Friday, October 31, 2014

छिपकली

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एक संसार हुआ करता था वह कमरा तब
और कमरे का लाल बल्ब था दहकता सूरज
रहती थी उस संसार में एक जोड़ी छिपकली
जो खेलती थी छुआ-छुई देर शाम तलक
संसार में तब कोई और था ही कहाँ




दूर से दिखता बुरा वक़्त हुआ कमरे में लगा लाल बल्ब
और घड़ी के दो कांटो की मानिंद रही एक जोड़ी छिपकली
जो कर रही थी प्रदक्षिणा कमरे में लगे लाल बल्ब की
जहाँ घड़ी की टिक-टिक बढ़ा जाती थी दिल की धड़कन
हर बुरे अंदेशे पर ठीक-ठीक कह जाती थी छिपकली




किसी बहुत सुन्दर स्त्री के चेहरे सा है एक कमरा
जो है यादों के कैनवास पर गुलाबी और आकर्षक
जिसमे माथे की बिंदी सा है सजा कमरे का लाल बल्ब
जहाँ एक जोड़ी छिपकली देखती है एक-दुसरे को दूर से
जो बनाता है हँसुली सा आकार; हँसुली जो है फंसी गले में


-----सुलोचना वर्मा-----------------------

Wednesday, September 24, 2014

एक आम सी कविता

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जब दिखेंगे आम के मंजर अगले बरस
फागुन बौरा उठेगा
और मैं हो जाउंगी सरसों की तरह
थोड़ी और पीली दर्द से


जब झूमेगा मौसम कोयल की कूक से
एक हुक मेरे अन्दर भी उठेगी


एक दिन वैशाख लगा जाएगा पेड़ पर टिकोला
और हो उठेगा खट्टा मेरे स्वाद का मन  

 
जेठ भारी हो जाएगा मन के मौसम में
ज्यूँ लद जायेगी टहनी पके फलों से


जब दिखेगा बिकता लंगड़ा सावन के बाज़ार में
मन गुज़रे मीठे पलों की बैशाखी ढूँढ लेगा


मुझे तुम पसंद रहे आम की तरह
हमारा साथ भी आम के मौसम जितना रहा


जी रही हूँ मैं अब तुम्हारी आम्रपाली सी यादें !!!

-----सुलोचना वर्मा---------

Saturday, September 13, 2014

इन्द्रधनुष

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मन की इच्छा थी बैंगनी
बहारों के फूलों सी फालसई
और मन का आकाश था आसमानी


दहक उठा मन पलाश सा नारंगी होकर
वसंत के मौसम में लेकर अपनी अनगिनत आशायें


फिर पड़ गई रंगत पीली मन के त्वचा की
दर्द के पतझड़ में


हुआ रंग नीला मन के विषाक्त रक्त का
और लाल मन की आँखे


जीवन के सावन में
मन का जख्म हरा ही रहा 


कमबख्त जिसे कहते रहे मन
इन्द्रधनुष निकला


------सुलोचना वर्मा ...........



 

Friday, August 22, 2014

प्रेम और शिक्षा

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जब होगा प्रेम का विलय उदासीनता में
शिक्षा करेगी तय प्रेम का हश्र
समय की किताब में


इतिहास पढने वाला कर देगा दफ्न
प्रेम को गुज़रे वक़्त में
एक दिलचस्प कहानी बनाकर


किसी भाषा का स्नातक
चुभाता रहेगा शूल शब्दों का
प्रेम में साल दर साल


मनोविज्ञान का डिग्रीधारक
जो पढ़ नहीं पाया मन प्रेयसी का प्रेम में
बस करता रह गया वैज्ञानिक प्रयोग
कर देगा खारिज प्रेम को सिरे से
एक परिस्थिति का परिणाम भर बताकर


"ब्रेकिंग न्यूज़" सा तवज्जो देगा नए प्रेम को  
पत्रकारिता पढनेवाला, दीवानापन दिखलायेगा  
फिर बिसार देगा उसे किसी बासी खबर सा  
धरकर इल्ज़ाम प्रेम और परिस्थिति के माथे 
कि सिखाया है यही दस्तूर इस इल्म ने उसे  

ठीक ऐसे किसी समय में क्या करुँगी मैं?

रख दूँगी प्रेम के फ़र्न को वक़्त की फ़ाइल में
बड़े जतन से हर्बेरियम स्पेसिमेन सा
देखा करुँगी खोलकर फ़ाइल गाहे-बगाहे 
थोड़ा शोक मना लूंगी
फ़र्न में क्लोरोफिल के नहीं रहने का


मैंने वनस्पति विज्ञान पढ़ा है !

-----सुलोचना वर्मा ------

Sunday, August 17, 2014

चरवाहा

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मेरे छोटे से घर में है एक बड़ी सी खिड़की
और है दूर-दूर तक फैला हरा-भरा खलियान
उस बड़ी सी खिड़की के सामने


गुजरती है उस बड़े से खलिहान से होकर 
एक बेहद ही संकड़ी सी पगडण्डी
जिस पर से रोज गुजरता है एक चरवाहा
जो गाता है निर्गुण बांसुरी पर
अपने छरहरे बदन पर अंगोछा लिए


नहीं गा पाता है वह अब राग कम्बोज
कि चढ़ गयी भेंट उसकी आराधिका
संकीर्ण सामजिक मापदंडों की
और उसका शाश्वत प्रेम
दर्ज़ होकर रह गया है
उसकी बाँसुरी की धुनों में


जहाँ उसे गाना था राग आशावरी
निराश हो चली हैं उसकी तमाम छोटी आशाएं
याद दिला जाते हैं उसे उसके बड़े शुभचिन्तक
कि वह रहता है उसी इन्द्रप्रस्थ में
जहाँ शासन था कभी कौरवों का
जहाँ अब भी रहते हैं धृतराष्ट्र और दुःशासन
अपने-अपने आधुनिक व अद्यतन रूप में


उसे अब कृष्ण कोई नहीं मानता !

-----सुलोचना वर्मा-----

Thursday, August 14, 2014

उन दिनों

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नहीं उगे थे मेरे दूध के दांत उन दिनों
फिर भी समझ लेती थी माँ मेरी हर एक मूक कविता
जिसे सुनाती थी मैं लयबद्ध होकर हर बार
जैसे पढ़ा जाता है सफ़ेद पन्ने पर ढूध से लिखी इबारत को
ममता की आंच में स्पष्ट हो उठता था मेरा एक-एक शब्द


माँ ने अपनी कविता में मुझको कहा चाँद
और उस चाँद से की मेरी नज़र उतारने की गुज़ारिश


चाँद ने बदले में लिख डाली कविता
अपनी रौशनी से मुझ पर


उन दिनों चाँद पर एक औरत
दोनों पाँव पसारे
रेशमी धागों से गेंदरा सिला करती थी 
जिसके किनारों पर लगे होते थे
मेरी माँ की साड़ी के ज़री वाले पार


----सुलोचना वर्मा-----

Tuesday, August 12, 2014

पुनर्जन्म

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समझते थे लोग सिद्धांत पुनर्जन्म का
इस देश से लेकर सात समंदर पार तक
कि स्कित्जोफ्रेनिया का आविष्कार नहीं हुआ था तब


तब पेड़ से सेब के नीचे गिरने के लिए 
गुरुत्वाकर्षण के नियम की नहीं
जरुरत होती थी भगवान् की मर्ज़ी की


विश्वास से उत्पन्न हुई सकारात्मकता
देती चली गई साल दर साल 
शुभ और सुखद परिणाम


और भगवान् ??
उसके तो कई टुकड़े किये गए थे
हुआ था जब जन्म मनुष्य में विवेक का
फिर वो रह गया दर्ज़ होकर दंतकथाओं में 
उसे भी लेने पड़े कई जन्म
अपना आस्तित्व बचाए रखने की खातिर 


सबको पड़ी थी जन्मों के फेर की
कि लिखा था गीता में
आत्मा अमर है


जीता रहा इंसान किश्तों में बनकर संतोषी
तय हुआ कि दुःख है परिणाम पिछले जीवन के कर्मों का
और करता रहा अच्छे कर्म अगले जनम के लिए


जन्म लेती रही एक इच्छा मानव शरीर में
हर बार एक नया जन्म लेने की
और हर जन्म के साथ ही
होता रहा जन्म नयी-नयी इच्छाओं का
जन्म और मरण से इतर


पूरी हो जाती है कई इच्छाएं एक ही जीवन में कभी तो
लेना पड़ता है कई जन्म उस एक इच्छा के लिए
जिसके कभी ना पूरा होने की कहानियाँ
हम दंतकथाओं में सुनते आये हैं


-----सुलोचना वर्मा---------