Saturday, June 28, 2014

तुम्हारे होने से

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तुम्हारा होना तय करता है
मेरी आँखों में काजल का होना
और जब तुम नहीं रहोगे
जम जाएगा बादल आँखों के आसमान पर


तुम हो तो हैं मेरे होंठ गीले
कि तुम्हारे नहीं होने से
उग आयेंगे नागफनी होठों की सतह पर


तुम्हारे होने के उत्सव पर
हवा से बतियाती है मेरी जुल्फें
जो तुम चले गए
बना जाएगा हवा जुड़ा ढीले बालों का मेरे कांधे पर


बादल के नहीं बरसने से
हो जायेगी बंजर सतह
हवा सांस नहीं ले पायेगी


बेहद ज़रूरी है तुम्हारा होना मेरे जीवन में !

सुलोचना वर्मा

Friday, June 27, 2014

ढोंगी

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इस समाज के कुछ लोग
मानते हैं उसे भगवान्
या फिर कोई अवतार
और वह गढ़ता है कुछ कहानियाँ
जिससे बना रहे यह भ्रम लोगों का


नहीं जानते लोग इस समाज के
कि जब वह बांच रहा होता है ज्ञान
महिला उत्पीड़न के विरुद्ध किसी सभा में
उसकी पत्नी कर रही होती है नाकामयाब कोशिश
अपने बदन के खरोंचो को छुपाने की
डाल रही होती है आँखों में गुलाब जल
कि कम हो रोने के बाद आँखों का सूजन
और वह बनी रहे सफल अभिनेत्री साल दर साल


भले ही चिल्लाता हो वह अपने बच्चे की जिद पर
और नहीं संभाल पाता हो उसकी बचकानी आदतें
या कर देता हो उसकी कुछ मांगे पूरी
गैर जिम्मेदाराना तरीके से, छुड़ाने को पीछा
पर कहाँ मानेंगे ये सब उस बस्ती के लोग
जहाँ वह पिलाता है हर पोलियो रविवार को
गरीब छोटे बच्चों को दो बूँद जिंदगी के
धूप में रहकर खड़ा समाज सेवा के नाम


करती है अचरज उसके घर की कामवाली
कि साहेब धमका आते हैं हर बार उसके पति को
जब भी वह उठाता है हाथ उसपर
और देती है दुआएं मालकिन को सुहागिन बने रहने की
सहम जाते हैं पुलिसकर्मी भी देखकर
उसके खादी के कुरते को
और लगाते हैं जयकारा साहेब के इस महान कृत्य पर


घर के सामने पार्क में खेलते सभी बच्चे हैं उसके दोस्त
और गली के हर कुत्ते ने खाया है उसके हाथ से खाना
मुहल्ले के सभी बुजुर्गों को झुक कर करता है प्रणाम
मदद के लिए सबसे पहले लोग उसे करते हैं याद


डाल आई है आज उसकी पत्नी
तलाक की एक तरफा अर्जी अदालत में
और सोच रही है कौन सी सूचना उसे मिलेगी पहले
एक झूठे रिश्ते से उसके निजात पाने की
या सार्वजनिक सेवा व सामुदायिक नेतृत्व का मैग्सेसे पुरस्कार
उस ढोंगी के नाम होने की !!!


सुलोचना वर्मा

Monday, June 23, 2014

तीस पार की आधुनिका

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जब तीस पार की आधुनिका करती है प्रेम
तो तोड़ देती है सारी वर्जनाएं
उम्र, धर्म और समाज की
और लिख देना चाहती है नाम प्रेमी का
शहर की सबसे ऊँची ईमारत पर
बड़े बड़े काले अक्षरों में
उसी प्रेम को उसका प्रेमी 
धर देता है किताब के पन्नो के बीच
मोर पंख की तरह
फिर हो जाता है व्यस्त
हरे, नीले और सुनहरे रंगों के बीच
और ढूँढने लगता है प्रेम का गुलाबी रंग उसमे


तीस पार की आधुनिका को नहीं पसंद गुलाब
कि उसकी उँगलियाँ डूबी होती है काँटों से मिले लहू में
प्रेमी को कहती है चाँद और महक जाना चाहती है
बनकर प्रेम सा झक्क सफ़ेद इवनिंग प्राइमरोज
मना लेना चाहती है वह उत्सव जिंदगी का


जब देखती है प्रेमी को, बुनती है ख्वाब प्रेम के आसमान पर
उसके ख़्वाबों को चिन्हित करता है आसमान में उड़ता हवाई जहाज
प्रेमिका देखती है हवाई जहाज और फिर देखती है प्रेमी को
प्रेमी कर लेता है कैद प्रेमिका को हवाई जहाज के साथ कैमरे में
ढाई सेकण्ड की इस घटना में पुरे पच्चीस साल फिर से जी लेती है
प्रेम में जवान एक नवयुवती, जो है तीस पार की आधुनिका


सुलोचना वर्मा

Thursday, June 19, 2014

इच्छा-मृत्यु

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वो कर देगा आज़ाद
मुझे मेरी देह से
और बन जाएगा सूरज
दर्द से मेरी मुक्ति के मार्ग का
करता है यकीं वह
जिंदगी में जिंदगी के बचे होने पर
उसे है बेपनाह मोहब्बत
मेरी जिस्म से भी ज्यादा मेरी रूह से  !!!


सुलोचना वर्मा
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Euthanasia is the Word

Wednesday, June 18, 2014

नमक

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हो आई मैं तुम्हारे सपनों की चहारदीवारी से
और टांग आई रूह की कमीज़
उस घर की दीवार पर लगे खूंटे में
कमरे में पसरे मौन ने बढाई
तुम्हारे शब्दों से मेरी घनिष्ठता
जिस वक़्त तुम उकेर रहे थे
मेरा तैलचित्र अपने ख़्वाबों के आसमान पर

टपक पड़ी थी एक बूँद पसीने की
मेरे माथे से तुम्हारी जुबान पर
सुनो, जब भर जाए तुम्हारे ख़्वाबों का कैनवास
उतार लेना मेरी रूह की कमीज़ खूंटे से
और ओढा देना मेरी आकृति को
निभाते रहना वचन ताउम्र साथ देने का
कि तुमने खाया है नमक मेरी देह का |


सुलोचना वर्मा

Tuesday, June 10, 2014

गंगा दशहरा

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जो फेंका तुमने निर्माल्य को नदी में
मछली दे देगी श्राप तड़पकर
और तुम बन जाओगे मछली अगले जनम में
फिर होगा तुम्हारा जन्म किसी नाले में

 
मत डालो अब गंगा में धुप-लोबान
कि वह जल रही है धरती की चिता पर 
सती की मानिंद, एक लम्बे समय से 


क्यूँ कुरेद रहे हो उसका मन तुम बारहों मास
और बना रहे हो झील निकालकर उसमे से रेत
लील लेगी एक दिन तुम्हे भी उसकी बदली हुई चाल 


जाओ, शंखनाद कर रोक लो नदी पर बनता बाँध
कर आओ प्राण प्रतिष्ठा पहाड़ों पर लगाकर कुछ पेड़
फिर सुनाओ मछलियों को जिंदगी का पवित्र मन्त्र
और मना लो गंगा दशहरा इस सही विधि के साथ


-------सुलोचना वर्मा--------

Sunday, June 8, 2014

सहायिका

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नहीं कह पायी शुक्रिया मैं उस माली से
लगा गया जो पेड़
गुलाबी चम्पा का हमारी बगिया में

कहाँ दे पायी शाबाशी मैं उस चुनचुन चिड़िया को
दिखा गयी जो नाच
बस कुछ दाने चुगकर बालकनी में

पर कह देती हूँ धन्यवाद हर बार सहायिका से
जो करती है काम पैसे लेकर
बड़े ही अनमने तरीके से घर में

सहायिका का होना तय करता है
चम्पा का गुलाबी होना मेरे लिए
और यह जानना कि नाच सकती है चुनचुन चिड़िया

कितना ज़रूरी है सहायिका का होना जीवन में

-----सुलोचना वर्मा----------