Thursday, February 25, 2021

रूचि भल्ला के लिए

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वह प्रयागराज के मानचित्र में सहेजकर रखती है इलाहाबाद

ठीक जैसे सहेजती है अपना बचपन कोई किशोरवय लड़की

संगम तट पर की गई सहस्र प्रार्थनाओं की वयः संधि है वह

इलाहाबाद ने दबा रक्खा है अपने सीने में जिसके दूध के दाँत


वह अमरुद को सिर्फ़ खाती ही नहीं, कुतरती है असंख्य स्मृतियों को 

फँस ही जाता है कोई बीज दाँतों में अक्सर, जैसे इलाहाबाद यादों में

वह खिला सकती है गेंदा फूल महबूब शहर की छत पर, घूमा सकती है 

नखासकोना से लूकरगंज, अतरसुइया से मीर गंज बिना ट्रेफिक जाम के 


उसकी कविता के आलोक में प्रज्वलित है चौदह गिरजे की मोमबत्तियाँ 

और इलाहाबाद तो ऐसे करता है झलमल कि कह देती हूँ अक्सर ही 

कि मैं नहीं जानती कौन है रुचि भल्ला! वह जिसे मैं जानती हूँ, करती हूँ 

जल, जंगल और जीवन की बात, प्रयागराज से दूर बसा इलाहाबाद है|  

Friday, February 19, 2021

अल महमूद

 कविता ऐसी है 


कविता तो किशोरावस्था की स्मृति है। वह तो है तिर आया 

मेरी माँ का म्लान चेहरा; नीम की डाल पर बैठा हुआ पीला पक्षी

पत्तों की आग से घिर रतजगा करते भाई-बहन

अब्बा का लौट आना, साइकिल की घंटी - राबिया राबिया -

मेरी माँ के नाम पर खुलता हुआ दक्षिण का भिड़काया हुआ कपाट!


कविता तो लौट जाना है पार कर घुटनों तक जल भरी नदी  

कोहरे से ढँका पथ, भोर की अजान या पराली का दहन 

पीठे के पेटवाले भाग में फुल आया तिल का सौरभ 

मछली की गंध, आंगन में फैली हुई जाल और

बाँस के झुरमुटों में घास से ढँकी दादाजी की कब्र।


कविता तो  है  छियालीस में बड़ा होता कोई बीमार किशोर

स्कूल से भागकर की गई सभा, स्वाधीनता, जुलूस, झंडा 

चारों तरफ चौंकाने वाले दंगों की आग में

निराश्रित होकर लौट आये अग्रज का कातर वर्णन।


कविता है कछार का पंछी, मिला हुआ बतख का अंडा, सुगंधित घास

म्लान मुख स्त्री की रस्सी तोड़ खोया हुआ बछड़ा

नीले लिफाफे की गोपनीय चिट्ठी में सुसज्जित अक्षर 

कविता तो है खुले बालों वाली मकतब की बेटी आयशा अख्तर।

Sunday, January 17, 2021

मछली पुराण

 1. 

जिस मछली से हुआ था प्रथम साक्षात्कार बासु दा का 

वह मछली थी बैला, जो कहलाती थी बलुआ भी 

कि उन्हें पसंद रहा स्वच्छ जल का बालुमय जनपद हमेशा 

छुपा न था किसी से भी बारिश के संग बलुआ का अन्तरंग सम्बंध

कि हर बार वही बनी वर्षा ऋतू की प्रथम जल शस्य |


पड़ी रहती मरी मछली समान वे उजान की ओर रख मुख 

पता था उन्हें कि करेंगी सरंजाम उनकी भूख का जलमाता 

बड़ा सा मुँह खोलती अपनी ओर आता देख निवाला 

आलस्य इन मछलियों का बासु दा ने करीब से था जाना 

फिर मुश्किल न था ढूँढना स्वच्छ जल में इनका ठिकाना |


बंसी में लगा कभी छोटी झींगा तो कभी मिष्टान्न का टुकड़ा 

डालते बासु दा जल में, मछलियाँ लपकती उस ओर तल में 

मासूम मछलियाँ नहीं जानती कोई लगा बैठा होगा घात 

बाहर निकलते ही बंसी के, मछलियाँ रखी जाती बटुली में 

फिर अंतिम श्वास तक लड़ती, करती रहती तुमुल उत्पात | 


बदला मौसम, बीते साल, कभी डाली बंसी, कभी डाला जाल 

हर बार तृप्त हुई बासु दा की भूख, मिला उनकी जिह्वा को स्वाद 

बहुत सालों बाद की है बात, जब वृद्ध हाथ नहीं पकड पाते थे बैला 

मछली नहीं, तड़प रहे थे बासु दा बंसी में फँसी मछली की तरह 

मृत्यु के मछुआरे ने इस संसार नामक भवसागर में था बंसी डाला|


गड्ढ़े बनाती हैं किनारों पर नदी की लहरें जहाँ जहाँ 

शुष्क मौसम में, लेती हैं आश्रय वहाँ वहाँ 

आत्मरक्षा के लिए परिपक्व वय की बलुआ मछलियाँ ।

उघड़ी ही रह जाती है उनकी पीठ बिना ढक्कन के 

रेत की प्राकृतिक बटुली में, उड़ जाता है रुपहला रंग पीठ का 

सूरज की किरणों में तप-तप कर, पर बात नही रूकती यहाँ 

इन्हीं गड्ढों में अक्सर हो जाती हैं ये कंकालसार|


दो हजार सत्रह के दिसम्बर महीने में आई थी खबर 

आशा सहनी नामक उस स्त्री की जो हो गई थी कंकालसार 

करते हुए बेटे की प्रतीक्षा, करोड़ों के अपने मुम्बई के घर में 

बासु दा अगर जिंदा रहते तो बताते लेकर सजल नेत्र 

कई बार आप सिर्फ़ इसीलिए करते हैं वरण मृत्यु का 

कि आप नहीं छोड़ना चाहते घर का अपना सुविधा क्षेत्र|


3.


श्रावण के आगमन पर वेगवती हो उठी नदी में 

गई थी करने गुसल अपनी बांधवियों संग 

तितास पार की पंद्रह साला लड़की लैला 

नहाना तो बहाना था, लाना था उसे बैला 


पहले भी किया था पार नदी को कई बार 

नया शय न था बलुआ मछली का शिकार 

ढूँढती गड्ढ़े तट पर गले भर पानी में जाकर 

पाँव की उँगलियों से रेत पर टटोल-टटोलकर 


गड्ढे के मुहाने को ज्यूँ ढूँढती उँगलियाँ 

भरकर श्वास फेफड़ों में लैला डूबकी मारती 

घुसाती हाथ बलुआ मछली के गड्ढे में 

मछलियाँ भय से रेत के और भीतर चली जाती 


पहुँचकर शिकार के इतने करीब 

छोड़ता शिकार कौन बदनसीब 

रेत के जितने भी भीतर जाती बैला 

उन्हें पकड़कर ही दम लेती थी लैला 


एक डूबकी में अगर शिकार न लगे हाथ 

तो डूबकी लगाती लैला कई-कई बार 

शिकार का नशा होता ही है ऐसा कि वह 

भूल जाती साँसों के खत्म होने की बात 


उस रोज़ कुछ अधिक तेज थी नदी की धार 

अभी रेत के भीतर ही फँसी थी लैला की हाथ 

तेज़ धार ने किया था शरीर पर कई वार 

पलट गया उसका शरीर और टूट गई श्वास 


गाँवभर ने मनाया लैला के जाने का सोग

और निकल पड़े पकड़ने बैला अगले ही रोज़ 

धतूरे से कम न होता है नशा मत्स्य शिकार का 

फिर यहाँ थी भूख, मजबूरी और प्रतिशोध 



भले ही किस्म-किस्म की मछलियाँ पकड़ते थे कुबेर माझी 

पर बासु दा की तरह वह भी कहते "माछ मानेई इलिश बुझी"

सागर में करती है वास पद्मा की इलिस और गंगा की हिलसा 

हजारों मील चलकर है आती नदी में छोड़ने वे अपने डिम्ब 

लौट जाते बच्चे बड़े हो सागर में यदि बच जाए होने से शिकार

बेआइनि है इलिश के नन्हें बच्चों का शिकार नदी के दोनों पार 


सुस्वादु व्यंजन बनाने के लिए खरीदना पड़ता है सुस्वादु इलिश

तमाम अभिज्ञता और गवेषणा करते हैं पुष्टि पद्मा के इलिश के सुस्वादु होने की 

पर जानते थे कुबेर माझी कि उत्कृष्ट है केवल वह इलिश जो पायी जाती है 

पद्मा, मेघना और डाकातिया नदियों के संगम पर चाँदपुर में 

खरीदना है आपको इलिश ही, भले ही हर ओर होता हो केवल पद्मा के इलिश का गुणगान 

जिह्वा के चाहने पर भी मारना पड़ सकता है मन कि बढ़ता इलिश का दाम, ग्राम दर ग्राम


रुपाली इलिश के पेट पर होता ललछौंह सुनहलापन, पीठ होती मोटी  

बताते थे कुबेर माझी कि बेहतरीन इलिश की पहचान ही यही होती

मछली पकड़ना ही होता है मछुआरों का एकमात्र काम दिवानिशी  

जुगनुओं सी प्रतीत होती थी मछुआरों के नौके पर लालटेन की रौशनी  

जिसमें चाँदी सी दमकती थी नौके पर रखी मृत मछलियों की त्वक

और नीलाभ मणि की मानिंद दिखती थीं उनकी आँखें निष्पलक 


आज भी उतरते हैं कुबेर माझी के वंशज उत्ताल पद्मा में पकड़ने मछली 

उनकी नौकायें हो गई हैं पालविहीन इंजन के साथ, बढ़ गई है उनकी गति 

नहीं बदला कुछ तो प्रकृति पर उनकी निर्भरता, पद्मा आज भी है जलमाता   

कर रहे हैं वहन वंश परम्परा का पकड़कर इलिश कभी कम तो कभी ज्यादा 

पद्मा की इलिश है अब एक ऐसा स्वप्न जिसका पीछा कर रहे हैं हर वर्ग के लोग 

किसी के हिस्से स्वप्न ही रह जाता; किसी किसी को ही मिलता है इलिश का भोग 


बिला शौक के मनुष्य कहाँ बचता है जिंदा

इसी प्रवृत्ति से तो वह करता है आनन्द का उपभोग 

कौन बताये कि कितने किस्म-किस्म के होते हैं ये शौक 

पूरा करने को अपना शौक कुछ भी कर जाते कुछ लोग

मानो शौक नहीं हुआ पूरा, तो वह जिंदा ही नहीं बचेगा 

तब समझ जाना चाहिए कि वह शौक नहीं रहा 

अब केवल शौक, बन चुका है वह उसका नशा 

मनुष्य की वे तमाम प्रवृत्तियाँ जिनमें शौक बन जाता है नशा 

उनमें पहली है मछली पकड़ने की प्रवृत्ति 


रूपक बाबु को भी था लगा ऐसा ही एक चस्का 

जो न जाने कब तब्दील हो गया शौक में 

चाँद मियाँ के साथ जाते हैं मछली पकड़ने 

सेमुअल के पोखर में जो है गाँव के दक्षिण में 

जो है शौक रूपक बाबु का, नशा है चाँद मियाँ के लिए  

और है जरिया अतिरिक्त आय का सेमुअल के लिए

पचास रूपये से एक कम न लेती बीबी ऑगस्टीना  

साथ में मछली भी मिल जाए तो क्या ही कहना 


गाँव वालोँ के लिए जो हैं हिन्दू, मुसलमान और इसाई 

पसंद करते हैं पहचाने जाना वे खुद को बतौर 'मत्स्य शिकारी' 

पृथ्वी के जल वाले भूभाग की लगभग हर जनजाति के बीच 

पाए जाते हैं ये मत्स्यशिकारी, जिनकी नहीं होती कोई जाति 

नहीं होता है कोई गोत्र, कोई धर्म नहीं होता है, 

कोई लिंग नहीं, अमीर और गरीब का भी कोई भेद नहीं होता


मत्स्य शिकार का नशा बनाये रखता है उन्हें ख़ालिस आदिम इंसान !


6

काक चेष्टा, बको ध्यानं का बीज मन्त्र 

बैठता है सटीक विद्यार्थियों से कहीं ज्यादा 

मत्स्य शिकारियों के लिए 

बताते हैं ऐसा रूपक बाबु को चाँद मियाँ

चाहिए किसी तपस्वी का धैर्य एक मत्स्य शिकारी में होना 

कि मछलियाँ कहलाती हैं जल का सोना 

 

कई बार ऐसा हुआ कि मछली पकड़ने बैठे रूपक बाबु 

पर हाथ न आई एक भी मछली 

फिर हुआ ऐसा भी

कि अलसुबह ही हाथ कतला आ गई 

और पूरा दिन बिन माछ के यूँ ही हुआ जाया 

जबकि कई किलो पकड़े दिन भर में चाँद मियाँ    


धुप हो या बारिश, आंधी हो या तूफ़ान 

बैठे रहे रूपक बाबु अपलक बंसी की ओर निहार 

बारिश में भीगे, आँधी में सूखे और फिर भीगे बारिश में  

पर हिले नहीं रूपक बाबु तनिक भी अपने आसन से 


क्षुधा के देवता हों या गरीबी के 

इन्हें साधने के लिए करनी ही पड़ती है तपस्या 

आप अमीर हैं तो खरीद सकते हैं देवताओं को !


सुस्वादु इलिश खाने की उत्कट इच्छा 

ले जा सकती है आपको कहाँ - कहाँ 

जानती थी कहाँ खुद भी बेगम नूरजहाँ   


विश्व की सबसे सुस्वादु इलिश मछली 

पकाते थे खानसामा मुसव्विर अली

जा पहुँची एक रोज़ बेगम अली की गली 


अकेले रहते मुसव्विर अली, घर पहुँची मेहमान 

पूछा कैसे बनाते इतना स्वादिष्ट इलिश पकवान 

इत्मिनान से किया अली ने पाकविधि का बखान 


खरीदते हैं जिस दिन इलिश, उसी रोज़ पकाते 

काटने के बाद इलिश मछली को नहीं धोते 

धोने से सुस्वादु इलिश अपना स्वाद खोते 


तो उसका रक्त ! बेगम चिल्ला पड़ी बेतरह 

पोंछना चाहिए सूती कपड़े से अच्छी तरह

अज़ीब बात थी, बेगम ने ख़ूब किया ज़िरह 


खा लेना होता है व्यंजन को पका लेने के फ़ौरन बाद 

कि खो जाता है दुबारा गर्म करने पर इलिश का स्वाद 

बेगम ने भी सुना था इलिश मछलियों के लिए यह प्रवाद 

 

थोड़ी काली मिर्च, थोड़ा नमक मिला कर नीम्बू संग मछली में 

रख दिया धुप में और पकाया बासंती पुलाव पीतल की बटुली में 

बेगम हैरान कि सूर्य की गर्मी में ही पक जायेगी इलिश थाली में 


सूरज की ताप में न सही पानी की भाप में तो 

पक ही जायेगी इलिश की सबसे मशहूर पकवान

इलिश पकाना जितना है मुश्किल,उतना ही है आसान 


कहते अली लगती है एक उम्र इलिश पकाने की कला को साधते 

आज भी ज़ायके के कदरदान लोग इलिश को भाप में हैं राँधते 

लगा मछली में नून तेल मसाले ऊपर से केले का पत्ता हैं बाँधते 


नोश फ़रमाती जातीं बेग़म बनाते जाते मुसव्विर अली इलिश,  

सरसों इलिश, इलिश पुलाव, इलिश खिचड़ी, भूना इलिश,  

इलिश दाल, बेगुन इलिश, भापा इलिश, पोस्तो इलिश..... 


व्यंजनों का कोई अंत ही न था, खत्म हुए जा रहे थे इलिश !    


रहती हैं कतला मछलियाँ जोड़ियों में 

विचरती हैं जल के समृद्ध संसार में साथ-साथ 

जब उठ आती है एक कतला बंसी में 

अगली बार बंसी डालते ही जल में 

पकड़ी जा सकती है उसकी सहचर भी  

वह बंसी हो सकती है आपकी या 

किसी पड़ोसी मत्स्य शिकारी की 

चाहिए होता है यथेष्ट अनुभव 

एक कतला को बंसी में फँसाकर 

जल से बाहर निकाल पाने के लिए 


भरपूर मनोरंजन है मत्स्य शिकार 

जिसके दीवाने होते हैं हजारों हज़ार 

मानों वे बैठे हों कोलोसियम में  

बहु वर्ष पुराने रोमन साम्राज्य के 

और देख रहें हों ख़ूनी खेल शिकार का 

होता है मुश्किल यह तय कर पाना 

कि कौन होता है अधिक उत्तेजित 

शिकारी या मनोरंजन पसंद दर्शक 


दिखता है आनंद चेहरे पर मत्स्य शिकारियों के 

तो उल्लास मनोरंजन से तृप्त दर्शकों के मुख पर 

बराबर ईर्ष्या भी दिख ही जाती है मुखमंडल पर 

उन शिकारियों के जो नहीं पकड़ सके मनपसंद मछली 

नहीं दिखती चिंता किसी के भी चेहरे पर  

एक जोड़े प्रेममय माछ के बिछड़ जाने की 

जिन्होंने नहीं किया कोई अनिष्ट मनुष्यों का कभी 

थल पर नहीं जल पर ही किया वास आजीवन !


किसने कहा प्रकृति के घर होता है न्याय बराबर !


9

वह होती है चारे की गंध ही  

जो करती है आकर्षित मछली  

फँसती बंसियों में भोजन की आड़ में 

हर मछली की होती है पसंद अपनी-अपनी 

जानते हैं ये भलीभाँति तमाम मत्स्य शिकारी 

तभी इतने जतन से करते हैं तैयार वे चारा 

पाव रोटी, हँड़िया, सूजी, चावल, सरसों की खल्ली 

चने का सत्तू, चींटी के अंडे, इलाइची, झींगा मछली 

अरवा चावल का पुलाव, मक्खन, मिष्टान्न का टुकड़ा, 

खसखस, तिल, नारियल और भी न जाने क्या - क्या 


अगर दिल की मुराद में है रोहू मछली 

तो ले जाते हल्की मक्खन लगी पाव रोटी

छिड़क उस पर हड़िया, उसे बंसी में फँसा 

लग जाते मत्स्य तपस्या में, मिलती है तृप्ति 


नैनी मछली को पुकार रही हो आत्मा 

तो ले जाते केंचुआ या चींटी का अंडा  

चने के सत्तू से भी बन सकती है बात 

बंसी जल में डालकर लगा बैठते घात 

 

सोल मछली को पसंद जिंदा घोंघा और छोटी माछ 

कतला को चाहिए होता नारियल कोरमा संग पुलाव

लगाकर बंसी में अनुकूल चारा डाल बैठते मुँह में पान 

निःशब्द साधु की तरह हैं करते जल शस्य का आह्वान 


मंजे हुए मत्स्य शिकारी रखते हैं ख्याल 

अपनी जिह्वा से पहले शिकार की जिह्वा का 

समझते हैं वे कि नहीं मिलती है आत्म-तृप्ति 

बिना तृप्त किये हुए दूसरों की आत्मा |


10 

इक्कीसवीं सदी के इस महादेश में 

दिखता है हर ओर ईंट और कंक्रीट 

सूखती जा रही हैं नदियाँ और 

पाट दिए जा रहे हैं तालाब 

ज़्यादातर लोगों की सुधि में 

पोखर नहीं, पानी नहीं 

वर्षा नहीं, हरीतिमा नहीं 

खेत नहीं, धान नहीं 

झील नहीं, मछली नहीं 

वह मातम भी तो नहीं 

जो बहा करती थी हवाओं संग 

शस्य श्यामला धरा के उपर 

मत्स्य शिकार का आनन्द भी नहीं !


यह विनाश नहीं आया स्वतः ही 

किया गया इसे आमंत्रित कायदे से 

जो आया विकास की वेशभूषा में 

फिर पसरता ही गया !


रुष्ट हो रही है जलमाता 

मत्स्य देवी देने ही वाली हैं 

पृथ्वीवासियों को श्राप 

कब करेंगे प्रतिवाद हम और आप!!

Wednesday, October 21, 2020

जीवनानंद दास

 पिछले साल चेन्नै के मिओट अस्पताल के लॉन में उगे हरे घास को देखकर उस पर लोटने की तीव्र इच्छा हुई | अगले ही क्षण महसूस हुआ कि हो न हो मेरे अंदर एक गधा है| इच्छा ऐसी विचित्र थी कि किसी से साझा करने में हिचकिचाहट महसूस हुई |  गधा होकर मनुष्य के शरीर में रहना साल रहा था |


पर जाड़े का अगला मौसम आते ही याद आया  कि बचपन में जाड़े के मौसम में दिन के भोजन के बाद जब घर की स्त्रियाँ घर के पीछे बागान में चटाई बिछाकर धुप सेंकते हुए स्वेटर बुना करती थीं या जूट पर ऊन से कलाकारी कर आसन बनाया करती थीं, मैं वहाँ उगे घास, घास के बीच में उग आये छोटे-छोटे फूल, दूर्वादलों, कालमेघ के पत्तों,  सत्यनाशी के फूल और भी न जाने क्या-क्या निहारा करती थी | संभव है मेरे अंदर के गधे का जन्म उन्हीं दिनों हुआ हो |


फिर जीवनानंद दास की कविताओं से गुजरते हुए उनकी कविता "घास" से साक्षात्कार हुआ | यह कविता से कम और स्वयं से साक्षात्कार अधिक था |  आज जीवनानंद दास के स्मृति दिवस पर उनकी उसी कविता का अनुवाद किया है आप सभी के लिए-


घास 

(अनुवाद : सुलोचना) 


कोमल नींबू के पत्तों की तरह नरम हरी रौशनी से 

               पृथ्वी भर गई है भोर की इस बेला में;

कच्चे चकोतरे के जैसी हरी घास - वैसा ही सुघ्राण -

                       हिरणदल दाँत से उखाड़ रहे हैं!

मेरी भी इच्छा होती है इस घास के इस घ्राण को हरित मद्य की तरह

                       भर-भर गिलास पीता रहूँ,

इस घास के शरीर को छुऊँ - आँखों में मलूँ,

                       घास के डैनों पर हैं मेरे पंख,

घास के भीतर घास होकर जन्मता हूँ किसी एक निविड़ घास-माता के 

                      शरीर के सुस्वादु अंधकार से उतरकर ।


 आकाशलीना 


सुरंजना, वहाँ नहीं जाना तुम,

नहीं करना बात उस युवक से;

लौट आओ सुरंजना:

नक्षत्र की रुपाली आग भरी रात में;


लौट आओ इस मैदान में, लहरों में;

लौट आओ मेरे हृदय में ;

दूर से भी दूर - बहुत दूर

युवक के साथ तुम नहीं जाना अब ।


क्या बात करनी है उससे? - उसके साथ!

आकाश की ओट में आकाश में

हो मृत्तिका की तरह तुम आज:

उसका प्रेम घास बन जाता है।


सुरंजना,

तुम्हारा हृदय आज घास:

बतास के उस पार बतास  -

आकाश के उस पार आकाश।


 सुदर्शना 


एक दिन म्लान हँसी लिए मैं

तुम जैसी एक महिला के पास 

युगों से संचित सम्पदा में लीन होने ही वाला था 

कि अग्निपरिधि के मध्य सहसा रुककर 

सुना किन्नरों की आवाज़ देवदार के पेड़ में,

देखा अमृतसूर्य है।


सबसे अच्छे हैं आकाश, नक्षत्र, घास, गुलदाउदी की रात;

फिर भी समय स्थिर नहीं है,

एक और गभीरतर शेष रूप देखने के लिए  

देखा उसने तुम्हारा वलय ।


इस दुनिया की चिर परिचित धूप की तरह है 

तुम्हारा शरीर; तुमने दान तो नहीं किया?

समय तुम्हें सब दान कर विधुर की भाँती कहता है 

सुदर्शना, तुम आज मृत।


 बिल्ली


 पूरे दिन घूम फिरकर एक बिल्ली से केवल मेरी ही मुलाकत हुई:

पेड़ों की छाया में, धूप में, बादामी पत्तों की भीड़ में;

कहीं कुछेक टुकड़े मछली के काँटों की सफलता के बाद

फिर सफेद मिट्टी के कंकाल के भीतर

देखता हूँ कि अपने हृदय के साथ मधुमक्खी की तरह निमग्न है;

लेकिन फिर भी उसके बाद गुलमोहर की देह नाखूनों से खरोंच रही है,

पूरे दिन सूरज के पीछे पीछे चल रही है वह।

एक बार वह दिखती है,

एक बार खो जाती है कहीं।

हेमंत की संध्या जाफरान रंग के सूर्य के कोमल शरीर में

उसे अपने सफेद पंजे से छू - छू कर खेलते देखा है मैंने;

फिर अंधकार को छोटे छोटे गेंदों की तरह पंजों से पकड़ लायी वह

समस्त पृथ्वी पर फैला दिया।



तुम्हें मैं 


तुम्हें मैंने देखा था इसलिए 

तुम मेरे कमल के पत्ते हुए;

शिशिर के कणों की तरह शून्य में घूमते हुए 

मैंने सुना था कि पद्मपत्र बहुत दूर हैं 

 ढूँढ ढूँढ कर पाया अंत में उसे ।


नदी सागर कहाँ जाते हैं बहकर?

कमल के पत्तों पर जल की बूँदें बनकर 

कुछ भी नहीं जानता - नहीं दिखता कुछ भी और 

इतने दिनों बाद मिलन हुआ मेरा तुम्हारा 

कमल के पत्ते के सीने के भीतर आकर।


तुमसे प्रेम किया है मैंने, इसलिए 

डरता हूँ शिशिर होकर रहने में,

तुम्हारी गोद में जल की एक बूंद पाने के लिए 

चाहता हूँ तुममें मिल जाना 

शरीर जैसे मिलता है मन से।


जानता हूँ कि रहोगी तुम - मेरा होगा क्षय 

कमल का पत्ता सिर्फ एक जल की बूँद नहीं।

अभी है, नहीं, अभी है, नहीं- जीवन चंचल;

यह देखते ही खत्म हो जाता है कमल के पत्तों का जल

समझा मैंने तुमसे प्रेम करने के बाद।

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ঘাস


কচি লেবুপাতার মতো নরম সবুজ আলোয়

                পৃথিবী ভরে গিয়েছে এই ভোরের বেলা;

কাঁচা বাতাবির মতো সবুজ ঘাস- তেমনি সুঘ্রাণ –

                       হরিনেরা দাঁত দিয়ে ছিঁড়ে নিচ্ছে !

আমারো ইচ্ছা করে এই ঘাসের এই ঘ্রাণ হরিৎ মদের মতো 

                       গেলাসে গেলাসে পান করি,

এই ঘাসের শরীর ছানি- চোখে ঘসি,

                       ঘাসের পাখনায় আমার পালক,

ঘাসের ভিতর ঘাস হয়ে জন্মাই কোনো এক নিবিড় ঘাস-মাতার

                      শরীরের সুস্বাদু অন্ধকার থেকে নেমে ।


আকাশলীনা


সুরঞ্জনা, ঐখানে যেয়োনাকো তুমি,

বোলোনাকো কথা অই যুবকের সাথে;

ফিরে এসো সুরঞ্জনা:

নক্ষত্রের রুপালি আগুন ভরা রাতে;


ফিরে এসো এই মাঠে, ঢেউয়ে;

ফিরে এসো হৃদয়ে আমার;

দূর থেকে দূরে – আরও দূরে

যুবকের সাথে তুমি যেয়োনাকো আর।


কী কথা তাহার সাথে? – তার সাথে!

আকাশের আড়ালে আকাশে

মৃত্তিকার মতো তুমি আজ:

তার প্রেম ঘাস হয়ে আসে।


সুরঞ্জনা,

তোমার হৃদয় আজ ঘাস :

বাতাসের ওপারে বাতাস -

আকাশের ওপারে আকাশ।


সুদর্শনা


একদিন ম্লান হেসে আমি

তোমার মতন এক মহিলার কাছে

যুগের সঞ্চিত পণ্যে লীন হতে গিয়ে

অগ্নিপরিধির মাঝে সহসা দাঁড়িয়ে

শুনেছি কিন্নরকন্ঠ দেবদারু গাছে,

দেখেছ অমৃতসূর্য আছে।


সবচেয়ে আকাশ নক্ষত্র ঘাস চন্দ্রমল্লিকার রাত্রি ভালো;

তবুও সময় স্থির নয়,

আরেক গভীরতর শেষ রূপ চেয়ে

দেখেছে সে তোমার বলয়।


এই পৃথিবীর ভালো পরিচিত রোদের মতন

তোমার শরীর; তুমি দান করোনি তো;

সময় তোমাকে সব দান করে মৃতদার বলে

সুদর্শনা, তুমি আজ মৃত।


 বেড়াল


সারাদিন একটা বেড়ালের সঙ্গে ঘুরে ফিরে কেবলি আমার দেখা হয়:

গাছের ছায়ায়, রোদের ভিতরে, বাদামি পাতার ভিড়ে;

কোথাও কয়েক টুকরো মাছের কাঁটার সফলতার পর

তারপর সাদা মাটির কঙ্কালের ভিতর

নিজের হৃদয়কে নিয়ে মৌমাছির মতো নিমগ্ন হয়ে আছে দেখি;

কিন্তু তবুও তারপর কৃষ্ণচূড়ার গায়ে নখ আঁচড়াচ্ছে,

সারাদিন সূর্যের পিছনে পিছনে চলেছে সে।

একবার তাকে দেখা যায়,

একবার হারিয়ে যায় কোথায়।

হেমন্তের সন্ধ্যায় জাফরান-রঙের সূর্যের নরম শরীরে

শাদা থাবা বুলিয়ে বুলিয়ে খেলা করতে দেখলাম তাকে;

তারপর অন্ধকারকে ছোট ছোট বলের মতো থাবা দিয়ে লুফে আনল সে

সমন্ত পৃথিবীর ভিতর ছড়িয়ে দিল।


 তোমায় আমি


তোমায় আমি দেখেছিলাম ব’লে

তুমি আমার পদ্মপাতা হলে;

শিশির কণার মতন শূন্যে ঘুরে

শুনেছিলাম পদ্মপত্র আছে অনেক দূরে

খুঁজে খুঁজে পেলাম তাকে শেষে।


নদী সাগর কোথায় চলে ব’য়ে

পদ্মপাতায় জলের বিন্দু হ’য়ে

জানি না কিছু-দেখি না কিছু আর

এতদিনে মিল হয়েছে তোমার আমার

পদ্মপাতার বুকের ভিতর এসে।


তোমায় ভালোবেসেছি আমি, তাই

শিশির হয়ে থাকতে যে ভয় পাই,

তোমার কোলে জলের বিন্দু পেতে

চাই যে তোমার মধ্যে মিশে যেতে

শরীর যেমন মনের সঙ্গে মেশে।


জানি আমি তুমি রবে-আমার হবে ক্ষয়

পদ্মপাতা একটি শুধু জলের বিন্দু নয়।

এই আছে, নেই-এই আছে নেই-জীবন চঞ্চল;

তা তাকাতেই ফুরিয়ে যায় রে পদ্মপাতার জল

বুঝেছি আমি তোমায় ভালোবেসে।

फ़कीर लालन शाह

१. कहते हैं सब लालन फकीर हिंदू हैं या यवन


कहते हैं सब लालन फकीर हिंदू है या यवन,

क्या कहूं अपना मैं नहीं जानता संधान ।।


एक ही घाट पर आना जाना, एक माँझी खे रहा,

कोई नहीं खाता किसी का छुआ, अलग जल का कौन करता है पान।।


वेद पुराणों में सुनते हैं, हिन्दू के हरि हैं यवन के साईं,

फिर भी मैं समझ नहीं पाता, दो रूपों में सृष्टि के क्या हैं प्रमाण।।


नहीं है मुसलमानी, नहीं है जिसके पास जनेऊ वह भी तो है ब्राह्मणी,

समझो रे भाई दिव्य ज्ञानी, है लालन भी वैसा ही जात एक जन।।


*मुसलमानी = खतना 


२. सत्य काम में कोई नहीं राज़ी 


सत्य काम में कोई नहीं राज़ी 

देखता हूँ सब कुछ ही ता ना ना ना ।

जात गया जात गया कहकर 

यह क्या अजब पागलपना 

जात गया जात गया कहकर 

यह क्या अजब पागलपना

जात गया जात गया कहकर 

जब तुम आये थे तो जाति क्या थी तुम्हारी?

आकर तुमने कौन सी जाति अपनाई?

जब तुम आये थे तो जाति क्या थी तुम्हारी?

आकर तुमने कौन सी जाति अपनाई?

जाते समय किस जाति के रहोगे?

जाते समय किस जाति के रहोगे?

वह बात सोचकर कहो ना ।

जात गया जात गया कहकर 

यह क्या अजब पागलपना 

जात गया जात गया कहकर 

ब्राह्मण चंडाल चमार मोची 

एक ही जल से सब होते हैं शुचि 

ब्राह्मण चंडाल चमार मोची 

एक ही जल से सब होते हैं शुचि 

देख-सुनकर नहीं होती रूचि 

देख-सुनकर नहीं होती रूचि 

यम तो किसी को भी नहीं छोड़ेगा।

जात गया जात गया कहकर 

यह क्या अजब पागलपना 

जात गया जात गया कहकर 

चुपके से जो खाता है वेश्या का भात 

उससे धर्म की क्या क्षति होती है

चुपके से जो खाता है वेश्या का भात 

उससे धर्म की क्या क्षति होती है

लालन कहे जात किसे कहते हैं

लालन कहे जात किसे कहते हैं

वह भ्रम तो नहीं गया ...

जात गया जात गया कहकर 

यह क्या अजब पागलपना 

जात गया जात गया कहकर

सत्य काम में कोई नहीं राज़ी 

सत्य काम में कोई नहीं राज़ी 

देखता हूँ सब कुछ ही ता ना ना ना ।

जात गया जात गया कहकर 

यह क्या अजब पागलपना 

जात गया जात गया कहकर 

यह क्या अजब पागलपना

जात गया जात गया कहकर 

पैदा होने का भाव


३. मैंने एकदिन भी नहीं देखा उसे 


घर के पास है आरसी नगर

वहाँ एक पड़ोसी रहता है 

मैंने एकदिन भी नहीं देखा उसे 


गाँव भर अगाध पानी 

न है किनारा, न है तरणी किनारे 

इच्छा होती है कि देखूँ उसे 

कैसे वहाँ जाऊं रे ?


क्या कहूँ पड़ोसी के बारे में

हस्त पद स्कंध माथा नहीं है 

क्षण भर तैरता है शून्य के ऊपर 

क्षण भर बहता है नीर में 

 

पड़ोसी यदि मुझे छूता 

यम यातना सब दूर हो जाते 

वह और लालन एक साथ रहते हैं 

लाख योजन फाँक रे //


*तरणी = नौका, फाँक = दूरी 


४. मैं अपार होकर बैठा हूँ 


मैं अपार होकर बैठा हूँ 

हे दयामय,

उस पार ले जाओ मुझे ।।

मैं अकेला रह गया घाट पर  

भानु बैठ गया नदी के पाट पर 

(मैं) तुम्हारे बिन हूँ घोर संकट में

नहीं दिख रहा है उपाय ।

नहीं है मेरे पास भजन-साधन 

चिरदिन कुपथ की ओर गमन 

नाम सुना है पतित-पावन  

इसलिए देता हूँ दुहाई ।

अगति को यदि नहीं दी गति

इस नाम की रह जायेगी अख्याति 

लालन कहे, अकुलपति

कौन कहेगा तुम्हें ।।


*अगति=दुर्गति/दुर्दशा, भानु = सूर्य 


५. मिलन होगा कितने दिनों बाद 


मिलन होगा कितने दिनों बाद 

अपने मन के मानुष के साथ ।।

चातक प्रायः अहर्निशी

देखता है काला शशि 

होने को चरण-दासी,

ऐसा होता नहीं है भाग्य गुण से ।।

जैसे मेघ का विद्युत मेघ में ही  

छुप जाने से नहीं हो पाता अन्वेषण,

काले (ईश्वर/कृष्ण) को खोकर वैसे ही 

इस रूप को ढूँढता हूँ दर्पण में ।।

जब उस रूप का स्मरण होता है,

नहीं रहता है लोक-लज्जा का भय 

लालन फकीर सोचकर कहता है हमेशा ही 

(यह) प्रेम जो करता है वह जानता है ।।


६. तुम्हारे घर में रहते हैं 


तुम्हारे घर में वास करते हैं कौन तुम्हें नहीं पता ओ मन

तुम्हारे घर में रहते हैं कितने जन, तुम्हें नहीं पता मन

तुम्हारे घर में रहते हैं कितने जन |


एक जन आँकता है छवि होकर एकाग्र, ओ मन

दूसरा जन बैठकर लगा रहा होता है रंग,

फिर उस छवि को करता है नष्ट 

कौन जन, कौन जन 

तुम्हारे घर में रहते हैं कितने जन |


एक जन छेड़ता है राग इकतारे पर, ओ मन

दूसरा जन झाल पर देता है ताल,

फिर बेसुरे राग में गाता है देखो

कौन जन, कौन जन 

तुम्हारे घर में रहते हैं कितने जन |


रस पीकर होकर माताल, यह देखो

हाथों से फिसल जाती है घोड़े की लगाम,

उस लगाम को पकड़ता है देखो

कौन जन, कौन जन 

तुम्हारे घर में रहते हैं कितने जन |


७. विदेशी के संग कोई प्रेम ना करना


पहले भाव जानकर प्रेम करना  

अन्यथा अंत में मिलेगी यंत्रणा

विदेशी के संग कोई प्रेम ना करना ||


विदेशी के भाव में भाव मिलाने से 

भाव में भाव कभी नहीं मिलेगा

पथ के मध्य में लक्ष्य निर्धारित करने से 

किसी के साथ कोई नहीं जाएगा ||


देश का देशी यदि हुआ वह 

उसे पाया जा सकता है समय-असमय,

विदेशी होता है वह जंगली तोता 

जो कभी पोस नहीं मानता ||


नलिनी और सूर्य का प्रेम है जैसा 

उसी तरह प्रेम करना रसिक सुजान,

लालन कहे पहले धोखा खाकर 

बाद में रोने से कुछ नहीं मिलेगा ||

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 ফকির লালন শাহ


1. সবে বলে লালন ফকির হিন্দু কি যবন

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সবে বলে লালন ফকির হিন্দু কি যবন,

  কি বলিব আমার আমি না জানি সন্ধান।।


একই ঘাটে আসা যাওয়া,এক পাটনী দিচ্ছে খেওয়া,

  কেউ খায়না কারো ছোঁয়া,বিভিন্ন জল কেবা পান।।


বেদ পুরানে শুনিতে পাই,হিন্দুর হরি যবনের সাঁই,

  তাওত আমি বুঝতে নারি,দুই রূপ সৃষ্টি কি প্রমাণ।।বিবিদের


নাই মুসলমানী,পৈতা যার নাই সেওত বাওনী,

  বোঝরে ভাই দিব্য জ্ঞানী,লালন তমনি জাতএক জনা।।


২. সত্য কাজে কেউ নয় রাজি

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সত্য কাজে কেউ নয় রাজি

সবই দেখি তা না না না….

জাত গেল জাত গেল বলে

একি আজব কারখানা

জাত গেল জাত গেল বলে

একি আজব কারখানা

জাত গেল জাত গেল বলে

আসবার কালে কি জাত ছিলে

এসে তুমি কি জাত নিলে

আসবার কালে কি জাত ছিলে

এসে তুমি কি জাত নিলে

কি জাত হবে যাবার কালে

কি জাত হবে যাবার কালে

সে কথা ভেবে বলো না…

জাত গেল জাত গেল বলে

একি আজব কারখানা

জাত গেল জাত গেল বলে

ব্রাহ্মণ চন্ডাল চামার মুচি

এক জলে সব হয় গো সুচি

ব্রাহ্মণ চন্ডাল চামার মুচি

এক জলে সব হয় গো সুচি

দেখে শুনে হয় না রুচি

দেখে শুনে হয় না রুচি

যমে তো কাউকে ছাড়বে না…

জাত গেল জাত গেল বলে

একি আজব কারখানা

জাত গেল জাত গেল বলে

গোপনে যে বেশ্যার ভাত খায়

তাতে ধর্মের কি ক্ষতি হয়

গোপনে যে বেশ্যার ভাত খায়

তাতে ধর্মের কি ক্ষতি হয়

লালন বলে জাত কারে কয়

লালন বলে জাত কারে কয়

সে ভ্রম তো গেল না…

জাত গেল জাত গেল বলে

একি আজব কারখানা

জাত গেল জাত গেল বলে

সত্য কাজে কেউ নয় রাজি

সত্য কাজে কেউ নয় রাজি

সবই দেখি তা না না না….

জাত গেল জাত গেল বলে

একি আজব কারখানা

জাত গেল জাত গেল বলে

একি আজব কারখানা

জাত গেল জাত গেল বলে


৩. আমি একদিনও না দেখিলাম তারে


বাড়ির পাশে আড়শি নগর

সেথায় এক পড়শি বসত করে

আমি একদিন ও না দেখিলাম তারে


গেরাম বেড়ে অগাধ পানি

নাই কিনারা নাই তরণী পারে

বান্ছা করি দেখব তারে

কেমনে সেথায় যাইরে


কি বলব পড়শির ও কথা

হস্থ পদ স্কন্ধ মাথা নাইরে

ক্ষনিক ভাসে শূন্যের উপর

ক্ষনিক ভাসে নীরে

 


পড়শি যদি আমায় ছুতো

যম যাতনা সকল যেত দূরে

সে আর লালন একখানে রয়

লক্ষ যোজন ফাক রে//


4. আমি অপার হয়ে বসে আছি


আমি অপার হয়ে বসে আছি

ও হে দয়াময়,

পারে লয়ে যাও আমায়।।

আমি একা রইলাম ঘাটে

ভানু সে বসিল পাটে-

(আমি) তোমা বিনে ঘোর সংকটে

না দেখি উপায়।।

নাই আমার ভজন-সাধন

চিরদিন কুপথে গমন-

নাম শুনেছি পতিত-পাবন

তাইতে দিই দোহাই।।

অগতির না দিলে গতি

ঐ নামে রবে অখ্যাতি-

লালন কয়, অকুলের পতি

কে বলবে তোমায়।।


5. মিলন হবে কত দিনে


মিলন হবে কত দিনে

আমার মনের মানুষের সনে।।

চাতক প্রায় অহর্নিশি

চেয়ে আছি কালো শশী

হব বলে চরণ-দাসী,

ও তা হয় না কপাল-গুণে।।

মেঘের বিদ্যুৎ মেঘেই যেমন

লুকালে না পাই অন্বেষণ,

কালারে হারায়ে তেমন

ঐ রূপ হেরি এ দর্পণে।।

যখন ও-রূপ স্মরণ হয়,

থাকে না লোক-লজ্জার ভয়-

লালন ফকির ভেবে বলে সদাই

(ঐ) প্রেম যে করে সে জানে।।


6.  তোমার ঘরে বসত করে


তোমার ঘরে বাস করে কারা ও মন জান না,

তোমার ঘরে বসত করে কয় জনা, মন জান না

তোমার ঘরে বসত করে কয় জনা।


এক জনায় ছবি আঁকে এক মনে, ও রে মন

আরেক জনায় বসে বসে রঙ মাখে,

ও আবার সেই ছবিখান নষ্ট করে

কোন জনা,কোন জনা

তোমার ঘরে বসত করে কয় জনা।


এক জনে সুর তোলে এক তারে, ও মন

আরেক জন মন্দিরাতে তাল তোলে,

ও আবার বেসুরা সুর ধরে দেখো

কোন জনা, কোন জনা

তোমর ঘরে বসত করে কয় জনা।


রস খাইয়া হইয়া মাতাল, ঐ দেখো

হাত ফসকে যায় ঘোড়ার লাগাম,

সেই লাগাম খানা ধরে দেখো

কোন জনা, কোন জনা

তোমার ঘরে বসত করে কয় জনা।


7.  বিদেশীর সঙ্গে কেউ প্রেম করো না।


বিদেশীর সঙ্গে কেউ প্রেম করো না।

আগে ভাব জেনে প্রেম করো

যাতে ঘুচবে মনের বেদনা।।

ভাব দিলে বিদেশীর ভাবে

ভাবে ভাব কভু না মিশিবে।

পথের মাঝে গোল বাঁধিলে

কারো সাথে কেউ যাবে না।।

দেশের দেশী যদি সে হয়

মনে করে তারে পাওয়া যায়।

বিদেশী ঐ জংলা টিয়ে

কখনো পোষ মানে না।।

নলিনী আর সূর্যের প্রেম যেমন

সেই প্রেমের ভাব লও রসিক সুজন।

অধীন লালন বলে, ঠকলে আগে

কাঁদলে শেষে সারবে না।।

Sunday, October 18, 2020

दुर्गा

--------------

1. 

खोल दिए आश्विन ने अपने उदार कपाट 

तन गया माथे के उपर शरद का आकाश, 

पाँव के नीचे शिशिर से चमकती है घास

शिउली की सुगंध लिए तैर रही बतास 

शुभ्र मेघों के नीचे खिल उठा धवल कास 


अनामंत्रित ही आ धमकी है महामारी 

पृथ्वीवासियों की चिंता में घुल रहा है चाँद 

मद्धिम हो चला रात्रि का अंधकार 

कि तभी दूरदर्शन पर आता है समाचार 

जगने ही वाली हैं देवी योगनिद्रा से 

लोगों के मध्य उमग उठता है उल्लास |




2.


कुमारटुली में जमा कर ली गई है मिट्टी 

जो कुछ रोज़ पहले तक थी पाँव के नीचे 

और फिर रौंदी गई कई - कई बार 

ढाली जा रही है अब एक अलौकिक देह में 

जब होगा चक्षु दान और प्रतिष्ठित प्राण 

देवी कहकर पुकारेंगे उसे मृत्तिका संतान 



उत्सव के बाद क्या होगा देवी का 

वो मिलेगी जल में, नदी के तल में 

समुद्र उसे कर देगा नेस्तानाबूद 

क्या पूछा - "तो फिर कहाँ मिलेगी देवी?"

ज़रा गौर से देखिये अपने पाँव के नीचे की ज़मीं 

वहीं दबी पड़ी मिलेगी कोई मृत्तिका देवी !





3. 


वह आ रही है मंगलध्वनि के साथ 

होकर घोड़े पर सवार लोकालय में 

दुर्गा की आगमनी वार्ता के लिए 

चल रही है तैयारी अंतिम समय की 

कहीं रह न जाए कमी किसी चीज की

व्यस्त है मंडप का प्रत्येक मानुष इस वास्ते 

निद्रित है दक्षिणायन देवी अकाल बोधन के मध्य

की जाएगी संधि पूजा देर शाम के बाद 

कि खुल जाए देवी की तन्द्रा से चूर स्निग्ध आँखें 

पधारेंगी शक्ति की देवी षष्ठी के शुभ मुहूर्त में 

करने महिषासुर का वध, विराजेंगी मंडप में 

तीर-धनुष, गदा-चक्र, खड्ग-कृपाण, पद्म -त्रिशूल

घंटा और वज्र धारण कर त्रिनयनी दशभुजा 

करेगी जागरण, उत्सव के समाप्त होने तक |



4.


जल दर्पण ही चुना अपने विसर्जन के लिए सुलोचना ने

कि महामाया स्वयं भी भर-भर जाती है माया से हर बार 

जल में घुलकर पुनः मृत्तिका बन जाने से पहले 

देखती है अपना अलौकिक सौन्दर्य जल की आरसी में 

और करती है अचरज कि माया से भरे इस संसार में 

माया नहीं जकड़ती किसी को उसकी सुंदर प्रतिमा को 

जल में विसर्जित करने के पहले? अवसाद नहीं घेरता?

क्या उसके साथ ही बहा देते हैं लोग अपना शोक भी जल में?

देखते हैं वे किसका प्रतिबिम्ब जल दर्पण में प्रतिमा विसर्जित करते हुए?


शांत रहता है दशमी का चाँद कि वह है गवाह कई युगों से 

मनुष्य को अपने समस्त भय विसर्जित करते देखने का 

सदियों से शक्ति के ही मार्ग से, जीतते भय को उल्लास से|




5.


चला जा रहा है मनुष्यों का दल 

ढाक की थाप पर नाचते हुए 

"बोलो दुर्गा माय की जय " के उद्घोघ के साथ 


हो उठी है कातर देवी पित्रालय से जाते हुए 

धुप-दीप संग जल रहा है देवी का ह्रदय भी 

चेहरा ज़र्द है खोयछे में दिए गए हल्दी की भाँती  


है कौन सी शक्ति जो रोक लेती है शक्ति की अभिलाषा 

यही सोचते हुए डूबती चली जाती त्रिपुरसुन्दरी जल में 

पहले घुलता है जल में काजल, फिर लावण्य

घुल सके दुःख ऐसा जल कहाँ पाया जाता है पृथ्वी में !


होती है प्रतीति विसर्जित होकर 

कि विसर्जन के मूल में है पूजा 

और दुःख अकाल बोधन के  


पर अनुत्तरित ही रह जाता है वह प्रश्न 

कि त्यागता है कौन किसे 

देवी को मनुष्य या मनुष्य को देवी 

किसका प्रतिबिम्ब देखता है मनुष्य 

विसर्जित करते हुए उस प्रतिमा में !



6. 

जब जागी थी देवी योगनिद्रा से 

कर नदी में स्नान, पाँव में लगाया था आलता 

कर रहे थे श्रृंगार मुक्त केशों का नदी के जलबिंदु 

बतास में घुली थी एक नूतन गंध 

आँखों में डाल अंजन, माथे पर लगाकर कुमकुम

चढने लगी थीं सीढियां मंदिर की 


कुल पाँच सीढ़ी चढ़ उतर आई थीं उलटे पाँव 

लिए मंद मुस्कान अधरों पर 

लिखा था प्रवेश द्वार पर मंदिर के 

"रजस्वला स्त्रियों का प्रवेश वर्जित है"


जिसे तुम खड्ग कहते हो 

वह प्रश्न चिन्ह है देवी का 

कि है वह कौन जो रहती है 

मंदिर के अंतरमहल में 

फिर भी रह जाती है अपरिचित ही 

करते हो किसे तुम समर्पित फिर 

यह क्षुद्र देह्कोष और रक्तबिंदु 

देवी क्या केवल पाषाण की एक मूरत भर है ??



7.

सबसे अच्छी पत्नियाँ किसी बात का बुरा नहीं मानती थीं

सबसे अच्छी प्रेमिकाएँ नहीं करती थीं कोई भी गिला शिकवा 

सबसे अच्छी माएँ अपने हिस्से का खाना भी खिला देती थीं बच्चों को

सबसे अच्छी बहनें नहीं बताती थीं भाई से दुखती रग की व्यथा

"कैसी हो" पूछने पर मुस्कुरा देती थीं सबसे अच्छी सखियाँ


भाव का अभाव गढ़ता रहता था देवियों की नित्य नयी प्रतिमा!


8.

जो सामने थी 

औरत थी, कुलटा थी, रंडी थी 

जिसको देखा ही नहीं 

देवी थी, दयामयी थी, चंडी थी |

Saturday, September 12, 2020

बुद्धदेव बसु

१. इस सर्दी में 


यदि मैं मर सकता

इस सर्दी में,

जैसे मरता है पेड़,

मरा रहता है सांप जैसे

समस्त दीर्घ सर्दी भर ।


नए हो जाते हैं पेड़ सर्दियों के अंत में,

जड़ से उर्ध्व की ओर उठ आता है तरुण प्राणरस,

खिल उठता है चमकीला हरा हर पत्ते पर 

और अजस्र अभिमान फूलों पर।


और साँप उतार देता है अपना केंचुल,

उसकी नई त्वचा पर होती है नक्काशी शंख की तरह;

उसकी जिह्वा मुक्त हो निकल आती है आग की शिखा की तरह,

वह आग जो भय नहीं जानती।


क्योंकि वे मरे रहते हैं

समस्त दीर्घ सर्दी भर,

क्योंकि वे मरना जानते हैं।


यदि मैं भी मरा रह पाता

यदि मुझे आता बिल्कुल शून्य हो जाना,

डूब जाना स्मृतिहीन, स्वप्नहीन अतल नींद में -

तो मुझे प्रति मुहूर्त मरना नहीं पड़ता 

बचे रहने के इस प्रयास में,

खुश होने, ख़ुश करने के लिए

अच्छा लिखने, प्यार करने के प्रयास में।


२. चिल्का में सुबह


इतना अच्छा लगा आज सुबह मुझे 

कैसे कहूँ?

इतना निर्मल नील यह आकाश, इतना असह्य सुंदर,

जैसे गुणी के कंठ की अबाध उन्मुक्त तान 

दिगंत से दिगंत तक;


इतना अच्छा लगा मुझे इस आकाश की ओर देखकर;

चारों ओर हरी पहाड़ियों से घिरा टेढ़ा-मेढ़ा, कोहरे में धुँआधार,

बीच में चिल्का चमक रहा है।


तुम पास आई, थोड़ी देर बैठी, फिर गई उधर,

स्टेशन पर गाड़ी आकर रुकी, वही देखने।

गाड़ी चली गई! - तुमसे इतना प्यार करता हूँ,

कैसे कहूँ?


आकाश में सूर्य की बाढ़, नहीं देखा जाता ।

गायें एकाग्र हो घास उखाड़ रही हैं, बेहद शांत!

-क्या तुमने कभी सोचा था कि इस झील के किनारे आकर हम वो पायेंगे 

जो इतने दिनों तक नहीं पाया?


रूपहला जल सो-सोकर स्वप्न देख रहा है; सारा आकाश

नील के स्रोत से झर पड़ा है उसके सीने पर 

सूर्य के चुम्बन से | यहाँ जल उठेगा अपरूप इंद्रधनुष

तुम्हारे और मेरे रक्त के समुद्र को घेर 

क्या कभी सोचा था?


कल चिल्का में नाव से जाते हुए हमने देखा था 

कितनी दूर से उड़कर आ रही हैं दो तितलियाँ 

जल के ऊपर से।- इतना दुस्साहस! तुम हँसी थी और मुझे 

बहुत अच्छा लगा था।


तुम्हारा वह उज्ज्वल अपरूप चेहरा। देखो, देखो,

कितना नीला है यह आकाश और तुम्हारी आँखों में 

काँप रहे हैं कितने आकाश, कितनी मृत्युएँ, कितने नए जन्म

कैसे कहूँ|


३.किसी मृतका के प्रति


'नहीं भूलूंगा' - इतने बड़े साहसिक शपथ के साथ

जीवन नहीं करता माफ | इसलिए मिथ्या अंगीकार हो |

तुम्हारी परम मुक्ति, हे क्षणिका, अकल्पित पथ में 

व्याप्त हो |  तुम्हारा चेहरा-माया में मिले, मिले 

घास-पत्तियों में, ऋतुरंग में, जल में-स्थल में, आकाश के नीले में |

केवल इस बात को हृदय के निभृत प्रकाश में

जला कर रखता हूँ इस रात में - तुम थी, फिर भी तुम थी|


४. रूपान्तर 


दिन मेरे कर्म के प्रहार से धूल धूसरित 

रात्रि मेरी ज्वलंत जाग्रत स्वप्न में|

धातु के संघर्ष में जागो, हे सुंदर, शुभ्र अग्निशिखा,

वायु हो वस्तुपुंज, चाँद हो नारी,

मृत्तिका के फूल हों आकाश के तारे|

जागो, हे पवित्र पद्म, जागो तुम प्राण के मृणाल में,

मुक्ति दो मुझे हमेशा के लिए क्षणिका की अम्लान क्षमा में,

क्षणिक को करो चिरंत|

देह हो मन, मन हो प्राण, प्राण हो मृत्यु का संगम,

मृत्यु हो देह , प्राण, मन 

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বুদ্ধদেব বসু


१. এই শীতে 


আমি যদি ম’রে যেতে পারতুম

এই শীতে,

গাছ যেমন ম’রে যায়,

সাপ যেমন ম’রে থাকে

সমস্ত দীর্ঘ শীত ভ’রে।


শীতের শেষে গাছ নতুন হ’য়ে ওঠে,

শিকড় থেকে উর্ধ্বে বেয়ে ওঠে তরুণ প্রাণরস,

ফুটে ওঠে চিক্কণ সবুজ পাতায়-পাতায়

আর অজস্র উদ্ধত ফুলে।


আর সাপ ঝরিয়ে দেয় তার খোলশ,

তার নতুন চামড়া শঙ্খের মতো কাজ-করা;

তার জিহ্বা ছুটে বেরিয়ে আসে আগুনের শিখার মতো,

যে-আগুন ভয় জানে না।


কেননা তারা ম’রে থাকে

সমস্ত দীর্ঘ শীত ভ’রে,

কেননা তারা মরতে জানে।


যদি আমিও ম’রে থাকতে পারতুম—

যদি পারতুম একেবারে শূন্য হ’য়ে যেতে,

ডুবে যেতে স্মৃতিহীন, স্বপ্নহীন অতল ঘুমের মধ্যে—

তবে আমাকে প্রতি মুহূর্তে ম’রে যেতে হ’তো না

এই বাঁচার চেষ্টায়,

খুশি হবার, খুশি করার,

ভালো লেখার, ভালোবাসার চেষ্টায়।


२. চিল্কায় সকাল


কী ভালো আমার লাগলো আজ এই সকালবেলায়

কেমন করে বলি?

কী নির্মল নীল এই আকাশ, কী অসহ্য সুন্দর,

যেন গুণীর কণ্ঠের অবাধ উন্মুক্ত তান

দিগন্ত থেকে দিগন্তে;


কী ভালো আমার লাগলো এই আকাশের দিকে তাকিয়ে;

চারদিক সবুজ পাহাড়ে আঁকাবাঁকা, কুয়াশায় ধোঁয়াটে,

মাঝখানে চিল্কা উঠছে ঝিলকিয়ে।


তুমি কাছে এলে, একটু বসলে, তারপর গেলে ওদিকে,

স্টেশনে গাড়ি এসে দাড়িয়েঁছে, তা-ই দেখতে।

গাড়ি চ’লে গেল!- কী ভালো তোমাকে বাসি,

কেমন করে বলি?


আকাশে সূর্যের বন্যা, তাকানো যায়না।

গোরুগুলো একমনে ঘাস ছিঁড়ছে, কী শান্ত!

-তুমি কি কখনো ভেবেছিলে এই হ্রদের ধারে এসে আমরা পাবো

যা এতদিন পাইনি?


রূপোলি জল শুয়ে-শুয়ে স্বপ্ন দেখছে; সমস্ত আকাশ

নীলের স্রোতে ঝরে পড়ছে তার বুকের উপর

সূর্যের চুম্বনে।-এখানে জ্ব’লে উঠবে অপরূপ ইন্দ্রধণু

তোমার আর আমার রক্তের সমুদ্রকে ঘিরে

কখনো কি ভেবেছিলে?


কাল চিল্কায় নৌকোয় যেতে-যেতে আমরা দেখেছিলাম

দুটো প্রজাপতি কতদূর থেকে উড়ে আসছে

জলের উপর দিয়ে।- কী দুঃসাহস! তুমি হেসেছিলে আর আমার

কী ভালো লেগেছিল।


তোমার সেই উজ্জ্বল অপরূপ মুখ। দ্যাখো, দ্যাখো,

কেমন নীল এই আকাশ-আর তোমার চোখে

কাঁপছে কত আকাশ, কত মৃত্যু, কত নতুন জন্ম

কেমন করে বলি।


३. কোনো মৃতার প্রতি


‘ভুলিবো না’ – এত বড় স্পর্ধিত শপথে

জীবন করে না ক্ষমা | তাই মিথ্যা অঙ্গিকার থাক |

তোমার চরম মুক্তি, হে ক্ষণিকা, অকল্পিত পথে

ব্যপ্ত হোক | তোমার মুখশ্রী-মায়া মিলাক, মিলাক

তৃণে-পত্রে, ঋতুরঙ্গে, জলে-স্থলে, আকাশের নীলে |

শুধু এই কথাটুকু হৃদয়ের নিভৃত আলোতে

জ্বেলে রাখি এই রাত্রে — তুমি ছিলে, তবু তুমি ছিলে |


४. রুপান্তর


দিন মোর কর্মের প্রহারে পাংশু,

রাত্রি মোর জ্বলন্ত জাগ্রত স্বপ্নে |

ধাতুর সংঘর্ষে জাগো, হে সুন্দর, শুভ্র অগ্নিশিখা,

বস্তুপুঞ্জ বায়ু হোক, চাঁদ হোক নারী,

মৃত্তিকার ফুল হোক আকাশের তারা |

জাগো, হে পবিত্র পদ্ম, জাগো তুমি প্রাণের মৃণালে,

চিরন্তনে মুক্তি দাও ক্ষণিকার অম্লান ক্ষমায়,

ক্ষণিকেরে কর চিরন্তন |

দেহ হোক মন, মন হোক প্রাণ, প্রাণে হোক মৃত্যুর সঙ্গম,

মৃত্যু হোক দেহ প্রাণ, মন