Thursday, September 10, 2020

राग-विराग

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उसने कहा प्रेम
मेरे कानों में घुला राग खमाज
जुगलबंदी समझा मेरे मन ने
जैसे बाँसुरी पर हरिप्रसाद चौरसिया
और संतूर पर शिवकुमार शर्मा


विरह के दिनों में
बैठी रही वातायन पर
बनकर क़ाज़ी नज़रूल इस्लाम की नायिका
सुना मैंने रहकर मौन राग मिश्र देश
गाते रहे अजय चक्रवर्ती "पिया पिया पिया पापिया पुकारे"


हमारे मिलन पर
शिराओं - उपशिराओं में बज उठा था मालकौंस
युगल स्वरों के परस्पर संवाद में
जैसे बिस्मिल्लाह खान बजाते थे शहनाई पर
और शुभ हुआ जाता था हर एक क्षण


लील लिया जीवन के दादरा और कहरवा को
वक़्त के धमार ताल ने
मिश्र रागों के आलाप पर
सुना मेरी लय को प्रलय शास्त्रीयता की पाबंद
आसपास की मेरी दुनिया ने


काश! इस पृथ्वी का हर प्राणी समझता संगीत की भाषा
और जानता कि बढ़ जाती है मधुरता किसी भी राग में
मिश्र के लगते ही, भले ही कम हो जाती हो उसकी शास्त्रीयता
और समझता कि लगभग बेसुरी होती जा रही इस धरा को
शास्त्रीयता से कहीं अधिक माधुर्य की है आवश्यकता |

लिखूंगी

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मुझे माफ़ करना प्राण सखा,
नहीं लिख पाउंगी मैं कोई महान कविता !
मैं लिखूंगी विशाल पहाड़
तुम ठीक उस जगह झरने का संगीत सुनना |


मैं लिखूंगी अलौकिक सा कुछ, लिखूंगी छल और दुःख भी
मेरे अनुभवों में शामिल है दुधमुंहे शिशु के शरीर की गंध,
कई दिनों से प्रेमी के फ़ोन का इंतजार करती
प्रेम में डूबी प्रेमिका को देखा है मैंने
"सहेला रे" गाती हुए किशोरी अमोनकर को सुना है कई बार
देखा है बिन ब्याही माँ को प्रसव से ठीक पहले
अस्पताल के रजिस्टर पर बच्चे के बाप का नाम दर्ज़ करते
देखा है परमेश्वरी काका को बचपन में
छप्पड़ पर गमछे से तोता पकड़ते हुए
कोई और कैसे लिख पायेगा भला वो तमाम दास्ताँ !


बचपन में थी जो कविता मेरे पास,उसका रंग था सुगापंछी
उसकी आँखों में देखते ही होता था साक्षात्कार ईश्वर से
कविता कभी-कभी संत बनकर गुनगुनाने लगती -
"चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़....."
मेरी कविता का तेज था किसी सन्यासिनी की मानिंद
वह कर सकती थी तानसेन से भी जुगलबंदी
वह कर सकती थी वो तमाम बातें जिनके लिए
नहीं हैं मौज़ूद कोई भी शब्द अभिधान में
एक पिंजड़ा था जो सम्भालता था
स्मृतियों का ख़ज़ाना कई युगों का


मैं अब जो कविता लिखूंगी, क्या होगा उसका रंग?
क्या उगा सकेगी जंगल "हरा" लिखकर मेरी कविता?
क्या लौट आयेंगे ईश्वर, संत और विस्मृत स्मृतियाँ?
लौट आयेंगे प्रेमी प्रतीक्षारत प्रेमिकाओं के पास?
"मंगलयान" और "चंद्रयान" हैं इस युग की पुरस्कृत कवितायेँ!

हासिल हो स्वच्छ हवा और जल हमारी भावी पीढ़ी को
ऐसी कविताएँ अनाथ भटक रही हैं न जाने कब से !
मैं उन कविताओं को गोद लूंगी |
फिर मेरी कविताओं के आर्तनाद से तूफ़ान आ जाये,
आसमान टूट पड़े या बिजली गिर जाए,
उनका हाथ मैं कभी नहीं छोडूंगी |
मेरी कविताओं के संधर्ष से फिर उगेगा हरा रंग धरा पर
गायेगा मंगल गान सुगापंछी
तो धरती चीर कर निकल पड़ेगी फल्गु और सरस्वती!


मुझे माफ़ करना प्राण सखा,
नहीं लिख पाउंगी मैं कोई महान कविता !
मैं लिखूंगी रेत, और कविता पढ़कर करूंगी नदी का आह्वान
किसी आदिम पुरुष सा उस नदी किनारे तुम करना मेरा इंतजार |

Friday, August 21, 2020

तुम्हारे साथ

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तुम्हारे साथ स्वर्ग नहीं जाऊँगी प्रिय  

मुझे पुकारती है नीलगिरी की पहाड़ियाँ

दिन रात आमंत्रित करती है बंगाल की खाड़ी

पुकारता है महाबलीपुरम का मायावी बाज़ार

नंदमबाक्क्म के आम के बागान में दावत उड़ाते पंछी

पुकारता है संयोग, पुकारता है अभियोग

कि लौटने की समस्त तिथियाँ मिट गई हैं पञ्चांग से

पुकारता है प्रेम, पुकारता है ऋण

पुकारता है असमंजस, पुकारता है रुका हुआ समय


जहाँ पुकार रही हैं मुझे असंख्य कविताएँ

मैं हो विमुख उनसे चल पडूँ तुम्हारे साथ!

नहीं कर सकती ऐसा अधर्म, ऐसा पाप!


प्रिय, तुम निकल पड़ो किसी यात्रा पर 

लिखो अपने पसंद की कविताएँ होकर दुविधामुक्त

देखना मैं मिलूंगी तुम्हें उन कविताओं में अक्षरशः

मैं नष्ट स्त्री हूँ, मुझे स्वर्ग की नहीं तनिक भी चाह !


पंचतत्व

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बनकर स्रष्टा करना सृष्टि अहर्निश प्रेम की 

दफ़न करना अपनी जमीं पर सीने भर आशा 

कि अपने आप में पूरी पृथ्वी हो तुम 

जिसकी परिक्रमा करेंगे कई कई चाँद 

जो पोषित कर सकती है कई कई जीवन 


वृष्टि के जल को भर कलशी में 

पकाना दाल, धोना कपड़े 

बन मेघ भले पी जाना भवसागर  

आँखों का पानी बचा रहे 

बस इतना सा यत्न करना 


चूल्हे की आग में पकाना भंटा बैंगन

खाना पांता संग, मत करने देना शमन 

किसी को अपने भीतर की अग्नि का 

कि आत्मा में भर कर अंधेरा

नहीं लाया जा सकता उजाला जीवन में  


संसर्ग ही करना हो तो रहे ध्यान 

कि भले ही कर ले स्पर्श कोई शरीर का 

परन्तु तुम्हारे तुम को किंचित छू भी न सके 

न करना उत्सर्ग अपना असीम किसी को 

कि जमता रहे वहाँ संभावनाओं का मेघ 


बन चैत्र की आँधी घूमना माताल की तरह 

पर साधे रहना ताल जीवन का 

प्रेमशुन्य धरा पर लौटना बार-बार अनेक रूपों में 

बन कर प्रशांति की अविरल धारा 

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा 


Sunday, June 14, 2020

अवसाद -2

जब होता है अवसाद नदियों को
धार क्षीण होती है पहले
उग आती हैं फिर जलकुंभियाँ
फिर सूख जाती हैं नदियाँ एक दिन

जब होता है अवसाद पेड़ों को
उनसे बिछड़ जाते हैं पत्ते
छूट जाता है हरे रंग से वास्ता
और पेड़ बन जाता है ठूँठ

जब होता है अवसाद जानवरों को
क्षुधा हो जाती है शांत उत्साह की तरह
और शरीर उर्जाविहीन 
वे हो जाते हैं विदा देखते हुए कातर आँखों से

जब होता है अवसाद मनुष्यों को
दिखता है अंधकार दिन के उजाले में
मुक्ति और मृत्यु घुल जाते हैं आपस में
नमक और जल की तरह

बनकर साक्षी कई युगों के अवसाद का भी
पत्थरों को अवसाद नहीं होता
ज़िंदा होना होता है
अवसादग्रस्त होने की पहली शर्त ।

Sunday, June 7, 2020

समुद्र

मैं कर आई विसर्जित अपने समस्त दुःख
अरब सागर के लवण जल में
कि पूरी पृथ्वी पर वह लवण जल ही तो है
जो करता है दुखों से मुक्त
स्वेद, अश्रु और समुद्र !

Wednesday, June 3, 2020

अमानुष

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वे निकल आये घने जंगलों से
स्वयं को करते हुए घोषित
पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ प्राणी

रहकर मलय पर्वत के संसर्ग में
लम्बी अवधि तक
बाँस चंदन न बन सका
साक्षर और शिक्षित होकर भी
आधुनिक मनुष्य न हो पाया सभ्य

अपने गुणसूत्रों की स्मृति में
वे बर्बर अमानुष ही रहे!

पलक्कड़ की हस्तिनी
प्रथम नहीं थी, अंतिम भी नहीं !