ব ধরে না
যে ভাঙছে তারও
অহমিকা নাচে ঘামে
রসের নাগর খেতাব মিলেছে
প্রেমিকের
প্রেমিকা দেখাবে চাদরে রক্ত লেগে
অধ্যবসায়ে সময়ের সাথে লড়ে
দেওয়াল ভাঙার সে কি আনন্দ
দুজনেরই
যে ভাঙল আর যার ভাঙা হল
সেলোফেন ফিনফিনে
দেওয়াল না ভেঙে মানুষ
জন্মাবে না
তাই
সব দেওয়ালই
স্বচ্ছ মাংসে গড়া
সেলোফেনে হোক কিংবা
লোহার ইঁটের অদৃশ্য
সীমারেখার
প্রেমের ঘামেতে ভিজিয়ে
ভেঙে ফেলা দরকার

Saturday, May 19, 2018

सरोज मृत्यु

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वह दिन का दूसरा प्रहर था जब हुआ शुरू मृत्यु आयोजन
गंगा पार की सुतनुका हवाओं ने गाया विरह का गीत
और पड़ी मलीन छाया ज्येष्ठ महीने के तपते मुख पर
तो भ्रमण पर निकल गए समस्त शब्द निःशब्द रूप लेकर

मृत्यु के जल की स्मृतियों में हुआ सरोज का आस्तित्व परिपूर्ण
तो आया लेकर अंधकार का दूत गंगा का जल निमंत्रण
सरोज की जिह्वा पर उतर आया स्वाद मछलियों का
डूबता चला गया फिर सरोज का मृणाल मृत्यु के जल में

भाग्य गुण से मिलता है ऐसा महाप्रस्थान
जब मृत्यु भी हो उठती है अत्यंत शिल्प सचेतन
जीवन ताल के पंक में बिखरा पड़ा है पवित्र बीज
फिर खिलेगा कहीं कोई सरोज किसी सृष्टि मुखर दिन में  !!

Wednesday, March 21, 2018

काज़ी नज़रूल इस्लाम की कविताएँ

1. साम्यवादी 

गाता हूँ साम्यता का गान 
जहाँ आकर एक हो गए सब बाधा - व्यवधान 
जहाँ मिल रहे हैं हिन्दू - बौद्ध - मुस्लिम - ईसाई 
गाता हूँ साम्यता का गान !

तुम कौन? पारसी? जैन? यहूदी? संथाली, भील, गारो?
कनफ्यूसियस? चार्वाक के चेले? कहते जाओ, कहो और !
बन्धु, जितने खुश हो जाओ,
पेट, पीठ, कांधे, मगज में जो मर्जी पाण्डुलिपि व किताब ढोओ,
कुरआन- पुराण-वेद- वेदान्त-बाइबिल-त्रिपिटक 
जेंदावेस्ता-ग्रन्थसाहिब पढ़ते जाओ, जितनी मर्जी 
किन्तु क्यूँ ये व्यर्थ परिश्रम, मगज में हनते हो शूल?
दुकान में क्यूँ ये दर मोल-भाव? पथ में खिलते ताज़ा फूल !
तुममे है सभी किताब सभी काल का ज्ञान,
सभी शास्त्र ढूँढ सकोगे सखा, खोलकर देखो निज प्राण !
तुममे है सभी धर्म, सभी युगावतार,
तुम्हारा हृदय विश्व -देवालय सभी देवताओं का |
क्यूँ ढूँढते फिरते हो देवता-ठाकुर मृत पाण्डुलिपि - कंकाल में ?
हँसते हैं वो अमृत हिया के निभृत अंतराल में !

बन्धु, नहीं कहा झूठ,
यहाँ आकर लूट जाते हैं सभी राजमुकुट |
यह हृदय ही है वह नीलाचल, काशी, मथुरा, वृन्दावन,
बोधगया यही, जेरूसलम यही, मदीना, काबा भवन,
मस्जिद यही, मंदिर यही, गिरिजा यही हृदय,
यहीं बैठ ईसा मूसा ने पाया सत्य का परिचय |
इसी रणभूमि में बाँसुरी के किशोर ने गाया महा-गीता,
इसी मैदान में भेड़ों का चरवाहा हुआ नबी खुदा का मीता |
इसी हृदय के ध्यान गुफा में बैठ शाक्यमुनि 
त्यागा राज्य मानव के महा-वेदना की पुकार सुनि  |
इसी कन्दरा में अरब-दुलाल सुनते थे आह्वान,
यहीं बैठ गाया उन्होंने कुरआन का साम-गान |
मिथ्या नहीं सुना भाई,
इस हृदय से बड़ा कोई मंदिर - काबा नाही |
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সাম্যবাদী – কাজী নজরুল ইসলাম

গাহি সাম্যের গান-
যেখানে আসিয়া এক হয়ে গেছে সব বাধা-ব্যবধান
যেখানে মিশছে হিন্দু-বৌদ্ধ-মুস্‌লিম-ক্রীশ্চান।
গাহি সাম্যের গান!
কে তুমি?- পার্সী? জৈন? ইহুদী? সাঁওতাল, ভীল, গারো?
কন্‌ফুসিয়াস্‌? চার্বআখ চেলা? ব’লে যাও, বলো আরো!
বন্ধু, যা-খুশি হও, 
পেটে পিঠে কাঁধে মগজে যা-খুশি পুঁথি ও কেতাব বও,
কোরান-পুরাণ-বেদ-বেদান্ত-বাইবেল-ত্রিপিটক-
জেন্দাবেস্তা-গ্রন্থসাহেব প’ড়ে যাও, যত সখ-
কিন্তু, কেন এ পন্ডশ্রম, মগজে হানিছ শূল?
দোকানে কেন এ দর কষাকষি? -পথে ফুটে তাজা ফুল!
তোমাতে রয়েছে সকল কেতাব সকল কালের জ্ঞান,
সকল শাস্র খুঁজে পাবে সখা, খুলে দেখ নিজ প্রাণ!
তোমাতে রয়েছে সকল ধর্ম, সকল যুগাবতার,
তোমার হৃষয় বিশ্ব-দেউল সকল দেবতার।
কেন খুঁজে ফের’ দেবতা ঠাকুর মৃত পুঁথি -কঙ্কালে?
হাসিছেন তিনি অমৃত-হিয়ার নিভৃত অন্তরালে!

বন্ধু, বলিনি ঝুট,
এইখানে এসে লুটাইয়া পড়ে সকল রাজমুকুট।
এই হৃদ্য়ই সে নীলাচল, কাশী, মথুরা, বৃন্দাবন,
বুদ্ধ-গয়া এ, জেরুজালেম্‌ এ, মদিনা, কাবা-ভবন,
মস্‌জিদ এই, মন্দির এই, গির্জা এই হৃদয়,
এইখানে ব’সে ঈসা মুসা পেল সত্যের পরিচয়।
এই রণ-ভূমে বাঁশীর কিশোর গাহিলেন মহা-গীতা,
এই মাঠে হ’ল মেষের রাখাল নবীরা খোদার মিতা।
এই হৃদয়ের ধ্যান-গুহা-মাঝে বসিয়া শাক্যমুনি
ত্যজিল রাজ্য মানবের মহা-বেদনার ডাক শুনি’।
এই কন্দরে আরব-দুলাল শুনিতেন আহবান,
এইখানে বসি’ গাহিলেন তিনি কোরানের সাম-গান!
মিথ্যা শুনিনি ভাই,
এই হৃদয়ের চেয়ে বড় কোনো মন্দির-কাবা নাই।

2. क्षमा कीजिए हजरत



आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
क्षमा कीजिए हजरत
भूल गया हूँ आपके आदर्श
आपका दिखाया हुआ पथ
क्षमा कीजिए हजरत |
विलास वैभव को रौंदा है पाँव तले
धूल समान आपने प्रभु
आपने नहीं चाहा कि हम बने
बादशाह, नवाब कभू |
इस धरणी की धन सम्पदा
सभी का है उस पर समान अधिकार,
आपने कहा था धरती पर हैं सब
समान पुत्रवत
क्षमा कीजिए हजरत |

आपके धर्म में नास्तिकों से
आप घृणा नहीं करते,
आपने उनकी की है सेवा
आश्रय दिया उन्हें घर में

भिन्न धर्मियों के पूजा मंदिर
तोड़ने का आदेश नहीं दिया, हे वीर !
हम आजकल सहन
नहीं कर पाते दूसरों का मत
क्षमा कीजिए हजरत |

नहीं चाहा आपने कि हो धर्म के नाम पर
ग्लानिकर हत्या-जीवन हानि
तलवार आपने नहीं दिया हाथ में
दी है अमर वाणी

हमने भूल कर आपकी उदारता
बढ़ा ली है धर्मान्धता,
जन्नत से नहीं झरती है अब
तभी आपकी रहमत
क्षमा कीजिए हजरत |

आपकी वाणी को नहीं किया ग्रहण
क्षमा कीजिए हजरत
भूल गया हूँ आपके आदर्श
आपका दिखाया हुआ पथ
क्षमा कीजिए हजरत |
==============
ক্ষমা করো হজরত

তোমার বাণীরে করিনি গ্রহণ, ক্ষমা করো হজরত।

ভুলিয়া গিয়াছি তব আদর্শ, তোমার দেখানো পথ

ক্ষমা করো হজরত॥

বিলাস বিভব দলিয়াছ পায় ধূলিসম তুমি প্রভু

তুমি চাহ নাই আমরা হইব বাদশা নওয়াব কভু

এই ধরণির ধন সম্ভার

সকলের তাহে সম অধিকার

তুমি বলেছিলে, ধরণিতে সবে সমান পুত্রবৎ॥

ক্ষমা করো হজরত॥

তোমার ধর্মে অবিশ্বাসীরে তুমি ঘৃণা নাহি করে

আপনি তাদের করিয়াছ সেবা ঠাঁই দিয়ে নিজ ঘরে।

ভিন-ধর্মীর পূজা মন্দির

ভাঙিতে আদেশ দাওনি, হে বীর,

আমরা আজিকে সহ্য করিতে পারিনোকো পর-মত॥

ক্ষমা করো হজরত!!

তুমি চাহ নাই ধর্মের নামে গ্লানিকর হানাহানি,

তলওয়ার তুমি দাও নাই হাতে, দিয়াছ অমর বাণী,

মোরা ভুলে গিয়ে তব উদারতা

সার করিয়াছি ধর্মান্ধতা,

বেহেশ্‌ত হতে ঝরে নাকো আর তাই তব রহমত॥

ক্ষমাকরো হজরত॥

3.तरुण प्रेमी 


तरुण प्रेमी, प्रणय वेदना
बताओ बताओ बे-दिल  प्रिया को
ओ विजयी, निखिल हृदय
करो करो जय मोहन माया से |

नहीं वो एक हिया समान
हजार काबा, हजार मस्जिद
क्या होगा तुम्हारे काबा की खोज से
आश्रय ढूँढों तुम्हारी हृदय की छाँव में |

प्रेम की रौशनी से है जो दिल रौशन
जहाँ हो समान उसके लिए
खुदा की मस्जिद, मूरत मंदिर
इसाई गिरिजा, यहूदीखाना |

अमर है उसका नाम प्रेम के पन्नों पर
ज्योति से जिसे जाएगा लिखा
दोजख़ का भय नहीं होता है उसे
नहीं रखता है वह जन्नत की आशा |
----------------------

তরুন প্রেমিক
তরুণ প্রেমিক, প্রণয় বেদন
জানাও জানাও বে-দিল প্রিয়ায়
ওগো বিজয়ী, নিখিল হূদয়
কর কর জয় মোহন মায়ায়।

নহে ও এক হিয়ার সমান
হাজার কাবা হাজার মস্‌জিদ
কি হবে তোর কাবার খোঁজে
আশয় খোঁজ তোর হূদয় ছায়ায়।

প্রেমের আলোয় যে দিল্‌ রোশন
যেথায় থাকুক সমান তাহার
খুদার মস্‌জিদ মুরত মন্দির
ইশাই দেউল ইহুদখানায়।

অমর তার নাম প্রেমের খাতায়
জ্যোতির লেখায় রবে লেখা
দোজখের ভয় করে না সে
থাকে না সে বেহেস্তের আশায়।।

4. विजयनी


ओ मेरी रानी ! हार मानता हूँ आज अंततः तुमसे
मेरा विजय-केतन लूट गया आकर तुम्हारे चरणों के नीचे |
मेरी समरजयी अमर तलवार
हर रोज़ थक रही है और हो रही है भारी,
अब ये भार तुम्हें सौंप कर हारूँ
इस हार माने हुए हार को तुम्हारे केश में सजाऊँ ||

ओ जीवन-देवी |
मुझे देख जब तुमने बहाया आँखों का जल,
आज विश्वजयी के विपुल देवालय में आन्दोलित है वह जल !
आज विद्रोही के इस रक्त-रथ के ऊपर,
विजयनी ! उड़ता है तुम्हारा नीलाम्बरी आँचल,
जितने तीर है मेरे, आज से सब तुम्हारे, तुम्हारी माला उनका तरकश,
मैं आज हुआ विजयी तुम्हारे नयन जल में बहकर |

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হে মোর রাণি! তোমার কাছে হার মানি আজ শেষে।
আমার বিজয়-কেতন লুটায় তোমার চরণ-তলে এসে।
আমার সমর-জয়ী অমর তরবারী
দিনে দিনে ক্লানি- আনে, হ'য়ে ওঠে ভারী,
এখন এ ভার আমার তোমায় দিয়ে হারি,
এই হার-মানা-হার পরাই তোমার কেশে।।

ওগো জীবন-দেবী।
আমায় দেখে কখন তুমি ফেললে চোখের জল,
আজ বিশ্বজয়ীর বিপুল দেউল তাইতে টলমল!
আজ বিদ্রোহীর এই রক্ত-রথের চূড়ে,
বিজয়িনী! নীলাম্বরীর আঁচল তোমার উড়ে,
 যত তৃণ আমার আজ তোমার মালায় পূরে',
আমি বিজয়ী আজ নয়ন-জলে ভেসে।

5. किसानों की ईद


बिलाल ! बिलाल ! हिलाल निकला है पश्चिम के आसमान में,
छुपे हुए हो लज्जा से किस मरुस्थल के कब्रिस्तान में |
देखो ईदगाह जा रहे हैं किसान, जैसे हों प्रेत-कंकाल
कसाईखाने जाते देखा है दुर्बल गायों का दल ?
रोजा इफ्तार किया है किसानों ने आँसुओं के शर्बत से, हाय ,
बिलाल ! तुम्हारे कंठ में शायद अटक जा रही है अजान |
थाली, लोटा, कटोरी रखकर बंधक देखो जा रहे हैं ईदगाह में,
सीने में चुभा तीर, ऋण से बंधा सिर, लुटाने को खुदा की राह में |

जीवन में जिन्हें हर रोज़ रोजा भूख से नहीं आती है नींद
मुर्मुष उन किसानों के घर आज आई है क्या ईद ?
मर गया जिसका बच्चा नहीं पाकर दूध का महज एक बूँद भी
क्या निकली है बन ईद का चाँद उस बच्चे की पसली की हड्डी?
काश आसमान में छाए काले कफ़न का आवरण टूट जाए
एक टुकड़ा चाँद खिला हुआ है, मृत शिशु के अधर-पुट में |
किसानों की ईद ! जाते हैं वह ईदगाह पढ़ने बच्चे का नमाज-ए-जनाजा,
सुनते हैं जितनी तकबीर, सीने में उनके उतना ही मचता है हाहाकार |
मर गया बेटा, मर गयी बेटी, आती है मौत की बाढ़
यजीद की सेना कर रही है गश्त मक्का मस्जिद के आसपास |

कहाँ हैं इमाम? कौन सा ख़ुत्बा पढ़ेंगे वह आज ईद में ?
चारों ओर है मुर्दों की लाश, उन्ही के बीच जो चुभता है आँखों में
जरी वाले पोशाकों से ढँक कर शरीर धनी लोग आए हैं वहाँ
इस ईदगाह में आप इमाम, क्या आप हैं इन्हीं लोगों के नेता ?
निचोड़ते हैं कुरआन, हदीस और फिकह, इन मृतकों के मुँह में
क्या अमृत कभी दिया आपने ? सीने पर रखकर हाथ कहिये |
पढ़ा है नमाज, पढ़ा है कुरआन, रोजे भी रखे हैं जानता हूँ
हाय रट्टू तोता ! क्या शक्ति दे पाए जरा सी भी  ?
ढ़ोया है फल आपने, नहीं चखा रस, हाय री फल की टोकरी,
लाखों बरस झरने के नीचे डूबकर भी रस नहीं पाता है बजरी |

अल्लाह - तत्व जान पाए क्या, जो हैं सर्वशक्तिमान?
शक्ति जो नहीं पा सके जीवन में, वो नहीं हैं मुसलमान |
ईमान ! ईमान ! कहते हैं रात दिन, ईमान क्या है इतना आसान ?
ईमानदार होकर क्या कोई ढ़ोता है शैतानी का बोझ ?

सुनो मिथ्यावादी ! इस दुनिया में है पूर्ण जिसका ईमान,
शक्तिधर है वह, बदल सकता है इशारों में आसमान |
अल्लाह का नाम लिया है सिर्फ, नहीं समझ पाए अल्लाह को |
जो खुद ही अंधा हो, वह क्या दूसरों को ला सकता है प्रकाश की ओर ?
जो खुद ही न हो पाया हो स्वाधीन, वह स्वाधीनता देगा किसे ?
वह मनुष्य शहद क्या देगा, शहद नहीं है जिसके मधुमक्खियों के छत्ते में ?

कहाँ हैं वो शक्ति- सिद्ध इमाम, जिनके प्रति पदाघात से
आबे जमजम बहता है बन शक्ति-स्रोत लगातार ?
जिन्होंने प्राप्त नहीं की अपनी शक्ति , हाय वह शक्ति-हीन
बने हैं इमाम, उन्हीं का ख़ुत्बा सुन रहा हूँ निशिदिन |
दीन दरिद्र के घर-घर में आज करेंगे जो नयी तागिद
कहाँ हैं वह महा-साधक लायेंगे जो फिर से ईद ?
छीन कर ले आयेंगे जो आसमान से ईद के चाँद की हंसी,
हंसी जो नहीं होगी खत्म आजीवन, कभी नहीं होगी बासी |
आयेंगे वह कब, कब्र में गिन रहा हूँ दिन ?
रोजा इफ्तार करेंगे सभी, ईद होगी उस दिन |

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কৃষকের ঈদ
বেলাল! বেলাল! হেলাল উঠেছে পশ্চিম আসমানে,
লুকাইয়া আছ লজ্জায় কোন মরুর গরস্থানে।
হের ঈদগাহে চলিছে কৃষক যেন প্রেত- কংকাল
কশাইখানায় যাইতে দেখেছ শীর্ণ গরুর পাল?
রোজা এফতার করেছে কৃষক অশ্রু- সলিলে হায়,
বেলাল! তোমার কন্ঠে বুঝি গো আজান থামিয়া যায়।
থালা, ঘটি, বাটি বাঁধা দিয়ে হের চলিয়াছে ঈদগাহে,
তীর খাওয়া বুক, ঋণে- বাঁধা- শির, লুটাতে খোদার রাহে।

জীবনে যাদের হররোজ রোজা ক্ষুধায় আসে না নিদ
মুমুর্ষ সেই কৃষকের ঘরে এসেছে কি আজ ঈদ?
একটি বিন্দু দুধ নাহি পেয়ে যে খোকা মরিল তার
উঠেছে ঈদের চাঁদ হয়ে কি সে শিশু- পাঁজরের হাড়?
আসমান- জোড়া কাল কাফনের আবরণ যেন টুটে।
এক ফালি চাঁদ ফুটে আছে, মৃত শিশুর অধর পুটে।
কৃষকের ঈদ!ঈদগাহে চলে জানাজা পড়িতে তার,
যত তকবির শোনে, বুকে তার তত উঠে হাহাকার।
মরিয়াছে খোকা, কন্যা মরিছে, মৃত্যু- বন্যা আসে
এজিদের সেনা ঘুরিছে মক্কা- মসজিদে আশেপাশে।

কোথায় ইমাম? কোন সে খোৎবা পড়িবে আজিকে ঈদে?
চারিদিকে তব মুর্দার লাশ, তারি মাঝে চোখে বিঁধে
জরির পোশাকে শরীর ঢাকিয়া ধণীরা এসেছে সেথা,
এই ঈদগাহে তুমি ইমাম, তুমি কি এদেরই নেতা?
নিঙ্গাড়ি' কোরান হাদিস ও ফেকাহ, এই মৃতদের মুখে
অমৃত কখনো দিয়াছ কি তুমি? হাত দিয়ে বল বুকে।
নামাজ পড়েছ, পড়েছ কোরান, রোজাও রেখেছ জানি,
হায় তোতাপাখি! শক্তি দিতে কি পেরেছ একটুখানি?
ফল বহিয়াছ, পাওনিক রস, হায় রে ফলের ঝুড়ি,
লক্ষ বছর ঝর্ণায় ডুবে রস পায় নাকো নুড়ি।

আল্লা- তত্ত্ব জেনেছ কি, যিনি সর্বশক্তিমান?
শক্তি পেলো না জীবনে যে জন, সে নহে মুসলমান।
ঈমান! ঈমান! বল রাতদিন, ঈমান কি এত সোজা?
ঈমানদার হইয়া কি কেহ বহে শয়তানি বোঝা?

শোনো মিথ্যুক! এই দুনিয়ায় পুর্ণ যার ঈমান,
শক্তিধর সে টলাইতে পারে ইঙ্গিতে আসমান।
আল্লাহর নাম লইয়াছ শুধু, বোঝনিক আল্লারে।
নিজে যে অন্ধ সে কি অন্যরে আলোকে লইতে পারে?
নিজে যে স্বাধীন হইলনা সে স্বাধীনতা দেবে কাকে?
মধু দেবে সে কি মানুষে, যাহার মধু নাই মৌচাকে?

কোথা সে শক্তি- সিদ্ধ ইমাম, প্রতি পদাঘাতে যার
আবে- জমজম শক্তি- উৎস বাহিরায় অনিবার?
আপনি শক্তি লভেনি যে জন, হায় সে শক্তি-হীন
হয়েছে ইমাম, তাহারি খোৎবা শুনিতেছি নিশিদিন।
দীন কাঙ্গালের ঘরে ঘরে আজ দেবে যে নব তাগিদ
কোথা সে মহা- সাধক আনিবে যে পুন ঈদ?
ছিনিয়া আনিবে আসমান থেকে ঈদের চাঁদের হাসি,
ফুরাবে না কভু যে হাসি জীবনে, কখনো হবে না বাসি।
সমাধির মাঝে গণিতেছি দিন, আসিবেন তিনি কবে?
রোজা এফতার করিব সকলে, সেই দিন ঈদ হবে।

Monday, March 5, 2018

शंख घोष की कविताएँ

1. त्रिताल
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तुम्हारा कोई धर्म नहीं है, सिर्फ
जड़ से कसकर पकड़ने के सिवाय
तुम्हारा कोई धर्म नहीं है, सिर्फ
सीने पर कुठार सहन करने के सिवाय
पाताल का मुख अचानक खुल जाने की स्थिति में
दोनों ओर हाथ फैलाने के सिवाय
तुम्हारा कोई धर्म नहीं है,
इस शून्यता को भरने के सिवाय |
श्मशान से फेंक देता है श्‍मशान
तुम्हारे ही शरीर को टुकड़ों में
दुःसमय तब तुम जानते हो
ज्वाला नहीं, जीवन बुनता है जरी |
तुम्हारा कोई धर्म नहीं है उस वक़्त
प्रहर जुड़ा त्रिताल सिर्फ गुँथा
मद्य पीकर तो मत्त होते सब
सिर्फ कवि ही होता है अपने दम पर मत्त

2. जन्मदिन
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तुम्हारे जन्मदिन पर और क्या दूँगा इस वायदे के सिवा
कि फिर हमारी मुलाक़ात होगी कभी
होगी मुलाक़ात तुलसी चौरे पर, होगी मुलाक़ात बाँस के पुल पर
होगी मुलाक़ात सुपाड़ी वन के किनारे
हम घूमते फिरेंगे शहर में डामर की टूटी सड़कों पर
दहकते दोपहर में या अविश्वास की रात में
लेकिन हमें घेरे रहेंगी कितनी अदृश्य सुतनुका हवाएँ
उस तुलसी या पुल या सुपाड़ी की
हाथ उठाकर कहूँगा, यह रहा, ऐसा ही, सिर्फ
दो-एक तकलीफ बाकी रह गया आज भी
जब जाने का समय हो आए, आँखों की चाहनाओं से भिगो लूँगा आँख
सीने पर छू जाऊँगा ऊँगली का एक पंख
जैसे कि हमारे सामने कहीं भी और कोई अपघात नहीं
मृत्यु नहीं दिगंत अवधि
तुम्हारे जन्मदिन पर और क्या दूँगा इस वायदे के सिवा कि
कल से हर रोज़ होगा मेरा जन्मदिन |

3. जल

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क्या जल समझता है तुम्हारी किसी व्यथा को? फिर क्यों, फिर क्यों
जाओगे तुम जल में क्यों छोड़ गहन की सजलता को?
क्या जल तुम्हारे सीने में देता है दर्द? फिर क्यों, फिर क्यों
क्यों छोड़ जाना चाहते हो दिन रात का जलभार?

4. कलकत्ता

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हे बापजान
कलकत्ता जाकर देखा हर कोई जानता है सब कुछ
सिर्फ मैं ही कुछ नहीं जानता
मुझे कोई पूछता नहीं था
कलकत्ता की सड़कों पर भले ही सब दुष्ट हों
खुद तो कोई भी दुष्ट नहीं

कलकत्ता की लाश में
जिसकी ओर देखता हूँ उसके ही मुँह पर है आदिकाल का ठहरा हुआ पोखर
जिसमें तैरते हैं सड़े शैवाल

ओ सोना बीबी अमीना
मुझे तू बाँधी रखना
जीवन भर मैं तो अब नहीं जाऊँगा कलकत्ता

5, बाउल
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कहा था तुम्हें लेकर जाऊँगा दूर के दूसरे देश में
सोचता हूँ वह बात
दौड़ती रहती है दूर-दूर तक जीवन की वह सातों माया
सोचता हूँ वह बात
तकती रहती है पृथ्वी, तुमसे हार मानकर वह
बचेगी कैसे !
जहाँ भी जाओ अतृप्ति और तृप्ति दोनों चलती है जोड़े में
सदर में - अंदर में
उदासीन नहीं कुछ से-- समझ सकता हूँ तुम्हारे सीने में
है कुछ और,
यंत्रणा खोलती है उसका ह्रदय फेरों में, उस खुलने का
है अर्थ कुछ और |
नींद में देखता हूँ प्रकाश के पूर्ण- कुसुम नीलांशु को
नहीं बाँध सकता है यह
जगते ही देखता हूँ कितनी विचित्र बात है, एक भी खरोंच नहीं लगी
उसके प्रेम की देह पर
कहा था तुम्हें मैं फैला दूँगा दूर हवा में
सोचता हूँ वह बात
तुम्हारे सीने के अन्धकार में बजा है सुख मदमत्त हाथों से
सोचता हूँ वह बात


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ত্রিতাল
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তোমার কোনো ধর্ম নেই, শুধু
শিকড় দিয়ে আঁকড়ে ধরা ছাড়া
তোমার কোনো ধর্ম নেই, শুধু
বুকে কুঠার সইতে পারা ছাড়া
পাতালমুখ হঠাত্ খুলে গেলে
দুধারে হাত ছড়িয়ে দেওয়া ছাড়া
তোমার কোনো ধর্ম নেই, এই
শূন্যতাকে ভরিয়ে দেওয়া ছাড়া।
শ্মশান থেকে শ্মশানে দেয় ছুঁড়ে
তোমারই ঐ টুকরো-করা-শরীর
দু:সময়ে তখন তুমি জানো
হলকা নয়, জীবন বোনে জরি।
তোমার কোনো ধর্ম নেই তখন
প্রহরজোড়া ত্রিতাল শুধু গাঁথা-
মদ খেয়ে তো মাতাল হত সবাই
কবিই শুধু নিজের জোরে মাতাল !


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জন্মদিন
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তোমার জন্মদিনে কী আর দেব এই কথাটুকু ছাড়া
আবার আমাদের দেখা হবে কখনো
দেখা হবে তুলসীতলায় দেখা হবে বাঁশের সাঁকোয়
দেখা হবে সুপুরি বনের কিনারে
আমরা ঘুরে বেড়াবো শহরের ভাঙা অ্যাসফল্টে অ্যাসফল্টে
গনগনে দুপুরে কিংবা অবিশ্বাসের রাতে
কিন্তু আমাদের ঘিরে থাকবে অদৃশ্য কত সুতনুকা হাওয়া
ওই তুলসী কিংবা সাঁকোর কিংবা সুপুরির
হাত তুলে নিয়ে বলব, এই তো, এইরকমই, শুধু
দু-একটা ব্যথা বাকি রয়ে গেল আজও
যাবার সময় হলে চোখের চাওয়ায় ভিজিয়ে নেবো চোখ
বুকের ওপর ছুঁয়ে যাবো আঙুলের একটি পালক
যেন আমাদের সামনে কোথাও কোনো অপঘাত নেই আর
মৃত্যু নেই দিগন্ত অবধি
তোমার জন্মদিনে কী আর দেবো শুধু এই কথাটুকু ছাড়া যে
কাল থেকে রোজই আমার জন্মদিন।


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জল ~

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জল কি তোমার কোনো ব্যথা বোঝে ? তবে কেন, তবে কেন
জলে কেন যাবে তুমি নিবিড়ের সজলতা ছেড়ে ?
জল কি তোমার বুকে ব্যথা দেয় ? তবে কেন তবে কেন
কেন ছেড়ে যেতে চাও দিনের রাতের জলভার ?


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কইলকাত্তায়
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বাপজান হে
কইলকাত্তায় গিয়া দেখি সক্কলেই সব জানে
আমিই কিছু জানি না
আমারে কেহ পুছত না
কইলকাত্তার পথে ঘাটে সবাই দুষ্ট বটে
নিজে তো কেউ দুষ্ট না

কইলকাত্তার লাশে
যার দিকে চাই তারই মুখে আদ্যিকালের মজা পুকুর
শ্যাওলপচা ভাসে

অ সোনাবৌ আমিনা
আমারে তুই বাইন্দা রাখিস,
জীবন ভইরা আমি তো আর কইলকাত্তায় যামু না



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বাউল
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বলেছিলাম তোমায় নিয়ে যাব অন্য দূরের দেশে
সেই কথাটা ভাবি,
জীবনের ওই সাতটা মায়া দূরে দূরে দৌড়ে বেড়ায়
সেই কথাটা ভাবি,
তাকিয়ে থাকে পৃথিবীটা, তোমার কাছে হার মেনে সে
বাঁচবে কেমন ক'রে !
যেখানে যাও অতৃপ্তি আর তৃপ্তি দুটো জোড়ায় জোড়ায়
সদরে - অন্দরে
উদাসিনী নও কিছুতে --- বুঝতে পারি তোমার বুকে
অন্য কিছু আছে,
যন্ত্রণা তার পাকে পাকে হৃদয় খোলে, সে খোলাটার
অন্য মানে আছে।
ঘুমের মাধ্যে দেখি আলোর ভরা-কুসুম নিলাংশুকে
বাঁধতে পারে না এ :
উঠেই দেখি কী বিচিত্র, একটি আঁচড় লাগে নি তার
ভালোবাসার গায়ে !
বলেছিলাম তোমায় আমি ছড়িয়ে দেব দূর হাওয়াতে
সেই কথাটা ভাবি
তোমার বুকের অন্ধকারে সুখ বেজেছে মদির হাতে
সেই কথাটা ভাবি ।।